गुरुवार, मार्च 25, 2010

समीक्षा 1.

परवरिस बिना बढते जन के गीत
*भारतेन्दु मिश्र


भगवत दुबे छन्द विधाके महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।वे जबलपुर की कादम्बरी संस्था के नाते भी चर्चित हैं।‘हम जंगल के अमलतास’ उनका नवीनतम गीत संग्रह है।संग्रह में कुछ नवगीत भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। भगवत दुबे के ये गीत अपनी लोकधर्मी चेतना से जुडे होने के नाते पाठकों को आश्वस्त करते हैं। कवि के इन गीतों में समय की विसंगतियाँ विभिन्न रूपों में उभर कर सामने आती हैं।वरिष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र की टिप्पणी भगवत दुबे के नवगीतों को समझने मे सहायक है। कवि आत्मनिवेदन में अपने तमाम सहयात्रियों को नामोल्लेख पूर्वक याद करता है, वह कहीं न कहीं संवेदना का अतिरेक ही कहा जायेगा।भगवत दुबे जैसे कवि को अपने ऊपर हो रहे शोध आदि का उल्लेख अपने आत्म निवेदन मे करने से बचना चाहिए क्योकि आत्म निवेदन और आत्मश्लाघा मे बहुत फर्क होता है। इसी पुस्तक में देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,विद्यानन्दन राजीव ,राम अधीर और कुमार रवीन्द्र सहित सबकी प्रशस्तिपरक टिप्पणियों के बाद गीतों के बारे मे कुछ अधिक कहना खतरा मोल लेने जैसा है।दूसरी बात यह भी कि संकलन के कुछ गीत अपने समय समाज की बेहतरीन सूक्तियाँ हैं। भगवत दुबे ओज के कवि हैं-
प्राण गँवाये हैं हमने/ पर लाज रखी है प्रण की/हमने की दुर्दशा/दम्भ के कंस और रावण की।
कवि अपने जातीय परिवेष की व्यवस्था पर चिंतित है,उसे सामाजिक समीकरण बिगडता दिखायी देता है।वह जिस लोक जीवन मे जी रहा है वहाँ मनुवादी जातियाँ ताण्डव कर रही हैं। संवेदनशील कवि कहता है-
बँधी जातियों की नावें/मजहब के घाटों में/लहरों को बँटवाया/महतर,बाँभन,जाटों में।
दूसरी ओर कवि के सामने भुखमरी के दृश्य हैं जो उसे विवश करते हैं।रोजी रोटी के चक्कर में खोया आम आदमी भी उसे नजर आता है।कवि कहता है-
सुख राई सा बौना /पर्वत जैसे कष्ट मिले/भूख मिटाने के साधन/सारे पथभ्रष्ट मिले/छल छद्मों के हाथ/पराजित,दृढ संकल्प हुए/रोजी रोटी बुनते-बुनते/हम खुद गल्प हुए।
ऐसे ही अनेक समसामयिक गीत भगवत दुबे की कविताई का पता बताते हैं।प्राचीन महाकोसल की लोक परम्पराएँ भी कवि के इन गीतों मे कहीं-कहीं झलकती हैं। आज भी यहाँ का नेता अपने हित में धर्म का इस्तेमाल करने में लगा है।भगवत दुबे कहते हैं-
भ्रम से लिपटी हुई/धर्म की पोथी थमा गये/तृष्णा स्वार्थ मनुष्यों की/ नस नस में समा गये।
यह परिदृश्य सदियों पुराना होते हुए भी नया है। कवि की विशेषता यह है कि उसका छन्द सधा हुआ है,लोक बिम्बों की गन्ध कवि की भाषा मे पठनीयता पैदा करती है। समकालीन जीवन की तमाम कठिनाइयों की ओर ये गीत संकेत करते दिखायी देते हैं।एक बिम्ब देखें- हम जंगल के अमलतास/परवरिस बिना बढ्ते/पर गमलों की नागफनी की आँखों में गडते।
नागर और देसी होने यह फर्क सचमुच आज भी हमारे समाज में व्याप्त है। अधिकांश हमारे साथी जनजीवन मे परवरिस के बिना ही जीते हैं।कुल मिलाकर हर कवि का अपना समय होता है और उसके समय के अनुसार उसकी कविताएँ प्रतिध्वनित होती हैं।कवि के ये गीत भी अपने समय के साक्षी हैं।


पुस्तक शीर्षक: हम जंगल के अमलतास
कवि:आचार्य भगवत दुबे
प्रकाशक: कादम्बरी,जबलपुर
मूल्य:रु.150/
वर्ष :2008


समीक्षा 2

दर्द जोगिया के साक्षी गीत
*भारतेन्दु मिश्र

मधुकर अष्ठाना लखनऊ के छन्दोबद्ध कवियों मे सुपरिचित नाम है। मधुकर जी के अब तक अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।वे गीत गज़ल और नवगीत जैसी छन्दोबद्ध विधाओं के कवि हैं,कवि के सामने एक कविता की सांस्कृतिक परम्परा है। वह अपनी परम्परा मे तनिक भी विचलन देखता है तो उसे विक्षोभ हो आता है और वह अपनी अभिव्यक्ति गीत या नवगीत के रूप मे प्रस्तुत करता है।कवि के सद्य:प्रकाशित गीतसंग्रह ‘दर्द जोगिया ठहर गया’ मे कवि के एक सौ से अधिक गीत हैं जो उनके गीतों की बहुआयामी अभिव्यक्तियों का दस्तावेज़ है। महानगरों मे उगे हुए कंकरीट के जंगलों मे अब देसी पंछी नजर नही आते।अब दिनोदिन विकसित हो रहे नगरों मे कौए ही सर्वाधिक नज़र आते हैं। कवि कहता है-
गली-गली में/डगर-डगर में काले कौए भरे नगर में।
असल में ये कौए शहरी प्रदूषण और धूर्तता का पर्याय भी बन गये हैं। मधुकर जी प्रगतिशील गीतकार हैं क्योकि उनके गीतों में लगातार भाषा-भाव छन्द तथा विचार के आधार पर भी प्रगति की चेतना दिखलायी देती है। महाकुम्भ पर कवि के दो गीत हैं जो दो विभ्न्न दृष्टियों से लिखे गये हैं,और बेहतरीन ढंग से लिखे गये हैं। एक नजर में जहाँ हरिद्वार नज़र आता है वहीं दूसरी नज़र में नरकद्वार दिखायी देता है।एक गीत मे कवि कहता है-
तम्बू खेमे और कनाते/ आने लगे नज़र/उतरा रातो-रात यहाँ पर कोई देव नगर।
दूसरे गीत मे कवि कहता है-
जाग गया उन्मुक्त प्रदूषण/कण-कण भरा जहर/ उतरा रातो रात यहाँ पर एक पिशाच नगर।
यहाँ पहला वाला दृश्य चिंतनीय है और दूसरा दृश्य तो भयावह है क्योंकि सच्ची आस्था तो मनुष्य के मन में और उसके व्यक्तिगत जीवन में होती है –उसका कोई भी रूप हो सकता है।उसके लिए किसी गुरु या महंत की आवश्यकता नही होती।कवि की नजर में अपने शहर के बच्चे भी हैं और उनकी विवशता भी है बच्चों के विकास की उम्र में अपने सपनों कीमत पर हम सभी उनसे किताबों का बोझ ढुलवा रहे हैं उसका बचपन कहीं खो चुका है कवि कहता है- धूप में बस्ता उठाये हाँफता बच्चा/तोतली भोली निगाहें लापता बच्चा। भ्रष्ट राजनीति का एक चित्र देखें- जय-जयकार भेडियों की /झंडा बरदारी है/ इसका आज और कल उसका/जग दरबारी है/कुछ पानी ही ऐसा/कोई दाल नही गलती/बहला देने से तो कोई बात नही बनती। ऐसे माहौल मे छुटभैये नेताओं की दशा मोहासन्न नारद जैसी हो जाती है।आम आदमी के मन में लगातार एक विभ्रम या विपर्यय का बोध चल रहा है।कवि कहता है- चार छोडकर/बीस भुजाओं पर/नारद का मन मचला है/रावण वही नाम बदला है/लिखा पढा अगला पिछला है। जैसे जैसे हमने प्रगति की है हमारे समाज मे नायकत्व का अभाव होता गया। पुराने नायकों पर विश्वास नही रहा नये नायक उभरकर आ नही पाये।कवि इसी चिंता को व्यक्त करता है- पढ-पढ कथा तुम्हारी राजा राम जी/हम हो गये भिखारी राजा राम जी। ऐसे पीडांतक समय में हम जी रहे हैं यह कम सौभाग्य नही है।अंतत:भोजपुरी मुहावरे की शक्ति कवि के गीतों मे चमक पैदा करती है, संवेदना के धरातल पर कवि का दर्द जोगी बन कर उसकी सघन चेतना मे मानो ठहर सा गया-
अपना लोहू आज आदमी बेबस चाट रहा/दर्द जोगिया ठहर गया चौमासा काट रहा।

पुस्तक शीर्षक: दर्द जोगिया ठहर गया
कवि: मधुकर अष्ठाना
प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन
मूल्य:रु.250/
वर्ष :2009

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

दाम्पत्य का आदर्श

दाम्पत्य का आदर्श

(तुलसी कृत कवितावली से)

जलको गये लक्खन हैं लरिका
परिखौ पिय छाँह घरीक ह्वै ठाढे
पोछि पसेऊ बयारि करौं
अरु पाँय पखारिहौं भूभुरि डाढे
तुलसी रघुबीर प्रिया स्रम जानिकै
बैठि बिलम्ब लौ कंटक काढे
जानकी नाह को नेह लख्यो
पुल्क्यो तन बारि बिलोचन बाढे।

छन्द का प्रसंग

वन गमन का दृश्य है।राम आगे आगे चल रहे है।सीता उनके पीछे और उनके पीछे लक्ष्मण चल रहे है।सीता थक गयी है परंतु अपनी थकान का संकेत वे राम से नही करना चाहतीं।अत: पीछे मुडकर सीता लक्ष्मण को जल लाने का आदेश देती हैं,लक्ष्मण चुपचाप जल लेने के लिए चले जाते है। अत: एकांत पाकर सीता राम से कहती हैं। हे प्रिये,बालक लक्ष्मण जल लेने गये हैं,अत: घरी भर वृक्ष की छाया मे खडे होकर उसकी प्रतीक्षा कर लीजिए,कहीं वह राह न भटक जायें। तब तक मै आपका पसीना पोछकर अपने आँचल से हवा कर देती हूँ,जब लक्ष्मण पानी ले आयेगे तब आपके गर्म धूल मे जले हुए पैर धो दूँगी।
तुलसीदास कहते है कि अंतर्यामी श्री राम ने प्रिया सीता के ऐसा कहने पर तुरंत उनकी थकान का अनुभव कर लिया और वृक्ष के नीचे बैठकर बडी देर तक पैरौं के काँटे निकालते रहे,ताकि सीता इतनी देर विश्राम कर सके। जब अधिक देर हो गयी तो सीता को भी इस बात का अनुभव हुआ कि श्री राम मेरे प्रेम के ही कारण इतनी देर से काँटे निकालने के बहाने बैठे हुए है।इस दाम्पत्य प्रेम के इस अनुभव के बाद सीता को रोमांच हो आया,उनका सारा शरीर प्रफुल्लित हो गया और आँखों से प्रणय अस्रु बह निकले।

मंगलवार, जनवरी 19, 2010

नवगीतकार डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा से भारतेन्दु मिश्र की बातचीत

मै तो कविता को एंज्वाय करता हूँ--डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा

आजकल साहित्यिक मासिक पत्रिका के सम्पादक,अनेक विधाओ के यशस्वी रचनाकार,डाँ योगेन्द्रदत्त शर्मा न केवल श्रेष्ठ नवगीतकार है बाल्कि कथाकार के रूप मे भी चर्चित रहे है । अगस्त 2010 मे योगेन्द्र जी अपने जीवन के साठ वर्ष पूर्ण कर रहे है,नवगीतकार योगेन्द्रदत्त शर्मा की प्रतिभा से प्रभावित होकर डाँ.शम्भुनाथ सिंह ने नवगीत दशक योजना मे उन्हे प्रमुख कवि के रूप मे संकलित किया।योगेन्द्रदत्त जितने अच्छे रचनाकार है उतने ही श्रेष्ठ मनुष्य भी है। आज 25-12-2009 को उनके पिताश्री पं.कन्हैयालाल मत्त की जयंती के अवसर पर प्र्स्तुत है -उनके आवास पर की गयी बातचीत के प्रमुख अंश-
भारतेन्दु मिश्र :योगेन्द्र जी आपकी की षष्ठिपूर्ति निकट है,आपकी छवि नवगीतकार,कथाकार,कुशल सम्पादक और विचारक की रही है- आप साहित्य की कई विधाओ से जुडे रहे है।आपके लेखन की शुरुआत कैसे हुई?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : शुरुआत तो नवीं क्लास मे पढता था तभी हुई। मेरे घर मे बचपन से ही कविता का माहौल था। पिताश्री पं.कन्हैयालाल मत्त स्वयं अच्छे कवि थे तो उन दिनो राष्ट्रीय कविताओ का दौर था ,1965 मे चीन युद्ध चल रहा था।उसी समय पहली कविता बनी।........शीर्षक था।इसको हास्यास्पद न समझे कि जैसे मैथिलीशरण गुप्त जी या बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द जी ने बहुत कम आयु मे कविता लिखनी शुरू कर दी थी,वस्तुत:उस समय मेरे घर का वातावरण ऎसा था।अक्सर घर मे गोष्ठी जैसा वातावरण होता था।
भारतेन्दु मिश्र : तो यह पहली कविता क्या छन्दोबद्ध थी,गीत के शिल्प मे थी?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : घर मे छन्दोबद्ध कविता का ही माहौल था। पिता जी गीत लिखते थे तो छन्द मुझे विरासत मे मिला उसे गीत तो नही कह सकते हाँ छन्दोबद्ध कविता अवश्य थी। उन्ही दिनो एक नाटक लिखमारा था,नाटक क्या छोटी नाटिका थी- तो वह कविता और नाटिका दोनो कालेज की मैगजीन मे छपने के लिए दे दी। पं.हरप्रसाद शास्त्री जी हमारे पिता जी के मित्र थे वही उसका संपादन देखते थे।हुआ ये कि कविता तो कही खो गयी किंतु वह नाटिका उन्होने छाप दी। दोनो रचनाओ की पृष्ठभूमि चीन युद्ध ही था।
भारतेन्दु मिश्र : योगेन्द्र जी आज पीछे मुडकर देखते हुए कैसा लगता है,खास कर उस माहौल को याद करते हुए,या कि स्व.मत्त जी को याद करते हुए?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : दरअसल मै जो कुछ भी हूँ वह अपने पिताजी के कारण हूँ।शुरुआत मे मै विज्ञान का विद्यार्थी रहा , साहित्य की ओर आने की संभावना बहुत कम होती है विज्ञान के छात्रो मे परंतु घर मे ऎसा वातावरण था कि मै साहित्य से जुडता गया। पिता जी रिटायर हो गये थे वो पढते बहुत थे उनकी आँखें कमजोर हो गयी थी,फिर भी अखबार मे या किसी किताब मे धुँधलके मे भी आँखे गडाये घंटो बैठे रहते थे। फिर वो मुझसे अपनी रचनाये फेयर कराने लगे। तो इस प्रकार साहित्य की भाषा सीखने लगा, बहुत सारे शब्दो का ज्ञान नही होता था तो उन्ही से पूछता था। साहित्य की पुस्तको मे रुचि हुई तो साहित्य पढने लगा । भाषा मैने पिता जी से ही सीखी।
भारतेन्दु मिश्र : उन दिनो कौन से साहित्यकार आपके घर आया करते थे?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : हाँ पिताजी के कारण घर मे सहित्याकार आते रहते थे।बडा सुन्दर माहौल था। स्थानीयो मे खासकर प्रसिद्ध कथाकार से.रा.यात्री,गीतकार प्रेम शर्मा,कुँवर बेचैन और देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,पाल भसीन जैसे श्रेष्ठ साहित्यकार अक्सर आया करते थे। मेरी शुरुआत थी तो इसीप्रकार मुझे भाषा और साहित्य के संस्कार मिलते रहे।
भारतेन्दु मिश्र : आपकी कविताएँ डाँ.शम्भुनाथ सिंह द्वारा सम्पादित नवगीत दशक 3 मे संकलित है,उसी मे राजेन्द्र गौतम है डाँ.सुरेश जैसे और भी कई महत्वपूर्ण कवि होंगे, कई लुप्त हो गये। प्रश्न यह है कि उस समय की रचनाएँ आपको अधिक प्रिय लगती है या आज कल जो लिख रहे है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :.देखिए सुखद कहें या दुखद,पता नही आप किस रूप लेंगें ,मेरे साथ यह स्थिति रही है कि मुझ पर किसी अपनी रचना का दो या तीन दिन से अधिक प्रभाव नही रह्ता उसके बाद वही रचना सामान्य लगने लगती है। जहाँ तक बात है रचनाशीलता की तो लगातार मेरी रचनाशीलता बरकरार है। कभी कभी अंतराल भी हो जाता है-साल साल भर का, लेकिन रचनात्मकता बनी हुई है। गीतो मे पहली पुस्तक खुशबुओं के दंश आयी फिर परछाइयो के पुल,और फिर दिवस की फुनगियो पर थरथराहट प्रकाशित हुई। गीत के अतिरिक्त कहानियो मे विसंवाद और परदा बे परदा मेरे प्रकाशित कथा संग्रह है।
भारतेन्दु मिश्र : तब के गीत और अब के गीत मे प्रयोगधर्मिता के आधार पर क्या अंतर महसूस करते है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : मैने कोशिश यह की कि मै अपने गीतो को रचनाशीलता के स्तर पर अलग रख सकूँ अपनी मौलिकता को लेकर चलूँ,पता नही कितना सफल हुआ हूँ,यह तो आप जैसे समीक्षक ही बता सकते है। पहले के गीतो पर पिता जी का बहुत प्रभाव था मैने बहुत परिश्रम से अपनी मनस्थिति को बदलकर उनके प्रभाव से स्वयं को हटाया। प्रयोगधर्मिता के आधार पर तब मे अब मे अंतर तो है ही,अब कितना और कैसा अंतर है यह तो दूसरे लोग ही तय करेंगे।
भारतेन्दु मिश्र : गीत के अतिरिक्त लम्बी कविताएँ,गजले आदि भी आपकी रचनाशीलता का हिस्सा रही है तो लम्बी कविता मे जो रचनात्मकता को विस्तार मिलता है उसका निर्वाह आपने कैसे किया?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : अरसा हो गया,अब जब पीछे मुडकर अपने लेखन को देखता हूँ तो लम्बी कविताएँ हमने लिखी है कुछ ऎसी कविताएँ भी है जिनमे तुकांत का भी निर्वाह होता रहा । मैने एक खण्डकाव्य लिखा था जिसका शीर्षक था गवाक्ष जिसमे मैने एक अध्याय मे निराला के तुलसीदास वाले छन्द का प्रयोग किया है। तो मैने अपनी लम्बी कविताओ मे तुक और लय को बचाकर रखा है। एक मेरी बहुत लम्बी कविता है जन्मदिन पित्रऋण और ऋतुचक्र,तो उसमे भी तुकांत का निर्वाह करने की कोशिश की है ,वह रचना मुझे प्रिय भी लगती है। एक और मेरी रचना थी गुमशुदा फागुन वह भी अब मुझे अधिक अच्छी लगने लगी है मै यही सोच रहा हूँ कि कुछ ऎसी ही प्रगीतात्मक रचनाएँ और लिख सकूँ..
भारतेन्दु मिश्र : योगेन्द्र जी यह गद्य का युग है,कविता भी गद्यात्मक हो गयी है। आप संपादक भी है तो ऎसी कविताओ के बारे मे आपकी क्या राय है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :मेरी राय बहुत अच्छी है। लोग बहुत अच्छी लिख रहे है,कुछ हमारे गीतकार मित्रो की राय हो सकती है कि ब्लैंकवर्स या गद्यकविता अच्छी नही होती किंतु मै तो कविता को एंज्वाय करता हूँ। मैने भी कुछ ऎसी कविताएँ लिखी है-अभी बहुत कुछ ऎसा है जो छप नही पाया। देखिए हमारे कई मित्र है जो कहानियाँ लिख रहे है हमे उनका लेखन पसन्द है वैसे ही छन्दहीन या गद्यकविता की बात है।
भारतेन्दु मिश्र : इनदिनो जो लोग लिख रहे है उनमे कौन से कवि आपको अच्छे लगते है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : देखिए आजकल जैसी सम्मानित साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते हुए जो रचनाएँ आती है उन्हे पढ्ता हूँ,इसके अतिरिक्त बहुत अधिक समय नही मिलता तो भी समकालीन अधिकांश कवियो की रचनाएँ देखने को तो मिल ही जाती है। मै सबको छन्दहीन या छन्दोबद्ध कविता को उसकी गुणवत्ता के आधार पर चुनता हूँ। मै सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,धर्मवीर भारती को बहुत पसन्द करता हूँ,कुँवर नारायण है, समकालीनो मे अरुण कमल है जो मुझे बहुत पसन्द है। इब्बार रब्बी,मंगलेश आदि की कुछ कविताएँ मुझे अच्छी लगती है।
भारतेन्दु मिश्र : गीतकारो मे कौन से नाम है जो आपको पसन्द है,और जो ठीक ठिकाने के गीत लिख रहे है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : गीतकारो मे जो ठीक ठिकाने के गीत लिखने वालो मे जो मेरे बाद के नये कवि है उनमे यश मालवीय अच्छा लिखते है,हरीश निगम है,सुधांशु उपाध्याय है,एक रचनाकार और है शिवाकांत मिश्र विद्रोही उनकी रचनाएँ भी मुझे बहुत पसन्द आती है बाकी और कई मेरे समकालीन है ,कई वरिष्ठ है जिनकी रचनाएँ मुझे पसन्द है। अन्यथा न ले तो आपकी रचनाएँ भी मुझे पसन्द आती है।
भारतेन्दु मिश्र : मै तो बहुत दिन हो गये गीत लिख ही नही पा रहा हूँ....
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : नही,आपको लिखते रहना चाहिए,आप अच्छा लिखते है।
भारतेन्दु मिश्र : डाँक्टर साहब, आपका नाम कहानियो से भी जुडा रहा है,कुछ लोग तो आपको कथाकार के रूप मे ही जानते है एक बार कथादेश के संपादक हरिनारायण से आपके बारे मे बात होरही थी तो उन्होने कहा कि मै तो योगेन्द्र जी को कथाकार के रूप मे ही जानता हूँ ,कथा लेखन की शुरुआत कैसे हुई?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : शुरुआत उसी समय हुई थी,जब कविता की हुई थी। सबसे पहले एक व्यंग्यात्मक लघुकथा लिखी थी जो सारिका के जुलाई सन 1975 अंक मे छपी थी।परन्तु वह इमरजेंसी का दौर था और वह मेरी पहली कहानी सेंसर की भेंट चढ गयी। अब उसकी कोई प्रति नही है।याद करके फिर से लिखना पडेगा। फिर अगली कहानी सारिका के नव लेखन अंक अप्रैल 1976 मे छपी।फिर आगे मै लिखता गया। मेरे दो कहानी संग्रह भी छपे –स्मृति संवाद और परदा बेपरदा। तीसरा संग्रह भी प्रकाशन की तैयारी मे है। तो यह सच बात है कि कुछ लोग मुझे केवल कथाकार के रूप मे जानते है और कुछ लोग केवल गीतकार के रूप मे जानते है। ऎसे ही मेरे एक मित्र थे रमेश बत्रा तो उन्हे भी आश्चर्य हुआ,उन दिनो मै अपनी थीसिस पर काम कर रहा था –उन्होने पूछा-आपका क्या टाँपिक है-मैने बताया-साठोत्तर हिन्दीगीत काव्य मे संवेदना और शिल्प- तो वे अचकचाये बोले तुम्हारा और कविता का क्या संबन्ध तो मैने बताया- मूलत: तो मै कवि ही हूँ।
भारतेन्दु मिश्र : आप आजकल से लम्बे अरसे सम्पादन से जुडे रहे है।वहाँ विभिन्न लोगो से- बडे छोटे साहित्यकारो से संपर्क होता रहा होगा,क्या सीमाएँ होती है खासकर सरकारी पत्रिका के सम्पादक के सामने?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : देखिये सम्पादक के सामने कुछ न कुछ तो सीमाएँ रहती ही है। जो निजी संस्थानो की पत्रिकाएँ है ,उनके सम्पादको के सामने भी कुछ अपनी तरह के दबाव रहते है। ऎसा नही है कि सिर्फ सरकारी पत्रिकाओ पर ही दबाव रहते है। यहाँ सरकारी पत्रिका मे ध्यान रखना होता है कि सरकार की तीखी आलोचना न हो। गाली-गलौच की भाषा न हो। आमतौर पर स्वस्थ आलोचना स्वीकार होती है यही थोडी सी सीमा आप कह सकते है। मैने ऎसे सम्पादको के साथ काम किया है जो थोडा सा जोखिम भी उठा लेते थे। तो वह संस्कार मुझे भी मिल गया और मै भी कभी-कभी ऎसी कोशिश कर लेता हूँ।
भारतेन्दु मिश्र :आपने शुरुआत किन सम्पादको के साथ की थी और पंकज विष्ट के साथ आपके कैसे संबन्ध रहे?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :शुरुआत मे जब मै आजकल से जुडा तो सम्पादक थे भगीरथ पांडेय और सहायक थे पंकज विष्ट । भगीरथ पांडेय कोई रुचि लेते नही थे। पंकज ही देखते थे उनसे मैने बहुत सीखा। मै उनका बहुत सम्मान करता हूँ। मैने उनसे सीखा कि रचना को ही वरीयता देनी चाहिए,रचनाकार को नही। रचना के चयन मे किस तरह से निर्मम होकर तटस्थता बरतनी है यह मैने उनसे ही सीखा,और यह भी कि पत्रिका को वरीयेता देनी है न कि अपने परिचितो को। किसी से द्वेष भी न हो किसी से राग भी न हो बस रचना ही ध्यान मे रहे। व्यक्तिगत रूप मे वे नैतिकतावादी किस्म के आदमी है। परंतु उस दौरान जब कोई उग्र होने लगता था तो वह भी पीछे नही रहते थे। बहुत प्यार करने वाले और सहायता करने वाले व्यक्ति है पंकज जी । मै उन्हे अपने बडे भाई के रूप मे ही देखता आया हूँ ।
भारतेन्दु मिश्र : इसके साथ ही प्रवीण उपाध्याय के साथ भी आप रहे ?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :प्रवीण जी मेरे अच्छे मित्र है सहकर्मी है,लेकिन हम दोनो आजकल मे एक साथ कभी नही रहे यह इत्तिफाक है। हम दोनो के बीच अच्छी समझदारी रही है जब वो पत्रिका मे रहे तो मै बाहर से उनका सहयोग करता रहा और अब जब मै पत्रिका मे हूँ तो उनका परोक्ष सहयोग मुझे मिल जाता है। हम दोनो के संबन्ध परस्पर ऎसे ही है।
भारतेन्दु मिश्र : योगेन्द्र जी, गाजियाबाद के साहित्यकारो से आपके रचनात्मक सरोकार किस रूप मे जुडे रहे,पिता श्री मत्त जी के समय से ही या बाद मे,गीताभ नामक संस्था से भी आप जुडे है और भी लोग है यहाँ जो अच्छा लिख रहे है उनके बारे मे आपकी क्या राय है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :जब मैने लिखना शुरू किया था तब तीने चार लोग मेरे समकक्ष थे धनंजय सिंह मुझसे सीनियर थे श्याम निर्मम मेरे सहपाठी है,हम लोग साथ-साथ पढते भी थे और कविता भी करने लगे थे। हम लोग ट्रेन से दिल्ली जाते थे,अक्सर ही मुलाकाते होती रहती थी।कभी-कभी ट्रेन मे ही हम लोग कविताएँ भी कह लेते थे। कभी-कभी मिटोब्रिज से शाहदरा तक आते-आते नई कविता बन जाती थी। ऎसा संयोग रहा कि दोस्ती भी निभती थी,रचनात्मक आदान-प्रदान भी होता रहता था।उन दिनो एक संस्था भी थी इंगित नामक उसमे भी हम लोग जुडते थे। अब पिछले आठ-दस वर्षो से गीताभ संस्था है जो काम कर रही है। उसमे भी तरह–तरह के लोग आते है,कुछ वरिष्ट उम्र के रचनाकार भी उसमे जुडे है जिनकी रचनाएँ शिथिल होती है,पर उनका भी महत्व होता है। संस्था का काम तो ऎसे ही चलता है। बाकी यहाँ पराग जी है,डाँ.मधु भारती है,कमलेश भट्ट कमल है,वेद प्रकाश वेद है ये सारे लोग अच्छा लिखने वाले है।
भारतेन्दु मिश्र : इन्द्र जी को आप कबसे जानते है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :अपने पिता जी के बाद मै आदरणीय इन्द्र जी को ही स्मरण करता हूँ,मैने उनसे बहुत कुछ सीखा है। उनका अनुसरण भी किया है,वो बहुत ही वरिष्ठ रचनाकार है। बहुत कुछ सिखाते है-बिना सिखाये भी उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। अधिक क्या कहूँ रचनाकार के नाते मै उनका ऋणी हूँ।
भारतेन्दु मिश्र :एक गजल संग्रह भी आपका आया था-नकाब का मौसम-उसपर आपको आर्य स्मृति पुरस्कार भी मिला था,तो उसके बारे मे कुछ बताये?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :हाँ पुरस्कार तो जरूर मिला ,मै यह तो नही कहूँगा कि मुझे अच्छा नही लगा क्योकि यह तो अपने साथ बेईमानी होगी अपने साथ।हाँ इतना अवश्य कहूँगा कि पुरस्कार के बाद मै कोई बडा कवि हो गया हूँ ऎसा नही लगा। निर्णायको को मेरी गजले अच्छी लगी। मै जैसा तब सामान्य था वैसा ही आज भी हूँ।
भारतेन्दु मिश्र : कुछ लोग कह रहे है कि कविता का अंत हो गया है तो ऎसे समय मे समकालीन कविता के बारे मे आपकी क्या राय है?आज नवलेखन की क्या चुनौतियाँ है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :देखिये, मेरी राय मिली जुली है।कुछ लोग बहुत अच्छा भी लिख रहे है,कुछ सामान्य भी लिख रहे है। ऎसा हर युग मे होता रहा है। अब कहने वालो की क्या बात है कोई कुछ भी कह सकता है-कविता का ही क्यो साहित्य का अंत हो गया है,या फिर मनुष्य का अंत हो गया है। बाकी लेखन का अंत तो हो ही नही सकता,अब किसी के दिमाग मे विचार आयेगे तो वह अपने को कैसे रोक लेगा। यह तो स्वाभाविक प्रक्रिया है,इसे बन्द नही किया जा सकता। चीजे जितनी जादा उलझती जा रही है उतना ही अनुभवो का विस्तार होगा तो रचनाकार लिखेगा ही। नये समय की नई चुनौतियो का सामना भी नया कवि कर रहा है।
भारतेन्दु मिश्र : अभी कुछ दिन हुए डाँ नामवर सिंह ने किसी कवि की एस.एम.एस. की हुई कविताओ का संकलन लोकार्पित किया है,इण्टरनेट पर भी कविताएँ आ रही है। हिन्दी विकीपीडिया मे बहुत से कवियो की कविताएँ दी हुई है आप इस सब को हिन्दी साहित्य की प्रगति का नया दौर मानते है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : देखिये विकास तो हो रहा है लेकिन अभी बहुत सीमित लोगो तक इण्टरनेट की पहुँच है। जैसे मै इस सबको के बारे मे अधिक नही जानता हूँ मुझे लगता है कि अधिकाश लोग अभी इण्टरनेट से जुडे नही है।हाँ, यह हो सकता है कि इसमे कुछ साहित्य सुरक्षित हो जाय। सुदूर बैठा हुआ सुविधा सम्पन्न पाठक भी इससे जुड सकता है।हो सकता है कि कुछ और अच्छे परिणाम आये,परंतु मुद्रित पुस्तक का कोई विकल्प नही हो सकता,उसका महत्व बराबर बना रहेगा।
भारतेन्दु मिश्र : तो नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद आपने लेखन की कोई नई योजना बनाई है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :देखिये, मै बहुत सामान्य आदमी हूँ,कोई बडी एषणा मेरी नही है,कोई महत्वाकाक्षा भी नही है। दो तीन उपन्यासो की योजना जरूर मेरे मन मे है। पिछले बीस वर्षो से कई प्लाँट मेरे मन मे है,उसकी रूपरेखा मेरे दिमाग मे है अब समय मिलेगा तो मै उन पर ध्यान दूँगा। कुछ मेरी कहानियाँ ऎसी है जिनमे उपन्यास की संभावनाएँ है उस पर भी काम करना चाहता हूँ।सबसे पहले मै जिस उपन्यास पर काम करना चाहता हूँ उसका शीर्षक है अजगर पंछी, यह प्लाँट आफिस के माहौल पर है। अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम से इसका शीर्षक लिया है। अब देखिये कर पाता हूँ कि नही,मन मे इच्छा तो है।
भारतेन्दु मिश्र : आपका अप्रकाशित साहित्य भी है,एक काव्य नाटक भी है ।उसके प्रकाशन की क्या योजना है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा : मेरा काव्य नाटक समयमंच अप्रकाशित है और मेरा खंडकाव्य है गवाक्ष वह भी अप्रकाशित है। प्रकाशन की दिशा मे भी विचार कर रहा हूँ। समयमंच की पृष्ठभूमि इमरजेंसी के दौर की है उस समय जयप्रकाश नारायण जी ने इन्दिरा जी को एक पत्र लिखा था। उसमे एक पंक्ति थी –कि आपने मुझे क्रांति के नायक से खलनायक बना दिया। -इसी सूत्र वाक्य को लेकर मैने वह काव्यनाटक लिखा था। उस नाटक मे राजनीति और कूटनीति मनुष्य और उसकी परिस्थितियो पर कैसे हावी होती है ,यही मूल विषय है। नाटक का सूत्रधार नायक को विक्षिप्त बना देखता है,तो ऎसे ही वह नाटक बन गया। बाकी रंगकर्मी देखेंगे।
भारतेन्दु मिश्र : आपका परिवार संयुक्त परिवार है? आज के समय मे महानगरो मे यह चकित करने वाला है,संयुक्त परिवार के कुछ लाभ भी है कुछ परेशानियाँ भी होती है आप कैसा अनुभव करते है?
डॉ योगेन्द्र दत्त शर्मा :देखिये, मै संयुक्त परिवार का बहुत अधिक पक्षधर हूँ, आजकल जो न्यूकिलियर फैमिलीज़ है उनसे मै बहुत सहमत नही हूँ। संयुक्त परिवार एक वटवृक्ष के समान है लेकिन उसमे यदि हम थोडा सा विवेक से काम ले तो बहुत अच्छा रहता है। उसमे यह रहता है कि हम अपने परिजनो की छोटी-छोटी बातो को यदि नजरन्दाज़ करते चले तो बहुत कठिनाई नही होती। संयुक्त परिवार मे यदि यह मान कर चले कि मै किसी के लिए क्या कर सकता हूँ,बजाय इसके कि कौन मेरे लिए क्या करदे तो अच्छे से निभाया जा सकता है। मुख्य उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम किसी के लिए क्या कर सकते है। इससे संयुक्त परिवार बहुत सुदृढ बना रह सकता है।

शनिवार, अक्टूबर 03, 2009


भारतेन्दु मिश्र के पाँच गीत

1.गुजरिया

रह-रह घबराता है अब मोरा जिया
चलो चलें गोदना गोदाये पिया।
हाथों मे हाथ लिए
मेले मे साथ चलें
मैं सब कुछ हार चुकी
तुम सब कुछ जीत चुके
तुम्ही कहो जादू ये कौन सा किया।
दाहिनी कलाई पर
नाम मै लिखाऊँगी
गाँव की गुजरिया हूँ
भूल नही पाऊँगी
लुका छिपी मे अब तक बहुत कछ हुआ।
हँसते हो -गाते हो
सपनों मे आते हो
धान जब लगाते हो
तुम बहुत सुहाते हो
आँखों मे चाहत का रंग भर दिया।

2.मेरा घर आँगन

पूर्वमुखी मेरा घर आँगन भीज रहा है
पच्छिम से कुछ ऎसे बादल आये हैं।
इनमे पानी नही
सिर्फ तेजाब भरा है
रूप रंग ये कैसा जीवन मे उतरा है
आज कँटीले झाड यहाँ अँकुराये हैं।
पीली होकर घास
यहाँ हरियाती है
बीमारों की संख्या बढती जाती है
थोथे गर्जन और धुएँ के साये हैं।
अब तो सभी
हवा मे बाते करते हैं
व्याकुल हुए किसान
भूख से मरते हैं
मोबाइल वो लिए हुए मुह बाये हैं।

3.बैलगाडी

यह समय की बैलगाडी
सो रहा है मस्त गाडीवान
पीकर आज ताडी।
राह के अभ्यस्त
दोनो बैल आगे बढ रहे हैं
वृक्ष पर बैठे परिन्दे
गर्म खबरें पढ रहे हैं
रात भर जलकर बुझी है
लालटेन टँगी पिछाडी।
कौन जाने किस दिशा मे
जा रहे है इस तरह हम
जिधर दिखता हरा चारा
उधर मुडता प्रगति का क्रम
बज रही हैं घंटियाँ भी
कंठ मे बाँधी अगाडी।
देखते सुनते समझते
कह नही पाते मगर कुछ
सह रहे है एक दिग्भ्रम
भूख प्यास थकान सब कुछ
इस समय का गीत गाता
एक चरवाहा अनाडी।

4.बरगद
मैं घना छतनार बरगद हूँ
जडें फैली हैं अतल पाताल तक।

अनगिनत आये पखेरू
थके माँदे द्वार पर
उड गये अपनी दिशाओ मे
सभी विश्राम कर
मैं अडिग-निश्चल-अकम्पित हूँ
जूझकर लौटे कई भूचाल तक।

जन्म से ही ग्रीष्म वर्षा शीत का
अभ्यास है
गाँव पूरा जानता
इस देह का इतिहास है
तोडते पल्लव, जटायें काटते
नोचते हैं लोग मेरी खाल तक।


 अँगुलियों से फूटकर
मेरी जडें बढ्ती रहीं
फुनगियाँ आकाश की
ऊँचाइयाँ चढती रहीं
मैं अमिट अक्षर सनातन हूँ
 शरण हूँ मैं
लय विलय के काल तक।

5.घमासान हो रहा

आसमान लाल-लाल हो रहा
 धरती पर घमासान हो रहा।

हरियाली खोई है
 नदी कहीं सोई है
 फसलों पर फिर किसान रो रहा।

 सुख की आशाओं पर
 खंडित सीमाओं पर
 सिपाही लहूलुहान सो रहा।

चिनगी के बीज लिए
 बिदेशी तमीज लिए
 परदेसी यहाँ धान बो रहा।

मंगलवार, अगस्त 25, 2009

(शोक गीत)

युवा कवि रामलखन के असामयिक निधन पर


रामलखन

तिकड्म की दुनिया मे रहकर
बहुत जी गये रामलखन
बडे बडो के बीच
छुपे रुस्तम निकले तुम रामलखन।

अपनी शर्तो पर जीने का हस्र
यही सब होना था
घरवालो को बीच राह मे
छोड गये तुम रामलखन।

कविता छूटी दुनिया छूटी
सारे सपने छूट गये
सच्चाई का कच्चा साँचा
छोड गये तुम रामलखन।

कल जिसको उँगली पकडाई
वह मासूम हथेली थी
बस उस पर उँगली का छापा
छोड गये तुम रामलखन।

रविवार, जून 07, 2009

सातवें आसमान के कवि
भारतेन्दु मिश्र

छंदोबद्ध कवियों मे जबरदस्त आत्ममुग्धता का गुण पाया जाता है।कभी कभी यही आत्ममुग्धता कवि के विकास में बाधक बन जाती है। तुकों-छंदों की पादपूर्ति करते करते वह यह भी भूल जाता है कि उसका उद्देश्य कविता लिख़ना है और दूसरे आम आदमी की जिन्दगी की बेहतरी को लेकर काम करना है। यहाँ मै भजन –कीर्तन लिख़ने वाले या मुशायरे लूट लेने वाले,या कविसंम्मेलनों में दाँत दिख़ाने ,आलाप लेने वाले कवियों की बात नही कर रहा हूँ । सार्थक छंदोबद्ध कविता की कोटि में ऐसे कवि और ऐसी बेहूदा रचनाओं का कोई महत्व नही होता।
सार्थकता तो उन्हीं रचनाओं की होती है जिनमें साफ़ तौर पर प्रगतिशीलता के स्वर झलकते हैं।बाकी सब तो बेमानी है।आत्ममुग्ध कवि अपने कमरे में बैठकर अपने आप को महाकवि या उस्ताद मान लेते हैं। ऐसे में यदि एक आध चेला मिल जाये तो फ़िर कहने ही क्या हैं? किसी लचर पत्रिका में किसी तरह थोड़ा सा स्थान मिल जाये या अपने ही पैसे लगाकर किसी तरह किसी दुबली –पतली पत्रिका का विशेषांक निकलवा पाने में सफ़लता मिल जाये तो ऐसे आत्मुग्ध कवि का स्वाभिमान सातवें आसमान पर चढ़ जाता है।
ऐसे सातवें आसमान पर चढ़े हुए कवियों की संख़्या छदोबद्ध कवियों में सर्वाधिक है।
ये आत्ममुग्धता के स्वर छदोबद्ध कवियों की प्रगतिशीलता को तोड़ते हैं। रचनात्मक स्वाभिमान होना एक बात है जैसे निराला स्वाभिमानी कवि थे। लेकिन आत्ममुग्धता एक घातक बीमारी है।ख़ुले आम अपनी आलोचना को स्वीकार करने और अपनी रचनात्मकता में सुधार करने से ही छंदप्रसंग की सार्थकता है।छंदप्रसंग में ऐसे ही कवियों का जिक्र करना चाहता हूँ जो स्वाभिमानी हों आत्ममुग्ध न हों।सातवें आसमान के कवियों को दूर से ही प्रणाम।

सोमवार, अप्रैल 20, 2009

श्रृद्धांजलि

न होना नईम का
भारतेन्दु मिश्र


गीत नवगीत की समकालीन काव्य धारा के प्रमुख कवि नईम नही रहे। जैसा कि उनके गीत की निम्न पंक्तियों में ध्वनित होता है-
काशी साधे नही सध रही, चलो कबीरा मगहर साधें
सौदा सुलुफ कर लिया हो तो, चलकर अपनी गठरी बाँधें ।
अपनी गठरी हर इंसान को बाँधनी होती है।और एक नएक दिन हर इंसान को इस बाजार से जाना ही है फिर भी आदरणीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र ने फोन द्वारा जब सूचित किया तो सहसा एक झटका सा लगा –कि नवगीत की एक और अपूरणीय -क्षति हुई और दूसरे क्षण तुरंत नईम जी के गीत की यही उपर्युक्त पंक्तियाँ उभर आयीं। नईम हमारे समाज के सहज और गंभीर कवि थे। सहज और गंभीर दोनो एक साथ होना आसान नही होता। पिछले ढाई महीने से वे ब्रेनहैमरेज के बाद इंदौर के एक अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे,परंतु अपनी गठरी बाँधकर वे इतनी जल्दी चल देंगे यह विश्वास किसी को नही था। यह सूचना तो मुझे थी कि वे लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे हैं और कॉमा में हैं। सच्चा रचनाकार जब जाता है तो अपने पीछे अपनी यश-काया छोड़ कर जाता है। नईम नवगीतदशक परंपरा के अग्रणी कवि थे। डाँ.शंभुनाथ सिंह ने आदरपूर्वक नवगीतदशक (1) में उनके नवगीत समेकित किये थे। आज जो कुछ हिन्दी नवगीत में प्रगति के स्वर दिखते हैं उस विकास यात्रा में नईम का भी बहुत योगदान रहा है-
जिन्दगी में जो भी लय है वह सब नवगीत में है। संगीतात्मकता की दृष्टि से देखें तो पायेंगे कि भातखण्डे स्कूल वाले नवगीतकारों को भीतर पैर नहीं रखने देंगे,क्योंकि क्लासिकल के साथ लोकगीतों से जो जीवंतता कुमार गंधर्व ने ग्रहण की है,वही नवगीतों में दिखायी देती है।(नवगीत दशक 1,दृष्टिबोध ,नईम)
नईम नवगीत में लोकोन्मुखता जीवंतता और गेयता के प्रबल पक्षधर थे। भाई राजगोपाल सिंह के आवास पर उनसे लगभग बारह वर्ष पहले मुलाकात हुई थी। दुबारा जब वो उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्यभूषण सम्मान ग्रहण करने लखनऊ पहुँचे थे।यह घटना सन् 2007 की है। इसी समरोह में आदरणीय रामदरश मिश्र को भारत भारती तथा कुमार रवीन्द्र, सुधांशु उपाध्याय को भी पुरस्कार मिलना था। मै संयोगवश उस दिन लखनऊ में ही था। यह नईम जी से मेरी दूसरी मुलाकात थी। यह मेरे लिए बड़े हर्ष की बात थी कि एक साथ इतने सारे मेरे परिचित गीतधर्मी कवियों को पुरस्कार मिल रहा था। नईम जी के गीत तो बहुत पहले से ही पढ़ता आ रहा हूँ। इन दोनो मुलाकातों में समय का बहुत अंतराल रहा । पहली बार जब उनसे मिला था तब वे उनदिनों अपने कालेज से रिटायर हो चुके थे और कविता के साथ-साथ काष्ठशिल्प के माध्यम से भी अपनी अभिव्यक्ति कर रहे थे। काठमारे हुए आदमी की पीड़ा काष्ठशिल्प से और बेहतर ढंग से अभिव्यक्त की जा सकती है संभवत: ऐसा ही विचार उनके दिल में रहा होगा। उनका काष्ठशिल्प भी मानवीय सरोकारों के साथ सदैव जुड़ा रहा। उनकी मस्त और निरभिमानी छवि उनकी कृतियों में तैरती दिखायी देती है। फोन से भी उनसे जब बातें हुईं तो वे बहुत सहज और आत्मीय लगे। वे साहित्यालोचन की राजनीति से सदैव अलग रहे। वे सच्चे सर्जक थे,जो लय उनकी कविता में विद्यमान है वही लय उनके काष्ठ शिल्प में भी उभरती है। उनके प्रथम गीतसंग्रह पथराई आँखें की भूमिका त्रिलोचन शास्त्री जी ने लिखी थी। नईम की गीतधर्मिता के विषय में त्रिलोचन जी ने लिखा था-
नईम छंद की आंतरिक लय और भाषा की लय से परिचित हैं, इसीकारण उनकी कविता स्वरूपत: स्पष्ट और गुणयुक्त है।
वास्तव में नईम के गीत अपने लोक की अभिव्यक्ति हैं। नईम का जीवन बुंदेलखंड और मालवा मे बीता इस लिए उनके नवगीतों में नदिया -ताल –झरने की तरलता और पठार की धरती वाली स्पष्टता साफ दिखयी देती है। महुआ और टेसू की गंध के आस्वाद से उनके गीत महकते हैं। छंद साधना कोई हँसी खेल कभी नही रहा । छंदपूर्ति तो लगातार लोग करते रहते हैं। नईम काव्य-साधक कृती रचनाकार थे-

साधते जितना बना
साधा पुरानों से
नये रिश्ते लगाये।
नईम के गीतों में मालवा का सांस्कृतिक वैभव और लोकजीवन एक साथ भास्वर होता चलता है। नवगीत की यही तो प्रमुख विशेषता रही है। शब्द की लय अर्थ की लय और बिंबों की लोकधर्मी बुनावट नईम के यहाँ अद्भुत है । उनके गीतों का ग्राम्यचरित्र, लोकवादी सौंदर्यशास्त्र और सहजात रचना विधान उनको तमाम नवगीतकारों में अलग से चीन्हने में सहायता करता है--

नीले जल झीलों के ,बतखों सी तैर रही ,पुरवइया क्वार की।
नैहर के अल्हड़पन ,पीहर शर्माये मन, रूठ-रूठ जाती है , बेला में हार की।
कुछ इसी प्रकार की एक कविता केदारनाथ सिंह ने भी लिखी थी वसंती हवा किंतु उस कविता में वर्णन का विस्तार और खिलंदड़ापन है। जबकि नईम के यहाँ खिलंदड़ेपन के अलावा क्वार की पुरवइया में सघन रूप छवियों के अनेक बिंब जगमगाते हैं। छीजते मानवीय संबंधों की चिंता प्राय:सभी छंदोबद्ध कवियों में एक प्रवृत्ति के रूप में उभरती है। छंदोबद्ध कवि नवगीत रचे चाहे दोहा या फिर गज़ल वहाँ संवेदना की अनुगूँज कई परतों और अनेक भंगिमाओं में प्रकट होती है। यह व्यंजना की जादूगरी का कमाल छंदहीन कविताओं में कभी नही उभर पाता । छंदोबद्ध कवि संवेदनाओं की घनीभूत भाषिक संरचना के माध्यम से ही अपनी बात समाज तक पहुँचाता है। उसके पास नीरस सपाट भाषा नही होती ,परंतु लोक में व्याप्त मुहावरे उसके लिए जनवादी लोकोन्मुख नये सौन्दर्यशास्त्र की छवियाँ निर्मित करते चलते हैं। नईम इस लिहाज से बड़े कवि थे। उनके नवगीत मालवा और बुन्देली भाषा की आंचलिकता से सीधे जुड़े हुए हैं--

पूनम और अमावस की क्या? ,हरियाले सावन गाने के- दिन अब नही रहे
इज्ज़त रहते उठजाने के , दिन अब नही रहे।
लोक बदल रहा है। नईम का गाँव समाज भी इस बदलाव से अछूता नहीं होगा। यह बिखराव और विस्मृति का युग है कवि इस मौसम में अपने परिवेष को याद करना चाहता है । जिसने बुन्देलखंड की धरती नही देखी वह महुए के टपकने से उत्पन्न सुगंध की घ्राण संवेदना के मर्म को नही जान सकता। कोसों तक फैलने वाली सुगंध मे रचनाकार का लोकवादी सौन्दर्य दर्शन एकाकार हो उठा है-
याद मुझे आता है
याद तुम्हें भी होगा, महुए सा टपकता हुआ मौसम।
होली का त्योहार नौजवानों में उल्लास भर ही देता है। फिर भी अवस्था के अनुसार लोक के पर्वों का आनंद सभी उम्र के लोग परंपरा से उठाते चले आरहे हैं। ऐसे अवसर पर भौजी और देवर का सदियों पुराना रिश्ता कवि के मन में भी सिहरन पैदा कर देता है। यही हमारे लोक की विशेषता है। निम्न पंक्तियों में भौजी का असमय बुढ़ा जाना कवि की पारदर्शिता का परिचायक है। भौजी की पीड़ा टीस बनकर कवि के मन में उतरती है । असमय बुढ़ा जाने की वेदना में उत्सव का सब चाव चुक गया है-
बुढा गयी भौजी असमय ही
रंगने और रंगाने के सब चाव चुक गये।
देवर और भौजी का जो रिश्ता हमारे गाँव में या कि हमारे लोकजीवन में रहा है वह स्त्री और पुरुष के परस्पर प्रेम और सम्मान का अद्भुत उदाहरण है। पाश्चात्य देशों में ऐसे रिश्ते प्राय: नहीं होते। हमारे विकसित समझे जाने वाले नगरों और महानगरों में भी अब ऐसे मानवीय संबंध केवल कल्पना में रह गये हैं। मेरी समझ से केवल छंदोबद्ध कवि ही हमारी संस्कृति का उद्गाता होता है। नईम सांस्कृतिक बिंबों के अलावा प्राकृतिक बिंबों के सफल नवगीतकार हैं। जैसे ठाकुर प्रसाद सिंह को संथाली लोकजीवन का श्रेष्ठ नवगीतकार माना गया । बहुत कुछ वैसे ही लोकबिंब नईम के नवगीतों में उभरते हैं। वे पाखंड के आलोचक भी रहे है। नईम के गीतों में मालवा के जीवन का लोकपाठ उभरता है। किसान और आमजन की पीड़ा देखिये किस प्रकार निम्न पंक्तियों से प्रकट होती है-

रावण ही रह गये आज प्रभु को उपासने
रुई बंद कर दी देना देशी कपास ने
प्रभु चोरों का भाग्य विधायक
ये कहते हैं ,वो कहते हैं।
असल में रावण ही सब ऒर सफल हो रहे हैं। अर्थात् जनसामान्य की दशा शोषित सर्वहारा की स्थित से ऊपर उठती हुई कभी नजर नही आती। यह जनपक्षधरता रमेश रंजक,नईम और नचिकेता के यहाँ साफ झलकती है।
नईम के पास अपने लोक के अनुरूप नवगीत रचने वाली अपनी काव्य भाषा है। अनुभव की आँख और साधना के ताप में पके हुए नईम के नवगीत -गीतकारौं के लिए आदर्श रहे हैं। बातों ही बातों में और लिख सकूँ तो उनके अन्य गीतसंग्रह हैं।

जंग लगी बाहर से ,भीतर दीमक चाटे
खण्डहर हुए ये दिन,भय भरते सन्नाटे
ब्याज अभी बाकी है, मूल भर चुका हूँ मैं
दीवारों पर खूटी कील सा ठुका हूँ मैं।
खोखले हो चुके जीवन मूल्यों का सामना करते हुए नईम यह कहते हैं। अब उनके न रहने के बाद सचमुच लगता है कि गीत-नवगीत का ब्याज अभी चुकाना बाकी है। यह ब्याज हम छंदोबद्ध कवियों को ही चुकाना होगा । नईम साहित्य अकादमी के कवि नही बने क्योंकि वे लोक के बड़े कवि थे। जैसे लोग कहते हैं कि निराला और रामविलास शर्मा की उस रचनात्मक स्वाभिमानी परंपरा का अवसान हो गया है, आज नईम जैसे कवि के न होने पर यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि गीत-नवगीत को समर्पित मानो कोई एक भरी पूरी नदी सूख गयी है। धीरे-धीरे ऐसे ही छीज रही है गीत नवगीत की काव्य परंपरा। आवश्यक है कि हमसब मिलकर नईम की सुझायी हुई उन खूटियों- कीलों का उपयोग करेते हुए गीत और नवगीत के वितान को साहित्य के आकाश में तानें तथा भारतीय कविता की लोकोन्मुख और शाश्वत परंपरा को जीवंत बनायें ।



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