शुक्रवार, दिसंबर 20, 2019


## नवगीत के उद्गाता : वीरेन्द्र मिश्र

#भारतेंदु मिश्र
नवगीतकार वीरेन्द्र मिश्र

जन्म से मुझको मिली है
जो विरासत में निशानी
वह निशानी गा रहा हूँ
मन नहीं बहला रहा हूँ||(जिन्दगी का गीत-127 गीतम)
हिन्दी नवगीत के उन्नायकों में राजेन्द्र प्रसाद सिंह,मुकुट बिहारी सरोज,ठाकुर प्रसाद सिंह ,शंभुनाथ सिंह , देवेन्द्र कुमार,रामदरस मिश्र,देवेन्द्र शर्मा इंद्र  जैसे जिन यशस्वी गीत नवगीत कवियों का उल्लेख लगातार किया जाता है उनमें वीरेन्द्र मिश्र जी का नाम भी अत्यंत अग्रणी रूपसे चर्चित रहा है| वीरेन्द्र मिश्र जी अपने सांस्कृतिक मूल्य और जीवन के सरोकारों को भली भाँती जानते हैं, जीवन के दुःख और दर्द को समझते हुए रूढ़ियों को संशोधित करते हुए नवगीत के पथ पर आते हैं|वे मारवाड़ी श्रोताओं का मन बहलाने वाले कवि कभी नहीं रहे| सौभाग्य वश उन्हें मध्यप्रदेश की धरती ग्वालियर और इंदौर जैसी सांस्कृतिक भूमि मिली तो दूसरी और वे मुम्बई और दिल्ली जैसे महानगरों में भी जीवन समग्र का अनुभव करते रहे| निश्चय  ही ‘नवगीत दशक 1’ में संग्रहीत उस समय के सभी दसों नवगीतकारों की तुलना में वे कहीं कम  श्रेष्ठ नवगीतकार नहीं थे, और नवगीत दशक योजना में उन्हें तथा रमेश रंजक को शामिल न करना डॉ शंभुनाथ सिंह की बड़ी भूल थी|  उन्होंने देश की स्वतंत्रता के बाद  नवाचार के आन्दोलन और नवता के विहान का स्वागत करते हुए उस समय अर्थात 28 फरवरी 1949 को नव निर्माण प्रतीक्षा वाले समय में लिखा था-
दूर होती जारही है कल्पना/पास आती जा रही है जिन्दगी
आज आशा ही नहीं विश्वास  भी/आज धरती ही नहीं आकाश भी
छेड़ते  संगीत नव निर्माण का/गुगुनाती जा रही है जिन्दगी
भ्रम नहीं यह टूटती जंजीर है/और ही भूगोल की तस्बीर है
रेशमी अन्याय की अर्थी लिए /मुस्कुराती जा रही है जिन्दगी|(गीतम -81)
 वीरेन्द्र जी ने अपने पहले गीत संग्रह ‘गीतम’ से ही कल्पना की थोथी उड़ानों को विराम देने और जीवन की विसंगतियों को भरपूर जी लेने  का मन बना लिया था| उक्त गीत में उन्होंने आजादी और उसके बाद बनते  बिगड़ते नए  भूगोल की और भी संकेत किया  है| तात्पर्य यह कि नवता की अवधारणा वीरेन्द्र मिश्र जी के गीतों में स्वतंत्रता के आरम्भ से ही देखने को मिलती है| नवगीत आन्दोलन के महत्वपूर्ण योद्धा तो वे थे ही| उनका फिल्मों में लिखना और कविसम्मेलनों में शामिल होना जैसे कतिपय कारणों को लेकर डॉ शंभुनाथ सिंह से चलते मतभेद के कारण उन्हें ‘नवगीत दशक’1 में नहीं शामिल किया गया| नवगीत दशक योजना के क्रियान्वयन के समय तक उनके अनेक नवगीत संग्रह भी प्रकाशित हो चुके थे| बाद में जब शंभुनाथ जी उन्हें शामिल करने का मन बना रहे थे तो वे स्वत: शामिल नहीं हुए| उनकी सजग और विशाल रचनाशीलता को विवेचित करते हुए माहेश्वर तिवारी कहते हैं- ‘भटकाने वालों की भीड़ में वीरेन्द्र मिश्र के गीत विश्वसनीय ढंग से रचनात्मकता की मशाल के रूप में सामने आते हैं|इस मशाल से सिर्फ आपको सिर्फ अपना रास्ता ही साफ़ दिखाई नहीं देगा बल्कि अपनी जमीन और उसके सरोकार साफ साफ नजर आयेंगे|’ (हिन्दी नवगीत सन्दर्भ और सार्थकता-144)
वीरेन्द्र मिश्र जी का जन्म 1 दिसम्बर 1927 को मध्य प्रदेश के मुरैना जनपद में हुआ,और देहांत 1 जून 1999 को हुआ | नौ वर्ष की आयु में ही शिक्षक पिता श्री चंद्रिका प्रसाद मिश्र जी के माध्यम से बच्चन जी की मधुशाला पढ़ने को मिली| उसे पढने से वीरेन्द्र मिश्र का कवि  बेहद प्रभावित हुआ| गीत नवगीत की प्रगतिशील चेतना ने आगे चलकर अपनी स्वतन्त्र छवि निर्मित की| इस 72 वर्ष की आयु में उन्होंने गीत और नवगीत को आकाशवाणी और दूरदर्शन के मंचों पर बहुत करीने से स्थापित किया था| इस लम्बे कालखंड में उनके अनेक गीत नवगीत संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें –गीतम(1953 ),लेखनी बेला (1957 ) , अविराम चल मधुवंती(1967 ),झुलसा है छायानट धूप में(1980), धरती गीताम्बरा (1982)शान्ति गन्धर्व (1984),गीत पंचम(1987), कांपती बांसुरी (1987)उत्सव गीतों की लाश पर (1990),वाणी के कलाकार (1991) सूर्यमुखी चंद्र्कौंस (1991) आदि उल्लेखनीय हैं| इसके अतिरिक्त बच्चों के  लिए भी उनके  -‘अपना देश महान’,’काले मेघा पानी दे’, ‘मेरी छोटी सी किताब’  जैसे गीत संग्रह  और कुछ काव्य रूपक भी प्रकाशित हुए| कुछ संगीत रूपक भी उन्होंने आकाशवाणी के लिए लिखे जो बेहद चर्चित रहे| ‘ हरिश्चंद तारामती’ और ‘बदनाम बस्ती’ जैसी कई फिल्मों केलिए मुम्बई में रहकर बालीवुड के लिए भी उन्होंने गीत लिखे थे| उनके गीतों को मोहमद रफ़ी और लतामंगेशकर  जी ने भी गया था| उनके गीत तो चले लेकिन बाद में कुछ फ़िल्में नहीं चलीं तो वहां से मन उचट गया|
वीरेन्द्र मिश्र जी का जीवन समग्र गीतमय था| उनके गद्य और साक्षात्कारों की एक पुस्तक – “पंख और पांखुरी’’ भी प्रकाशित हुई| उनका गद्य बहुत काव्यात्मक यथार्थ और ललित छवि से युक्त है,बापू के हत्यारे को लेकर ‘बीसवीं सड़ी का हत्यारा’ शीर्षक निबंध में वे लिखते हैं –
‘प्रार्थनासभा के लोग बैठे ही रह गए|नेहरू मिल भी नहीं पाए,देश संभाल भी नहीं सका और यह सब बिना समझे हत्यारे ने ह्त्या की|उसको उन बातों से मतलब? वः तो अपना काम कर चुका|न अपने पर घृणा,न अफसोस| वः क्या जाने कि नोआखाली ,बिहार और पंजाब में हुई ह्त्या का जो सामूहिक महत्व है उससे कहीं अधिक महत्व अकेले बापू के महाप्रयाण का है| हत्यारा यह कुछ नहीं समझता,न समझना चाहता है|’(पंख और पांखुरी -214)
आकाशवाणी से जुड़े रहने के कारण उन्हें मंचों पर अक्सर आमंत्रित किया जाता था| उनका प्रस्तुतीकरण  बेहद सरस और अर्थवाही था| एक समय में वीरेन्द्र मिश्र के गीतों की चारों और धूम थी| वर्ष 1986 में मैं जब दिल्ली आया तो उनसे भी मुलाक़ात हुई| हालांकि इससे पहेल उन्हें ‘लखनऊ महोत्सव’ में सुन चुका था| उन्हें लगातार पत्र पत्रिकाओं में पढ़ते हुए उनसे मिलने की इच्छा बलवती होती गयी| उन्हें तब पत्र लिखता था इसी बीच संभवत: ‘इसाक अश्क’ जी की पत्रिका-‘समान्तर’ में मेरा भी कोई गीत प्रकाशित हुआ था| मेरे पत्रों के जवाब में उसे पढ़कर मेरे पते पर वीरेन्द्र जी ने एक संक्षिप्त पोस्टकार्ड लिख भेजा कि – ‘इन दिनों कर्जन रोड स्थित कामकाजी महिला आवास ,नई दिल्ली में ठहरा हूँ किसी दिन मिलें तो अच्छा लगेगा|’ मुझे तो मन की मुराद मिल गयी थी| पत्र में फोन नंबर भी लिखा था सो फोन करके उनेसे समय लेकर कर्जन रोड स्थित उनकी सुपुत्री-गीतम मिश्र जी के आवास पर पहुँच  गया | पहली मुलाक़ात में ही उनसे बहुत स्नेह मिला| घर में उस समय कोई अन्य नहीं था सो उन्होंने स्वयं मेरे लिए चाय बनायी और देर तक नवगीत आन्दोलन पर बात करते रहे| तभी उन्होंने मुझे अपनी पहली गीत पुस्तक ‘गीतम’ भेंट की | बाद में और भी कई मुलाकातें हुईं ‘चौथी दुनिया’ के लिए मैंने उन्ही दिनों उनसे एक साक्षात्कार भी किया था,जिसकी चर्चा देश भर में हुई| मैं युवा था और नवगीत सीखने के दिन थे,तबके दौर में उनके जैसे बड़े साहित्यकार पत्र लिखकर मुझ जैसे युवा को उत्साहित करते थे|
वीरेन्द्र जी से नवगीत पाठ करने की शैली सीखी जा सकती थी| नवगीत के पाठ्य को अनाहत किये जाने वाली सरस प्रस्तुति क्या हो सकती है यह उनसे मुझे सीखने को मिला|उनका उच्चारण बेहद स्पष्ट और भावानुसारी था| हृदयंगम करने वाले आरोह और अवरोह भावानुसार अभिव्यक्ति उनके गीतों को हृदयग्राही बनाता था| मेरे मन में गीत और नवगीत का अंतर भी तब कुछ कुछ साफ़ होने लगा था| वीरेन्द्र मिश्र जी के प्रारम्भिक गीतों पर स्पष्ट रूप से छायावादी कविता का प्रभाव खासकर अध्यात्मिकता,प्रकृति के माध्यम से चित्रण और राष्ट्रीय चेतना के स्वर विद्यमान है| यह उस दौर के सभी गीतकारों पर किसी न किसी रूपमें परिलक्षित होता है|
‘पवन सामने है नहीं गुनगुनाना
 सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना ||’
जैसे उनके प्रारंभिक अनेक गीतों में छायावादी प्रवृत्तियां देखी जा सकती हैवर्षों की50  काव्यात्मक संवेदना उनकी किन्तु  |   व्यापक जन चेतना को समाये हुए है|  ‘लेखनी बेला’ ‘गीत पंचम’और ‘शान्ति गन्धर्व’ जैसे गीत संग्रहों के गीतों में व्यवस्था विद्रोह  और जनजीवन की विसंगतियाँ प्रखर रूप से अत्यंत मुखर हुई हैं|
‘पतझर कुर्सी पर बैठा है इस बार न जाएगा
दल बदल रहे सामंत सुमन हर रंग उड़ जाएगा
ऊंचे कुबेर पर्वत पर बंधक सारस्वत वाणी
ऋतु  राजा/ऋतु रानी| (गीत पंचम-163 )
नवगीत के प्रखर बिम्ब और प्रयोग उनके काव्य वैभव को प्रतिष्ठित करते चलते हैं| ऋतु ही राजा है और ऋतु रानी भी है| इस सन्दर्भ में व्यंग्य करते हुए पतझर के माध्यम से वीरेन्द्र जी कालिदास की प्रणय चेतना और मेघदूत की पीड़ा तक पहुचने का जतन करते हैं| असल में पतझड़ ऋतुराज वसंत की कुर्सी के या कि सत्ता के पतन का भी प्रतीक है| वही क्रूर पतझड़ सत्ता पर बैठकर कालिदास जैसे कवियों की सारस्वत वाणी को बंधक बनाने का जतन कर  रहा है| सुमन का अर्थ सुन्दर मन वाले सहृदय सहज व्यक्ति से लगाकर देखें |गीत की व्यंजना चक्राकार होती है और कुशल गीतकार वीरेन्द्र मिश्र जी अनेक शब्द शक्तियों से  और अर्थ व्यंजनाओं से अपने गीत सजाते हैं| ‘अविराम चल मधुवंती’ शीर्षक संग्रह का एक नवगीत अंश देखें-
डसने के बाद सर्प खिसका है/चूसे विष कौन दाय किसका है
जल तरंग में गरल,मधुवंती /फिर भी अविराम चल मधुवंती |(अविराम चल मधुवंती)
असल में वीरेन्द्र मिश्र जी अविराम गीत से माधुरी बिखेरने और सुरभि वितरित करने वाली संवेदन यात्रा के संवाहक हैं| समाज का विष पीकर भी कवि सदैव मधुर सकारात्मकता का सन्देश देता हुआ चलता है|वीरेन्द्र जी के नवगीतों में यथार्थ सत्ता और व्यवस्था के सजीव चित्र के रूप में उभरता है| रोजी रोटी के लिए संघर्ष करते मनुष्य के व्यथा का एक चित्र देखिए – रोटी की आयु बड़ी छंद की अवस्था से
इसीलिए शब्दों का युद्ध है व्यवस्था से
लाभ के अँधेरे में नाच रहे व्यापारी
मृत्यु के महोत्सव में रस की ठेकेदारी
विष से है सराबोर अमृता सुराही
कविता की सेना में शब्द है सिपाही||(शान्ति गन्धर्व-143)
 असली कवि जनहित में संघर्ष को ही अपना मार्ग बनाते हैं|आज भी व्यवस्था से शब्दों का युद्ध जारी है|करुणा और पीड़ा ही तो सार्थक कविता की सबसे बड़ी पूंजी है| जिस कवि  ने इस मर्म को समझ लिया वह समग्र मानवता का कवि कहा गया| वीरेन्द्र जी के मुक्तक भी बहुत मार्मिक होते हैं |कविताई की पराकाष्ठा तो संक्षिप्तता  में ही निहत मानी गयी है| सार्थक दोहे और मुक्तक सदियों से सर्वश्रेष्ठ कविता का नमूना रहे हैं| वीरेन्द्र जी का एक मुक्तक देखें-
प्यासी लहरें टूटी नावें/खाली सीपी खारा जल
इतनी दौलत पास हमारे/हम हैं सागर के बादल|
( -मुखरित संवेदन )
 जन और अभिजन का द्वंद्व नया नहीं है, हमेशा अभिजन लोगों ने अपनी कुलीनता के स्वर्णिम आसन पर विराजमान होकर आमजन को निम्न साबित करके उसे तिरस्कृत किया है| शालीनता का दुशाला ओढ़े हुए लोगों से कवि कहता है कि असल में तो वही लोग अधिक संपन्न होते हैं जिनका सर्वाधिक विरोध होता है | सच्चा कवि  आमजन के पक्ष में ही खडा होता है| वहीं से तटस्थ होकर कवि की रचनाशीलता की लता फूटती है| झुलसा है छायानट धूप में’ से एक नवगीत अंश देखिए-
मखमल –से लोग बहुत ज्यादा शालीन हैं
दुःख के पग से होते मैले कालीन हैं
उतना संपन्न तुम उसे समझो /जितना उसका विरोध होता है
जब जब कंठावरोध होता है/और अधिक सृजन बोध होता है| (झुलसा है छायानट धूप में )
फ़िल्मी दुनिया से विदा लेकर वीरेन्द्र मिश्र जी ने काफी समय तक आकाशवाणी में नौकरी की|आकाशवाणी में उनकी रचनाशीलता को बहुत विस्तार और सृजन का नया आकाश मिला| आकाशवाणी की नौकरी करते हुए जब इंदौर से वीरेन्द्र जी का स्थानान्तरण दिल्ली के लिए हुआ   तब उन्होंने जो लिखा था वो  उन दिनों ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के मुखपृष्ठ पर छपा था-
इस राजनगर का अनुचित संबल लूं/ या बांधूं बिस्तर और कहीं चल दूं|
प्रसिद्द गीत चिन्तक डॉ.उपेन्द्र जी का वीरेन्द्र मिश्र जी के बारे में कहना है  कि-‘”यह वीरेन्द्र के कवि  की ,मेरी समझ से एक असाधारण उपलब्धि है कि उन्होंने इस द्वंद्व पर उस उम्र में ही काबू पा लिया था जब प्यार रोमांस का ताप अपने तीव्रतम रूप में होता है|पच्चीस वर्ष की तरुनाई में उनका यह किया हुआ फैसला उनके दृढ संस्कारी व्यक्तित्व का द्योतक है| ‘गीतम’के उस प्रसिद्द गीत की पंक्तियाँ शायद आप ने सुनी हों-‘पीर मेरी कर रही ग़मगीन मुझको/और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर रानी/और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर रानी|’”
(उपेन्द्र/हिन्दी गीत और गीतकार-100)
उपेन्द्र जी के वक्तव्य में संदर्भित यह गीत उनके संग्रह ‘गीतम’ में त्रिमुखी पीड़ा के संकेत के साथ संकलित है| त्रिमुखी पीड़ा की त्रिमुखी अभिव्यक्ति और उसकी भंगिमा उनके चकित करने वाले गीत कौशल का पता बताती है| व्यक्तिगत पीड़ा कवि की प्रेयसी या प्रियजन की पीड़ा और समाज की पीड़ा सब मिलकर यहाँ त्रिमुखी पीड़ा के रूप में एकाकार होती है,तब एक गीत बनाता है|
वीरेन्द्र मिश्र जी ने नवगीत पर व्यापक विचार करते हुए अनेक साक्षात्कारों में अपना मत स्पष्ट किया था| नवगीत नाम के आकर्षण में खिंच कर उस समय भी तमाम वयोवृद्ध कवि नवगीत लिखने लगे थे और लोगों ने उन्हें सुविधानुसार आयु के आधार पर वरिष्ठ भी मानना शुरू कर दिया तो वीरेन्द्र जी ने स्पष्ट किया | नवगीत में घुसपैठ बनाने वालों को लेकर बहुत स्पष्ट रूप से वे कहते हैं-
‘काव्य सृजन के क्षेत्र में साहित्यिक वरिष्ठता ही महत्वपूर्ण होती है,(जिसकी उपलब्धि के लिए प्राय: लोग शार्टकट ढूंडते हैं|) आयु वरिष्ठता नहीं| फिर यह भी कि नवगीत का विरोध भी मुख्यत: वही कर रहे हैं जो उसे लिख पाने में असमर्थ होने के कारण उसके विरुद्ध आज बासी पड़ जाने वाले प्रमाण और नए गढ़े तर्क प्रस्तुत करने को विवश हैं| ’(पंख और पांखुरी -175)
 आजकल भी नवगीत की नाव  में ऐसे अनेक साठोत्तरी कवि पदार्पण कर चुके हैं जो चर्चित होने के लिए नवगीत के आकर्षण में खिंचे चले आ रहे हैं| यश लाभ का ये शार्टकट आज भी चल रहा है| वीरेन्द्र जी इसके आगे नवगीत पर विचार करते हुए स्पष्ट करते है- ‘आधुनिक युगबोध से संपन्न वैविध्यपूर्ण हिन्दी नवगीत निश्चित रूप से स्वस्थ सृजनात्मकता और सुरुचिपूर्ण पाठक-श्रोता का निर्माण कर रहा है|इसी केंद्र बिंदु से उसका भविष्य आरम्भ होता है|’ (पंख और पांखुरी-180)
आज वीरेन्द्र जी हमारे बीच नहीं है| उनके गीत और उनके शब्द हमारे बीच अपनी चेतना के साथ सक्रिय हैं| नवगीत को उनके दाय और उनके साथ बिताए पलों को लेकर गौरवान्वित हूँ| उनकी पुण्य स्मृति को सादर नमन |
संपर्क:- सी-45 /वाई -4,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110095  
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शुक्रवार, दिसंबर 13, 2019


समीक्षा -

ब्रज संस्कृति का अप्रतिम कोश
# डॉ. भारतेंदु मिश्र
ब्रजभाषा हिन्दी कविता की प्राचीन भाषा है जिसमें कई शताब्दियों  की शब्द संपदा , लोक जीवन के चित्र और जीवनानुभव संजोये हुए हैं| ब्रज भाषा के माध्यम से कई शताब्दियों तक कविताई की जाती रही| राधा और कृष्ण की अनन्य लीला छवियों का प्रकटीकरण ब्रज भूमि और ब्रजभाषा से ही संभव हुआ| विशाल वैष्णव मत पूरे भारत भू भाग में इसी ब्रज भाषा के लोक जीवन से निकले  संत कवियों द्वारा प्रसारित किया गया| ब्रजभाषा की कविताई और उसकी शब्द संपदा केवल ब्रज भूमि तक ही सीमित नहीं रही| मध्यकाल में ब्रजभाषा ही पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण सभी दिशाओं में कविता का माध्यम बनी|यही कारण है कि वैष्णव मत के साथ ब्रज भाषा की  विशाल साहित्यिक सांगीतिक तथा सांस्कृतिक परंपरा भी हमारे समाज में दिखाई देती है| 
रज़ा फाउन्डेशन और राजकमल प्रकाशन की ओर से पुनर्प्रकाशित ‘ब्रज ऋतुसंहार’ शीर्षक इस नए सन्दर्भ ग्रन्थ को स्वर्गीय प्रभुदयाल मीतल द्वारा संकलित किया गया था | स्वर्गीय प्रभुदयाल मीतल का नाम ब्रजभाषा और संस्कृति के विशेषज्ञ के रूप में बहुत आदर से लिया जाता है|प्रस्तुत सन्दर्भ ग्रन्थ का संकलन और प्रस्तुति उन्ही के द्वारा की गयी है|इस संदर्भ ग्रन्थ में 961 चुनी हुई ब्रज भाषा की ऋतु संबंधी रचनाएँ संकलित हैं|इसके प्रथम संस्करण की भूमिका महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने लिखी थी| हालांकि ‘ब्रज ऋतुसंहार’ ग्रन्थ में संकलित सभी कविताओं को यथारूप समझ पाना मेरे लिए भी सहज नहीं रहा |ये मध्यकालीन  कवियों की सदियों पुरानी शब्द संपदा अल्प चलन के कारण भी अति गरिष्ठ और गंभीर होती जा रही है| हिन्दी साहित्य के पाठ्यक्रमों से इन अनेक कवियों को पहले ही बहिष्कृत किया जा चुका है|
ऋतुओं के ब्याज से श्रृंगार वर्णन करने की पुरानी परंपरा है जो संस्कृत,पाली,अपभ्रंश से होते हुए  ब्रजभाषा तक निर्बाध गति से आयी | अन्य लोकभाषाओं में और खड़ीबोली में भी कदाचित ऐसे प्रयोग कवियों ने किये है,लेकिन ब्रजभाषा के बारहमासा की बात ही कुछ और है| लोक जीवन और भारतीय ब्रजभाषा -संस्कृति  से परिपूर्ण इस संकलन में उदात्त काव्यानुभव  के मार्मिक  चित्र प्राय: देखने को मिलते हैं| ऋतु वर्णन के साथ ही ‘बाराहमासा’ की परिपाटी का भी निर्वाह हमारे कवियों ने बखूबी किया है| राहुल सांकृत्यायन जी के शब्दों में-
‘मीतल जी ने ब्रजकाव्य- महोदधि से ऋतु वर्णन के इतने अधिक और सुदर रत्नों को एकत्रित कर साहित्य प्रेमियों का बहुत उपकार किया है| उनके ब्रज साहित्य के गंभीर ज्ञान और उनकी न विश्राम लेने वाली लेखनी से ब्रजभाषा साहित्य के प्रचार और उसे प्रकाश में लाने के लिए अभी बहुत आशा की जा सकती है|’ (पृ-16,ब्रज ऋतुसंहार) यह महत्वपूर्ण टिप्पणी प्रस्तावना के रूप में राहुल जी ने 26 जून 1950 में लिखी थी| जाहिर है कि यह कार्य ब्रजभाषा और लोक साहित्य के ऋतु वर्णन को समझने के लिए अत्यंत महत्त्व का है| आधुनिकता के प्रवाह में हमने जाने अनजाने अपने प्राचीन साहित्य के गौरव ग्रंथों को सब प्रकार उपेक्षित और तिरस्कृत भी किया है| रज़ा फाउन्डेशन द्वारा इसे पुनर्प्रकाशित करने से सदियों पुरानी  ब्रज संस्कृति और साहित्य को नया आयाम मिला है| रमाशंकर दिवेदी जी का आलेख इस पुस्तक की उपयोगिता को और बढाता है| ये सन्दर्भ ग्रन्थ-सूरदास,केसवदास,गिरधरकवि,घनानंद,सेनापति,ठाकुर,बोधा,बेनी,ऋषीकेस ,ब्रजपति,मुरारि  आदि के अलावा  सेवक,हरीचंद,सूरजदास,पद्माकर जैसे शताधिक रीतिकालीन ब्रजभाषा के कवियों की कविताई से हमें संपृक्त और संपन्न करता है| ये संचयन रचनात्मक वैभव से संपन्न टकसाली छंद घनाक्षरियाँ,कबित्त,सवैया,दोहा,सोरठा  आदि हिन्दी कविताई की परंपरा में व्याप्त कई शताब्दियों की ब्रज सरस्वती का महत्वपूर्ण दस्तावेज है| हालांकि आज के नए कवि इस प्रकार की कविताओं से प्राय: अनभिज्ञ और अछूते रहना ही पसंद करते हैं|जैसे जैसे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम बदलते गए इन कवियों की जगह नए कवियों ने ले ली|नए कवियों के प्रगतिशील सामाजिक सरोकार अपनी जगह हैं लेकिन प्राचीन सांस्कृतिक महत्त्व की कविताई को भारतीय कविता की अस्मिता के गौरव के रूप में अवश्य पढ़ा जाना चाहिए| ये लोक की ही शक्ति है जिसने अपने कवियों को आदर पूर्वक याद रखा |अब तो पिछले कई दशकों से खासकर हमारे शीर्ष आलोचकों द्वारा लगातार उपेक्षा किये जाने के कारण लोक भाषाओं का और उनमे काम  करने वाले रचनाकारों का कोई नामलेवा नहीं है| रस छंद और भारतीय काव्य मूल्यों वाली कविता परंपरा से अलग समकालीनता के नाम पर केवल विचारधारा का पिष्टपेषण करना ही नई पीढी के प्राध्यापकों को सुविधाजनक भी लगता है| इस सन्दर्भ ग्रन्थ को भी स्वयं पढ़कर उसका अर्थ लगा लेने वाले प्राध्यापक विश्वविद्यालयों के हिन्दी विभागों में शायद बिरले ही मिलेंगे|
बहरहाल प्राध्यापकों द्वारा बखूबी प्रसारित किये गए आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के सामाजिक सरोकार और उनके महाभ्रमजाल के बाद भी न बारहमासा अप्रासंगिक हुआ है, न ऋतुए अप्रासंगिक हुई हैं और न ब्रज भाषा ही महत्वहीन हुई है| हाँ हमने अपनी प्राचीन संवेदनाओं को अभिव्यक्ति देने वाली शैली संवेदना की विरल भावभंगिमाएँ  और शब्द संपदा अवश्य खो दी है| ब्रज की लोक चेतना को संरक्षित करने की दृष्टि से इस पुस्तक का सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में सचमुच बहुत महत्त्व है|
कालिदास कृत ‘ऋतुसंहार’ किसी न किसी रूप में काव्यात्मक ऋतु वर्णन का प्रमुख सांस्कृतिक स्रोत माना जाता है| इसके बाद तो प्राय: विभिन्न भाषाओं में ऋतु वर्णन अपनी तरह से लिखा गया|प्रस्तुत संचयन में सभी ऋतुओं को लेकर कई शताब्दियों के विभिन्न कवियों के चुने हुए  छंदों को संग्रहीत किया गया है|इसप्रकार ये सन्दर्भ ग्रन्थ अनेक प्रकार से कविता प्रेमियों के लिए पठनीय ही नहीं अपितु संग्रहणीय  भी जान पड़ता है| ‘पद्माकर’ का एक छंद देखिये-जिसमें प्रोषितपतिका विरहिणी नायिका अपनी वियोग की दशा का स्वाभावोक्ति के रूप में निरूपण कर रही है| अपने प्रिय के सन्देश के बिना वसंतागम में उसका जीवन लगभग दूभर हो गया है, विवशता की हालत ये है कि वह मोहन मीत के बिना राधा के भाव से न तो अपना दुःख किसी से कह पा रही है और बिना कहे रह भी नहीं पा रही है--

बीर अबीर अभीरन को दुख,भाखे बने न बने बिन भाखैं |
त्यों पद्माकर मोहन मीत के ,पाए संदेस न आठएँ पाखैं |
आये न आप,न पाती लिखी,मन की मन ही में रहीं अभिलाखैं |
सीत के अंत बसंत लाग्यो,अब कौन के आगे बसंत लै राखैं ||
 ऐसी ही अनेक भावभंगिमाओं और राधा -कृष्ण प्रेम संयोग वियोग से परिपूर्ण इस श्रेष्ठ संचयन को ब्रज भाषा ही नहीं वरन हिन्दी कविता और पारंपरिक काव्यालंकार,संगीतशास्त्र खासकर राग रागिनियों की दृष्टि से भी संदर्भित किया जा सकता है| ब्रज में फाग और होली से संबंधित कविताओं की परंपरा तो निराली ही है|रीतिकालीन कवियों के होली और फाग विषयक ये कवित्त किन किन रागों में दरबारों में संगीतकारों द्वारा गाये जाते थे इसका भी उल्लेख इस ग्रन्थ में मिलता है| संस्कृति और शास्त्रीय गायन में रूचि रखने वालों को भी यह ग्रन्थ एकबार अवश्य पढ़ना चाहिए|
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शीर्षक-ब्रज ऋतुसंहार /संकलन-प्रभुदयाल मीतल/ प्रकाशक-राजकमल प्रकाशन प्र.लि., नई दिल्ली /मूल्य-रु-750 /प्रथम संस्करण-2018

संपर्क- सी-45/वाई -4,दिलशाद गार्डन ,दिल्ली-110095
फोन-9868031384  

सोमवार, अक्तूबर 14, 2019


आचार्य कवि का अवसान
# भारतेंदु मिश्र  
आज हिन्दी में अनेक तरह के कवि एक साथ सक्रिय हैं जैसे-फेसबुकिया कवि ,मोबाइल कवि,मंचीय कवि, अकादमिक कवि आदि|हम देखते हैं कि इन विविध रूप में हिन्दी की कविता तरह तरह से फल फूल रही है|इसके बावजूद हिन्दी में आचार्य कवियों की एक शाश्वत परंपरा रही है| देवेन्द्र शर्मा इंद्र इसी आचार्य परंपरा के कवि थे| छंदोबद्ध काव्य साधना की अविरल धारा उनके न रहने से लगभग सूख गयी है|उनका जन्म 1 अप्रैल सन 1934 में नगला अकबरा,आगरा,उत्तर प्रदेश  में हुआ और अपनी आयु के 86 वर्ष पूरे कर 17 अप्रैल 2019 को उनका स्वर्गवास हुआ| आगरा कालेज से संस्कृत और हिन्दी में एम. ए. करने के बाद इंद्र जी वहीं हिन्दी प्रवक्ता के रूप में अस्थायी तौर पर नियुक्त  हुए वहां उन्हें पंडित जगन्नाथ शर्मा आचार्य,और मार्क्सवादी चिन्तक डॉ.रामविलास शर्मा जैसे विद्वानों का भी स्नेह मिला| फिर कुछ समय बाद वर्ष 1966 में दिल्ली के श्याम लाल कालेज में हिन्दी के स्थायी प्रवक्ता के रूप में नियुक्त होकर वे दिल्ली आ गए| यहाँ दिल्ली के शाहदरा स्थित श्याम लाल कालेज में वे ऐसा रमे कि रमते चले गए|गीत और नवगीत की धुन इतनी समाई कि इसके अतिक्त उन्हें ज्यादा कुछ दिखाई भी न दिया| तात्पर्य यह कि उन्होंने पीएचडी भी नहीं की अन्यथा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तो बन ही सकते थे|यहीं नवीन शाहदरा और बाबर पुर रोड स्थित किराए के घरों में उन्होंने अपना  आवास  बनाया| शाहदरा उस समय हिन्दी प्रकाशकों की मंडी  था|अत: अक्सर साहित्यकार प्रकाशन के सिलसिले में उनसे भी मिलने जुलने आते रहते थे|जीवन चलता रहा,परिवार बढ़ा|दो बेटियाँ और तीन पुत्र हुए|जिनमें से छोटी बेटी मानसिक रूप से विमंदित रह गयी|उसकी सेवा करना वे अपना धर्म मानते थे|इसके अलावा इंद्र जी को मैंने कभी पूजा पाठ करते या व्रत आदि करते नहीं देखा|अपनी बेटी को लेकर वे सदैव निराश रहते थे| उसकी सेवा को ही वे अपनी पूजा मानते थे| उसने भी अंतिम समय तक इंद्र जी का पीछा नहीं छोड़ा| मैं नौकरी के सिलसिले में 1986 में दिल्ली आया तब से उनके अनेक रचनात्मक प्रसंगों का साक्षी और सहभागी रहने का अवसर मिला| सन 1990 के दशक में इंद्र जी ने राजेन्द्र नगर गाजियाबाद में अपना स्थायी आवास बना लिया था|वर्ष 1994 में उनकी षष्ठिपूर्ति के अवसर पर जब ‘नवगीत एकादश’ का संपादन कर रहा था तो उनके अत्यंत निकट रहने का अवसर मिला|
वे सांस्कृतिक बोध के नवगीत कवि  हैं| शम्भुनाथ सिंह जी ने नवगीत पर काम करते हुए ‘नवगीत दशक’ 1 में उन्हें ‘इंद्र’ उपनाम हटाकर शामिल किया|नवगीत संबंधी अपनी यात्राओं में शंभुनाथ जी,वीरेन्द्र मिश्र ,रमेश रंजक,कुमार रवीन्द्र,राजेन्द्र गौतम,योगेन्द्र दत्त शर्मा ,कुंवर बेचैन,विज्ञान व्रत  आदि  उनके दिल्ली स्थित आवास पर चर्चा हेतु आया करते थे|शाहदरा स्थित अनेक साहित्यकारों डॉ.हरदयाल,डॉ.बाबूलाल गोस्वामी,बाबू राम शुक्ल,डॉ.विन्दु माधव मिश्र,पाल भसीन  आदि से भी उन्ही दिनों उनके सानिध्य में मुलाकातें हुईं| डॉ. शंभुनाथ जी ने अन्य नवगीत दशकों की योजना भी इंद्र जी के सहयोग से बनायी  कुछ नए नवगीतकारों को इंद्र जी ने इस योजना में शामिल भी करवाया | अस्सी के दशक में एक ओर छन्दोबद्ध और मुक्त छंद वाली नई कविता धारा के बीच तलवारें खिंची हुई थीं|दूसरी ओर बाद में डॉ.शंभुनाथ जी से उनकी  कुछ अनबन भी हुई और दोनों ने अपने रास्ते अलग अलग कर लिए,हालांकि संवाद बना रहा|
इंद्र जी का पहला नवगीत संग्रह –‘पथरीले शोर में’ 1972  में प्रकाशित हुआ था उसके बाद से अभी तक उनके 15 नवगीत संग्रह ,चार दोहा संग्रह और छः ग़जल संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं| निराला पर तुलसीदास छंद में लिखा उनका खंडकाव्य ‘कालजयी’ बेहद चर्चित रहा और कई वर्षों तक यह आगरा वि.वि. के पाठ्यक्रम में भी शामिल रहा|इंद्र जी द्वारा रचित साहित्य विपुल मात्रा में है जिसमें  हजारों नवगीत,25 हजार से अधिक दोहे,कई सौ ग़ज़लें “मैं साक्षी हूँ” (प्रबंध काव्य) आदि शामिल है| उनका बहुत सा काव्य साहित्य अप्रकाशित भी रहा गया|
जब 1990 के दशक में नवदोहा लेखन की बाढ़ सी आयी थी तो उनदिनों इंद्र जी ने ‘सप्तपदी’ शीर्षक से समवेत दोहा सतसई योजना को क्रियान्वित किया|इस प्रकार ‘सप्तपदी’ सात खण्डों में प्रकाशित हुई|उनके द्वारा अन्य संपादित कविता संग्रहों में – ताज की छाया में ,यात्रा में साथ साथ,वसंत का अग्रदूत,हरियर धान आदि बहुत चर्चित रहे| उनके विपुल साहित्यिक कार्य के लिए उन्हें सम्मान आदि भी मिले जिनमें उत्तर प्रदेश हि.सं. का ‘साहित्य भूषण’ अम्बेडकर वि.वि.आगरा का ‘ब्रज वैभव’,गाजियाबाद नगर का –‘काव्य पुरुष’ अदि प्रमुख हैं|
अपनी बेटी के कारण इंद्र जी प्राय: यात्राएं नहीं कर पाते थे| रिटायर होने के बाद उनका अधिकाँश समय चारपाई पर गोले(विशेष बेटी नीहारिका) के साथ बीता| पत्नी का देहांत पहले ही हो चुका था इसलिए गोले उनपर ही आश्रित थी|अक्सर उसे नहलाने धुलाने शौच आदि कराने से लेकर अधिकाँश कार्य वही करते थे,अब उनकी मंझली बहू गोले की सेवा करती है| इन परिस्थितयों में उन्हें अपनी अधिकाँश यात्राएं स्थगित ही करनी पडीं| इसके बावजूद एकबार उन्होंने मुम्बई और संभवत: दूसरी बार कुल्लू की यात्रा की थी| संयोगवश मैं भी उनकी कुल्लू यात्रा में साथ रहा|उस साहित्यिक यात्रा में वेदप्रकाश दीक्षित वटुक,त्रिलोचन शास्त्री,राजेन्द्र गौतम,पाल भसीन आदि भी सम्मिलित थे|       
उनका संघर्ष बहु आयामी था|चारपाई पर लेटी बेटी से लेकर रचनाशीलता के नए आयाम तक वे चारपाई पर पेट के बल लेटकर नवगीत,दोहा ग़जल आदि का सृजन करते रहे |सैकड़ों छंदोबद्ध कवियों की किताबों की भूमिकाएं तथा अपने निकटवर्ती रचनाकारों पर भी लगातार लिखते पढ़ते रहने के कारण उन्होंने अपना शरीर बेडौल कर लिया था|पिछले कुछ वर्षों से वे लगातार अपने इष्ट मित्रों के लिए काम करते जा रहे थे लेकिन उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा था| देहावसान से कुछ दिन पहले तक वे ब्रजकुमार वर्मा शैदी –पर केन्द्रित अभिनन्दन ग्रन्थ संपादित कर रहे थे जो संभवत: अभी प्रकाशित नहीं हो सका|
छंदोबद्ध कविता के इस आचार्य के पास लिखने पढ़ने और गोले की सेवा करते रहने के अलावा मानो और कुछ काम न था| उनकी अनेक कविताओं में सांस्कृतिक क्षय के प्रति निराशा का स्थायी भाव साफ़ तौर पर देखा जा सकता है|हालांकि उन्हें लेकर अनेक विश्वविद्यालयों में दर्जनों शोध भी संपन्न हो चुके हैं तथापि उनका बहुत कुछ अभी बाकी है जो अप्रकाशित है ,जो अनकहा और अविवेचित है| भारतीय हिन्दी कविता की शास्त्रीय परंपरा  के प्रयोक्ता और व्याख्याता आचार्य देवेन्द्र शर्मा इंद्र जैसा अब हिन्दी में कोई अन्य कवि मुझे दिखाई नहीं देता| अनेक वर्षों तक वे दिल्ली वि.वि. की एम.ए. की कक्षा में प्राकृत और अपभ्रंश पढ़ाते रहे|उनसे हमारे जैसे कितने लोगों ने बहुत कुछ सीखा ,अब वह स्रोत छिन्न हो गया है| साहित्य इतिहास काव्यशास्त्र और प्राचीन कवियों को लेकर जब कहीं कोई शंका मन में आती थी तो  उनसे अक्सर पूछ लिया करता था|अब उनके बाद वैसा कोई दूर दूर तक दिखाई नहीं देता| हिन्दी की सांस्कृतिक कविता धारा के लिए यह एक अपूरणीय क्षति है| इन्ही शब्दों के साथ उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि|
कविताई की बानगी-
महाप्राण निराला जी की पत्नी मनोहरा के रूप सौन्दर्य का चित्रण एक छंद में-
संभ्रांत विप्रकुल की कन्या
गुणवती यथा नाम धन्या
नागरी लता पर स्मित वन्या अलिका सी|
अपरा-सरस्वती –ऋतंभरा
सिद्धार्थमना ज्यों यशोधरा
नव सूर्यकांत की मनोहरा कालिका सी||( 60/कालजयी -खंड काव्य से )
# अपनी विशेष पुत्री नीहारिका के लिए लिखी कविता का एक अंश-
वह सबसे दूर एक सूने कोने में
ज्यों आत्मलीन विस्मृत जादू टोने में
नीहारिका न कुछ मुख से कह पाती
जिसकी हर व्यथा अनकही ही रह जाती
उसके मीठे दो बोल कभी सुन पाता
त्रिभुवन का वैभव भी पाकर ठुकराता
वह परम हंसिनी मेरे ही मानस की
कोकिला मूक जो पल भर भी गा न सकी
हो गए निरर्थक सुकृत सभी चिर संचित
कुछ कर न सका तेरे हित सुविधा वंचित||(‘मैं साक्षी हूँ’- से )
 दो नवगीत-
1.    फिर उगूंगा
मैं फिर उगूंगा सांझ के आकाश में
मुझको विदा दो भोर का नक्षत्र हूँ|
हिमप्रांत  के नीले गगन में रात भर
धूनी रमाये ज्योति का करता हवन
गन्धर्व किन्नर किरातों के यज्ञ में
मैंने किया आलोक मंडित स्वस्त्ययन
मधुपर्व के आरम्भ का अवसान हूँ  
उल्लास का अवसादधर्मी सत्र हूँ|
अलकापुरी के शिखर पर मैं हूँ खड़ा
वह जलद वलयित कल्पवृक्ष विशाल हूँ
मैं पीन कन्धों पर बिठाए झूमता
नर्तित शिखी सारंग मंजु -मराल हूँ
समिधा बनूगा एक दिन ,अब हो चला
निश्छाय मैं फलहीन औ निष्पत्र हूँ||
2.    नामधारी रामनामी
दीप की लौ हुई मद्धिम झुकीं पलकें
कोयलों की राख पर सोयी अंगीठी
रोशनी की निम्न मुख सोनल ध्वजाएं
अब कहाँ वे सुयोधा कुंडल किरीटी
शैल देही पड़ा है निष्प्राण कुंजर
सूंड में जिसकी घुसी है एक चींटी
सिंह की मृत दन्त-दंष्ट्र विशीर्ण काया
वन्य पथ पर जम्बुकों ने है घसीटी
बांस वन की बहुप्रसूता मेदिनी में
उग रही फिर दीमकों की एक भीटी
स्वप्न पंखी नींद में डूबे कथानक
रात घिरते पहरुओं की बजी सीटी
कौन सा किसने नया अध्याय जोड़ा
नई कह कह कर पुरानी  लीक पीटी
जिसे ओढ़े नामधारी रामधारी
वस्तुत: थी कांच में चादर पछींटी ||   
 # संपर्क- सी 45/वाई -4 दिलशाद गार्डन,दिल्ली-95
 9868031384



#कथादेश जून २०१९  में प्रकाशित 

नवगीत की अरगनी पर टंगी गजलें
# भारतेंदु मिश्र
गीत नवगीत की दुनिया से जुड़े तमाम रचनाकारों से मेरा रचनात्मक जुड़ाव होना स्वाभाविक है,लेकिन बहुत कम ऐसे लोग मिले जो सचमुच में हिन्दी की गजलें लिखते हैं| वशिष्ठ अनूप  उनमें से एक हैं| जब हिन्दी को प्रतिष्ठित करने के लिए खडीबोली में नए प्रयोग किये जा रहे थे तभी बीसवीं सदी में इसी क्रम  में निराला और जयशंकर प्रसाद जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने भी गजलें लिखीं| तब हिन्दी वादियों ने ग़जल को ‘गीतिका’ नाम देकर अपनाया| उस समय के रचनाकार हिन्दी की साहित्यिक विधाओं में अन्य भाषाओं में प्रचलित साहित्यिक विधाओं का भावानुवाद जैसा काम भी अभिनव प्रयोग समझ कर रहे थे| तभी हिन्दी ग़जल का प्रयोग भी आरम्भ हुआ|  प्रयोगधर्मिता की दृष्टि से हिन्दी में यह नवलेखन का ही परिविस्तार है|खड़ीबोली का छायावादी गीत अपनी प्रयोगधर्मिता के कारण  नवगीत बना,हाइकू और सानेट जैसे छंद आये, नव दोहा अभियान आरम्भ हुआ|भाषा –छंद लय सन्दर्भ आदि में भी नवता आयी| इन साहित्यिक परिस्थितियों को पचाकर और खुद को  बचाकर जो कवि आगे बढे उनकी कविता में स्वाभाविक चमक बनी रही| गजलकारों ने भी नए प्रयोग किये| सूर्यभानु गुप्त,जहीर कुरेशी,ज्ञान प्रकाश विवेक,हस्तीमल हस्ती,शिव ओम अम्बर ,कैलाश गौतम,राजेश रेड्डी ,मयंक श्रीवास्तव,अशोक रावत,योगेन्द्र दत्त शर्मा ,लक्ष्मीशंकर बाजपेयी,आदि अनेक सार्थक नाम हिन्दी गजल में नए प्रयोग के लिए सम्प्रति चर्चित हैं| भाई विज्ञान व्रत ने छोटी बहर में बहुत सार्थक ऐतिहासिक प्रयोग किया| हिन्दी में दिनेश शुक्ल जैसे कुछ्लोगों ने दोहा छंद में भी गज़लें लिखी हैं,हिन्दी में गजल लिखने वालों के पास उर्दू के अलावा हिन्दी छंदों की भी कभी कमी नही रही| दुष्यंत कुमार के बाद आदम गोंडवी  से प्रेरणा लेकर आधुनिक समय के अनेक कवियों ने हिन्दी गजल में हिन्दी के मुहावरे और हिन्दी की लोक भाषाओं के ठसक दार शब्दों को बहुत सुन्दर ढंग  से पिरोया है | नई पीढी के हिन्दी गजलकारो में वशिष्ठ अनूप उनमें से एक हैं| उनके पास हिन्दी गजल की विशाल परंपरा के अनुभव और अपनी हिन्दी की तत्सम शब्द संपदा का बेहतर प्रयोग भी है-
अक्षत चन्दन मन्त्र पुष्प नैवेद्य अग्नि कुमकुम
ख्वाबो में भाँवरे लगाना अच्छा लगता है|
मन में यदि संकल्प भरे हों सुन्दर दुनिया के
तूफानों से भी टकराना अच्छा लगता है| (-रौशनी की कोपलें)
मुझे लगता है कि जैसे जैसे हिन्दी गद्य का विकास हुआ वह राजभाषा का चरित्र गृहण करती गयी उसका गद्य रूप अधिक विकसित होता गया,लेकिन दूसरी ओर  वह मानकीकृत भाषा का स्वरूप मौलिक लयवंती संवेदनाओं से दूर होता गया| कविता की भाषा खुरदरे गद्य में तब्दील होती गयी|यही कारण है कि अकविता की तर्ज पर लिखी गयी खबरनुमा कवितायेँ लोक संवेदनाओं से असम्पृक्त होती गयीं| इसके बावजूद दूसरी ओर  छंदोबद्ध कवियों ने  आंचलिक आलोक में अपनी लोक भाषाओं को जीवंत रखा| कविता लोक से संपृक्त होकर ही हरियाती है| वशिष्ठ अनूप के पास भी प्रारम्भिक अवधी से लेकर अपनी मातृभाषा के लोक का आलोक और उसका भरा पूरा संवेदना संसार है| जहां कहीं वो अपनी मूल मौलिक भाषा संवेदना को छू पाते हैं वहां उनकी कविताई में चमक पैदा हो जाती है-
भूख मदारी सी डुगडुगी बजाती जब
नंगा होकर पेट दिखाना पड़ता है|
सारे  काम कहाँ होते आसानी से
कभी कभी आस्तीन चढ़ाना पड़ता है| (-रोशनी खतरे में है)
भगवान के घरों में भी है चिल्ल पों मची
अल्लाह के घरों में बहुत शोर है मियाँ|
पढ़ लिख के अभी सभ्य कहाँ हो सके हैं हम
हर बात पे अब भी तो तोर मोर है मियाँ ||(-तेरी आँखें बहुत बोलती हैं )
 असल में ये ‘तोर-मोर’ जैसे देशज शब्दों की मिठास कविताई को प्रभावशाली स्वरूप देती है| छंदहीन कवियों की कविता में ये बात नही दिखाई देती| खासकर छंदहीन कवियों ने कविता को अनुवाद किये जाने के लिए अधिक लिखा या विदेशी भाषाओं के साहित्यकारों से हिन्दी में अनुवाद करते हुए कविताकामिनी को हृदयंगम किये जाने का बड़ा स्वांग रचा और सम्मानों -पुरस्कारों तथा विदेशी यात्राओं के मार्ग खोजे| यह हिन्दी के व्यापक प्रचार प्रसार के हित में भले ही बड़ा काम दिखाई देता हो, किन्तु लोकोन्मुख हिन्दी की कविताई तो लोक भाषाओं के संस्कार से अनुप्राणित हुए बिना पहले भी संभव न थी और आज भी संभव नहीं है| इसीलिए नागार्जुन,केदार बाबू और त्रिलोचन जैसे प्रगतिशील कवियों ने कभी लोक भाषा और आंचलिक शब्दसंपदा से अपना संपर्क नहीं तोड़ा| परन्तु कुछ अतिवादी  समकालीन मुक्तछंद कवियों ने नामवरी आलोचना की छत्रछाया में अपने निजी विकास को ही गाया बजाया और व्यूह बनाकर छंदोबद्ध कवियों की उपेक्षा भी की |
गीत और गजल में हिन्दी और उर्दू की परंपरा का अंतर ही नहीं दोनों में छंदों के कहन और विषय वस्तु आदि का भी फ़र्क होता है रचाव में तो अंतर होता ही है| कुछ छंदोबद्ध कवियों ने केवल तुकों के सहारे छंदों की बेहिसाब जुगाली की है,मैं ऐसे कवियों को कविराज की श्रेणी में रखना चाहता हूँ, भगवान बचाए ऐसे कविराजों से| इसके अतिरिक्त  मंचीय तालीपिटाऊ, गलेबाज कवियों से भी हिन्दी गजल को सुरक्षित करने की आवश्यकता है| ये गलेबाज कविसम्मेलनों में अपनी आलाप वाली गायकी से छंदों में दो चार मात्राएँ तो आसानी से बढ़ा घटा लेते हैं|हिन्दी गजल में हिन्दी का रदीफ़ और काफिया भी वशिष्ठ अनूप के यहाँ साफ दिखाई देता है-
ये फूल बच्चियां नदियाँ पहाड़ यह सागर
ये सब बचेंगे तो सारा जहां सुरक्षित है|
चलो कि मिलके कहीं घोसला बनाए हम
बगैर प्यार के कुछ भी कहाँ सुरक्षित है|(-तेरी आँखें बहुत बोलती हैं)

इसी तरह हमारे गाँवों की तस्बीर भी हिन्दी गजलों में अब दिखाई देने लगी है| ये हिन्दी की गजलें अक्सर मुझे नवगीत की अरगनी पर टंगी हुई नजर आती हैं| जाने क्यों मैं हिन्दी कविता की विशाल परंपरा में गीत नवगीत की धारा से ही हिन्दी गजल को जोड़कर देख पाता  हूँ| इन गजलों मे वो पुरानी रोमानियत गुलाब -शराब और नाजों नखरे उठाने वाले बिम्ब अब नहीं दिखाई देते-
फूल खुशबू तितलियाँ अब भी हैं मेरे गाँव में
नेह की पुरवाइयां अब भी हैं मेरे गाँव में |
हैं अभी गाते कबीरा और मीरा के भजन
रस भरी चौपाइयां अब भी हैं मेरे गाँव में |
ऐसा नहीं है कि वशिष्ठ अनूप अकेले ही इस प्रकार की गजलें लिख रहे हैं,और भी हमारे समय के अनेक कवि इस तरह की अभिव्यक्ति अपनी हिन्दी गजलों के माध्यम से सामने रख रहे हैं-हिन्दी कविता के लिए ये बहुत अच्छी बात है-
गदोरी पर रची मेंहदी कि लाली याद आती है
मुझे अक्सर वो लड़की भोली भाली याद आती है|
बहुत सी बिजलियों की झालरे आँखों में जब चुभतीं
तो मिट्टी के दियों वाली दिवाली याद आती है|

(बारूद के बिस्तर पे )
सत्ता से आँख  मिलाकर उसके मर्म को समझने का हुनर भी आज का कवि जानता है| ये सच है कि कलम के सामने तख्तोताज बहुत बौने ही रहे हैं-
कलम को थपथपाती है हुकूमत
कलम से थरथराती है हुकूमत|
फतह करले भले ही मोर्चों पर
कलम से हार जाती है हुकूमत |
हिन्दी की छंदोबद्ध कविता आज इक्कीसवीं सदी के नए दौर में अपनी तमाम अर्थ ध्वनियों, शब्दविन्यास, और लोक भाषा चेतना को  लिए आगे बढ़ रही है| हिन्दी के मुहावरे लेकर लिखी जा रही समकालीन हिन्दी गजल का मैं हमेशा से स्वागत करता रहा हूँ|अंतत: वशिष्ठ अनूप का एक और शेर देखें जो अपनी पोशाक में गजल सा है लेकिन उसमें नवगीत की ऊर्जा भरी हुई है| एक शेर  में गिलहरी और पेड़ के रिश्ते को इस आसान ढंग से कहने की कोशिश कवि ने की है कि उसकी उक्ति वैचित्र्य को सराहे बिना नहीं रहा जा सकता|

कोई चूहा तो नहीं है कि बिल बनाएगी
गिलहरी पेड़ से जाये तो कहाँ जायेगी?
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9868031384