शनिवार, अप्रैल 12, 2014

समीक्षा


कुमार रवीन्द्र की नई किताब:भारतेन्दु मिश्र







































 
    गत तीन चार दशकों से लगातार जो कवि अपने गीतों नवगीतों से हिन्दी  कविता में अपनी उपस्थिति दर्ज करता आ रहा है ।जिसने अपने गीतों के पाठ्य  से अपनी अलग पहचान बनाई उनके गीतों को लेकर विचार करते हुए यह कहा जा सकता है उन्होने लगातार प्रगतिशील गीत / नवगीत को नए आयाम दिए।ऐसे कवि कुमार रवीन्द्र उन तमाम नवगीतकारों से इस लिए भी अलग हैं क्योकि वे कविसम्मेलनों से कभी जुडे नहीं ।उन्होने आलाप और सुर की साधना न करके गीत के पाठ्य को लेकर सजगता से काम किया। उनकी मौलिकता का प्रमाण उनके गीतों की प्रगतिशील चेतना और युगधर्मिता से आंका जा सकता है। पिछले दशक में मैने अपने आवास पर प्रयोग के तौर पर कुछ कवियों के एकल गीतपाठ के कार्यक्रम आयोजित किए जिसमें श्रोताओं को कवि से उसकी रचना धर्मिता पर प्रश्न पूछने का भी अधिकार था। ऐसे कार्यक्रम में जाहिर है कि अधिक कवि/श्रोता नहीं शामिल हो सके लेकिन गीत के पाठ्य को लेकर कुछ सजग कवियों ने उसमें भागीदारी की कुमार रवीन्द्र उनमे से एक महत्वपूर्ण नाम हैं।उस प्रकार के आयोजन का भी यही उद्देश्य था कि गीत के पाठ्य और सामयिक रचनाविधान तथा कवि  की रचनाधर्मिता  पर बातचीत हो।कुछ लोग आलोचना से डरकर ऐसे आयोजनों में शामिल नहीं होते।बहरहाल कुमार रवीन्द्र जी ने उस दिन अपनी रचनाधर्मिता और वैचारिक प्रगतिशीलता से सबका मन मोह लिया था।  वे वरिष्ठ हैं, विद्वान हैं-उनके लिखे गीतों और विमर्श परक आलेखों का अपना महत्व है।कई काव्यनाटक भी उन्होंने लिखे हैं।आहत हैं वन,चेहरों के अंतरीप,पंख बिखरे रेत पर,सुनो तथागत,और हमने सन्धियां की,उनके गीत नवगीत संग्रह हैं।इसके अतिरिक्त-एक और कौंतेय,गाथा आहत संकल्पों की,अंगुलिमाल उनके काव्य नाटक हैं।इसके अतिरिक्त गीत नवगीत की समीक्षा से भी वे पिछले दशकों से लगातार जुडे रहे हैं।  लखनऊ से पढ लिखकर जीवन भर हिसार में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे। उनका एक अंग्रेजी कविताओ का संकलन भी  प्रकाशित हुआ है।तो उनके कवि कर्म पर बात होनी चाहिए । लोग पीछे पडकर भी समीक्षा लिखवाने के लिए तमाम जतन करते हैं कुमार रवीन्द्र जी ने कभी मुझे इस प्रकार तंग नही किया। गत दिनों लखनऊ के नवगीत परिसंवाद -2011 पर केन्द्रित एक किताब मुझे निर्मल शुक्ल जी ने भेजी थी उसके आवरण पर कुमार रवीन्द्र जी का नवगीत प्रकाशित हुआ था।वह गीत है--इसी गली के आखिर में-
इसी गली के आखिर में है /एक लखौरी ईंटो का घर/किस पुरखे ने था बनवाया/दादी को भी पता नही है/बसा रहा अब उजड रहा है/इसमें इसकी खता नही है/एक एक कर लडके सारे /निकल गए हैं इससे बाहर।  
तो ऐसे लखौरी ईंटो की चिता के बहाने पुराने लखनवी तेवर याद दिलाने वाले और गृहरति की व्यापकता वाले  कवि के नवगीतों पर बात करना मेरे लिए अत्यंत सुख की बात है। लखौरी ईंटों  के रूप में न जाने कितने सामाजिक सरोकार संवेदन  के स्तर पर मिट गये और काव्य संवेदना के रूप में यहां सिमट गए हैं। कवि की अपनी जातीयता को चीन्हने के लिए एक और गीत का मुखडा देखिए----
नदी गोमती /शहर लखनऊ/हम बाशिन्दे उसी शहर के
 कुमार रवीन्द्र बिम्बों का घना शाल नहीं बुनते बल्कि सीधी सरल भाषा में संवेदना की अनुगूंज पैदा करते हैं।संयोगवश मैने कुमार रवीन्द्र जी का लखनऊ वाला पुराना मकान देखा है।मुझे एकबार उनकी माता जी के दर्शन करने और आशीर्वाद लेने का अवसर मिला है।पिछले दिनों-रखो खुला यह द्वार –शीर्षक से नया नवगीत संग्रह प्रकाशित हुआ है। यह कवि की लगतार सक्रियता का नया दस्तावेज है।
हालांकि सीधे साफ सुथरे गीत रचना कुमार रवीन्द्र की सीमा भी है और शक्ति भी ,कि वे गृहरति यानी घर आंगन के काव्य संसार से बेहतर संवेदनाएं चुराकर वे नवगीत मे ढालने का सफल प्रयोग करते हैं। उनके यहां नचिकेता जैसा जनवाद नही है और जनवाद की नारेबाजी भी  नही है। कभी कभी उनके गीतों मे अतीत चिंता नास्टेलिजिक स्तर पर भी दिखाई दे सकती है।लेकिन यह छन्दोबद्ध कवियों में नवगीत/गजल /दोहा कहते समय आ ही जाती है।
    इस संकलन की भूमिका में कवि ने जो गीत की समकालीनता के प्रश्न पर टिप्पणी की है वह भी पठनीय है। यहां यदि अप्रासंगिक न हो तो कहना चाहता हूं कि कुमार रवीन्द्र जी ने अपने पांच पृष्ठ के वक्तव्य में पांच शब्द भी अपने गीतों पर नही कहा है।तात्पर्य यह कि उन्हे विचार और निजी संवेदना को अलग करने का सलीका आता है।अन्यथा अधिकांश गीतकारों की भूमिका पढकर मन कचकचा जाता(उल्टी करने का  हो आता है ) है।ऐसे वास्तविक रचनाकार और आत्मप्रशस्ति की मदिरा मे धुत्त रचनाकार का फर्क कुछ लोग मिटा देना चाहते हैं। मुझे लंपटो की इस  नव बाजारवादी विकृति पर ऐतराज है।कुमार रवीन्द्र जी नवगीत के कबीर की तरह अपना ताना बाना लेकर  केवल अपनी सृजन धर्मिता से अपने सक्रिय होने का सबूत दे रहे हैं।इस समय में यह बडी बात है कबीर इस लिए क्योकि कबीर का मुहाबरा उनके गीतों मे उनके सिर चढकर बोलता है। साधो को संबोधित उनके गीत समावेशी समाजिक परिवेश की ओर संकेत तो करते ही हैं,कवि की निर्लिप्तता के भी परिचायक हैं। यह कवि के मन का साधो सूर और मिल्टन के पास से तथागत तक भी जाता है। लेकिन अपनी जमीन नहीं छोडता। वे कहते हैं-
सुनो बन्धु/यह गीत नहीं/अचरज की बोली है।
अर्थात कविता कवि के लिए संवाद की भाषा है।वो सुर ताल से श्रोताओं को रिझाने के लिए मंच के प्रपंच की भाषा कदापि नहीं है। जहां वे –
सुनो /बावरे नचिकेता की उल्टी बातें।  
कह कर पौराणिक मिथकों को नवगीत की परिभाषा देने की कोशिश करते हैं तो वहीं –
बांचो साधो/चार पदों का /सांसों का यह गीत हमारा।
कहकर एक ही  गीत में  जीवन के चार आयाम –बचपन ,जवानी,वृद्धावस्था और देहांतर तक की संवेदना को समो लेने का प्रयत्न किया है।प्रत्येक सजग कवि के पास उसकी अपनी जमीन और  जातीयता को आसानी से लक्षित किया जाता है । नगर बोध के स्वर नवगीत में खूब देखने को मिलते हैं कुमार रवीन्द्र के यहां भी ऐसे तमाम गीत हैं। देखें-
हवा बेदम/रौशनी कम/महानगरी की सुबह है
एक और चित्र देखें लेकिन लगता है यहां शायद प्रूफ की कोई कमी रह गई है-
अपनी आंखों पर/पट्टी सब बांधे रहते/कोई भी घर के बंटने का /हाल न कहते/आम कट चुके/खूब फले हैं आक धतूरा/महानगर में।
यहां कोई भी घर के बंटने का हाल न कहते के स्थान पर कहता होना चाहिए क्योकि कोई शब्द एक वचन है और उसकी क्रिया भी एक वचन की ही होनी चाहिए। बहरहाल  रोमानियत और नास्टेल्जिया दोनो ही गीत की संवेदना के साथ हमेशा जुडे. रहते हैं उनसे काटकर गीत को नही देखा जा सकता।अंतत: कुमार रवीन्द्र के नवगीत और उनका पाठ्य हमें नए आस्वाद के प्रति आश्वस्त तो करता ही है।  
शीर्षक:रखो खुला यह द्वार/कुमार रवीन्द्र/उत्तरायण प्रकाशन ,लखनऊ/वर्ष: 2013/मूल्य:295/


शुक्रवार, अप्रैल 11, 2014

मित्रो के लिए दो गीत

1.सूरज हूं मैं
(मजदूर दिवस पर )
जब मै थककर बुझ जाता हूं
तब घर का चूल्हा जलता है
सूरज हूं मैं अन्धियारे से
मेरा पेट नही पलता है।

छाए हैं नफरत के बादल
फिर भी मैं चलता जाता हूं
धूमकेतु जब मुझे घेरते
तब हिम्मत से टकराता हूं
छतरी की छया मे सुख से
कुछ लोगों का दिन ढलता है।


मुझे पता है इस धरती पर
कोई मेरा मित्र नही है
कौन सुने कबिरा की भाषा
किसका मन अपवित्र नही है
सच्चाई की इस गर्मी में
मोम सरीखा मन गलता है।

बडा कठिन है इस बस्ती में
सच कहना सच को सह पाना
लोगों ने सीखा है केवल
शक्ल देखकर बात बनाना
जब सब थम जाता है तो भी
कुछ मेरे भीतर चलता है।

2.गीत होंगे

हम न होंगे गीत होंगे
क्योकि ये हमसे बडे हैं
ये समय की सीढियों पर
रत्न मणियों से जडे हैं।


ये नदी हैं ये हिमालय
ये समन्दर की लहर हैं
ये सुबह हैं -शाम हैं ये
रात दिन ये दोपहर हैं
मृत्य से भी हर कदम पर
शक्ति भर अपनी लडे हैं।

सूर्य की किरणो सरीखे ये
हवा के विमल झोंके
आग हैं ये बाढ हैं ये
शब्द रथ को कौन रोके
ये स्वयंभू बरगदों की भांति
धरती में गडे हैं।

इन्द्र्धनुषीमेघ हैं ये
छन्दमय आकाश हैं ये
ये समर के शंख अनहद
ये सृजन हैं नाश हैं ये
वेद हैं ये नीति हैं ये
कर्म बनकर ये खडे हैं।

कोकिला हैं हंस हैं ये
मोर हैं ये बुलबुले हैं
कहीं तीखे कहीं मीठे
कंठ में सबके घुले हैं
ये अजंता की गुफाएं
ये सुधारस के घडे हैं।(जुगलबन्दी से)

शनिवार, अप्रैल 05, 2014

  नचिकेता जी की
गीत वसुधा : दस अनसुलझे सवाल


# भारतेन्दु मिश्र

हिन्दी गीत नवगीत के लिहाज से नचिकेता जी एक बडे हस्ताक्षर के रूप मे जाने जाते हैं।यह भी सच है कि रमेश रंजक और शांतिसुमन के बाद सत्यनारायण के समकक्ष खडे नचिकेता का कविमन पिछले दस वर्षों  से गीत वसुधा पर काम भी कर रहा था।लेकिन अब उनकी दस वर्षो की मेहनत को देखकर जो निराशा हुई उसका वर्णन करना मेरे लिए नितांत दुखद अनिवार्यता है।अनिवार्यता इस लिए कि मैं नवगीत/गीत से किसी भी रूप में जुडे मित्रों को गीत वसुधा के इन पक्षो का ज्ञान कराना जरूरी समझता हूं।और दुखद इस लिए कि नचिकेता जी जैसे  वरिष्ठ रचनाकार के दस वर्षो के श्रम की  निरर्थकता से और व्यापारिक लाभ (साहित्येतर )से  पाठकों को अवगत कराना पड रहा है । घोषित और अघोषित रूप से जनवादी माने जाने वाले नवगीतकार जो स्वयं को जनगीतकार के रूप प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं। उनके द्वारा संपादित यह ग्रंथ (कथनी करनी में भेद के कारण )बहुत चकित करने वाला और भ्रम मे डालने वाला है। कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं-
1. जब दस वर्ष पहले नचिकेता जी  ने गीत भेजने के लिए आग्रह  किया था तब वे अकेले ही इस योजना के संपादक थे।परंतु प्रकाशित रूप में इसमे अवधेश नारायण मिश्र और यशोधरा राठौर जी का नाम जाने कैसे जुड गया।शायद इस प्रयोग से उन्हे कुछ बल(धनबल/आत्मबल ) अवश्य मिला होगा।वर्ना इसकी कोई उपयोगिता पुस्तक में नजर नही आती।यदि उनकी उपयोगिता होती तो कुछ नजर  भी आनी चाहिए ?
2.मेरे पास नचिकेता जी के पत्र सुरक्षित हैं जिनसे मेरे गीत आमंत्रित किए गए थे।तब आर्थिक सहयोग 500/रुपए था जो मैने भेजने के लिए मना किया था।परंतु बिना सहयोग के ही गीत भेजने का फोन पर भी बार बार आग्रह  किया जाता रहा और मैने अंतत: गीत भेज दिए तब मुझे यह नही मालूम हो पाया था कि यह उनकी कैसी योजना है ? उनकी यह योजना किस स्तर पर नवगीत के अन्य समवेत संकलनों से भिन्न है ?तबतक मेरी उनसे मुलाकात भी नही हुई थी,बस पत्राचार ही हुआ था ।कोई वरिष्ठ रचनाकार जब बार बार आग्रह  करता है तो सामाजिक मर्यादा के अनुरूप उसे निभाना पडता है,फिर नचिकेता जी तो उम्र में और गीत -रचनाधर्मिता में भी  वरिष्ठ हैं ।
3.इस 580 पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य नचिकेता जी ने रु.2000/ रखा है। इस मूल्य निर्धारण में बेचारे प्रकाशक की कोई भूमिका नही है। क्योकि वो प्रकाशक नचिकेता जी का नाम लेकर ही किताब बेच रहा है।शायद किसान चेतना और मजदूरों से जुडे जनवादी कवियों कलाकारों के लिए यह सामंतजनोचित मूल्य उनकी दृष्टि मे उचित होगा।क्या इसी पुस्तक का पेपरबैक 200/ में भी सुलभ नहीं हो सकता था ?
4.विशेष बात यह है कि नचिकेता जी ने सभी गीतकारों के गीतों का कापीराइट भी प्रकाशक से मिलकर अपने नाम करा लिया है। अब वे पिछले छह महीने से इस पुस्तक को बिकवाने के लिए संकलित रचनाकारों से आग्रह  कर रहे हैं।पहले प्रकाशक ने किताब खरीदने के लिए मुझे सीधे फोन किया फिर नचिकेता जी ने  मुझे आधे मूल्य पर किताब खरीदने के लिए फोन भी किया था।किंतु मैने मना कर दिया ,क्योकि मूर्खतावश मुझे लगता है कि   रचनाकार होने के नाते यह किताब मुझे ही नहीं सभी रचनाकारों को संपादक द्वारा लेखकीय प्रति के रूप में धन्यवाद सहित क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? इस पर केन्द्रित संगोष्ठी करने की बात कहीं सुनाई नही दी।मैने तो उन्हे अपने गीतो का लिखित या मौखिक रूप से स्वत्वाधिकार नही दिया /बेचा था और कोई गीतकार मुझे मिला भी नही जिसने अपने गीतों का स्वत्वाधिकार नचिकेता जी को लिखित रूप में दिया हो।
5.हैरानी की बात यह भी है कि कई 1000/रुपये अग्रिम धनराशि देकर भी  नए गीतकार  इसमें इसलिए शामिल कर लिए गये ।ऐसे कई गीतकारों का संकेत नचिकेता जी ने संपादकीय में आदर भाव से किया भी है।
6.अब जरा इस ग्रंथ के  समर्पण पृष्ठ के बेनामी गीत का मुखडा पढिए-
उनको/ जिनके लिए/गीत पसीने की परिभाषा है/जीवन जीने की अभिलाषा है।
अर्थात जो गीत को पसीने की परिभाषा में लिख रहे हैं और जी रहे हैं यह पुस्तक उनके लिए तो है लेकिन इसका मूल्य केवल -2000/रुपये है।..माने संपादक के लिए गीत जीने मरने का प्रश्न नही है ?
7. और देखिए चकित मत हो जाइए-आपन मुख तुम आपन करनी /बार अनेक भांति बहु बरनी।–जैसा कि तुलसी बाबा कह गए हैं उसी तर्ज पर नचिकेता जी अपने ही गीतों की प्रशस्ति अपनी  ही कलम से गीतवसुधा की भूमिका मे देते हुए चलते हैं-देखें पृष्ठ 49 और 50 (संपादकीय:समकालीन गीत का आत्मसंघर्ष )तो क्या यह संपादक का न्याय हो सकता है? जरा गौर करने की बात है। रामचन्द्र शुक्ल,रामविलास शर्मा,आदि ने अपनी आलोचना पुस्तकों में अपने ही आलेखों /कविताओं की प्रशस्ति क्यों नहीं की ? हां नचिकेता जी के आदर्श यदि राधेश्याम बन्धु हैं जिन्होने नवगीत के नए प्रतिमान में हर आलेख में अपनी कविताओं के उद्धरण स्वयं ही भर लिए हैं,तो यह उचित कहा जा सकता है।
8.सोचने और विचार करने की बात यह भी हो सकती है कि गीत वसुधा मे संकलित रचनाएं भारतीय मानस और समाज की हैं या कि किसी अन्य देश की  ? यदि भारतीय कविता हमारे समाज से निकली है तो उसकी समीक्षा के औजार भी तो भारतीय काव्यशास्त्र से निकलने चाहिए। जबकि नचिकेता जी अपने संपादकीय की शुरुआत जार्ज लुकाच के उद्धरण से करते हैं। बहरहाल उद्धरणीय विचारों का एक कालक्रम  होता है जिसका यहां निर्वाह नही दिखाई दिया।
9.इतने बडे बहुआयामी संपादकीय को देखकर कहीं कहीं तो यह भी लगता है कि नचिकेता जी पर राधेश्याम बन्धु की मूर्खता पूर्ण कृति (नवगीत के नए प्रतिमान ) का गहरा प्रभाव पडा है।जबकि राजेन्द्र गौतम की पुस्तक विख्यात पुस्तक हिन्दी नवगीत उद्भव और विकास  का जानबूझकर  नामोल्लेख तक नही  किया गया है। राजेन्द्र गौतम के गीतों के साथ प्रस्तुत परिचय तक में नहीं।
10. अब अंतत: यदि इसमें अवधेश नारायण मिश्र और यशोधरा राठौर के श्रम को भी जोड लें या जोडकर देखें तो नचिकेता जी के दस वर्षों की कमाई केवल इस पुस्तक का नाजायज कापीराइट ही बचता है।
इसके बावजूद उन्हे बधाई जिन्हे पहलीबार नचिकेता जी जैसे किसी वरिष्ठ कवि द्वारा संकलित गीत संकलन मे येन केन प्रकारेण रचनाकार के रूप में स्थान मिला। प्रकाशक को बधाई कि उसे इतनी बढिया कमाई वाली पुस्तक मिली।
गीत वसुधा/संपादक:नचिकेता+अवधेश नारायण मिश्र+यशोधरा राठौर /पृ.580/मूल्य-2000/=/प्र्काशक:युगांतर प्रकाशन ,दिल्ली/वर्ष:2013

   

गुरुवार, अप्रैल 03, 2014

टिप्पणी

एक सार्थक उम्मीद:
भारतेन्दु मिश्र
 
भाई जयकृष्ण राय तुषार का गीत संग्रह सदी को सुन रहा हूं मैं   को
देखने का मौका मिला।सचमुच जयकृष्ण राय तुषार  यश मालवीय और सुधांशु उपाध्याय की परंपरा में इलाहाबाद की गीत नवगीत यात्रा का नया स्टेशन है। जहां थोडी देर रुक कर गीत का आनन्द लिया जा सकता है।यह तुषार का पहला नवगीत संग्रह है।वे गजलें भी कहते हैं और अच्छी कहते हैं।बस आशंका है कि कहीं वो कुंअर बेचैन की तरह मंच के प्रपंच में डूबकर विलुप्त न हो जाएं। खुदा उन्हे मंच की नजर से बचाए रखे।जैसे वो अपने पिता को याद करते हुए कहते हैं-
पिता/घर की खिडकियों /दालान में रहना/यज्ञ की आहुति /कथा के पान में रहना।
-तो कथा के पान में रहने का मर्म इलाहाबाद की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में रचा बसा कोई गीतकार ही जानता है।इसी प्रकार एक और निराला को समर्पित गीत भी बहुत सुन्दर बन पडा है।कवि सदानीरा से प्रार्थना करता है और निराला के सुनहरे गीत गाने की बात करता है-
आज भी /वह तोडती पत्थर/पसीने में नहाए/सर्वहारा /केलिए अब /कौन ऐसा गीत गाए/एक फक्कड /कवि हुआ था/ पीढियों को तुम बताना।

तुषार भाई के ये गीत नवगीत की परंपरा में ही अपना स्थान बनाते हुए आगे बढते हैं।यद्यपि एक अट्पटापन शिल्प के स्तर पर कहीं कहीं नजर आता है।यह अटपटापन उर्दू और हिन्दी छन्दों के एकसाथ प्रयोग के कारण भी सहज रूप मे आ सकता है।बहरहाल तुषार के पास समकालीन जनवादी भाषा,कथ्य,सामयिक मुहावरे आदि का अभाव नही है।निसन्देह वरिष्ठ नवगीतकार चाहें तो तुषार के रूप में नवगीत की नई संभावनाएं अवश्य देख सकते हैं।तुषार की रचनाशीलता से एक सार्थक उम्मीद तो बन ही रही है |             
शीर्षक:सदी को सुन रहा हूं मैं /
कवि:जयकृष्ण राय तुषार /
प्रकाशक:साहित्य भण्डार,इलाहाबाद
/वर्ष:2014/मूल्य:रु.50/

सोमवार, मार्च 24, 2014


साहित्य की मुख्य धारा में समकालीन गीत

(ग्वालियर गीत समारोह में दि.२३/३/१४ को दिया गया यह व्याख्यान )
# भारतेंदु मिश्र

साहित्य को समाज का दर्पण कहा गया है और वह कई मायने में है भी| अब यदि साहित्य की मुख्यधारा की बात करें तो उसमे गद्य की ही अनेक विधाए आती हैं|यह हमें स्वीकार करना होगा कि यह गद्य का युग है|अब गद्य और पद्य का भेद मिट गया है|अर्थात छन्दहीन नीरस वैचारिक कवितायेँ हमारे सामने हैं| जहां तक छंदोबद्ध कविता की बात की जाय तो वह आज मुख्य धारा में नहीं दिखाई देती| लगभग एक दशक से अधिक हो गया उत्तर आधुनिकता के प्रवाह में कवियों (राजेश जोशी) समालोचको (मैनेजर पाण्डेय,सुधीश पचौरी) आदि ने साहित्य की प्रासंगिकता को खासकर कविता की प्रासंगिकता को ही कठघरे में खडा कर दिया है|तात्पर्य यह कि बाजार और बाजारवादी इस समय में कविता या गीत की कोमल संवेदना के लिए अवसर नहीं बचा है|दूसरी ओर इसके कई कारण है कि एक तरफ हर बड़े शहर में हर मोहल्ले में दस बीस कवि अवश्य होने लगे हैं| अर्थात अधकचरे /अपरिपक्व कवियों की सूची लगातार बढ रही है धडाधड किताबें भी प्रकाशित हो रही हैं| गीतकार या व्यग्य कवि के रूप में जिस किसी कवि सम्मलेन के मंच पर देखें चार छह नए कवि – एक-दो नई कवयित्रियाँ जरूर मिल जाएंगी |उनके पास यत्र तत्र नए समय की मौलिक संवेदनाए भी हैं लेकिन उनमे धैर्य नहीं है|वे सब साहित्य के इस बाजार में ताजे उत्पाद या माल के तौर पर अपने आपको प्रस्तुत करने में लगे हैं|वो ज्यादातर पढ़ नहीं रहे हैं,केवल लिख रहे हैं| जो कवि साहित्य की परम्परा को जाने बिना आ रहे हैं उनके लिए कविताई खेल बन गया है| ..तो जो हमारे प्राचीन कवि ने कहा था –लोगन कवित्त कीबो खेल करि जानेव है| -अर्थात कविताई खेल बन गया है/फैशन बन गया है| अधिकाँश गीत कविता उस दिशा में जा रही है|लगभग एक जैसे विचार और संवेदना सबके पास है और उसका बार बार प्रकटीकरण हो रहा है| ये संचार माध्यमो के प्रभाव से प्रतिदिन उपजने वाली तुकबन्दियाँ सार्थक कविता के रूप में रेखांकित नहीं की जा सकती|अखबारों में छपने वाली अवसर विशेष के लिए लिखी गयी तमाम गीत गजल कविताएं-उत्सवधर्मिता और बाजार को ही संवर्धित करती हैं,साहित्य को नहीं|
यह जो थोक में कविताए लिखी जा रही हैं वह विचार/विचारधारा के नाम पर भी हो सकता है राजनीति या एन.जी.ओ.के संगठन के विज्ञापन के तौर पर भी हो रहा है-जैसे कुमार विश्वास की चुनावी तुकबन्दियाँ| उत्सवधर्मिता के नाम पर तो लगातार तुकबाजी होती रही है|इसी बीच कविता का अनुशासन समाप्त हो रहा है,केवल छन्दानुशासन में लिखी गयी पंक्तियाँ कविताएँ नहीं मानी जा सकतीं|इसके बावजूद शिल्प में जहाँ कहीं नवीनता दिखती है वहाँ नई कविता/नवगीत या समकालीन गीत हो सकता है|तात्पर्य यह कि गीत कविता के नाम पर जो तमाम कचरा इकट्ठा हो रहा है उसमे से बहुत कम हिस्सा सार्थक गीत का है|
सार्थकता किसी भी कविता का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु होता है|लेकिन सोचिए कि स्वतंत्रता दिवस /होली या दीपावली के अवसर पर आयोजित कवि सम्मलेन में कितनी नई संवेदनाओं की कवितायेँ /गीत लिखे जा सकते हैं| दूसरी बात यह कि उन तमाम कविताओं के पाठ्य रूप एक जैसे होंगे या नहीं| जिन्हें तुको का अभ्यास हो जाता है फिर वो कविराज हो जाते हैं चलते फिरते गीत बनाते रहते हैं,किन्तु उन तमाम गीतो को हम समकालीन गीत के खाते में नहीं जोड़ सकते|
वाल्मीकि की आदि कविता –शोक से उपजती है |आचार्यो ने कहा-शोक:श्लोकत्वमागत: -अर्थात शोक ही श्लोक बनकर फूट पडा|अरस्तू ने करुणा और दुःख के विरेचन को साहित्य का मूल मंत्र माना|..लेकिन वह कौन सी कविता या गीत हो जिसे समकालीन श्रेष्ठता के आधार पर परखा जाय या स्वीकार किया जाय-यह विचारणीय है|यहाँ गीतकारो में आत्ममुग्ध कवियों की एक विराट परम्परा है|
इसलिए मेरे हिसाब से जो कविसम्मेलनो में जाकर तरह तरह से आलाप भरते हैं |और गायन/प्रस्तुति से अपने गीत की कमियों को ढकने का प्रयास करते हैं वे श्रेष्ठ कवि /गीतकार/नवगीतकार नहीं हो सकते| सुर ताल और आलाप संगीत का विषय हैं कविता का नहीं|कविता में शब्द की शक्तियां होती है-अभिधा लक्षणा और व्यंजना|हमारे आदि काव्यशास्त्रकार भरत से लेकर आचार्य विश्वनाथ और रामचंद्र शुक्ल तक ने कवि के लिए गाना अनिवार्य नहीं बताया|
काव्यपाठ शैली /छन्दपाठ शैली अलग चीज है|भाषा की शुद्धता छंद की मात्राओं आदि की बात सभी ने अवश्य की है|गायन और प्रस्तुतीकरण-नाटक और संगीत का विषय है|
हमारे यहाँ समाज में भी नौटंकीबाज को गंभीर कवि नहीं माना गया|यहाँ जो -वाह वाह इंडिया -में हो आया या जो लालकिले से गीत पढ़ आया उसे ही हम बड़ा गीतकार मान लेते हैं| तो क्या कुमार विश्वास और शैलेश लोढा हमारे इस समय के बड़े गीतकार हैं ?बिलकुल नहीं | कवि सम्मलेन शुद्ध रूप से चारणों और भाँड़ो द्वारा किया जाने वाला एक तरह का नाटक ही होता है,जिसका आयोजन कुछ उत्सव धर्मी व्यापारी और दलाल मिलकर करते हैं|जिसका उद्देश्य साहित्य नहीं होता |जहां लोग कोशिश करते है ताली पिटाऊ गीत पढ़ें|ऐसे अधिकाँश गीतकारो के पास समकालीन श्रेष्ठ गीत नहीं मिलते| यह आप स्वयं भी जांच सकते हैं ऐसे बड़े मंचीय गीतकारो के गीत कभी एकांत में पढ़िए और उनका विवेचन करने का प्रयत्न भी कीजिए|कुछ न कर सकें तो पूरे गीत में कर्ता और क्रिया ही खोज लीजिए|अर्थात उसका व्याकरण ही देख जाइए|आपको बहुत निराशा होगी ,हो सकता है बाल नोचने की नौबत भी आ जाए| अक्सर छंद भी खंडित हो सकता है|आलाप लेते समय या सुर ताल लगाते समय छंद की मात्राएँ कम या ज्यादा हो जाती हैं| अर्थात यह समझ लीजिए कि मंचीय गीत का सार्थक गीत से कोई सरोकार नहीं हो सकता|-काव्यं गीतेन हन्यते|(गाये जाने से कविताई नष्ट हो जाती है|) जो गीतकार मंच के प्रपंच से बाहर निकलने को तैयार नहीं है,उन्हें समकालीन गीत की समीक्षा के संदर्भ में कैसे गिना जा सकता है ? कुछ कुंअर बेचैन जैसे मंचीय गीतकार ऐसे भी हैं जिनके पास कुछ बहुत अच्छे गीत हैं लेकिन मंचीयता के चलते उनके सार्थक गीत भी प्रभाव शून्य और प्रभाहीन हो गए|
मंच भी न छूटे सार्थकता भी बनी रहे ऐसा विलक्षण गीत रचना करना आज के युग में संभव नहीं है|अर्थात जहां ये सब कमियाँ दिखाई देती है उस कवि या गीतकार से हमें कोई आशा नहीं करनी चाहिए|यदि हम समकालीन गीत के खाते में श्रृंगार –वीर-आदि पारम्परिक विषयो को शामिल कर लें और उत्सव धर्मिता को भी किसी हद तक शामिल करे तो करोडो की संख्या में कवि दिखाई देने लगेंगे| उदाहरणार्थ –सरस्वती वन्दना या राधा कृष्ण प्रेम या धार्मिक मंचो के गीत के रूप लिखे गए कीर्तन ही कई करोड़ की संख्या में होंगे|उन्हें समकालीन श्रेष्ठ गीत के उदाहरण के रूप में नहीं देखा जा सकता|क्योकि ये अधिकांश गीत हमारी गंभीर संवेदना को नहीं छू पाते और मनुष्य की चेतना का परिसंस्कार नहीं करते|इसी प्रकार पन्द्रह अगस्त या गांधी जयन्ती, ईद मिलन जैसे समारोहों के लिए करोडो की संख्या में गीत लिखे गए होंगे और साल दर साल लिखे जा रहे हैं,उन्हें भी समकालीन गीत के खाते में नहीं जोड़ा जा सकता|मुंडन या जन्म दिन पर भी हमारे मित्र गीत गाने में व्यस्त दिखाई देते हैं|वह चारण कर्म हो सकता है कविताई नहीं|वह सब समीक्षा की दृष्टि से समकालीन गीत में शामिल नहीं किया जा सकता |
इसके बाद जो कुछ बचता है वह अधिकांश नवगीत की तरह कवियों ने लिखा है यदि उसे ही समकालीन गीत मान लेने से आशय है तो यह समीचीन हो सकता है|इस पर विचार किया जा सकता है|अर्थात जो नवगीत की परम्परा से आगे का गीत है वही समकालीन गीत है| नवगीत का काल लगभग चार दशको (१९६० से २००० )तक फैला है|निश्चित है कि अब नवगीत का नारा भी पुराना पड़ने लगा है,लेकिन लोग अभी भी नवगीत की प्रवृत्तियो के साथ काम कर रहे हैं|हमें समकालीन गीत पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है|सार्थक समकालीन गीतकारो में – मुकुटबिहारी सरोज,शंभुनाथासिंह ,रमेश रंजक ,वीरेन्द्र मिश्र , नईम ,देवेन्द्र शर्मा इंद्र ,उमाकांत मालवीय,कुमार रवीन्द्र, माहेश्वर तिवारी ,राजेन्द्र गौतम ,महेश अनघ,कैलाश गौतम ,दिनेश सिंह, अवध बिहारी श्रीवास्तव,शान्ति सुमन ,इंदिरा मोहन,राजकुमारी रश्मि, इसाक अश्क ,राम अधीर ,मयंक श्रीवास्तव ,पूर्णिमा वर्मन ,दिवाकर वर्मा ,योगेन्द्र दत्त शर्मा,नचिकेता ,सत्यनारायण, ओमप्रकाश सिंह ,मधुकर अष्ठाना, विनोद श्रीवास्तव,यश मालवीय,निर्मल शुक्ल ,पूर्णिमा वर्मन ,दिनेश प्रभात,मनोज जैन मधुर,ब्रजेश श्रीवास्तव,ब्रिजनाथ श्रीवास्तव आदि अनेक नाम हैं-इनमें से कुछ नाम तो ऐसे भी हैं जो लगातार गीत /नवगीत या समकालीन गीत को साहित्य की मुख्य धारा में केंद्रित करने के प्रयास में संलग्न हैं|अंतरजाल पर नवगीत /गीत केन्द्रित पत्रिका अभिव्यक्ति –अनुभूति अधिकाँश गीतकारों को चकित कर रही है| पूर्णिमा जी तो कई वर्षो से इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रही हैं| वहां नवगीत की पाठशाला भी चल रही है| आप जाने या न जानें,बहरहाल दुनिया भर में गीत प्रेमी लोग उन्हें जान चुके हैं|

अब ज़रा अकादमियो और विश्वविद्यालयों में साहित्य की मुख्यधारा की बात करें तो समीक्षा की दृष्टि से समकालीन गीत पर कोई विमर्श प्राय: साहित्य अकादमी जैसे केन्द्रीय साहित्यिक मंच आदि से पिछले कई दशकों में मैंने नहीं देखा सुना|यहाँ तो छंदोबद्ध कविता ही हाशिए में है|यहाँ समकालीन कविता पर हालांकि अक्सर बात होती है कविता पाठ आदि भी होते हैं ,लेकिन समकालीन गीत पर कोई बात नहीं होती|इस दुखद स्थिति के लिए भी हमारे गीतकार ही जिम्मेदार हैं|क्योकि गीतकार समीक्षा के लिए तैयार नही होते|आत्ममुग्धता के चलते उदार आलोचना भी उन्हें स्वीकार्य नहीं होती|कोई करना भी चाहे तो दुश्मनी मोल लेने जैसा काम हो जाता है|मैं ये जोखिम उठा चुका हूँ और मित्रो को अमित्र बना चुका हूँ|..तो ये जो तलवार की धार पे धावनो है – कविताई, उसकी चिंता कौन करे और क्यों करे? अत:साहित्य की मुख्यधारा यदि कोई है तो उसमे गीत तो कतई शामिल नहीं है| जो गीत पाठ्यक्रम आदि में (प्रसाद-निराला-माखनलाल चतुर्वेदी-महादेवी वर्मा -राम नरेश त्रिपाठी-नागार्जुन-त्रिलोचन-केदार नाथ अग्रवाल-मुकुट बिहारी सरोज-शंभुनाथ सिंह –वीरेन्द्र मिश्र -नीरज–रमेश रंजक ) शामिल दिखाई देते हैं वे पचासों वर्ष पहले के लिखे हुए हैं उन्हें हम समकालीन गीत कहकर खुश हो सकते हैं|कुछ उनमे से आज भी समकालीन और प्रासंगिक लगते हैं |लेकिन हम जानते हैं कि वे हमारे नए समय की नई संवेदना को प्रभावित करने वाले गीत नहीं हैं|
हालांकि मध्य प्रदेश से ही अनेक गीत पत्रिकाएं निकलती रही हैं –समान्तर-इसाक अश्क ,संकल्प रथ-राम अधीर ,प्रेसमेन-मयंक श्रीवास्तव ,शिवम पूर्णा,अंतरा ,गीत गागर आदि सब मध्यप्रदेश से ही निकलने वाली पत्रिकाएं हैं |किसी भी अन्य प्रदेश में गीत को लेकर इतनी तत्परता नही दिखाई देती लेकिन तार्किकता और वैचारिक सजगता यहाँ भी नहीं दिखती| दूसरी ओर अब साहित्य आकादमी की पत्रिका हो या कथादेश अथवा वागर्थ,प्राय: सभी पत्रिकाओं में सार्थक गीत को जगह मिलने लगी है|इसके बावजूद गीत/गज़ल /घनाक्षरी आदि साहित्य की मुख्यधारा में नहीं है|मुख्यधारा में जो कविताए/विधाएं होती हैं उन पर लगातार विमर्श होता रहता है| यहाँ आत्मसंमोहन का आसव छके हुए अधिकाँश दोहरे व्यक्तित्व वाले स्वनामधन्य गीतकारो से विमर्श की बात करना बेमानी है|समालोचना उन्हें सहन नहीं होती|ऐसे में साहित्य की मुख्य धारा में गीत की बात करना निरर्थक होगा |क्योकि मुख्यधारा तो समावेशी होती है|वहां वैयक्तिकता के लिए कोइ शान नहीं होता|किसी एक संस्कृति या सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना सही नहीं हो सकती|हमारी भारतीयता विविध संस्कृतियों के रंगों से निर्मित हुई है|हमारे गीतों में कहीं किसान चेतना,दलित चेतना या स्त्री विमर्श की बात की गयी है क्या? या की जा रही है ?साहित्य की मुख्यधारा में ये सब विमर्श भी शामिल करना होगा|ध्यान रहे कि किसान का चित्रण या दलित वर्णन और स्त्री वर्णन की बात मै यहाँ नहीं कर रहा हूँ|वर्णन और विमर्श में बहुत अंतर होता है| पहले विमर्श कर लें और तय कर लें कि साहित्य की मुख्य धारा में शामिल किए जाने वाले कौन से गीत हैं या कौन से गीतकार हैं|तब आगे इस विषय पर बात हो सकती है|
दूसरी ओर मुझे तो-मानव जहां बैल घोड़ा है/कैसा तन मन का जोड़ा है|
या कि—सुख का दिन डूबे डूब जाय/तुमसे न तनिक मन ऊब जाय|
जैसी पंक्तिया देने वाले कालजयी कवि निराला के गीत आज भी प्रासंगिक और समकालीन लगते हैं | ग्वालियर के ही मुकुट बिहारी सरोज और महेश अनघ के गीत समकालीन और प्रासंगिक भी जान पड़ते हैं |आप उन्हें मुख्यधारा का माने या न मानें|लेकिन ..अगर उन्हें मुख्यधारा का गीतकार माना होता तो अब तक किसी न किसी गीत पत्रिका का उनपर विशेषांक आ चुका होता|उन्हें लेकर विस्तार से गीत की चर्चा हुई होती|मेरी जानकारी में शायद –शंभुनाथ सिंह ,ठाकुर प्रसाद सिंह ,उमाकांत मालवीय,वीरेन्द्र मिश्र ,जानकीवल्लभ शास्त्री,मुकुट बिहारी सरोज,महेश अनघ ,कैलाश गौतम ,दिनेश सिंह जैसे गीतकारो पर एकाग्र किसी पत्रिका का अंक नहीं संपादित किया गया|यदि कहीं छुटपुट अंक आए भी हों तो इनकी रचनाधर्मिता पर विस्तार से बातचीत तो कतई नहीं हुई|शंभुनाथ सिंह के नवगीत दशको पर भी चर्चा नहीं हुई|इस दिशा में रामअधीर जी ने संकल्प रथ के कुछ विशेषांक तो निकाले हैं बाकी सन्नाटा है , तो फिर बताएं गीत मुख्यधारा में कहाँ है? किसी एक गीत पत्रिका के प्रयास को साहित्य की मुख्यधारा कैसे माना जा सकता है? मेरे तेरे गीतों को एक किसी स्थानीय पत्रिका में छप जाने से गीत साहित्य की मुख्यधारा में नहीं आ सकता|लोगो के लिए गीत जीने मरने का सवाल बिलकुल भी नहीं है|गीत को मुख्यधारा में स्थापित करने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है|सबसे पहले गीत में घुसा हुआ -मंच और प्रपंच वाला हिस्सा काट कर अलग फेंकना होगा |उसके बाद तर्क की छेनी और व्याकरण की हथौड़ी लेकर समकालीन गीत की नई तस्बीर गढ़नी होगी|इस अवसर पर याद करना चाहता हूँ भवानी दादा को जिनकी जन्मशती चल रही है |उन्होंने मंचीय गीतकारो पर व्यंग्य करते हुए कहा था-
जी हाँ हुज़ूर
मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के
गीत बेचता हूँ
मैं क़िस्म-क़िस्म के
गीत बेचता हूँ|

शायद इसी मंचीयता के विरोध के कारण उनपर किसी गीत पत्रिका ने विशेषांक नहीं निकाला |और अंत में धन्यवाद-ग्वालियर के सुधी मित्रो का जिन्होंने मुझे कुछ कहने का सुखद अवसर दिया , खासकर ब्रजेश जी का जिन्होंने मुझे यहाँ बुलाने की कृपा की और यह ग्वालियर का इतना रसज्ञ मंच प्रदान किया|

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मंगलवार, फ़रवरी 04, 2014




आज भी प्रासंगिक हैं
गीत निराला के

भारतेन्दु मिश्र

युग बीत गया,निराला की कविता नही रीती। वो आज भी प्रासंगिक हैं उनके गीत कालजयी हैं। छन्दोबद्ध कवियों को निराला से बहुत कुछ सीखना है। सन-1923 में निराला का पहला कविता संग्रह –अनामिका- प्रकाशित हुआ। अनामिका में ही अधिवास शीर्षक एक कविता है जिसमें निराला कहते हैं-
मैने मै शैली अपनायी
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पडी हृदय में झट उमड वेदना आयी।
यह कविता सन 1923 या उससे कुछ पहले की ही होनी चाहिए,बहरहाल निराला की कविता का प्रयोजन उनकी इन्ही पंक्तियों से साफ झलकता है कि निराला दुखदग्ध मनुष्य की वेदना के कवि हैं। असल में निराला करुणा के कवि हैं। सरोज स्मृति हिन्दी का पहला शोक गीत है। घनघोर शोक की दशा में भी निराला छन्द नही तोडते। वे दुख को गरल समझकर पी जाने वाले सिद्ध कवि हैं। वे असहाय दीन दुखियों के दुखों के गीतकार हैं। यह वह समय था जब अधिकांश रचनाकार स्वतंत्रता की लडाई के गीत लिख रहे थे। हालाँकि कुछ कवि धर्म और दर्शन की पहेलियाँ सुलझाने में भी लगे थे।निराला की इसी जमीन पर पढीस और बंशीधर शुक्ल जैसे किसान चेतना के कवि भी इसी समय में हुए। यह वह समय था जब भारतीय जीवन मे बहुत तेजी से बदलाव हो रहे थे,लेकिन निराला ने छन्द नही छोडा बल्कि वो तो नए से नए छन्दविधान को स्वर देने मे लगे थे। अत: निराला छन्द साधना के कवि हैं। जब वो कहते हैं -मैने मैं शैली अपनायी- तो इसका अर्थ यही है कि वो अपने समय के छायावादी कवियों से हटकर अपना मार्ग बना रहे थे। यहीं से उनकी मौलिकता का अन्दाज लगाया जा सकता है। निराला के इसी वाक्य को लेकर कुछ आलोचको ने उन्हे छन्दमुक्त कविता का प्रवर्तक और स्वच्छन्दतावादी कवि सिद्ध करने की कोशिश की है,जबकि यह पूरा सच नही था। यदि ऐसा होता तो निराला छन्दहीन कविताएँ ही रचते रहते। निराला तो संवाद धर्मी गीत लिख रहे थे।
-बाँधों न नाव इस ठाँव बन्धु /पूँछेगा सारा गाँव बन्धु। जैसे अनेक गीत निराला ने रचे हैं।किसान चेतना और ग्राम्य जीवन के बहुत से चित्र निराला के गीतों की शक्ति बनकर उभरते हैं ।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-‘जैसे और सब बातो की वैसे ही संगीत के अंगरेजी ढंग की नकल पहले बंगाल में शुरू हुई|इस नए ढंग की और निराला जी सबसे पहले आकर्षित हुए और अपने गीतों में उन्होंने उसका पूरा जौहर दिखाया|संगीत को काव्य के और काव्य को संगीत के अधिक निकट लाने का सबसे अधिक प्रयास निराला जी ने किया|’(पृ.497 ,हिन्दी साहित्य का इतिहास ,)इसी के साथ आचार्य शुक्ल आगे बताते है कि निराला जी ने सामाजिक बन्धनों के साथ ही छंद के बंधन भी छोड़ दिए थे-‘जिस प्रकार निराला जी को छंद के बंधन अरुचिकर हैं उसी प्रकार सामाजिक बंधन भी|’(पृ.499 वही)
बहरहाल निराला की रचनावली में जो कविताएँ संकलित हैं उन्हे देखकर यह साफ हो जाता है कि वे अंततक छन्दोबद्ध कविताएँ ही लिखते रहे,बल्कि निराला नए छन्दो का सृजन भी करते रहे। कविता की अखण्ड लय ही निराला की साधना का मूल है। वे उन विरल कवियो में से हैं जिन्हे संगीत का भी पूरा ज्ञान है। वे राग रागनियों में निबद्ध गीतो की रचना भी करते हैं। उनके अनेक गीतों का सुर ताल सधा हुआ है। वे पक्के राग मे भी गाये जाते हैं। वे सहज रूप मे ही नवगीत की परिभाषा देते हुए चलते हैं-
नवगति नव लय ताल छन्द नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दे।..वरदे वीणावादिनि वर दे।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री ने अपनी पुस्तक –अनकहा निराला- मे इस बात पर विशेष बल दिया है और निराला के गीतों मे प्रयुक्त रागों की विस्तार से चर्चा करते हुए वे कहते हैं-‘वैसे तो निराला जी ने चित्र और संगीत हीन एक पंक्ति भी नही लिखी ,किंतु कभी कभी उनमें कुछ ऐसा लोकोत्तर अनोखापन आ गया है कि देखते ही बनता है। पृ.194(अनकहा निराला) निराला महाप्राण हैं क्योकि उनके गीतो में दीन जन के प्राण बजते हुए सुने जा सकते हैं। निर्धन लाचार लोगों की पीडा का स्वर उनके गीतो मे सुना जा सकता है। वे छायावाद के निरे सुकुमार कवि नही हैं,वे रहस्यवाद के चमत्कारी कवि भी नही हैं।वे तो प्रगतिशील चेतना के गीतकार हैं।छायावादोत्तर -नवगीत,जनगीत आदि अनेक प्रगतिशील आन्दोलनो को उर्वर भूमि निराला के गीतों से ही मिलती है। संवेदना का जो मार्मिक विस्तार निराला अपने गीतों द्वारा कर चुके हैं उससे बहुत कुछ आगे हमारे गीतकार नही बढ पाये हैं।वैचारिक स्तर पर निराला समाज के अतिदीन दुखी दलित और अंतिम पंक्ति मे खडे व्यक्ति के दुखों की समीक्षा ही नही करते बल्कि सामंतों को टोकते हुए चलते हैं।सन 1929 के आसपास लिखे गये गीत का अंश देखिए-
छोड दो जीवन यों न मलो
ऐठ अकड उसके पथ से तुम रथ पर यों न चलो।
यह पूरा गीत उस समय के सामंतवादी ठाठ के खिलाफ आम आदमी के साथ खडे हुए निराला की गवाही देता है।यह है निराला की काव्य चेतना सामंतवादी ऐठ अकड के खिलाफ दलित जन का समर्थन करती है। निराला यहाँ सच्चे समाजवादी दिखाई देते हैं।दीन दुखी जन के हित में निराला किसी हठयोगी की तरह डटे हुए दिखाई देते हैं तो कहीं ईश्वर से प्रार्थना करते हुए तुलसी जैसे संत कवियों के समीप खडे मिलते हैं- दलित जन पर करो करुणा दीनता पर उतर आये प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा। ध्यान देने की बात यह है कि निराला का भक्तिभाव स्वर्ग मोक्ष प्राप्त करने वाला नही है। वे तो अपने सब संचित फल लुटाने वाले हैं।भिक्षुक शीर्षक कविता भी उनकी प्रारम्भिक कविताओ में है। भिक्षुक की लाचारी का इतना सजीव चित्रण सम्भवत:हिन्दी कविता में निराला से पहले अन्यत्र नही मिलता। कलेजे के दो टुकडे करने वाला मार्मिक डृश्य अपना कलेजा चीर कर निराला देखते हैं और दिखाते हैं। करुणा ही चीत्कार करती है निराला की कविता में। इस पूरी कविता को पढने के बाद उनके समय की भुखमरी से उत्पन्न लाचारी का स्पष्ट आकलन किया जा सकता है। निराला का भिक्षुक आजकल जैसा पेशेवर भिखारी नही है-
वह आता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता।
भीख माँगने वाले आज भी कम नही हुए हैं बल्कि पेशेवर हो गये हैं। विचारधाराएँ और सरकारें दमतोड चुकी हैं। निराला के भिक्षुक के मन में पश्चात्ताप है। यह बोध ही उसे पेशेवर भिखारियो से अलग करता है। शायद इसीलिए निराला की करुणा फूटकर बह निकली है। निराला कल्पना की कोई गुलाबी उडान के कवि नही हैं। वे असल मे जनकवि भी हैं,महाप्राणत्व की प्रतिष्ठा भी उन्ही में है। यह कविता निराला के श्रेष्ठ प्रगीतो में से एक है। निराला अपने समय में छायावादी रोमानियत को फलाँग कर आगे बढे हैं। अपने समय मे वैचारिक स्तर पर आगे बढना ही तो प्रगतिशीलता है। किसी दल की सदस्यता लेकर किसी खेमे मे शामिल होकर निराला प्रगतिशील नही बने, बल्कि वे तो प्रगति शीलता के अग्रदूत हैं। इसी क्रम में पत्थर तोडती महिला बिम्ब देखें-
वह तोडती पत्थर
देखते देखा उसे मैने इलाहाबाद के पथ पर।
हिन्दी में इस तरह की छान्दसिक कविताएँ निराला से पहले नही लिखी गयीं जिनमें मज्दूर महिला का श्रम सौन्दर्य अंकित हो। ऐसे प्रगीत लिखना तो बहुत बडी साधना की बात है। उनके गीतो मे बिम्बो और प्रतीको के भटकाऊ जंगल नही हैं। उनकी कविताओ में अंत:सलिला की तरह लय धडकती है। वे सीधी सादी भाषा में सुकोमल और भीषण संवेदना के मर्मस्पर्शी कवि हैं। इसी लिए जानकीवल्लभ शास्त्री उन्हे विरोधो के सामंजस्य का कवि कहते हैं। सुकोमल संवेदना की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रणय और दाम्पत्य के विरल गीत अपने समय में निराला ने रचे हैं,गृहरति व्यंजना का स्वर देखें-
सुख का दिन डूबे डूब जाय
तुमसे न सहज मन ऊब जाय।
खुल जाय न गाँठ मिली मन की
लुट जाय न राशि उठी धन की
सारा जग रूठे रूठ जाय।
जहाँ सहज सौन्दर्य की उन्नत राशि है और जिस दाम्पत्य में एक मन के साथ दूसरे मन की गाँठ कसी है वह बना रहे बेशक काल्पनिक या अनिर्वचनीय सुख का दिन डूबता है तो डूब जाये। फिर तो निराला सारी दुनिया की भी बात नही मानते। दाम्पत्य बोध का ऐसा सुन्दर गीत अन्यत्र हिन्दी मैने नही पढा। इसी प्रकार एक और गीत में दाम्पत्य बोध का निराला का यही स्वर दृष्टव्य है निराला यहाँ भी अपने समकालीनों से अलग अपनी पहचान के साथ खडे हैं-
जैसे हम हैं वैसे ही रहें लिए हाथ एक दूसरे का अतिशय सुख के सागर में बहें।
एक और चित्र देखें-
पिय के हाथ जागाये जागी
ऐसी मैं सो गयी अभागी।
सहयोग साहचर्य और बहुत कुछ संत मत के निकट के सुन्दर चित्र निराला की कविता मे साफ तौर से दिखाई देते हैं जो अपनी सहजता और अनुभूति के कारण आकर्षक लगते हैं। निराला बहुआयामी कवि हैं उनकी कविता के अनेक स्तर हैं उनकी कविता के अनेक स्वर हैं। वो किसी एक विचार या विचारधारा में बँधकर नही चलते। जो नई राह बनाते हैं वो बनी बनायी राह पर कैसे चल सकते हैं। हम कह सकते हैं कि निराला वसुधैव कुटुम्बकं के कवि हैं। जानकीवल्लभ शास्त्री के अनुसार-“ निराला अद्वैतवादी भी हैं,द्वैतवादी भी हैं,भक्त भी हैं और ज्ञानी भी और क्रांतिकारी भी,लौह प्रहार तथा ललकार भी और और आत्म परमात्म मिलन की मधुर झंकार भी।वह वैयक्तिक अनुभूतियों के स्वर्ग में विचरने वाला मुक्त विहग भी हैऔर पतनोन्मुख रूढ प्रिय संस्कृति की विहग बालिका के लिए भयंकर बाज भी,उसमें लौकिक प्रेम की ललक भी है और आध्यात्मिक भूमि पर अनुभूति का आत्मपुलक भी,निराला विरोधों का स्वयं सामंजस्य और सामंजस्यो का विरोध हैं।“ (पृ.117 अनकहा निराला)
यहाँ साफ शब्दों मे कहें तो निराला सिद्ध रचनाकार साबित होते हैं। वो कुशल रचनाकार की तरह सब विचार धाराओ मे से जन्नोन्मुखी संवेदना का चुनाव करते हैं। कुछ कबीर की तरह ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ वाली मुद्रा में। अपनी इन्ही विशेषताओ के कारण निराला आधुनिक युग के विशिष्त और युग प्रवर्तक कवि हैं।उनके गीतो को भी मार्क्स,फ्रायड,लोहिया या विवेकानन्द ,अम्बेडकर अथवा गान्धी में से किसी एक की विचारधारा से जोडकर नही देखा जा सकता। निराला इन सभी अपने समय के महापुरुषों के विचारों को सुन समझकर अपनी राह बनाते हैं सम्भवत: इसी लिए वो कहते हैं-“मैने मैं शैली अपनायी”। निराला को जब जो अपने रचनासमय के लिए उपयुक्त जान पडा उसे गृहण किया और जो अनुपयुक्त जान पडा उसे छोड दिया।
निरला की रचनावली और विशेषकर आराधना में प्रकाशित गीतों को पढने से लगता है निराला भक्त कवि हैं।निराला के गीतों मे सूर तुलसी मीरा आदि भक्त कवियों की सी संवेदना की तडप विद्यमान है।यद्यपि वो धार्मिक कर्मकाण्ड वाली आस्था के कवि नही हैं जहाँ एक ओर कहीं वो अपने गीतों में नाम जपने का संकेत देते हैं तो वहीं दूसरी ताल ठोककर खडे होते हैं। राम की शक्ति पूजा में निराला की ओजस्विता और काव्य शक्ति की अनेक भंगिमाएँ स्पष्ट होती हैं तो दूसरी ओर उनके अनेक गीत सहजा भक्ति के मार्ग का अवलम्बन करते हैं। उदाहरणार्थ-

नाचो हे रुद्र ताल/आँचो जग ऋजु अराल।
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दुख के सुख पियो ज्वाला/शंकर के स्मर-शर की हाला।
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कामरूप हरो काम/जपूँ नाम राम-राम।
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वरदे वीणा वादिनि वर दे
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भारति जय विजय करे/कनक शस्य-कमल धरे।

यह अपने निजी सुख स्वार्थ पूर्ति या स्वर्ग सुख की कामना या ईस्वर से वरदान माँगने की निरी मानवीय मुद्रा नही है। यह निराला का युगधर्म भी है और व्यक्तिगत जीवन का सत्य भी। निराला के गीतो के पुनर्पाठ और नयी पाठचर्या की आवश्यकता है। उनकी छन्दसिक रचनाएँ ही उनके मनोभावो के भेद खोल सकती हैं। वे निरे
प्रयोगवादी भी नही हैं। निराला साफ करते हैं अपने भक्ति भाव को और कहते हैं-
नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणो पर माँ
मेरे श्रम संचित सब फल।
आम तौर पर भक्ति और प्रगति दोनो पृथक मार्ग हैं किंतु निराला की भक्ति में उनकी प्रगतिशीलता साफ नजर आती है-जब वो कहते हैं नर जीवन के स्वार्थ सकल अर्थात मनुष्य जीवन के असंख्य छोटे बडे व्यक्तिगत स्वार्थ सबका बलिदान करता हूँ। इसके आगे कहते हैं–श्रम संचित सब फल-अर्थात अपने परिश्रम से अर्जित कर्मफल का ही अर्पण है। किसी अन्य पूर्वज या अनुज द्वारा अर्जित किसी फल या सम्पदा की बात नही कर रहे हैं निराला क्योकि मनुष्य का अपने श्रम द्वारा अर्जित फल पर ही नैतिक अधिकार होता है। इसके बदले में किसी फल की कामना तो है ही नही । हम इसे निराला की राष्ट्रीय चेतना के रूप में भी व्याख्यायित कर सकते हैं। तात्पर्य यह कि निराला के गीतो में कथ्य और संवेदना के जितने स्तर हैं कदाचित ही किसी दूसरे कवि के पास हों। अत: यह मान लेना कि केवल वैचारिकता के आग्रह में निराला ने छन्द तोड दिया,सही नही है। इस बात को स्वयं उनके गीत ही प्रमाणित करते हैं जहाँ वो नए शिल्प में नयी लय लेकर उपस्थित होते हैं। निराला अपनी सर्जना से तमाम छन्दविरोधियों को उत्तर देते है जैसे शक्ति पूजा में उन्होने राम को सन्देश दिलाया है-“आराधन का दृढ आराधन से दो उत्तर।“ वो सिद्धावस्था के जाग्रत कवि हैं। इसी लिए निराला नयी कविता ही नही नवगीत,जनगीत जैसे आन्दोलनो के प्रेरणा पुरुष के रूप में देखे जाते हैं। नवगीत जनगीत जैसे आन्दोलनो की जो पृष्ठभूमि सन 1950 के आसपास तैयार हो रही थी निराला उस दिशा में 1943 मे ही सार्थक प्रयोग कर चुके थे। बाद में अणिमा में संकलित उनका यह गीत देखिए-
चूँकि यहाँ दाना है इसीलिए दीन है ,दीवाना है। लोग हैं महफिल है नग्में हैं ,साज है,दिलदार है और दिल है शम्मा है,परवाना है। निराला अपने समाज के उपेक्षित जन के लिए अपनी कविता के औजार से लडते रहे। युगदृष्टा साहित्यकार हमेशा से ही अपने समय की समालोचना में उपेक्षा का शिकार रहा है। निराला भी शिकार हुए तब निराला ने अपने समय के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को सम्बोधित यह गीत लिखा-
जब से एफ.ए.फेल हुआ है/हमारे कालेज का बचुआ
नाक दबाकर सम्पुट साधै/महादेव जी को आराधै
भंग छानकर रोज रात को/ खाता माल पुआ
बाल्मीकि को बाबा मानै/नाना व्यासदेव को जानै
चाचा महिषासुर को,दुर्गा जी को सगी बुआ
हिन्दी का लिक्खाड बडा वह/जब देखो तब अडा पडा वह
छायावाद रहस्यवाद के/भावो का बटुआ
धीरे धीरे रगड-रगड कर/श्री गणेश से झगड झगड कर
नत्थाराम बन गया है अब /पहले का नथुआ।
जिस कवि मे आलोचक से आँख मिलाकर बात करने और ताल ठोककर दो हाथ करने की क्षमता होगी वही निराला के स्वाभिमान और उनके गीत की लय को पकड सकता है। बाद मे शुक्ल जी ने निराला जी को पढा भी और उनपर लिखा भी। समर्थ रचनाकार आलोचना की बैसाखी के सहारे खडा नही होता। निराला को अपनी रचना पर दृढ विस्वास था। यह आत्मविश्वास ही उनकी मैं शैली है। कहना न होगा कि निराला के गीत कहीं न कहीं कालिदास,जयदेव,तो कहीं तुलसी मीरा,तो कहीं गुरुदेव रवीन्द्र की गीत परम्परा को आगे बढाते हैं। निराला के गीत इस सीमा तक अपने कथ्य भाषिक-व्यंजना और सवेदना से नए हैं कि बाद के गीतोन्मुख तमाम आन्दोलन उनकी रचनाशीलता का परिविस्तार ही साबित होते हैं। निराला के परवर्ती प्रमुख कवियों में नागार्जुन,त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल आदि सभी प्रगतिशीलो ने भी गीत की शक्ति विस्तार ही दिया। निराला के नवगीतो की बानगी देखें- मानव जहाँ बैल घोडा है कैसा तन मन का जोडा है। तथा- बान कूटता है ऐसे बैठे ठाले सुख का राज लूटता है। मुक्तिबोध कविता में जिस मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा करते हैं और डाँ. रामविलास शर्मा जिस श्रम सौन्दर्य की बात करते हैं उसकी रूपरेखा हिन्दी नवगीत के शिल्प मे निराला की देन है।विशेषता यह भी है कि निराला का चिंतन भारतीय काव्यमूल्यो से अनुप्राणित है। अत: उनके गीतों की विवेचना भी भारतीय परिवेष मे विकसित मूल्यों के आधार पर ही की जा सकती है। निराला की कविता में वाक्य और अर्थ कहीं लँगडाता नही है। विराम और अर्धविराम चिन्हों तक का प्रयोग निराला करते चलते हैं।
तात्पर्य यह कि वो अपने पाठ्य को लेकर पूरी तरह सजग हैं।यही कारण है कि निराला के गीत पाठ्य और श्रव्य दोनो रूपों मे सहृदयो को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं। निराला ने अपनी कविता के जो मानदण्ड बनाये वो निभाये। इसे ही उन्होने मैं शैली कहा है।घनघोर निराशा की स्थिति में भी वह आशा की किरण खोज ही लेते हैं।आसन्न मृत्यु की स्थिति में संकट की स्थिति में भी निराला गीत का साथ नही छोडते।अपनी अंतिम गीत रचना में वो कहते हैं-
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
आशा का प्रदीप जलता है हृदय कुंज में
अन्धकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है
दिंड्निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र –पुंज में।
सम्भवत;यही निराला की अंतिम रचना है जो अगस्त 1961 के आसपास रची गयी और सान्ध्यकाकली में संकलित है। इस कविता में भी दिंड्निर्णय ध्रुव से कहकर अपने अटल विश्वास को दृढ करते हैं। निराला अपनी रचनाशीलता की आग को अपनी मुट्ठी में जीवन पर्यंत कसे रहे। तात्पर्य यह है कि निराला की स्वच्छन्दता को छन्दहीनता से जोडकर देखना अनुचित है। निराला के यहाँ छन्द कमजोरी नही है। वह तो सहृदय को आच्छादित करने या हृदयव्यापी बनाने के अर्थ में है। छन्दो के अनंत रूप हैं निराला की कविता में-कहीं लयांविति के रूप में कहीं सांगीतिक लय के रूप में कहीं संवाद धर्मिता के रूप में वो प्रकट होते चलते हैं। डाँ रामविलास शर्मा से बेहतर शायद ही कोई निराला को जान पाया हो।शर्मा जी ने भी निराला की प्रशस्ति अपने एक गीत से ही की थी-
यह कवि अपराजेय निराला जिसको मिला गरल का प्याला
ढहा और तन टूट चुका है पर जिसका माथा न झुका है
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती लेकिन अभी सँभाले थाती
और उठाये विजय पताका यह कवि है अपनी जनता का।
निराला अपराजेय हैं क्योकि वह अपनी रचनाशीलता से लगातार जनता से जुडे रहे हैं। निराला समर्थ गीतकार हैं जो टूटकर भी लगातार आत्मस्वाभिमान से उन्नत मस्तक होकर अपनी जनता के दुखों को अपने गीतों से माँजते रहे।
उनका छन्दसौष्ठव और वाक्य विन्यास देखकर उनकी काव्य प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। निराला की गीत परम्परा का विस्तार प्रगतिशील कवियो ने भी किया। बाद में यही परम्परा आगे जाकर नवगीत और जनगीत के रूप में प्रतिफलित हुई जिसके परिणाम स्वरूप राजेन्द्रप्रसाद सिंह,शम्भुनाथ सिंह,मुकुट बिहारी सरोज,रमेश रंजक,ठाकुर प्रसाद सिंह,वीरेन्द्र मिश्र,नईम,उमाकांत मालवीय,देवेन्द्रशर्मा इन्द्र,माहेश्वर तिवारी जैसे अनेक नवगीतकार जनगीतकार उभरे। नवगीत आन्दोलन के बाद छायावादी गीत परम्परा का लगभग अवसान हो गया। निराला की समर्थ गीत प्रतिभा कहीं न कहीं नवगीतकारो को लागातार प्रेरणा देती रही।नई पीढी के नवगीतकारो मे संवेदना के स्तर पर और नई जमीन देखने को मिलती है किंतु छन्दहीन कवितावादियो ने काव्यं गीतेन हन्यते की गलत व्याख्या करके अपनी सुविधा के आधार पर हिन्दी कविता का बहुत आहित किया। दूसरी ओर नये कवियो मे जो नवगीत लिख रहे हैं उनमे वाक्य गठन,भाषिक रचना,तथा सहज सरल जीवन को मुखरित करने वाली समर्थ छन्द रचना का अभाव दिखता है। नये कवि के पास समय नही है।साधना और अभ्यास की कमी इसका मूल कारण है। किसी भी संवेदना को छन्द मे प्रस्तुत किया जा सकता है बशर्ते साधना और अभ्यास किया जाये। निराला अपनी रचनाओ को बार बार माँजते हुए आगे बढते हैं वो कहीं स्वयं को दुहराते नहीं,विचार- भाव- भाषा-शिल्प आदि के प्रयोग उनके यहाँ नए हैं। निराला के बहुत से गीत हैं जिनकी गहन विवेचना होनी चाहिए। यहाँ इस लेख में निराला के गीतो की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करना भर ही मेरा उद्देश्य है।निराला के यहाँ जीवन और कविता में फर्क नही है।यही कारण है कि निराला के गीत आज के समय में भी प्रासंगिक हैं उनकी छन्दसिकता और जनपक्षधरता की दृष्टि से भी उनके पुनर्पाठ की आवश्यकता बनी हुई है।

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