सोमवार, मार्च 24, 2014


साहित्य की मुख्य धारा में समकालीन गीत

(ग्वालियर गीत समारोह में दि.२३/३/१४ को दिया गया यह व्याख्यान )
# भारतेंदु मिश्र

साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है और वह कई मायने में है भी| अब यदि साहित्य की मुख्यधारा की बात करें तो उसमे गद्य की ही अनेक विधाए आती हैं|यह हमें स्वीकार करना होगा कि यह गद्य का युग है|अब गद्य और पद्य का भेद मिट गया है|अर्थात छन्दहीन नीरस वैचारिक कवितायेँ हमारे सामने हैं| जहां तक छंदोबद्ध कविता की बात की जाय तो वह आज मुख्य धारा में नहीं दिखाई देती| लगभग एक दशक से अधिक हो गया उत्तर आधुनिकता के प्रवाह में कवियों (राजेश जोशी) समालोचको (मैनेजर पाण्डेय,सुधीश पचौरी) आदि ने साहित्य की प्रासंगिकता को खासकर कविता की प्रासंगिकता को ही कठघरे में खडा कर दिया है|तात्पर्य यह कि बाजार और बाजारवादी इस समय में कविता या गीत की कोमल संवेदना के लिए अवसर नहीं बचा है|दूसरी ओर इसके कई कारण है कि एक तरफ हर बड़े शहर में हर मोहल्ले में दस बीस कवि अवश्य होने लगे हैं| अर्थात अधकचरे /अपरिपक्व कवियों की सूची लगातार बढ रही है धडाधड किताबें भी प्रकाशित हो रही हैं| गीतकार या व्यग्य कवि के रूप में जिस किसी कवि सम्मलेन के मंच पर देखें चार छह नए कवि – एक-दो नई कवयित्रियाँ जरूर मिल जाएंगी |उनके पास यत्र तत्र नए समय की मौलिक संवेदनाए भी हैं लेकिन उनमे धैर्य नहीं है|वे सब साहित्य के इस बाजार में ताजे उत्पाद या माल के तौर पर अपने आपको प्रस्तुत करने में लगे हैं|वो ज्यादातर पढ़ नहीं रहे हैं,केवल लिख रहे हैं| जो कवि साहित्य की परम्परा को जाने बिना आ रहे हैं उनके लिए कविताई खेल बन गया है| ..तो जो हमारे प्राचीन कवि ने कहा था –लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानेव है| -अर्थात कविताई खेल बन गया है/फैशन बन गया है| अधिकाँश गीत कविता उस दिशा में जा रही है|लगभग एक जैसे विचार और संवेदना सबके पास है और उसका बार बार प्रकटीकरण हो रहा है| ये संचार माध्यमो के प्रभाव से प्रतिदिन उपजने वाली तुकबन्दियाँ सार्थक कविता के रूप में रेखांकित नहीं की जा सकती|अखबारों में छपने वाली अवसर विशेष के लिए लिखी गयी तमाम गीत गजल कविताएं-उत्सवधर्मिता और बाजार को ही संवर्धित करती हैं,साहित्य को नहीं|
यह जो थोक में कविताए लिखी जा रही हैं वह विचार/विचारधारा के नाम पर भी हो सकता है राजनीति या एन.जी.ओ.के संगठन के विज्ञापन के तौर पर भी हो रहा है-जैसे कुमार विश्वास की चुनावी तुकबन्दियाँ| उत्सवधर्मिता के नाम पर तो लगातार तुकबाजी होती रही है|इसी बीच कविता का अनुशासन समाप्त हो रहा है,केवल छन्दानुशासन में लिखी गयी पंक्तियाँ कविताएँ नहीं मानी जा सकतीं|इसके बावजूद शिल्प में जहाँ कहीं नवीनता दिखती है वहाँ नई कविता/नवगीत या समकालीन गीत हो सकता है|तात्पर्य यह कि गीत कविता के नाम पर जो तमाम कचरा इकट्ठा हो रहा है उसमे से बहुत कम हिस्सा सार्थक गीत का है|
सार्थकता किसी भी कविता का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है|लेकिन सोचिए कि स्वतंत्रता दिवस /होली या दीपावली के अवसर पर आयोजित कवि सम्मलेन में कितनी नई संवेदनाओं की कवितायेँ /गीत लिखे जा सकते हैं| दूसरी बात यह कि उन तमाम कविताओं के पाठ्य रूप एक जैसे होंगे या नहीं| जिन्हें तुको का अभ्यास हो जाता है फिर वो कविराज हो जाते हैं चलते फिरते गीत बनाते रहते हैं,किन्तु उन तमाम गीतो को हम समकालीन गीत के खाते में नहीं जोड़ सकते|
वाल्मीकि की आदि कविता –शोक से उपजती है |आचार्यो ने कहा-शोक:श्लोकत्वमागत: -अर्थात शोक ही श्लोक बनकर फूट पडा|अरस्तू ने करुणा और दुःख के विरेचन को साहित्य का मूल मंत्र माना|..लेकिन वह कौन सी कविता या गीत हो जिसे समकालीन श्रेष्ठता के आधार पर परखा जाय या स्वीकार किया जाय-यह विचारणीय है|यहाँ गीतकारो में आत्ममुग्ध कवियों की एक विराट परम्परा है|
इसलिए मेरे हिसाब से जो कविसम्मेलनो में जाकर तरह तरह से आलाप भरते हैं |और गायन/प्रस्तुति से अपने गीत की कमियों को ढकने का प्रयास करते हैं वे श्रेष्ठ कवि /गीतकार/नवगीतकार नहीं हो सकते| सुर ताल और आलाप संगीत का विषय हैं कविता का नहीं|कविता में शब्द की शक्तियां होती है-अभिधा लक्षणा और व्यंजना|हमारे आदि काव्यशास्त्रकार भरत से लेकर आचार्य विश्वनाथ और रामचंद्र शुक्ल तक ने कवि के लिए गाना अनिवार्य नहीं बताया|
काव्यपाठ शैली /छन्दपाठ शैली अलग चीज है|भाषा की शुद्धता छंद की मात्राओं आदि की बात सभी ने अवश्य की है|गायन और प्रस्तुतीकरण-नाटक और संगीत का विषय है|
हमारे यहाँ समाज में भी नौटंकीबाज को गंभीर कवि नहीं माना गया|यहाँ जो -वाह वाह इंडिया -में हो आया या जो लालकिले से गीत पढ़ आया उसे ही हम बड़ा गीतकार मान लेते हैं| तो क्या कुमार विश्वास और शैलेश लोढा हमारे इस समय के बड़े गीतकार हैं ?बिलकुल नहीं | कवि सम्मलेन शुद्ध रूप से चारणों और भाँड़ो द्वारा किया जाने वाला एक तरह का नाटक ही होता है,जिसका आयोजन कुछ उत्सव धर्मी व्यापारी और दलाल मिलकर करते हैं|जिसका उद्देश्य साहित्य नहीं होता |जहां लोग कोशिश करते है ताली पिटाऊ गीत पढ़ें|ऐसे अधिकाँश गीतकारो के पास समकालीन श्रेष्ठ गीत नहीं मिलते| यह आप स्वयं भी जांच सकते हैं ऐसे बड़े मंचीय गीतकारो के गीत कभी एकांत में पढ़िए और उनका विवेचन करने का प्रयत्न भी कीजिए|कुछ न कर सकें तो पूरे गीत में कर्ता और क्रिया ही खोज लीजिए|अर्थात उसका व्याकरण ही देख जाइए|आपको बहुत निराशा होगी ,हो सकता है बाल नोचने की नौबत भी आ जाए| अक्सर छंद भी खंडित हो सकता है|आलाप लेते समय या सुर ताल लगाते समय छंद की मात्राएँ कम या ज्यादा हो जाती हैं| अर्थात यह समझ लीजिए कि मंचीय गीत का सार्थक गीत से कोई सरोकार नहीं हो सकता|-काव्यं गीतेन हन्यते|(गाये जाने से कविताई नष्ट हो जाती है|) जो गीतकार मंच के प्रपंच से बाहर निकलने को तैयार नहीं है,उन्हें समकालीन गीत की समीक्षा के संदर्भ में कैसे गिना जा सकता है ? कुछ कुंअर बेचैन जैसे मंचीय गीतकार ऐसे भी हैं जिनके पास कुछ बहुत अच्छे गीत हैं लेकिन मंचीयता के चलते उनके सार्थक गीत भी प्रभाव शून्य और प्रभाहीन हो गए|
मंच भी न छूटे सार्थकता भी बनी रहे ऐसा विलक्षण गीत रचना करना आज के युग में संभव नहीं है|अर्थात जहां ये सब कमियाँ दिखाई देती है उस कवि या गीतकार से हमें कोई आशा नहीं करनी चाहिए|यदि हम समकालीन गीत के खाते में श्रृंगार –वीर-आदि पारम्परिक विषयो को शामिल कर लें और उत्सव धर्मिता को भी किसी हद तक शामिल करे तो करोडो की संख्या में कवि दिखाई देने लगेंगे| उदाहरणार्थ –सरस्वती वन्दना या राधा कृष्ण प्रेम या धार्मिक मंचो के गीत के रूप लिखे गए कीर्तन ही कई करोड़ की संख्या में होंगे|उन्हें समकालीन श्रेष्ठ गीत के उदाहरण के रूप में नहीं देखा जा सकता|क्योकि ये अधिकांश गीत हमारी गंभीर संवेदना को नहीं छू पाते और मनुष्य की चेतना का परिसंस्कार नहीं करते|इसी प्रकार पन्द्रह अगस्त या गांधी जयन्ती, ईद मिलन जैसे समारोहों के लिए करोडो की संख्या में गीत लिखे गए होंगे और साल दर साल लिखे जा रहे हैं,उन्हें भी समकालीन गीत के खाते में नहीं जोड़ा जा सकता|मुंडन या जन्म दिन पर भी हमारे मित्र गीत गाने में व्यस्त दिखाई देते हैं|वह चारण कर्म हो सकता है कविताई नहीं|वह सब समीक्षा की दृष्टि से समकालीन गीत में शामिल नहीं किया जा सकता |
इसके बाद जो कुछ बचता है वह अधिकांश नवगीत की तरह कवियों ने लिखा है यदि उसे ही समकालीन गीत मान लेने से आशय है तो यह समीचीन हो सकता है|इस पर विचार किया जा सकता है|अर्थात जो नवगीत की परम्परा से आगे का गीत है वही समकालीन गीत है| नवगीत का काल लगभग चार दशको (१९६० से २००० )तक फैला है|निश्चित है कि अब नवगीत का नारा भी पुराना पड़ने लगा है,लेकिन लोग अभी भी नवगीत की प्रवृत्तियो के साथ काम कर रहे हैं|हमें समकालीन गीत पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है|सार्थक समकालीन गीतकारो में – मुकुटबिहारी सरोज,शंभुनाथासिंह ,रमेश रंजक ,वीरेन्द्र मिश्र , नईम ,देवेन्द्र शर्मा इंद्र ,उमाकांत मालवीय,कुमार रवीन्द्र, माहेश्वर तिवारी ,राजेन्द्र गौतम ,महेश अनघ,कैलाश गौतम ,दिनेश सिंह, अवध बिहारी श्रीवास्तव,शान्ति सुमन ,इंदिरा मोहन,राजकुमारी रश्मि, इसाक अश्क ,राम अधीर ,मयंक श्रीवास्तव ,पूर्णिमा वर्मन ,दिवाकर वर्मा ,योगेन्द्र दत्त शर्मा,नचिकेता ,सत्यनारायण, ओमप्रकाश सिंह ,मधुकर अष्ठाना, विनोद श्रीवास्तव,यश मालवीय,निर्मल शुक्ल ,पूर्णिमा वर्मन ,दिनेश प्रभात,मनोज जैन मधुर,ब्रजेश श्रीवास्तव,ब्रिजनाथ श्रीवास्तव आदि अनेक नाम हैं-इनमें से कुछ नाम तो ऐसे भी हैं जो लगातार गीत /नवगीत या समकालीन गीत को साहित्य की मुख्य धारा में केंद्रित करने के प्रयास में संलग्न हैं|अंतरजाल पर नवगीत /गीत केन्द्रित पत्रिका अभिव्यक्ति –अनुभूति अधिकाँश गीतकारों को चकित कर रही है| पूर्णिमा जी तो कई वर्षो से इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रही हैं| वहां नवगीत की पाठशाला भी चल रही है| आप जाने या न जानें,बहरहाल दुनिया भर में गीत प्रेमी लोग उन्हें जान चुके हैं|

अब ज़रा अकादमियो और विश्वविद्यालयों में साहित्य की मुख्यधारा की बात करें तो समीक्षा की दृष्टि से समकालीन गीत पर कोई विमर्श प्राय: साहित्य अकादमी जैसे केन्द्रीय साहित्यिक मंच आदि से पिछले कई दशकों में मैंने नहीं देखा सुना|यहाँ तो छंदोबद्ध कविता ही हाशिए में है|यहाँ समकालीन कविता पर हालांकि अक्सर बात होती है कविता पाठ आदि भी होते हैं ,लेकिन समकालीन गीत पर कोई बात नहीं होती|इस दुखद स्थिति के लिए भी हमारे गीतकार ही जिम्मेदार हैं|क्योकि गीतकार समीक्षा के लिए तैयार नही होते|आत्ममुग्धता के चलते उदार आलोचना भी उन्हें स्वीकार्य नहीं होती|कोई करना भी चाहे तो दुश्मनी मोल लेने जैसा काम हो जाता है|मैं ये जोखिम उठा चुका हूँ और मित्रो को अमित्र बना चुका हूँ|..तो ये जो तलवार की धार पे धावनो है – कविताई, उसकी चिंता कौन करे और क्यों करे? अत:साहित्य की मुख्यधारा यदि कोई है तो उसमे गीत तो कतई शामिल नहीं है| जो गीत पाठ्यक्रम आदि में (प्रसाद-निराला-माखनलाल चतुर्वेदी-महादेवी वर्मा -राम नरेश त्रिपाठी-नागार्जुन-त्रिलोचन-केदार नाथ अग्रवाल-मुकुट बिहारी सरोज-शंभुनाथ सिंह –वीरेन्द्र मिश्र -नीरज–रमेश रंजक ) शामिल दिखाई देते हैं वे पचासों वर्ष पहले के लिखे हुए हैं उन्हें हम समकालीन गीत कहकर खुश हो सकते हैं|कुछ उनमे से आज भी समकालीन और प्रासंगिक लगते हैं |लेकिन हम जानते हैं कि वे हमारे नए समय की नई संवेदना को प्रभावित करने वाले गीत नहीं हैं|
हालांकि मध्य प्रदेश से ही अनेक गीत पत्रिकाएं निकलती रही हैं –समान्तर-इसाक अश्क ,संकल्प रथ-राम अधीर ,प्रेसमेन-मयंक श्रीवास्तव ,शिवम पूर्णा,अंतरा ,गीत गागर आदि सब मध्यप्रदेश से ही निकलने वाली पत्रिकाएं हैं |किसी भी अन्य प्रदेश में गीत को लेकर इतनी तत्परता नही दिखाई देती लेकिन तार्किकता और वैचारिक सजगता यहाँ भी नहीं दिखती| दूसरी ओर अब साहित्य आकादमी की पत्रिका हो या कथादेश अथवा वागर्थ,प्राय: सभी पत्रिकाओं में सार्थक गीत को जगह मिलने लगी है|इसके बावजूद गीत/गज़ल /घनाक्षरी आदि साहित्य की मुख्यधारा में नहीं है|मुख्यधारा में जो कविताए/विधाएं होती हैं उन पर लगातार विमर्श होता रहता है| यहाँ आत्मसंमोहन का आसव छके हुए अधिकाँश दोहरे व्यक्तित्व वाले स्वनामधन्य गीतकारो से विमर्श की बात करना बेमानी है|समालोचना उन्हें सहन नहीं होती|ऐसे में साहित्य की मुख्य धारा में गीत की बात करना निरर्थक होगा |क्योकि मुख्यधारा तो समावेशी होती है|वहां वैयक्तिकता के लिए कोइ शान नहीं होता|किसी एक संस्कृति या सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना सही नहीं हो सकती|हमारी भारतीयता विविध संस्कृतियों के रंगों से निर्मित हुई है|हमारे गीतों में कहीं किसान चेतना,दलित चेतना या स्त्री विमर्श की बात की गयी है क्या? या की जा रही है ?साहित्य की मुख्यधारा में ये सब विमर्श भी शामिल करना होगा|ध्यान रहे कि किसान का चित्रण या दलित वर्णन और स्त्री वर्णन की बात मै यहाँ नहीं कर रहा हूँ|वर्णन और विमर्श में बहुत अंतर होता है| पहले विमर्श कर लें और तय कर लें कि साहित्य की मुख्य धारा में शामिल किए जाने वाले कौन से गीत हैं या कौन से गीतकार हैं|तब आगे इस विषय पर बात हो सकती है|
दूसरी ओर मुझे तो-मानव जहां बैल घोड़ा है/कैसा तन मन का जोड़ा है|
या कि—सुख का दिन डूबे डूब जाय/तुमसे न तनिक मन ऊब जाय|
जैसी पंक्तिया देने वाले कालजयी कवि निराला के गीत आज भी प्रासंगिक और समकालीन लगते हैं | ग्वालियर के ही मुकुट बिहारी सरोज और महेश अनघ के गीत समकालीन और प्रासंगिक भी जान पड़ते हैं |आप उन्हें मुख्यधारा का माने या न मानें|लेकिन ..अगर उन्हें मुख्यधारा का गीतकार माना होता तो अब तक किसी न किसी गीत पत्रिका का उनपर विशेषांक आ चुका होता|उन्हें लेकर विस्तार से गीत की चर्चा हुई होती|मेरी जानकारी में शायद –शंभुनाथ सिंह ,ठाकुर प्रसाद सिंह ,उमाकांत मालवीय,वीरेन्द्र मिश्र ,जानकीवल्लभ शास्त्री,मुकुट बिहारी सरोज,महेश अनघ ,कैलाश गौतम ,दिनेश सिंह जैसे गीतकारो पर एकाग्र किसी पत्रिका का अंक नहीं संपादित किया गया|यदि कहीं छुटपुट अंक आए भी हों तो इनकी रचनाधर्मिता पर विस्तार से बातचीत तो कतई नहीं हुई|शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशको पर भी चर्चा नहीं हुई|इस दिशा में रामअधीर जी ने संकल्प रथ के कुछ विशेषांक तो निकाले हैं बाकी सन्नाटा है , तो फिर बताएं गीत मुख्यधारा में कहाँ है? किसी एक गीत पत्रिका के प्रयास को साहित्य की मुख्यधारा कैसे माना जा सकता है? मेरे तेरे गीतों को एक किसी स्थानीय पत्रिका में छप जाने से गीत साहित्य की मुख्यधारा में नहीं आ सकता|लोगो के लिए गीत जीने मरने का सवाल बिलकुल भी नहीं है|गीत को मुख्यधारा में स्थापित करने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है|सबसे पहले गीत में घुसा हुआ -मंच और प्रपंच वाला हिस्सा काट कर अलग फेंकना होगा |उसके बाद तर्क की छेनी और व्याकरण की हथौड़ी लेकर समकालीन गीत की नई तस्बीर गढ़नी होगी|इस अवसर पर याद करना चाहता हूँ भवानी दादा को जिनकी जन्मशती चल रही है |उन्होंने मंचीय गीतकारो पर व्यंग्य करते हुए कहा था-
जी हाँ हुज़ूर
मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के
गीत बेचता हूँ
मैं क़िस्म-क़िस्म के
गीत बेचता हूँ|

शायद इसी मंचीयता के विरोध के कारण उनपर किसी गीत पत्रिका ने विशेषांक नहीं निकाला |और अंत में धन्यवाद-ग्वालियर के सुधी मित्रो का जिन्होंने मुझे कुछ कहने का सुखद अवसर दिया , खासकर ब्रजेश जी का जिन्होंने मुझे यहाँ बुलाने की कृपा की और यह ग्वालियर का इतना रसज्ञ मंच प्रदान किया|

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मंगलवार, फ़रवरी 04, 2014




आज भी प्रासंगिक हैं
गीत निराला के

भारतेन्दु मिश्र

युग बीत गया,निराला की कविता नही रीती। वो आज भी प्रासंगिक हैं उनके गीत कालजयी हैं। छन्दोबद्ध कवियों को निराला से बहुत कुछ सीखना है। सन-1923 में निराला का पहला कविता संग्रह –अनामिका- प्रकाशित हुआ। अनामिका में ही अधिवास शीर्षक एक कविता है जिसमें निराला कहते हैं-
मैने मै शैली अपनायी
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पडी हृदय में झट उमड वेदना आयी।
यह कविता सन 1923 या उससे कुछ पहले की ही होनी चाहिए,बहरहाल निराला की कविता का प्रयोजन उनकी इन्ही पंक्तियों से साफ झलकता है कि निराला दुखदग्ध मनुष्य की वेदना के कवि हैं। असल में निराला करुणा के कवि हैं। सरोज स्मृति हिन्दी का पहला शोक गीत है। घनघोर शोक की दशा में भी निराला छन्द नही तोडते। वे दुख को गरल समझकर पी जाने वाले सिद्ध कवि हैं। वे असहाय दीन दुखियों के दुखों के गीतकार हैं। यह वह समय था जब अधिकांश रचनाकार स्वतंत्रता की लडाई के गीत लिख रहे थे। हालाँकि कुछ कवि धर्म और दर्शन की पहेलियाँ सुलझाने में भी लगे थे।निराला की इसी जमीन पर पढीस और बंशीधर शुक्ल जैसे किसान चेतना के कवि भी इसी समय में हुए। यह वह समय था जब भारतीय जीवन मे बहुत तेजी से बदलाव हो रहे थे,लेकिन निराला ने छन्द नही छोडा बल्कि वो तो नए से नए छन्दविधान को स्वर देने मे लगे थे। अत: निराला छन्द साधना के कवि हैं। जब वो कहते हैं -मैने मैं शैली अपनायी- तो इसका अर्थ यही है कि वो अपने समय के छायावादी कवियों से हटकर अपना मार्ग बना रहे थे। यहीं से उनकी मौलिकता का अन्दाज लगाया जा सकता है। निराला के इसी वाक्य को लेकर कुछ आलोचको ने उन्हे छन्दमुक्त कविता का प्रवर्तक और स्वच्छन्दतावादी कवि सिद्ध करने की कोशिश की है,जबकि यह पूरा सच नही था। यदि ऐसा होता तो निराला छन्दहीन कविताएँ ही रचते रहते। निराला तो संवाद धर्मी गीत लिख रहे थे।
-बाँधों न नाव इस ठाँव बन्धु /पूँछेगा सारा गाँव बन्धु। जैसे अनेक गीत निराला ने रचे हैं।किसान चेतना और ग्राम्य जीवन के बहुत से चित्र निराला के गीतों की शक्ति बनकर उभरते हैं ।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-‘जैसे और सब बातो की वैसे ही संगीत के अंगरेजी ढंग की नकल पहले बंगाल में शुरू हुई|इस नए ढंग की और निराला जी सबसे पहले आकर्षित हुए और अपने गीतों में उन्होंने उसका पूरा जौहर दिखाया|संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के अधिक निकट लाने का सबसे अधिक प्रयास निराला जी ने किया|’(पृ.497 ,हिन्दी साहित्य का इतिहास ,)इसी के साथ आचार्य शुक्ल आगे बताते है कि निराला जी ने सामाजिक बन्धनों के साथ ही छंद के बंधन भी छोड़ दिए थे-‘जिस प्रकार निराला जी को छंद के बंधन अरुचिकर हैं उसी प्रकार सामाजिक बंधन भी|’(पृ.499 वही)
बहरहाल निराला की रचनावली में जो कविताएँ संकलित हैं उन्हे देखकर यह साफ हो जाता है कि वे अंततक छन्दोबद्ध कविताएँ ही लिखते रहे,बल्कि निराला नए छन्दो का सृजन भी करते रहे। कविता की अखण्ड लय ही निराला की साधना का मूल है। वे उन विरल कवियो में से हैं जिन्हे संगीत का भी पूरा ज्ञान है। वे राग रागनियों में निबद्ध गीतो की रचना भी करते हैं। उनके अनेक गीतों का सुर ताल सधा हुआ है। वे पक्के राग मे भी गाये जाते हैं। वे सहज रूप मे ही नवगीत की परिभाषा देते हुए चलते हैं-
नवगति नव लय ताल छन्द नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दे।..वरदे वीणावादिनि वर दे।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री ने अपनी पुस्तक –अनकहा निराला- मे इस बात पर विशेष बल दिया है और निराला के गीतों मे प्रयुक्त रागों की विस्तार से चर्चा करते हुए वे कहते हैं-‘वैसे तो निराला जी ने चित्र और संगीत हीन एक पंक्ति भी नही लिखी ,किंतु कभी कभी उनमें कुछ ऐसा लोकोत्तर अनोखापन आ गया है कि देखते ही बनता है। पृ.194(अनकहा निराला) निराला महाप्राण हैं क्योकि उनके गीतो में दीन जन के प्राण बजते हुए सुने जा सकते हैं। निर्धन लाचार लोगों की पीडा का स्वर उनके गीतो मे सुना जा सकता है। वे छायावाद के निरे सुकुमार कवि नही हैं,वे रहस्यवाद के चमत्कारी कवि भी नही हैं।वे तो प्रगतिशील चेतना के गीतकार हैं।छायावादोत्तर -नवगीत,जनगीत आदि अनेक प्रगतिशील आन्दोलनो को उर्वर भूमि निराला के गीतों से ही मिलती है। संवेदना का जो मार्मिक विस्तार निराला अपने गीतों द्वारा कर चुके हैं उससे बहुत कुछ आगे हमारे गीतकार नही बढ पाये हैं।वैचारिक स्तर पर निराला समाज के अतिदीन दुखी दलित और अंतिम पंक्ति मे खडे व्यक्ति के दुखों की समीक्षा ही नही करते बल्कि सामंतों को टोकते हुए चलते हैं।सन 1929 के आसपास लिखे गये गीत का अंश देखिए-
छोड दो जीवन यों न मलो
ऐठ अकड उसके पथ से तुम रथ पर यों न चलो।
यह पूरा गीत उस समय के सामंतवादी ठाठ के खिलाफ आम आदमी के साथ खडे हुए निराला की गवाही देता है।यह है निराला की काव्य चेतना सामंतवादी ऐठ अकड के खिलाफ दलित जन का समर्थन करती है। निराला यहाँ सच्चे समाजवादी दिखाई देते हैं।दीन दुखी जन के हित में निराला किसी हठयोगी की तरह डटे हुए दिखाई देते हैं तो कहीं ईश्वर से प्रार्थना करते हुए तुलसी जैसे संत कवियों के समीप खडे मिलते हैं- दलित जन पर करो करुणा दीनता पर उतर आये प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा। ध्यान देने की बात यह है कि निराला का भक्तिभाव स्वर्ग मोक्ष प्राप्त करने वाला नही है। वे तो अपने सब संचित फल लुटाने वाले हैं।भिक्षुक शीर्षक कविता भी उनकी प्रारम्भिक कविताओ में है। भिक्षुक की लाचारी का इतना सजीव चित्रण सम्भवत:हिन्दी कविता में निराला से पहले अन्यत्र नही मिलता। कलेजे के दो टुकडे करने वाला मार्मिक डृश्य अपना कलेजा चीर कर निराला देखते हैं और दिखाते हैं। करुणा ही चीत्कार करती है निराला की कविता में। इस पूरी कविता को पढने के बाद उनके समय की भुखमरी से उत्पन्न लाचारी का स्पष्ट आकलन किया जा सकता है। निराला का भिक्षुक आजकल जैसा पेशेवर भिखारी नही है-
वह आता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता।
भीख माँगने वाले आज भी कम नही हुए हैं बल्कि पेशेवर हो गये हैं। विचारधाराएँ और सरकारें दमतोड चुकी हैं। निराला के भिक्षुक के मन में पश्चात्ताप है। यह बोध ही उसे पेशेवर भिखारियो से अलग करता है। शायद इसीलिए निराला की करुणा फूटकर बह निकली है। निराला कल्पना की कोई गुलाबी उडान के कवि नही हैं। वे असल मे जनकवि भी हैं,महाप्राणत्व की प्रतिष्ठा भी उन्ही में है। यह कविता निराला के श्रेष्ठ प्रगीतो में से एक है। निराला अपने समय में छायावादी रोमानियत को फलाँग कर आगे बढे हैं। अपने समय मे वैचारिक स्तर पर आगे बढना ही तो प्रगतिशीलता है। किसी दल की सदस्यता लेकर किसी खेमे मे शामिल होकर निराला प्रगतिशील नही बने, बल्कि वे तो प्रगति शीलता के अग्रदूत हैं। इसी क्रम में पत्थर तोडती महिला बिम्ब देखें-
वह तोडती पत्थर
देखते देखा उसे मैने इलाहाबाद के पथ पर।
हिन्दी में इस तरह की छान्दसिक कविताएँ निराला से पहले नही लिखी गयीं जिनमें मज्दूर महिला का श्रम सौन्दर्य अंकित हो। ऐसे प्रगीत लिखना तो बहुत बडी साधना की बात है। उनके गीतो मे बिम्बो और प्रतीको के भटकाऊ जंगल नही हैं। उनकी कविताओ में अंत:सलिला की तरह लय धडकती है। वे सीधी सादी भाषा में सुकोमल और भीषण संवेदना के मर्मस्पर्शी कवि हैं। इसी लिए जानकीवल्लभ शास्त्री उन्हे विरोधो के सामंजस्य का कवि कहते हैं। सुकोमल संवेदना की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रणय और दाम्पत्य के विरल गीत अपने समय में निराला ने रचे हैं,गृहरति व्यंजना का स्वर देखें-
सुख का दिन डूबे डूब जाय
तुमसे न सहज मन ऊब जाय।
खुल जाय न गाँठ मिली मन की
लुट जाय न राशि उठी धन की
सारा जग रूठे रूठ जाय।
जहाँ सहज सौन्दर्य की उन्नत राशि है और जिस दाम्पत्य में एक मन के साथ दूसरे मन की गाँठ कसी है वह बना रहे बेशक काल्पनिक या अनिर्वचनीय सुख का दिन डूबता है तो डूब जाये। फिर तो निराला सारी दुनिया की भी बात नही मानते। दाम्पत्य बोध का ऐसा सुन्दर गीत अन्यत्र हिन्दी मैने नही पढा। इसी प्रकार एक और गीत में दाम्पत्य बोध का निराला का यही स्वर दृष्टव्य है निराला यहाँ भी अपने समकालीनों से अलग अपनी पहचान के साथ खडे हैं-
जैसे हम हैं वैसे ही रहें लिए हाथ एक दूसरे का अतिशय सुख के सागर में बहें।
एक और चित्र देखें-
पिय के हाथ जागाये जागी
ऐसी मैं सो गयी अभागी।
सहयोग साहचर्य और बहुत कुछ संत मत के निकट के सुन्दर चित्र निराला की कविता मे साफ तौर से दिखाई देते हैं जो अपनी सहजता और अनुभूति के कारण आकर्षक लगते हैं। निराला बहुआयामी कवि हैं उनकी कविता के अनेक स्तर हैं उनकी कविता के अनेक स्वर हैं। वो किसी एक विचार या विचारधारा में बँधकर नही चलते। जो नई राह बनाते हैं वो बनी बनायी राह पर कैसे चल सकते हैं। हम कह सकते हैं कि निराला वसुधैव कुटुम्बकं के कवि हैं। जानकीवल्लभ शास्त्री के अनुसार-“ निराला अद्वैतवादी भी हैं,द्वैतवादी भी हैं,भक्त भी हैं और ज्ञानी भी और क्रांतिकारी भी,लौह प्रहार तथा ललकार भी और और आत्म परमात्म मिलन की मधुर झंकार भी।वह वैयक्तिक अनुभूतियों के स्वर्ग में विचरने वाला मुक्त विहग भी हैऔर पतनोन्मुख रूढ प्रिय संस्कृति की विहग बालिका के लिए भयंकर बाज भी,उसमें लौकिक प्रेम की ललक भी है और आध्यात्मिक भूमि पर अनुभूति का आत्मपुलक भी,निराला विरोधों का स्वयं सामंजस्य और सामंजस्यो का विरोध हैं।“ (पृ.117 अनकहा निराला)
यहाँ साफ शब्दों मे कहें तो निराला सिद्ध रचनाकार साबित होते हैं। वो कुशल रचनाकार की तरह सब विचार धाराओ मे से जन्नोन्मुखी संवेदना का चुनाव करते हैं। कुछ कबीर की तरह ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ वाली मुद्रा में। अपनी इन्ही विशेषताओ के कारण निराला आधुनिक युग के विशिष्त और युग प्रवर्तक कवि हैं।उनके गीतो को भी मार्क्स,फ्रायड,लोहिया या विवेकानन्द ,अम्बेडकर अथवा गान्धी में से किसी एक की विचारधारा से जोडकर नही देखा जा सकता। निराला इन सभी अपने समय के महापुरुषों के विचारों को सुन समझकर अपनी राह बनाते हैं सम्भवत: इसी लिए वो कहते हैं-“मैने मैं शैली अपनायी”। निराला को जब जो अपने रचनासमय के लिए उपयुक्त जान पडा उसे गृहण किया और जो अनुपयुक्त जान पडा उसे छोड दिया।
निरला की रचनावली और विशेषकर आराधना में प्रकाशित गीतों को पढने से लगता है निराला भक्त कवि हैं।निराला के गीतों मे सूर तुलसी मीरा आदि भक्त कवियों की सी संवेदना की तडप विद्यमान है।यद्यपि वो धार्मिक कर्मकाण्ड वाली आस्था के कवि नही हैं जहाँ एक ओर कहीं वो अपने गीतों में नाम जपने का संकेत देते हैं तो वहीं दूसरी ताल ठोककर खडे होते हैं। राम की शक्ति पूजा में निराला की ओजस्विता और काव्य शक्ति की अनेक भंगिमाएँ स्पष्ट होती हैं तो दूसरी ओर उनके अनेक गीत सहजा भक्ति के मार्ग का अवलम्बन करते हैं। उदाहरणार्थ-

नाचो हे रुद्र ताल/आँचो जग ऋजु अराल।
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दुख के सुख पियो ज्वाला/शंकर के स्मर-शर की हाला।
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कामरूप हरो काम/जपूँ नाम राम-राम।
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वरदे वीणा वादिनि वर दे
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भारति जय विजय करे/कनक शस्य-कमल धरे।

यह अपने निजी सुख स्वार्थ पूर्ति या स्वर्ग सुख की कामना या ईस्वर से वरदान माँगने की निरी मानवीय मुद्रा नही है। यह निराला का युगधर्म भी है और व्यक्तिगत जीवन का सत्य भी। निराला के गीतो के पुनर्पाठ और नयी पाठचर्या की आवश्यकता है। उनकी छन्दसिक रचनाएँ ही उनके मनोभावो के भेद खोल सकती हैं। वे निरे
प्रयोगवादी भी नही हैं। निराला साफ करते हैं अपने भक्ति भाव को और कहते हैं-
नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणो पर माँ
मेरे श्रम संचित सब फल।
आम तौर पर भक्ति और प्रगति दोनो पृथक मार्ग हैं किंतु निराला की भक्ति में उनकी प्रगतिशीलता साफ नजर आती है-जब वो कहते हैं नर जीवन के स्वार्थ सकल अर्थात मनुष्य जीवन के असंख्य छोटे बडे व्यक्तिगत स्वार्थ सबका बलिदान करता हूँ। इसके आगे कहते हैं–श्रम संचित सब फल-अर्थात अपने परिश्रम से अर्जित कर्मफल का ही अर्पण है। किसी अन्य पूर्वज या अनुज द्वारा अर्जित किसी फल या सम्पदा की बात नही कर रहे हैं निराला क्योकि मनुष्य का अपने श्रम द्वारा अर्जित फल पर ही नैतिक अधिकार होता है। इसके बदले में किसी फल की कामना तो है ही नही । हम इसे निराला की राष्ट्रीय चेतना के रूप में भी व्याख्यायित कर सकते हैं। तात्पर्य यह कि निराला के गीतो में कथ्य और संवेदना के जितने स्तर हैं कदाचित ही किसी दूसरे कवि के पास हों। अत: यह मान लेना कि केवल वैचारिकता के आग्रह में निराला ने छन्द तोड दिया,सही नही है। इस बात को स्वयं उनके गीत ही प्रमाणित करते हैं जहाँ वो नए शिल्प में नयी लय लेकर उपस्थित होते हैं। निराला अपनी सर्जना से तमाम छन्दविरोधियों को उत्तर देते है जैसे शक्ति पूजा में उन्होने राम को सन्देश दिलाया है-“आराधन का दृढ आराधन से दो उत्तर।“ वो सिद्धावस्था के जाग्रत कवि हैं। इसी लिए निराला नयी कविता ही नही नवगीत,जनगीत जैसे आन्दोलनो के प्रेरणा पुरुष के रूप में देखे जाते हैं। नवगीत जनगीत जैसे आन्दोलनो की जो पृष्ठभूमि सन 1950 के आसपास तैयार हो रही थी निराला उस दिशा में 1943 मे ही सार्थक प्रयोग कर चुके थे। बाद में अणिमा में संकलित उनका यह गीत देखिए-
चूँकि यहाँ दाना है इसीलिए दीन है ,दीवाना है। लोग हैं महफिल है नग्में हैं ,साज है,दिलदार है और दिल है शम्मा है,परवाना है। निराला अपने समाज के उपेक्षित जन के लिए अपनी कविता के औजार से लडते रहे। युगदृष्टा साहित्यकार हमेशा से ही अपने समय की समालोचना में उपेक्षा का शिकार रहा है। निराला भी शिकार हुए तब निराला ने अपने समय के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को सम्बोधित यह गीत लिखा-
जब से एफ.ए.फेल हुआ है/हमारे कालेज का बचुआ
नाक दबाकर सम्पुट साधै/महादेव जी को आराधै
भंग छानकर रोज रात को/ खाता माल पुआ
बाल्मीकि को बाबा मानै/नाना व्यासदेव को जानै
चाचा महिषासुर को,दुर्गा जी को सगी बुआ
हिन्दी का लिक्खाड बडा वह/जब देखो तब अडा पडा वह
छायावाद रहस्यवाद के/भावो का बटुआ
धीरे धीरे रगड-रगड कर/श्री गणेश से झगड झगड कर
नत्थाराम बन गया है अब /पहले का नथुआ।
जिस कवि मे आलोचक से आँख मिलाकर बात करने और ताल ठोककर दो हाथ करने की क्षमता होगी वही निराला के स्वाभिमान और उनके गीत की लय को पकड सकता है। बाद मे शुक्ल जी ने निराला जी को पढा भी और उनपर लिखा भी। समर्थ रचनाकार आलोचना की बैसाखी के सहारे खडा नही होता। निराला को अपनी रचना पर दृढ विस्वास था। यह आत्मविश्वास ही उनकी मैं शैली है। कहना न होगा कि निराला के गीत कहीं न कहीं कालिदास,जयदेव,तो कहीं तुलसी मीरा,तो कहीं गुरुदेव रवीन्द्र की गीत परम्परा को आगे बढाते हैं। निराला के गीत इस सीमा तक अपने कथ्य भाषिक-व्यंजना और सवेदना से नए हैं कि बाद के गीतोन्मुख तमाम आन्दोलन उनकी रचनाशीलता का परिविस्तार ही साबित होते हैं। निराला के परवर्ती प्रमुख कवियों में नागार्जुन,त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल आदि सभी प्रगतिशीलो ने भी गीत की शक्ति विस्तार ही दिया। निराला के नवगीतो की बानगी देखें- मानव जहाँ बैल घोडा है कैसा तन मन का जोडा है। तथा- बान कूटता है ऐसे बैठे ठाले सुख का राज लूटता है। मुक्तिबोध कविता में जिस मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा करते हैं और डाँ. रामविलास शर्मा जिस श्रम सौन्दर्य की बात करते हैं उसकी रूपरेखा हिन्दी नवगीत के शिल्प मे निराला की देन है।विशेषता यह भी है कि निराला का चिंतन भारतीय काव्यमूल्यो से अनुप्राणित है। अत: उनके गीतों की विवेचना भी भारतीय परिवेष मे विकसित मूल्यों के आधार पर ही की जा सकती है। निराला की कविता में वाक्य और अर्थ कहीं लँगडाता नही है। विराम और अर्धविराम चिन्हों तक का प्रयोग निराला करते चलते हैं।
तात्पर्य यह कि वो अपने पाठ्य को लेकर पूरी तरह सजग हैं।यही कारण है कि निराला के गीत पाठ्य और श्रव्य दोनो रूपों मे सहृदयो को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं। निराला ने अपनी कविता के जो मानदण्ड बनाये वो निभाये। इसे ही उन्होने मैं शैली कहा है।घनघोर निराशा की स्थिति में भी वह आशा की किरण खोज ही लेते हैं।आसन्न मृत्यु की स्थिति में संकट की स्थिति में भी निराला गीत का साथ नही छोडते।अपनी अंतिम गीत रचना में वो कहते हैं-
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
आशा का प्रदीप जलता है हृदय कुंज में
अन्धकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है
दिंड्निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र –पुंज में।
सम्भवत;यही निराला की अंतिम रचना है जो अगस्त 1961 के आसपास रची गयी और सान्ध्यकाकली में संकलित है। इस कविता में भी दिंड्निर्णय ध्रुव से कहकर अपने अटल विश्वास को दृढ करते हैं। निराला अपनी रचनाशीलता की आग को अपनी मुट्ठी में जीवन पर्यंत कसे रहे। तात्पर्य यह है कि निराला की स्वच्छन्दता को छन्दहीनता से जोडकर देखना अनुचित है। निराला के यहाँ छन्द कमजोरी नही है। वह तो सहृदय को आच्छादित करने या हृदयव्यापी बनाने के अर्थ में है। छन्दो के अनंत रूप हैं निराला की कविता में-कहीं लयांविति के रूप में कहीं सांगीतिक लय के रूप में कहीं संवाद धर्मिता के रूप में वो प्रकट होते चलते हैं। डाँ रामविलास शर्मा से बेहतर शायद ही कोई निराला को जान पाया हो।शर्मा जी ने भी निराला की प्रशस्ति अपने एक गीत से ही की थी-
यह कवि अपराजेय निराला जिसको मिला गरल का प्याला
ढहा और तन टूट चुका है पर जिसका माथा न झुका है
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती लेकिन अभी सँभाले थाती
और उठाये विजय पताका यह कवि है अपनी जनता का।
निराला अपराजेय हैं क्योकि वह अपनी रचनाशीलता से लगातार जनता से जुडे रहे हैं। निराला समर्थ गीतकार हैं जो टूटकर भी लगातार आत्मस्वाभिमान से उन्नत मस्तक होकर अपनी जनता के दुखों को अपने गीतों से माँजते रहे।
उनका छन्दसौष्ठव और वाक्य विन्यास देखकर उनकी काव्य प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। निराला की गीत परम्परा का विस्तार प्रगतिशील कवियो ने भी किया। बाद में यही परम्परा आगे जाकर नवगीत और जनगीत के रूप में प्रतिफलित हुई जिसके परिणाम स्वरूप राजेन्द्रप्रसाद सिंह,शम्भुनाथ सिंह,मुकुट बिहारी सरोज,रमेश रंजक,ठाकुर प्रसाद सिंह,वीरेन्द्र मिश्र,नईम,उमाकांत मालवीय,देवेन्द्रशर्मा इन्द्र,माहेश्वर तिवारी जैसे अनेक नवगीतकार जनगीतकार उभरे। नवगीत आन्दोलन के बाद छायावादी गीत परम्परा का लगभग अवसान हो गया। निराला की समर्थ गीत प्रतिभा कहीं न कहीं नवगीतकारो को लागातार प्रेरणा देती रही।नई पीढी के नवगीतकारो मे संवेदना के स्तर पर और नई जमीन देखने को मिलती है किंतु छन्दहीन कवितावादियो ने काव्यं गीतेन हन्यते की गलत व्याख्या करके अपनी सुविधा के आधार पर हिन्दी कविता का बहुत आहित किया। दूसरी ओर नये कवियो मे जो नवगीत लिख रहे हैं उनमे वाक्य गठन,भाषिक रचना,तथा सहज सरल जीवन को मुखरित करने वाली समर्थ छन्द रचना का अभाव दिखता है। नये कवि के पास समय नही है।साधना और अभ्यास की कमी इसका मूल कारण है। किसी भी संवेदना को छन्द मे प्रस्तुत किया जा सकता है बशर्ते साधना और अभ्यास किया जाये। निराला अपनी रचनाओ को बार बार माँजते हुए आगे बढते हैं वो कहीं स्वयं को दुहराते नहीं,विचार- भाव- भाषा-शिल्प आदि के प्रयोग उनके यहाँ नए हैं। निराला के बहुत से गीत हैं जिनकी गहन विवेचना होनी चाहिए। यहाँ इस लेख में निराला के गीतो की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करना भर ही मेरा उद्देश्य है।निराला के यहाँ जीवन और कविता में फर्क नही है।यही कारण है कि निराला के गीत आज के समय में भी प्रासंगिक हैं उनकी छन्दसिकता और जनपक्षधरता की दृष्टि से भी उनके पुनर्पाठ की आवश्यकता बनी हुई है।

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सोमवार, अक्टूबर 21, 2013

बात बोलेगी: अपनी तरह का पहला प्रयोग


समीक्षा

भारतेंदु मिश्र
(समीक्ष्य पुस्तक: बात बोलेगी(साक्षात्कार संग्रह)/प्रश्नकर्ता –डा.योगेन्द्र वर्मा व्योम/प्रकाशक/गुंजन प्रकाशन ,मुरादाबाद/मूय:३००/ वर्ष:२०१३ )
बात बोलेगी,डा.योगेन्द्र वर्मा व्योम द्वारा लिए गए पन्द्रह साक्षात्कारों की पुस्तक है| व्योम की इस पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों में एक सूत्रता यह कि ये सब छ्न्दधार्मी रचनाकार हैं| इनके नाम क्रमश:शिवबहादुर सिंह भदौरिया,ब्रजभूषण गौतम अनुराग,देवेन्द्र शर्मा इंद्र,सत्यनारायण,अवधबिहारी श्रीवास्तव,शचीन्द्र भटनागर,माहेश्वर तिवारी,मधुकर अष्ठाना,मयंक श्रीवास्तव,कुंअर बेचैन,जहीर कुरेशी ,ओमप्रकाश सिंह,राजेन्द्र गौतम,आनंद कुमार गौरव और कृष्ण कुमार नाज हैं|
इनमे से अधिकांश गीत गजल और नवगीत के चर्चित नाम हैं|कुछ ऐसे भी है जो इन तीनो विधाओं में लिखते हैं| व्योम चूंकि स्वयं गीतकार हैं इस लिए उनकी अपनी पसंद या जुड़ाव जिन लोगो से होगा उन्ही में से साक्षात्कार के लिए चुनाव उन्होंने किया होगा| मेरी दृष्टि में यही इस पुस्तक की सीमा भी है|ज्यादातर पूछे गए प्रश्न एक जैसे हैं| जिनके उत्तर प्राय:एक जैसे ही हैं| लगता है कुछ प्रश्न भेज कर लेख रूप में मंगवाए गए साक्षात्कार भी इसमें शामिल हैं |
बहरहाल ख़ास बात यह है कि व्योम ने इस पुस्तक में अपनी ओर से कुछ नहीं लिखा जिससे पता लगता कि उनका प्रयोजन क्या है इस पुस्तक के मूल में ? इतने साक्षात्कारों के पीछे ,जिनमे कई मंचीय लोग भी हैं, व्योम का क्या सरोकार है? लगता है कई वरिष्ठ कवियों के साक्षात्कार कर लिए तो एक किताब बन गयी |दूसरी बात यह भी चकित करने वाली है कि पुस्तक पर व्योम का कांपीराईट भी छपा है,मुझे लगता है कि व्योम जी का कांपीराईट केवल साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्नों तक ही बनता है क्योकि उत्तर देने वाले रचनाकार के विचार तो उसके अपने है|यह भूल कई दिग्गज भी कर रहे हैं अभी नचिकेता जी द्वारा संपादित गीत वसुधा देखने को मिली तो उसमे भी सैकड़ो गीतकारो का सर्वाधिकार नचिकेता जी ने हथिया लिया है|

अब रही बात इस पुस्तक को पढने के बाद हमे नवगीत का विस्तृत इतिहास और गीत की परम्परा का अनेक रूपों में ज्ञान होता है| यदि इस तथ्य को इस पुस्तक की उपलब्धि मान लिया जाए तो उसमे भी अनेक कवियों के वक्तव्यों में परस्पर दुहराव हैं | ये साक्षात्कार अलग अलग प्रकाशित रूप में पढ़े जाए तो यह दुहराव नहीं दिखाई देगा लेकिन एक ही पुस्तक में एक ही तरह के प्रश्नों के कारण यह होना स्वाभाविक ही है|
असल में साक्षात्कार विधा में साक्षात्कार लिए जाने वाले व्यक्ति को पढ़कर उसकी रचनाशैली,विचार,उसके संघर्ष की शैली,सामयिक टकराहटो पर केन्द्रित विषयों से जुड़े प्रश्न सामने रखे जाते हैं ताकि साक्षात्कार द्वारा नए रचनाकार को पुरानी परम्परा के श्रेष्ठ /खतरनाक /संघर्ष मूलक अनुभवो का ज्ञान हो सके| यहाँ इस पुस्तक में ऐसा बहुत कम मिल पाया है| यह पत्रकारिता की विधा है|मुझे लगता है कवियों की गहरी पड़ताल होनी चाहिए जो नहीं हो पायी है,तो बात कम ही बोल पा रही है|
इसके बावजूद मै डा योगेन्द्र वर्मा व्योम की इस पुस्तक का स्वागत करता हूँ|कुल मिलाकर इस पुस्तक से कुछ छ्न्द्धर्मी कवियों के विचार उनका अनुभव और उनकी रचनाशीलता आदि की जानकारी तो मिलती ही है|दूसरी बात यह भी कि डा.व्योम की संभवत:यह पहली पुस्तक है जिसमे छन्दोबद्ध कवियों के साक्षात्कार एकत्र किए गए हैं|गीत नवगीत की दिशा में किए गए इस सार्थक प्रयोग के लिए उन्हें बधाई|ऐसे और सार्थक प्रयोगों की नितांत आवश्यकता बनी हुई है|

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गुरुवार, अगस्त 15, 2013

संभावनाशील नवगीतकार


समीक्षा

भारतेंदु मिश्र
भोपाल के चर्चित गीतकार शिवकुमार अर्चन का पहला गीत संग्रह-उत्तर की तलाश-शीर्षक से प्रकाशित हुआ है|इन पछपन गीतों को पढ़कर अर्चन जी के प्रति गीत के सच्चे साधक होने का विश्वास होता है|कवि के पास गीत का मुकम्मल मुहावरा है | यानी भाषा और छंद में प्रवाह विद्यमान है | प्रक्रति और प्रणय में पगी हुई संवेदना कवि के अनेक गीतों में गृहरति की सार्थक व्यंजना के रूप में प्रतिफलित होती है|यह स्वर समकालीन गीत का मुख्य स्वर बन गया है|असल में निजी संबंधो की संवेदना का वर्तमान सामजिक रूप लगभग एक समय की समष्टि गत पीड़ा बन गया है| यह रंग सार्वजनिक है ,आम आदमी के घर का भी है-
कुछ भी करू /कही भी जाऊ/जब देखो तब पीछे घर|
यहाँ पीछे घर का अर्थ केवल घर पीछे पड़ा है -यही नहीं बल्कि यह भी कि सभी कार्यो के मूल में घर ही है,और घर अपने आप में एक बड़ी कविता है| इसी घर का एक और मधुर चित्र देखें –
सौप गया जबसे इन बाहों को/क्षण अपने उजले निष्कर्ष/रह रह कर खूब याद आए/दूध में नहाए स्पर्श /काम आ गयी कोई दुआ/तुमने जो अधर से छुआ/पोर पोर बांसुरी हुआ|
यहां ध्यान देने की बात है कि-यहाँ कवि दूध में नहाए स्पर्श की बात करता है जो प्रकारान्तर से भरे पूरे घर की ग्रहिणी की ओर संकेत है|प्रणय गीत और गृहरति के गीत में यही भेद है|प्रणय गीत यानी श्रृंगार की सुन्दर अभिव्यक्ति के चित्र भी अर्चन के गीतों में दिखाई देते हैं यथा –
जब जब पत्र तुम्हारे आये /संबंधो की इस धरती पर/ इन्द्रधनुष लहराए|
लेकिन गृहरति की व्यंजना कवि के इन गीतों में अधिक मर्मस्पर्शी होकर उभरती है|यह स्वर आगे जा कर प्रकृति के सौन्दर्य का चित्रण करने में भी अभिव्यक्त हुआ है,गांव की सुबह का एक चित्र देखें कि ताल की छवि कैसे रंग बदल रही है-
अभी श्याम कुछ पीला औ /कुछ ईंगुरिया है ताल/छूटे नहीं आँख से /सपनों के सतरंगी जाल/हवा भरे सिसकारी जैसे /कील चुभी हो पाँव में|
ये जो कील सी संवेदना कवि के हृदय में चुभी हुई है वही कविता का मूल है|तभी वह गीतों के नीलकंठ का पता जानता है,संग्रह के पहले गीत का मुखड़ा देखने योग्य है- गीतों के नीलकंठ/उतर रहे सांस पर/बूँद के बिछौने हैं / नरम हरी घास पर|
इस सुन्दर प्रकृति का अनुशीलन कवि अपने मूल जनपद सागर से लेकर भोपाल तक लगातार करता आ रहा है|अपने युग से भी कवि अनजान नहीं है|समय की विसंगति को लेकर कई गीत इस संग्रह में हैं |एक चित्र देखें – अँधेरे का गीत गाया /सूर्य-पुत्रो ने/सबा सुखी हो,स्वस्थ हो सब/यह कथन कितना स्वगत है/यहाँ समय चट्टानवत है|
तो शिवकुमार अर्चन के गीतकार के पास प्रकृति को चीन्हने की पैनी नजर है|भाषा छन्द लय तो कवी ने साधा हुआ ही है|उत्तर की तलाश का अर्थ है कवि के पास प्रश्न हैं -जो उसके अपने ही नहीं उसके समाज के भी प्रश्न हैं,उनका समाधान हरा संवेदनशील व्यक्ति खोज रहा है|आत्मविमर्श भी कवि करता है और कहता है-
बीज हूँ मैं /एक नन्हा बीज हूँ /वृक्ष बनने की प्रबल संभावना मुझमें |
सचमुच शिवकुमार अर्चन संभावनाशील नवगीतकार हैं |छंद प्रेमियों की ओर से उनके इस पहले गीतसंग्रह का स्वागत है|
शीर्षक :उत्तर की तलाश ,कवि : शिव कुमार अर्चन ,प्रकाशक:पहले पहल प्रकाशन-भोपाल,वर्ष:२०१३,मूल्य:१५०/

शनिवार, अगस्त 10, 2013

उजली परम्परा के नवगीत


समीक्षा

डा.भारतेंदु मिश्र


ब्रजेश श्रीवास्तव की पहली गीत पुस्तक “बांसों के झुरमुट से” प्रकाशित हुई है|ब्रजेश जी के अध्यापक मन और अध्यवसाय की चमक उनके इन गीतों में विद्यमान है |उम्र के पैसठ वसंत बीत जाने के बाद अनुभव की पकी लेखनी उनके पास है|पके हुए अनुभवो के साथ उनके पास बुन्देलखंड की गीत वसुधा का संस्कार है |खासकर ग्वालियर में साहित्य संगीत रंगमंच और शिक्षा की अपनी सुदीर्घ परंपरा है|कवि के इन गीतों में वह सांस्क्रतिक परंपरा सहज ही देखी जा सकती है| वे गीत से नवगीत की यात्रा की और अग्रसर हैं |संग्रह के इन सभी सत्तावन गीतों में जो पाठ्य रूप प्रकट होता है वहा आश्वतिकारी है|भाषा भाव और प्रस्तुति सभी स्तरों पर ये गीत पठनीय और आकर्षक बन गए हैं |सहजता में फूटती व्यंजना की अनेक छवियाँ मनोरम हैं -
हिरना अब तुम मत वन जाओ /बसते वहां शिकारी हैं|
अर्थात जो हिरना मन वाले सहज लोग हैं उन्हें वन जाने की आवश्यकता नहीं है क्योकि शहरों के भेड़िए उनका शिकार करने को आतुर हैं | यह जंगल राज सभी ओर व्याप्त है|इसी प्रकार एक और बिम्ब देखें –
कितने बड़े मकान /किन्तु मन छोटे छोटे /स्वर्णमयी दिखाते हैं/ सिक्के खोंटे खोंटे|
यह आचरण का बौनापन आज हमारी सभ्यता का पर्याय सा बना गया है|व्यंग्य का एक और सुंदर बिम्ब देखें –
आज नेवला मिला रहा है /नागराज से हांथ /हंसा तुम्ही बताओ इसमे /छिपी कौन सी बात| -इस प्रकार की पंक्तियाँ सीधे तौर पर राजनीतिक दलों की अनैतिक गठजोड़ की ओर भी संकेत करती हैं |
कवि के पास व्यंग्य के अलावा ग्रहरति के अमूल्य चित्र भी हैं जो इन गीतों को मार्मिक स्वर देते हैं|देखिए माँ की शिक्षा का संस्कार –
चौका बरतन कपडे धोना /रोटी गोल बनाना/चिट्ठी पत्री लिखना पढ़ना /गुड जैसा बतियाना /मुँह धोकर बच्चे नहलाना /मेरे साथ रहा/माँ ने जो कुछ भी सिखलाया /मेरे हाँथ रहा|
कवि ने अपने हाथ में अपनी माँ की सीख कसकर रखी है|हम यह मान लेते है कि अच्छा अध्यापक अच्छा विद्यार्थी रहा चुका होता है| दूसरी ओर कवि ब्रजेश जी के संस्कारित मन में अभी तक अपने गाँव की मार्मिक उजली यादें बसी हुई हैं –ढूढा करते /तोता कुतरा आम पेड़ के नीचे/दीदी भैया लड़ते रहते/ इन आमों के पीछे /कंकरीट के वन में अटके/ छोडी रजधानी/भूला गया हूँ ताल तलैया /लोटा भर पानी |
इन यादो का अनुकीर्तन ही कवि का लक्ष्य नहीं है बस उसे तो यह कंकरीट का जंगल भाता ही नहीं है|कवि के पास सत्ता से सताई जनता का दर्द भी है और लूटने वाली व्यवस्था के रंगीन चित्र भी सुरक्षित हैं |देखें –
अनगिनत नव योजनाएं घोषणाएं हैं /खेत सूखा है निरी संवेदनाएँ हैं/कर रहे हैं सड़क चौड़ी/झोपडी बेघर /बुझे से चेहरे रुआंसे /खूब देखें हैं /मंच के हमने तमाशे खूब देखे हैं |
इसके अतिरिक्त –गाँव गाँव में बना दिए हैं/छोटे छोटे गाँव |
तो यह शक्ति है कवि ब्रजेश श्रीवास्तव जी के गीतों की| कुल मिलाकर इन गीतों से कवि के मन में नवगीत की उजली परंपरा के प्रति आस्था का भाव प्रकट होता है|

शीर्षक :बांसों के झुरमुट से ,कवि :ब्रजेश श्रीवास्तव,
प्रकाशन:उत्तरायण प्रकाशन,लखनऊ -२२६०१२,
मूल्य-२५०/,वर्ष:२०१३


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बुधवार, अगस्त 07, 2013

नहीं रहे संवेदना की नदी बहाने वाले नवगीतकार :शिवबहादुर सिंह भदौरिया


अभी प्रात:रायबरेली के डा ओमप्रकाश सिंह और जय चक्रवर्ती भाई द्वारा प्रसिद्ध नवगीतकार डा.शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी के निधन का दुखद समाचार मिला|वे नवगीत दशक -१ के यशश्वी नवगीतकार थे|उनका जन्म १५ जुलाई १९२७ को जिला रायबरेली में हुआ था|शिन्जिनी ,पुरवा जो डोल गयी,नदी का बहना मुझमे हो आदि उनके चर्चित गीत/नवगीत संग्रह है|अभी कुछ ही दिन हुए भाई विनय भदौरिया से उनके स्वास्थ्य को लेकर बात हुई थी |यह संयोग ही है कि अभी कुछ ही दिन हुए डा .ओम प्रकाश अवस्थी के संपादन में उनके समग्र रचनाकर्म पर केंद्रित पुस्तक राघव रंग का प्रकाशन हुआ था|ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी आत्मा हो शान्ति प्रदान करे|

सोमवार, जुलाई 29, 2013

माहेश्वर तिवारी की नवगीत चेतना


(चौहत्तरवें सावन पर विशेष)

भारतेन्दु मिश्र

कैद हुए हैं जब से बुने हुए घेरे में
गर्म-गर्म साँसों के शब्द हैं अँधेरे में
बहुत बहुत दिन हुए
कन्धों को सौंपते जुए।

अब इस समय यह पूरा गीत तो याद नही है लेकिन मेरी दृष्टि में माहेश्वर तिवारी जी के एक नवगीत की ये अत्यंत महत्वपूर्ण और चर्चित पंक्तियाँ हैं।इस केन्द्रीय भावना वाले नवगीत कवि के पास निम्नमध्यवर्ग के श्रमजीवी -आम आदमी की मार्मिक संवेदना है इस बात का अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।यहाँ कन्धों को जुए सौंपने का जो बिम्ब है, वह हमारी जातीय या कहें कि मूल किसान चेतना की अवधारणा से सीधे तौर पर जुडा हुआ है।इसे हम यथास्थितिवाद से भी जोडकर नहीं देख सकते । काव्य हो कोई अन्य कला माध्यम कलाकार अपने समय से ऊबकर या अपनी परिस्थिति मे डूबकर भी अपने समाज को आइना दिखाने का काम करता है। यहाँ माहेश्वर जी नवगीत के माध्यम से जीवन की जडता से संघर्ष का रास्ता खोजते हुए नजर आते हैं।अपने समय के मनोविज्ञान को चित्रित करते सकारात्मक सूक्ष्म संवेदना वाले ऐसे उनके अनेक गीत हैं।
पाँच जोड बाँसुरी के बाद विशेषत: नवगीत दशक -2 से नवगीत की चर्चा मे आए नवगीतकार माहेश्वर तिवारी उन नवगीतकारो मे है जिन्होने नवगीत की विशाल भूमिका तैयार करने मे सतत योगदान भी किया। हरसिंगार कोई तो हो,नदी का अकेलापन,सच की कोई शर्त नही,और फूल आए हैं कनेरो पर शीर्षक से उनके कई नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। हिन्दी नवगीत की दीर्घ सेवा मे माहेश्वर तिवारी जी का नाम बडे आदर से लिया जाता है। असल मे नवगीत आन्दोलन जिन कुछ कवियो की सतत रचनाशीलता के कारण स्थिर हुआ है माहेश्वर तिवारी उनमे से एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। डाँ शम्भुनाथ सिंह ने जिन प्रमुख नवगीतकारों को लेकर नवगीत दशकों की योजना बनाई थी उनमे माहेश्वर तिवारी जी की एक खास भूमिका रही है।
बीती सदी के सातवें दशक के उत्तरार्ध और आठवें दशक के मध्य तक नवगीत दशक और नवगीत अर्धशती का प्रकाशन हो पाया। यह नवगीत के व्याकरण को स्थापित करने और नवगीतकारों की रचनाशीलता को रेखांकित करने की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ समय था। इसी बीच माहेश्वरजी के नवगीत भी पत्र पत्रिकाओ मे प्रकाशित होने लगे थे।लेकिन उनकी पहला नवगीत संग्रह सन 1981 मे हरसिंगार कोई तो हो-शीर्षक से प्रकाशित हुआ।संकलन समय पर छप जाना या बाद मे छपना कोई विशेष अर्थ नही रखता किंतु रचनाकार के बारे मे मुकम्मल धारणा बनाने मे संग्रह का अपना महत्त्व होता है,यह तो निर्विवाद है। यहाँ मै यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि नवगीत दशको की योजना मे कुछ नाम शम्भुनाथ जी ने भर्ती के भी शामिल किए लेकिन माहेश्वर जी का नाम उस योजना मे चार चाँद लगाता है। उनकी रचनाएँ अपनी अलग छवि के कारण नवगीत दशको के कई कवियो की तुलना मे अधिक चर्चित हुईं।माहेश्वर जी के गीतो मे संवेदना की सूक्ष्मता के अनेक बिम्ब बहुत आकर्षित करते हैं।यह दृष्टि बहुत साधना के बाद निखरती है –
उंगलियों से कभी
हल्का-सा छुएँ भी तो
झील का ठहरा हुआ जल
काँप जाता है।
एक हल्की सी क्रिया की गहरी प्रतिक्रिया सुनी तो जाती है लेकिन उसे इतने सादे ढंग से सूक्ति बद्ध करना सबके बस की बात नही है। एक हल्के स्पर्श द्वारा मन की गहरी झील को कँपा देनी की संवेदना का पता हमे इस दौर के बहुत कम नवगीतकारों मे मिलता है,यह माहेश्वर जी की खूबी है। एक और ऐसा ही सुकुमार मन वाले पेड का चित्र देखिए- जंगल का घर छूटा
कुछ कुछ भीतर टूटा
शहरों में
बेघर होकर जीते
सपनों में खोये हैं पेड़/कोहरे मे सोए हैं पेड.।
जंगल से बिछुडकर शहरों में पेडों का जीवन कवि मनुष्य की संवेदना से ।देखता है।लगता है कि मनुष्य भी सपनो मे खो जाने और कोहरे मे सो जाने के लिए विवश है।आजकल शहरो मे बार बार पुनर्वास की पीडा हम सभी को भोगनी पड रही है।बार बार बेघर होने की संवेदना पूरब के अधिकांश लोगो की निजता मे शामिल हो गयी है। पुरानी घर गाँव की यादों की संवेदना जिसे व्यापक रूप मे गृहरति से जोडकर देखा जाता है,-का व्यापक चित्रण माहेश्वर जी के अनेक नवगीतों मे देखने को मिलता है।जैसे-
याद तुम्हारी जैसे कोई/कंचन-कलश भरे।/जैसे कोई किरन अकेली/पर्वत पार करे।
यह माहेश्वर जी की अपनी भूमि या कहें कि उनकी निजता है।किरन का अकेले पर्वत पार करना तो मानो सूक्षम संवेदना की सघन सौन्दर्य चेतना है।यहाँ जो याद के कारण उपजी चिंता और उस चिंता से उपजा एक अनजाना भय हम सबको गहरे तक मथ जाता है,वह देखने योग्य है।अपने घर परिवार गाँव जवार की याद को नास्टेल्जिया के तौर पर भारतीय कविता के मानस मे नही देखा जा सकता। यह पलायन वाद भी नही है।मै तो इसे गृहरति की व्यापक व्यंजना के तौर पर ही गृहण करता हूँ,और कमोबेश हर संवेदन शील कवि मे यह व्यंजना होती है-
हँसी के झरने,
नदी की गति,
वनस्पति का
हरापन
ढूँढ़ते है फिर
शहर-दर-शहर
यह भटका हुआ मन
छोड़ आए हम हिमानी
घाटियों में
धार की चंचल, सयानी छाँह।
बल्कि यही गीत नवगीत चेतना का मूल बिन्दु है ।अपनी निजता की खोज हम सभी अपने तौर पर करते ही रहते हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है।कंकरीट के शहरी जंगल में हँसी का एक पल,एक बालिश्त हरापन,एक अदत सयानी छाँह जब तक अपने लिए मनुष्य खोजता है तभी तक वह सच्चे अर्थ मे संवेदनशील मनुष्य है।देखी भोगी हुई प्रकृति की चाह किसे नही होती।
दूसरी ओर नगर बोध एक डरावनी बिल्ली की तरह हमे हर वक्त सजग रहने के लिए विवश करता है। यहाँ शातिर लोग हमारी मनुष्यता को नोचते जा रहे हैं और हम उनके चालाक पंजो मे अपनी चेतना को फँसा हुआ देख रहे हैं।हमारी अपनी मनुष्यता भी छीज रही है। माहेश्वर जी का अनुभव हम सबका अनुभव है देखिए-
हम पसरती आग में
जलते शहर हैं
एक बिल्ली
रात-भर
चक्कर लगाती है
बात यहीं खत्म होने वाली नही है। यह दुनिया नदी की धार की तरह सदैव चलायमान है कुछ भी स्थिर नही है।इस समय की नश्वरता का बिम्ब देखें कितना मार्मिक है-
न मछली
न बादल
न गहरा अतल-तल
थिर नहीं होता कहीं कुछ
नदी के जल में
मार्मिकता तब और बढ जाती है जब माहेश्वर जी अपने वर्तमान को सहज व्यंजना शक्ति के माद्धयम से महानगर बोध को ऐतिहासिक दृष्टि से देखते हैं।–
इतिहासों के
कूड़ाघर में
पड़ी आम्रपाली .
बुद्धं शरणम को
अगोरती
स्मृतियाँ काली ,

मंत्रि परिषदें ,गणाध्यक्ष
बस खुशहाली में हैं |
............................ श्रेष्ठिजनों ,भूखों में
बस्ती का है
बंटा समाज
सड़कों -गलियों में
शव रखकर
भाग रहे सब
आज |

पहले जैसा अब
काशी का नहीं समाज रहा |
इन उदाहरणो मे इतिहास बोध तो है लेकिन इतिहास की शव साधना नही है।जैसा कि आजकल तमाम गीतकार /कवि इतिहास बोध के रूप मे सांस्कृतिक उद्धार की दृष्टि से अपना कुछ खास एजेण्डा लेकर चल रहे हैं।माहेश्वर जी के पास संवाद करती हुई भाषा का जादू है,और संवेदनशील लोगो के बीच संवादहीनता की चिंता भी है।हम बढती भीड मे कितने अकेले हो गए हैं यह महानगरीय जीवन का दैनन्दिन स्वर है जो हमारी संवेदना को लगातार झकझोरता है ।बहरहाल यह तो सच है कि हम महानगर के लोग अपने मे इतना खो गये हैं कि सहज बतकही तक का अवकाश अब किसी के पास नही रहा-
खुद से खुद की
बतियाहट हम
लगता भूल गए। माहेश्वर जी के पास नवगीत की सशक्त भाषा है-सधा हुआ छन्द है-नित नूतन युगबोध का मुहावरा है और सूक्ष्म सहज अभिव्यक्ति है की संवेदना है ।आम आदमी के दुखदर्द का पता इन नवगीतों मे साफ दिखाई देता है।रमेश रंजक,वीरेन्द्र मिश्र,देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,उमाकांत मालवीय आदि नवगीतकारो की श्रेष्ठ काव्य परंपरा को कुमार रवीन्द्र और माहेश्वर तिवारी जी आगे ले जाते हैं।देखें समय की विडम्बना ढोते दिन का चित्र- सूखे मे बाढ में फँसे हैं दिन/अजगर की दाढ मे फँसे हैं दिन/आसमान से टपके थे भविष्य बनकर जो/सुनते हैं ताड. में फँसे हैं दिन।
असल में दिन नहीं हमारा पूरा जीवन आसमान से टपक कर ताड मे फँसा हुआ सा नजर आता है। कवि की सूक्ष्म चेतना दिन के कई हिस्सो तक जाती है और वहाँ से लौटकर क्षणवादी विसंगतियों के साथ यथास्थिति और निरर्थकता बोध को मानवीय सरोकारो के समक्ष रखकर उसकी समीक्षा करती है।कमोबेश यही स्थिति हम सभी संवेदनशील रचनाकारों/बुद्धिजीवियों की है-
धूप थे बादल हुए तिनके हुए/सैकडो हिस्से गये दिनके हुए/दफ्तरो से लौट आया है शहर/हम कभी इनके हुए उनके हुए।
अंतत:माहेश्वर तिवारी जी की नवगीत यात्रा हमें नवगीत के उस पडाव के रूप मे नजर आती है जहाँ से नए नवगीत कवियों के लिए अनुभव की सहस्र-धाराएँ फूटती हैं।मेरी दृष्टि में वे जनपक्ष के नवगीतकार हैं और श्रम सौन्दर्य के अनुपम चित्रकार भी हैं। किंतु वे जनवादी राजनीति के अनुरूप जनगीतकार नहीं हैं। वे अपने जन और लोक ,समय और समाज के लिए आज भी रच रहे हैं। हमें विश्वास है कि वे शतायु होकर भी अपनी रचना धर्मिता से हमे प्रेरित करते रहेंगे।

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