रविवार, जून 20, 2010

जेठ की दुपहरी  
दो घनाक्षरी

(डाँ श्याम गुप्त)

दहन सी दहकै, द्वार देहरी दगर दगर ,

कली कुञ्ज कुञ्ज क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है।

पावक प्रतीति पवन , परसि पुष्प पात पात ,

जरै तरु गात , डारी डारी मुरिझाई है ।

जेठ की दुपहरी सखि, तपाय रही अंग अंग ,

मलय बयार मन मार अलसाई है।

तपैं नगर गाँव ,छावं ढूंढ रही शीतल ठावं ,

धरती गगन 'श्याम' आगि सी लगाई है।1।


सुनसान गलियाँ वन बाग़ बाज़ार पड़े ,

जीभ को निकाल श्वान हांफते से जारहे।

कोई पड़े ऐसी कक्ष कोई लेटे तरु छाँह ,

कोई झलें पंखा कोई कूलर चलारहे

जब कहीं आवश्यक कार्य से है जाना पड़े ,

पोंछते पसीना तेज कदमों से जारहे।

ऐनक लगाए ,श्याम छतरी लिए हैं हाथ,

नर नारी सब ही पसीने से नहा रहे॥2।

( श्याम गुप्त के मेल द्वारा प्रकाशनार्थ प्राप्त)





गुरुवार, जून 17, 2010


धार पर हम -2 : लोकार्पण और विमर्श


(प्रस्तुति:विनोद श्रीवास्तव,कानपुर)



11 मई,कानपुर,जुहारीदेवी महिला महाविद्यालय के प्रांगण में गीतकार वीरेन्द्र आस्तिक द्वारा सम्पादित धार पर हम-2 का लोकार्पण सम्पन्न हुआ। इस समारोह का आयोजन काव्यायन ,जनसंवाद तथा बैसवारा शोध संस्थान के सहयोग से किया गया। समारोह की अध्यक्षता हैदराबाद से पधारे विचारक डाँ विजेन्द्र नारायण सिंह ने की। इस अवसर पर डाँ विमल,राजेन्द्र राव,दिनेश प्रियमन आदि ने धार पर हम के बहाने इस गीत चर्चा मे भाग लिया। बीज भाषण डाँ विमल ने प्रस्तुत किया।उनका कहना था कि गीत नवगीत को कविता से अलग करके देखने की जरूरत नही है। कानपुर के कथाकार पत्रकार राजेन्द्र राव ने आस्तिक जी द्वारा लिखी पुस्तक की भूमिका पर विचार व्यक्त किये। दिनेश प्रियमन ने भी इस अवसर पर सम्पादक आस्तिक जी को बधाई दी और कहा कि यह संकलन धार पर हम -1 की तुलना मे अधिक पोटेंशियल वाला है। अपने अध्यक्षीय भाषण मे डाँ.विजेन्द्र नारायण सिंह ने पुस्तक के सम्पादकीय पर बोलते हुए अनेक ऐतिहासिक समवेत संकलनों पल्लव,तारसप्तक आदि की परम्परा से धार पर हम-2 को जोडते हुए इस संकलन के महत्व की विस्तार से चर्चा की। विषय को आगे बढाते हुए उन्होने डोमन साहू समीर,ठाकुर प्रसाद सिंह के गीतों पर भी टिप्पणी की तथा पुस्तक में संकलित मधुसूदन साहा,ओमप्रकाश सिंह,भारतेन्दु मिश्र आदि के गीतों को सन्दर्भित करते हुए अपने विचार व्यक्त किए। और अंत मे बैसवारा शोध संस्थान के अध्यक्ष डाँ ओमप्रकाश सिंह ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। गीत विमर्श की दृष्टि से चर्चित इस समारोह का संचालन गीतकार विनोद श्रीवास्तव ने किया। यह समाचार दैनिक जागरण,राष्ट्रीय सहारा ,हिन्दुस्तान ,अमर उजाला जैसे अनेक प्रतिष्ठित अखबारों मे भी प्रमुखता से प्रकाशित हुआ।

बुधवार, जून 09, 2010

गीत के विविध आयाम :



                                       (चित्र में प्रो.सिदूर भाषण देते हुए,मंच पर अवधबिहारी श्रीवास्तव,नचिकेता,प्रो.रमेशकुंतल मेघ,भारतेन्दु मिश्र,  देवेन्द्र सफल और संचालक)

हल्दी के छापे का पुनर्पाठ

पिछले दिनों 17-18 अप्रैल कानपुर, भाई देवेन्द्र सफल के गीत संग्रह लेख लिखे माटी ने के लोकार्पण के बहाने कानपुर जाने का सुयोग बना। वहाँ की दो दिवसीय गीत गोष्ठी देवेन्द्र सफल ने ही आयोजित की थी। इस कार्यक्रम में प्रो.रमेशकुंतल मेघ चंडीगढ से पधारे थे,वरिष्ठ गीतकार नचिकेता पटना से पधारे थे। प्रो.रामस्वरूप सिन्दूर इस समारोह के अध्यक्ष थे। यह दो दिवसीय गोष्ठी समकालीन हिन्दी कविता मे गीत नवगीत के रचना विधान और गीत के विविध आयामों को समझने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण रही। बहुत बडा कोई सरकारी मंच नही था। इसे व्यक्तिगत तौर पर गीतकार देवेन्द्र सफल ने अपने प्रयास से आयोजित किया था। यही इस कार्यक्रम की सीमा भी थी कि वह किसी एक कवि द्वारा आयोजित किया गया था,और यही इस कार्यक्रम की शक्ति भी । बहरहाल इसी बहाने यहाँ अवधबिहारी श्रीवास्तव, वीरेन्द्र आस्तिक,शैलेन्द्र शर्मा,विनोद श्रीवास्तव जैसे कानपुर के कवियों से इस अवसर पर मिलने का मौका मिला जो मेरे लिए बहुत सुखद रहा। कानपुर से लौटकर श्रेष्ठ नवगीतकार कवि अवधबिहारी श्रीवास्तव की जो छवि मन पर अंकित हुई वह अविस्मरणीय है। उनकी पुस्तक हल्दी के छापे को दुबारा पढते हुए सचमुच बहुत संतोष मिला।आमतौर पर कुछ ही ऐसी पुस्तकें होती हैं जिन्हे आप दुबारा या बार बार पढना चाहते हैं हल्दी के छापे वैसी ही पुस्तक है। समकालीन कविता के रचनात्मक अभियान को सबल बनाते पुस्तक के कुछ गीत कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की सुगन्ध बिखेरते हैं।हालाँकि हल्दी के छापे का प्रकाशन 1993 मे हुआ था किंतु अभी इन गीतों की चमक तमाम कवियों को चकित करती है।ये गीत कवि के आसपडोस की लोकधर्मी जीवन शैली से सीधे तौर पर जुडे हैं। अवधबिहारी जी ने बहुत अधिक गीत नही लिखे लेकिन जो गीत उनकी सधी हुई लेखनी से जनमें है वो बडे महत्वपूर्ण हैं। उनकी इस पुस्तक में गीत नवगीत प्रगीत और आख्यान धर्मी लम्बी कविताएँ भी संकलित हैं। ठाकुर प्रसाद सिंह ,अमरनाथ श्रीवास्तव,शतदल आदि ने अवधबिहारी के इन गीतों पर टिप्पणी की है।ठाकुर प्रसाद जी कहते हैं-‘हल्दी के छापे में ऐसे गीतों की संख्या बहुत बडी है जो अवधबिहारी के अत्यंत अंतरंग क्षणो के साक्षी हैं।’ यह अंतरंगता ही कवि के निजीपन का साक्ष्य बनती है और कविता में सौन्दर्य की चमक पैदा करती है। अवधबिहारी जी के कुछ गीत अंश देखिये-

भाभी की चपल ठिठोली है/माँ के आँचल की छाया है दादी की परी कथाओं का/वह जादू है वह टोना है हम हँसते थे घर हँसता था/फिर यादों में खो जाता था मैने देखा है कभी कभी/घर भूखा ही सो जाता था मुझको तीजों त्योहारों पर/दरवाजे पास बुलाते थे खिडकियाँ झाँकती रहती थीं/कमरे रिश्ते बतलाते थे आँगन में चलती हुई धूप/कल्पना लोक में चाँदी है दीवारों पर सूखती हुई/मक्के की बाली सोना है वैसे तो माटी माटी है/मेरे बाबा वाला वह घर लेकिन यादों का राजमहल/उस घर का कोना कोना है। माता पिता और अपने सगे सम्बन्धियों पर अनेक कविताएँ हिन्दी के कवियों ने लिखी हैं लेकिन अपने घर आँगन पर ऐसा मार्मिक मुझे इससे पहले कहीं पढने को नही मिला। अवधबिहारी के पास ऐसे कई गीत हैं जो गृहरति की व्यंजना को व्यापक स्तर पर सघन और सुसंवेद्य बनाते हैं। कवि के पास अपना घर आँगन है और अपनी कृषि संस्कृति वाली प्राथमिकताएँ हैं-

लगता है बरसेगा पानी/धूप भागकर गयी क्षितिज तक/वर्षा की करने अगवानी। इसके अतिरिक्त- चौक पूरते हाथ कलश जल,मन में उत्सव भरें/नयन में कितने चित्र तिरें गोबर लिपी देहरी खिडकी मुझसे बातें करें/नयन में कितने चित्र तिरें।

लोक जीवन के ऐसे विरल चित्र अवधबिहारी के यहाँ कई रूपों मे उभरते हैं।व्यंग्य और विसंगति का एक चित्र देखिए- मै बरगद के पास गया था छाया लेने

पर बरगद ने मुझसे मेरी छाया ले ली।

तथाकथित महान लोगों पर कवि का यह व्यंग्य कितना सार्थक है कहने की आवश्यकता नही। कानपुर की इस साहित्यिक यात्रा में मेघ जी का सानिध्य सिन्दूर और नचिकेता जी का स्नेह तथा वीरेन्द्र आस्तिक,अवधबिहारी श्रीवास्तव,शैलेन्द्र शर्मा ,विनोद श्रीवास्तव और देवेन्द्र सफल जैसे कानपुर के गीतकारों की कविताई का साक्षी बनने का अवसर मिला। भाई देवेन्द्र सफल को धन्यवाद कि उन्होने मुझे इस गोष्ठी में आमंत्रित किया।

रविवार, मई 09, 2010

मदारी की लड़की
(from,anubhooti.com)


मदारी की लड़की
सपनों की किरचों पर
नाच रही लड़की।

अपने ही
झोंक रहे चूल्हे की आग में
रोटी पानी ही तो है इसके
भाग में
संबंधों के अलाव ताप
रही लड़की।

ड्योढी की
सीमाएँ लाँघ नही पायी है
आज भी मदारी से बहुत मार
खायी है
तने हुए तारों पर काँप
रही लड़की।

तुलसी के
चौरे पर आरती सजाये है
अपनी उलझी लट को फिर फिर
सुलझाये है
बचपन से रामायन बाँच
रही लड़की।
--भारतेंदु मिश्र

बुधवार, अप्रैल 14, 2010

अशोक पाण्डेय अशोक की षष्ठिपूर्ति

छन्द प्रसंग के अप्रतिम हस्ताक्षर अशोक पाण्डेय अशोक छन्दविधा के आचार्य कवि हैं। उन्हे छन्दविधा की यह अप्रतिम कला अपने पिता स्व.गोमती प्रसाद पाण्डेय कुमुदेश से संस्कार रूप में प्राप्त हुए।मैने ही नही लखनऊ और आसपास के नमालूम कितने नए पुराने छन्दोबद्ध कवियों ने अशोक जी से छन्द की बारीकियाँ ,शब्द मैत्री और पारम्परिक भारतीय हिन्दी कविता के स्वरूप को जाना समझा है । वे जितने कुशल कवि हैं उतने ही सहज व्यक्ति भी हैं। संयोग देखिये कि वे चार भाई हैं –अशोक पाण्डेय,विजय पाण्डेय,महेश पाण्डेय और शरद पाण्डेय और सभी छन्दविधा में कविताई करते हैं। अशोक पाण्डेय अशोक के महत्व के विषय मे विद्वानों ने इस प्रकार राय दी है-

1.अशोक कुमार पाण्डेय ने कवित्त,सवैया के माध्यम को इतना सहज,अनलंकृत और आकर्षक बना दिया है कि उनकी रचनाओं से बासीपन नही बल्कि स्वाभाविक मिठास और टकटकेपन की अनुभूति होती है। *डाँ.शम्भुनाथ सिंह

2.अलंकारों के प्रयोग से छन्दोबद्ध शैली में रची गई कविता के निसर्ग सम्भव सौन्दर्य में और भी अधिक लालित्य का समावेश हो उठता है। पाण्डेय जी के ये सभी छंद अलंकॆत शैली में रचे गये हैं।उन्होने अपनी कविता में अलंकारों का प्रयोग साध्य रूप में न करके साधन रूप में ही किया है। *देवेन्द्र शर्मा इन्द्र
प्रभात के दो छन्द:
चाव से सजाये अंग अंग में वसुन्धरा ने,
पाये मोतियों के हार रजनी नवेली से।
स्नेह का पराग बिखराता झूम झूम कंज,
गान सुनता है अलिपंक्ति अलबेली से।
ऐसा मधु योग हुआ हो गये सरों के वृन्द,
हेम-रंग-रंजित उषा की रंगरेली से।
निकल गया है तम तोम जग-मन्दिर से,
फिसल गया है चन्द्र व्योम की हथेली से। 1।
खोया रूप रैन –श्रम-सीकरों ने अम्बर में,
संयमी द्विजों का दल वेद -मंत्र बोला है।
प्रेम से सुलाता नलिनी को थाप दे समीर,
रश्मियों ने सकल सरों में स्वर्ण घोला है।
मंद-मंद आये रवि जावक लगाये भाल,
देख मधु योग अलियों का मन डोला है।
मार हेतु मात ले बिता के प्रिय संग रात,
प्रात में संयोगिनी उषा ने द्वार खोला है।
(*व्योम की हथेली से)
मैं आज उन्हे युवा रचनाकार मंच,लखनऊ के पहले अध्यक्ष के रूप में याद करते हुए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। आज भी उन्हे छन्दोबद्ध कवि अंशुमालिनी और ब्रजकुमुदेश जैसी पारम्परिक छन्दोबद्ध पत्रिकाओं के सम्पादक के रूप में जानते मानते हैं।10 मार्च 2010 को उन्होने अपनी आयु के साठ वर्ष पूर्ण किये,ईश्वर उन्हे दीर्घायु करे।

गुरुवार, मार्च 25, 2010

समीक्षा 1.

परवरिस बिना बढते जन के गीत
*भारतेन्दु मिश्र


भगवत दुबे छन्द विधाके महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।वे जबलपुर की कादम्बरी संस्था के नाते भी चर्चित हैं।‘हम जंगल के अमलतास’ उनका नवीनतम गीत संग्रह है।संग्रह में कुछ नवगीत भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। भगवत दुबे के ये गीत अपनी लोकधर्मी चेतना से जुडे होने के नाते पाठकों को आश्वस्त करते हैं। कवि के इन गीतों में समय की विसंगतियाँ विभिन्न रूपों में उभर कर सामने आती हैं।वरिष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र की टिप्पणी भगवत दुबे के नवगीतों को समझने मे सहायक है। कवि आत्मनिवेदन में अपने तमाम सहयात्रियों को नामोल्लेख पूर्वक याद करता है, वह कहीं न कहीं संवेदना का अतिरेक ही कहा जायेगा।भगवत दुबे जैसे कवि को अपने ऊपर हो रहे शोध आदि का उल्लेख अपने आत्म निवेदन मे करने से बचना चाहिए क्योकि आत्म निवेदन और आत्मश्लाघा मे बहुत फर्क होता है। इसी पुस्तक में देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,विद्यानन्दन राजीव ,राम अधीर और कुमार रवीन्द्र सहित सबकी प्रशस्तिपरक टिप्पणियों के बाद गीतों के बारे मे कुछ अधिक कहना खतरा मोल लेने जैसा है।दूसरी बात यह भी कि संकलन के कुछ गीत अपने समय समाज की बेहतरीन सूक्तियाँ हैं। भगवत दुबे ओज के कवि हैं-
प्राण गँवाये हैं हमने/ पर लाज रखी है प्रण की/हमने की दुर्दशा/दम्भ के कंस और रावण की।
कवि अपने जातीय परिवेष की व्यवस्था पर चिंतित है,उसे सामाजिक समीकरण बिगडता दिखायी देता है।वह जिस लोक जीवन मे जी रहा है वहाँ मनुवादी जातियाँ ताण्डव कर रही हैं। संवेदनशील कवि कहता है-
बँधी जातियों की नावें/मजहब के घाटों में/लहरों को बँटवाया/महतर,बाँभन,जाटों में।
दूसरी ओर कवि के सामने भुखमरी के दृश्य हैं जो उसे विवश करते हैं।रोजी रोटी के चक्कर में खोया आम आदमी भी उसे नजर आता है।कवि कहता है-
सुख राई सा बौना /पर्वत जैसे कष्ट मिले/भूख मिटाने के साधन/सारे पथभ्रष्ट मिले/छल छद्मों के हाथ/पराजित,दृढ संकल्प हुए/रोजी रोटी बुनते-बुनते/हम खुद गल्प हुए।
ऐसे ही अनेक समसामयिक गीत भगवत दुबे की कविताई का पता बताते हैं।प्राचीन महाकोसल की लोक परम्पराएँ भी कवि के इन गीतों मे कहीं-कहीं झलकती हैं। आज भी यहाँ का नेता अपने हित में धर्म का इस्तेमाल करने में लगा है।भगवत दुबे कहते हैं-
भ्रम से लिपटी हुई/धर्म की पोथी थमा गये/तृष्णा स्वार्थ मनुष्यों की/ नस नस में समा गये।
यह परिदृश्य सदियों पुराना होते हुए भी नया है। कवि की विशेषता यह है कि उसका छन्द सधा हुआ है,लोक बिम्बों की गन्ध कवि की भाषा मे पठनीयता पैदा करती है। समकालीन जीवन की तमाम कठिनाइयों की ओर ये गीत संकेत करते दिखायी देते हैं।एक बिम्ब देखें- हम जंगल के अमलतास/परवरिस बिना बढ्ते/पर गमलों की नागफनी की आँखों में गडते।
नागर और देसी होने यह फर्क सचमुच आज भी हमारे समाज में व्याप्त है। अधिकांश हमारे साथी जनजीवन मे परवरिस के बिना ही जीते हैं।कुल मिलाकर हर कवि का अपना समय होता है और उसके समय के अनुसार उसकी कविताएँ प्रतिध्वनित होती हैं।कवि के ये गीत भी अपने समय के साक्षी हैं।


पुस्तक शीर्षक: हम जंगल के अमलतास
कवि:आचार्य भगवत दुबे
प्रकाशक: कादम्बरी,जबलपुर
मूल्य:रु.150/
वर्ष :2008


समीक्षा 2

दर्द जोगिया के साक्षी गीत
*भारतेन्दु मिश्र

मधुकर अष्ठाना लखनऊ के छन्दोबद्ध कवियों मे सुपरिचित नाम है। मधुकर जी के अब तक अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।वे गीत गज़ल और नवगीत जैसी छन्दोबद्ध विधाओं के कवि हैं,कवि के सामने एक कविता की सांस्कृतिक परम्परा है। वह अपनी परम्परा मे तनिक भी विचलन देखता है तो उसे विक्षोभ हो आता है और वह अपनी अभिव्यक्ति गीत या नवगीत के रूप मे प्रस्तुत करता है।कवि के सद्य:प्रकाशित गीतसंग्रह ‘दर्द जोगिया ठहर गया’ मे कवि के एक सौ से अधिक गीत हैं जो उनके गीतों की बहुआयामी अभिव्यक्तियों का दस्तावेज़ है। महानगरों मे उगे हुए कंकरीट के जंगलों मे अब देसी पंछी नजर नही आते।अब दिनोदिन विकसित हो रहे नगरों मे कौए ही सर्वाधिक नज़र आते हैं। कवि कहता है-
गली-गली में/डगर-डगर में काले कौए भरे नगर में।
असल में ये कौए शहरी प्रदूषण और धूर्तता का पर्याय भी बन गये हैं। मधुकर जी प्रगतिशील गीतकार हैं क्योकि उनके गीतों में लगातार भाषा-भाव छन्द तथा विचार के आधार पर भी प्रगति की चेतना दिखलायी देती है। महाकुम्भ पर कवि के दो गीत हैं जो दो विभ्न्न दृष्टियों से लिखे गये हैं,और बेहतरीन ढंग से लिखे गये हैं। एक नजर में जहाँ हरिद्वार नज़र आता है वहीं दूसरी नज़र में नरकद्वार दिखायी देता है।एक गीत मे कवि कहता है-
तम्बू खेमे और कनाते/ आने लगे नज़र/उतरा रातो-रात यहाँ पर कोई देव नगर।
दूसरे गीत मे कवि कहता है-
जाग गया उन्मुक्त प्रदूषण/कण-कण भरा जहर/ उतरा रातो रात यहाँ पर एक पिशाच नगर।
यहाँ पहला वाला दृश्य चिंतनीय है और दूसरा दृश्य तो भयावह है क्योंकि सच्ची आस्था तो मनुष्य के मन में और उसके व्यक्तिगत जीवन में होती है –उसका कोई भी रूप हो सकता है।उसके लिए किसी गुरु या महंत की आवश्यकता नही होती।कवि की नजर में अपने शहर के बच्चे भी हैं और उनकी विवशता भी है बच्चों के विकास की उम्र में अपने सपनों कीमत पर हम सभी उनसे किताबों का बोझ ढुलवा रहे हैं उसका बचपन कहीं खो चुका है कवि कहता है- धूप में बस्ता उठाये हाँफता बच्चा/तोतली भोली निगाहें लापता बच्चा। भ्रष्ट राजनीति का एक चित्र देखें- जय-जयकार भेडियों की /झंडा बरदारी है/ इसका आज और कल उसका/जग दरबारी है/कुछ पानी ही ऐसा/कोई दाल नही गलती/बहला देने से तो कोई बात नही बनती। ऐसे माहौल मे छुटभैये नेताओं की दशा मोहासन्न नारद जैसी हो जाती है।आम आदमी के मन में लगातार एक विभ्रम या विपर्यय का बोध चल रहा है।कवि कहता है- चार छोडकर/बीस भुजाओं पर/नारद का मन मचला है/रावण वही नाम बदला है/लिखा पढा अगला पिछला है। जैसे जैसे हमने प्रगति की है हमारे समाज मे नायकत्व का अभाव होता गया। पुराने नायकों पर विश्वास नही रहा नये नायक उभरकर आ नही पाये।कवि इसी चिंता को व्यक्त करता है- पढ-पढ कथा तुम्हारी राजा राम जी/हम हो गये भिखारी राजा राम जी। ऐसे पीडांतक समय में हम जी रहे हैं यह कम सौभाग्य नही है।अंतत:भोजपुरी मुहावरे की शक्ति कवि के गीतों मे चमक पैदा करती है, संवेदना के धरातल पर कवि का दर्द जोगी बन कर उसकी सघन चेतना मे मानो ठहर सा गया-
अपना लोहू आज आदमी बेबस चाट रहा/दर्द जोगिया ठहर गया चौमासा काट रहा।

पुस्तक शीर्षक: दर्द जोगिया ठहर गया
कवि: मधुकर अष्ठाना
प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन
मूल्य:रु.250/
वर्ष :2009

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

दाम्पत्य का आदर्श

दाम्पत्य का आदर्श

(तुलसी कृत कवितावली से)

जलको गये लक्खन हैं लरिका
परिखौ पिय छाँह घरीक ह्वै ठाढे
पोछि पसेऊ बयारि करौं
अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि डाढे
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानिकै
बैठि बिलम्ब लौ कंटक काढे
जानकी नाह को नेह लख्यो
पुल्क्यो तन बारि बिलोचन बाढे।

छन्द का प्रसंग

वन गमन का दृश्य है।राम आगे आगे चल रहे है।सीता उनके पीछे और उनके पीछे लक्ष्मण चल रहे है।सीता थक गयी है परंतु अपनी थकान का संकेत वे राम से नही करना चाहतीं।अत: पीछे मुडकर सीता लक्ष्मण को जल लाने का आदेश देती हैं,लक्ष्मण चुपचाप जल लेने के लिए चले जाते है। अत: एकांत पाकर सीता राम से कहती हैं। हे प्रिये,बालक लक्ष्मण जल लेने गये हैं,अत: घरी भर वृक्ष की छाया मे खडे होकर उसकी प्रतीक्षा कर लीजिए,कहीं वह राह न भटक जायें। तब तक मै आपका पसीना पोछकर अपने आँचल से हवा कर देती हूँ,जब लक्ष्मण पानी ले आयेगे तब आपके गर्म धूल मे जले हुए पैर धो दूँगी।
तुलसीदास कहते है कि अंतर्यामी श्री राम ने प्रिया सीता के ऐसा कहने पर तुरंत उनकी थकान का अनुभव कर लिया और वृक्ष के नीचे बैठकर बडी देर तक पैरौं के काँटे निकालते रहे,ताकि सीता इतनी देर विश्राम कर सके। जब अधिक देर हो गयी तो सीता को भी इस बात का अनुभव हुआ कि श्री राम मेरे प्रेम के ही कारण इतनी देर से काँटे निकालने के बहाने बैठे हुए है।इस दाम्पत्य प्रेम के इस अनुभव के बाद सीता को रोमांच हो आया,उनका सारा शरीर प्रफुल्लित हो गया और आँखों से प्रणय अस्रु बह निकले।