शुक्रवार, दिसंबर 28, 2018

नवगीत की परंपरा (क्रमश:)
न कोई बिम्ब न कोई चमत्कार,न कोई दूर की कौड़ी लाने का प्रयास ही किया गया|नवगीत की परंपरा को जाने समझे बिना जो लोग नवगीत क्या है पूछने लगते हैं,या जो कहते हैं कि नवगीत को गीत ही मान लिया जाए तो क्या फर्क पडेगा उन चिंतन शील युवा नवगीतकार मित्रों के लिए साझा कर रहा हूँ|गलेबाज मंचीय लोगों के लिए नहीं ये उन्हें कतई अच्छा नहीं लगेगा-

अकाल के बाद

कई दिनों तक चूल्हा रोया
चक्की रही उदास
कई दिनों तक कानी कुतिया
सोई उनके पास
कई दिनों तक लगी भीत पर
छिपकलियों की गश्त
कई दिनों तक चूहों की भी
हालत रही शिकस्त।

दाने आए घर के अंदर
कई दिनों के बाद
धुआँ उठा आँगन से ऊपर
कई दिनों के बाद
चमक उठी घर भर की आँखें
कई दिनों के बाद
कौए ने खुजलाई पाँखें
कई दिनों के बाद।---नागार्जुन


  • राम सेंगर नागार्जुन, नवगीत की परंपरा और पृष्ठभूमि को समृद्ध करने वाले अग्रगामियों में से एक हैं । वे अपनी तरह की औघड़ कहन के उस्ताद कवियों में रहे जिन्होंने फार्मूलाबद्ध काव्यरूपों के मुँह पर तमाचा जड़ते हुए कथ्य- शिल्प और लयात्मकता को लेकर ऐसे-ऐसे अनूठे लोकधर्मी...और देखें
    4
  • Prem Chandra Ghanghoriya बाबा नागार्जुन को प्रणाम भारत राष्ट्र के उन ऋषि-मुनियों को प्रणाम है जिन्होंने इसकी प्रारंभिक संरचना में अपना योगदान दिया होगा! बाबा को नमन पुनः नमन
    1
  • Dinesh Priyaman वही गीतात्मक रचना नवनीत कही जा सकती है जिसमें शिल्प व अन्तर्वस्तु का नयापन हो। यह कौशल गीत धारा की परम्परा को जानने के साथ अपने समय की सम्वेदना को नयेपन के साथ लयात्मक अभिव्यक्ति देने में है। आप मंचीय कविता की गलेबाजी पर जो टिप्पणी कर रहे हैं उससे सहमत...और देखें
    1
  • भूपेन्द्र दीक्षित बहुत बढ़िया कोई जवाब नहीं है
    1
  • Dineshwar Prasad Singh Dinesh बाबा नागार्जुन को नमन, आपको हार्दिक बधाई
    1
  • Bhartendu Mishra शंभुनाथ सिंह जी ने नवगीत अर्धशती" में नागार्जुन जी के गीत शामिल किये थे।
  • रमाकान्त नीलकंठ नागार्जुन की इस प्रसिद्ध कविता को गीत या नवगीत कहना कविता और नवगीत दोनो पक्षों के लिए अन्यायपूर्ण है और दूर की कौड़ी लाना है।
    1
  • Bhartendu Mishra रमाकांत जी ये आपका मत हो सकता है ,लेकिन नवगीत या गज़ल, दोहा आदि कविता की विधाएं हैं।नईकविता और नवगीत लगभग एक साथ हिंदी कविता में प्रचलित हुए ,ये प्रवृत्ति भर है। मुझे इसमें अन्याय जैसी बात समझ मे नहीं आती।शोध और समीक्षा की दृष्टि से विधाओं का विभाजन किया गया है।मूलतः तो सब कविता ही है।

  • नवगीत की परंपरा

    नवगीत आन्दोलन के प्रारंभिक दिनों का नवगीत है|जब त्रिलोचन जी बनारस में रहते थे|शंभुनाथ सिंह जी उनके मित्र थे|और ये चित्र डॉ.नामवर सिंह जी के साथ गंगा तट का है| नवगीत के शिल्प को समझने के लिए युवा मित्रों हेतु साझा कर रहा हूँ-

    आज मैं अकेला हूँ

    आज मैं अकेला हूँ
    अकेले रहा नहीं जाता
    जीवन मिला है यह
    रतन मिला है यह
    धूल में कि फूल में
    मिला है तो मिला है यह
    मोल तोल इसका
    अकेले कहा नहीं जाता|
    सुख आये दुख आये
    दिन आये रात आये
    फूल में कि धूल में
    आये जैसे जब आये
    सुख दुख एक भी
    अकेले सहा नहीं जाता|
    चरण हैं चलता हूँ
    चलता हूँ,चलता हूँ
    फूल में कि धूल में
    चलता मन चलता हूँ
    ओखी धार दिन की
    अकेले बहा नहीं जाता|
    (-धरती )चित्र में ये शामिल हो सकता है: एक या अधिक लोग और दाड़ी

रविवार, दिसंबर 16, 2018


Gulabsingh.jpg
(गुलाब सिंह -9936379937)


गुलाब सिंह के नवगीत # भारतेंदु मिश्र 




  

बैसवारा नवगीत समारोह (नवम्बर -2018) से लौटते समय अनेक कवियों की जो पुस्तकें मिलीं उनमें गुलाब सिंह जी की दो पुस्तकें भी शामिल हैं जो मुझे कुछ कहने के लिए प्रेरित कर रही हैं| एक समय था जब नवगीत में आंचलिक बोध के स्वर बुहत मार्मिक ढंग से उभर रहे थे| ठाकुर प्रसाद सिंह के नवगीत हिन्दी नवगीत की परंपरा को आगे बढाते हैं| इसी क्रम में देवेन्द्र कुमार तथा अन्य आंचलिक स्वर के नवगीत साधकों का भी नाम लिया जा सकता है| सत्तर के दशक से नवगीत सृजन में सक्रिय हुए चर्चित वरिष्ठ नवगीतकार गुलाब सिंह की रचनाएं डॉ.शंभुनाथ सिंह जी ने ‘नवगीत दशक-2’ में और ‘नवगीत अर्धशती’ में संकलित की थीं| उनके गीतों में गाँव की प्राकृतिक सुगन्ध अपने मुहावरे के साथ विद्यमान है| जहां तक मैं समझता हूँ वे मंचीय कविता के प्रपंच से अपनी रचनाशीलता को बचाए रखने में समर्थ रहे हैं|नवगीत की सही दिशा इसी ओर आगे बढ़ते रहने से दिखाई देती है| एक अंश देखें-
‘शब्दों के हाथीं पर /ऊंघता महावत है/गाँव मेरा/लाठी और भैंस की कहावत है|
शीत घाम का वैभव/रातों का अन्धकार/पकते गुड़ की सुगंध/धुल धुंए का गुबार|
पेट पीठ के रिश्ते ढो रहा यथावत है|’  ( 25-धूल भरे पाँव)
गुलाब सिंह के अब तक चार नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जो क्रमश:-धूल भरे पाँव,बांस वन और बांसुरी,जड़ों से जुड़े हुए’ और ‘कभी मिटती नहीं संभावना’ हैं| उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा जैसे लोग सुबह शाम नवगीत जोड़ने में लगे रहते हैं वैसा नहीं बल्कि अपने ग्रामीण आंचलिक जीवन के यथार्थ को रागात्मक स्वर में अपनी आंचलिक जनता यानी किसान और श्रमिक वर्ग के लिए लिखा| जिसने पूर्वी अवधी वाले आंचलिक गाँव के दृश्य और लोक जीवन को निकट से नहीं देखा उन्हें गुलाब सिंह के नवगीतों के निहितार्थ को समझाने में कठिनाई हो सकती है| लेकिन गुलाब सिंह के नवगीत अपने पाठक के सुख दुःख को यथारूप रखने में समर्थ हैं| एक चित्र देखें-
‘रामदीन/ अंधियारे की कुछ परतें फाड़ रहे|
खुरपी लेकर/ मरी भैंस की खाल उतर रहे|’ (35 -धूल भरे पाँव)
नवगीत में इस प्रकार के चित्र उमाकांत मालवीय,रमेश रंजक,सत्यनारायण,महेश अनघ,कैलाश गौतम,  और दिनेश सिंह  के यहाँ भी देखने को मिलते हैं| तात्पर्य यह कि ये कोई एकदम नए प्रयोग नहीं हैं तथापि इनमें अनुस्यूत अपने समय की पीड़ा अपने समाज के साक्ष्य नवगीत की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए हैं|
गुलाब सिंह जी की कविताई में –खेत ,बाग़ ,किसान की सामाजिक स्थिति गाँव की श्रमशील स्त्रियों के बिम्ब कटी हुई फसलों के साथ नवगीत की पूंजी बन जाते हैं|दूसरी ओर मछली,भात,नदी और पाल के सामंती सवाल भी कवि अपने बिम्बों से हल करने का प्रयत्न करता है| एक अंश देखें-
बांस पर बैठे परिंदे/हवा का रुख भांपते हैं
जब हबेली में लगे/ रंगीन परदे कांपते हैं|
एक शहजादी समय पर /छींट जाती चार दाना
जल है भीतर नदी के/ घाट से हट कर नहाना|( 12-बांस वन और बांसुरी )
पूर्वी अवधी में और भोजपुरी में छींट जाने का जो अर्थ है जबतक वह नही समझा जाएगा तब तक इस गीत बिम्ब को समझना कठिन होगा| दान करना या दक्षिणा स्वरूप अपनी प्रजा को कुछ देना ही छींट जाने का अभिप्राय है| यहाँ यह शब्द ही नहीं बल्कि पूरी दान दक्षिणा देने की परंपरा है उसकी लोक व्यंजना उभर कर सामने आयी है|पूरा नवगीत बिम्ब नए कथ्य के साथ मार्मिक तो है ही लोक व्यंजना के कारण इसमे अतिरिक्त सौन्दर्य की अभिव्यक्ति हो रही है|ऐसे अनेक नवगीत बिम्ब कवि के गीतों को नयी व्यंजना देते हैं-
‘धुले पान सी नर्म हथेली/उभरी हुई लकीरें
तेज छुरी सी साँसें /मन का हराहरापन चीरें|’(21-बांस वन और बांसुरी)
नए बिम्बों को नए कथ्य  और नयी भाषा के साथ जोड़ने का उपक्रम जब गीत की रागात्मकता में ढलता है ,तो नवगीत बनाता है,परन्तु नयापन लाने में तुकांत खोजने में जब कहीं भूल हो जाती है या संतुलन बिगड़ता है तो शिल्प कमजोर हो जाता है|एक अंश देखें-
‘पांवों से उलझी पगडंडी/दूर पड़ाव हुए|
..................................................
अंतरिक्ष से धरती के हों रोज सलाम – दुए |’  (81-बांस वन और बांसुरी) यहाँ गीत तो अपनी जगह है लेकिन ‘सलाम दुए’ प्रयोग मेरे हिसाब से उचित नहीं लगता,क्योकि सलाम दुआ का प्रयोग किया जाता  है | दुआ का बहुवचन दुआएं बनेगा| नवगीत की साधना में कथ्य और शिल्प दोनों का संतुलन बनाना आवश्यक होता है|जहां तक कथ्य की बात है तो गुलाब सिंह जी के गीतों में आंचलिकता का जन पक्ष बखूबी उभरता है सामंती मूल्यों पर एक और मार्किक व्यंग्य देखें-
हाथी पर सोने के हौदे/घोड़े पर चांदी की जीन
दोनों के चलने की खातिर/हम होते हैं सिर्फ जमीन| (82- बांस वन और बांसुरी)
अंतत: वरिष्ठ कवि गुलाब सिंह के नवगीत हमारे नए नवगीतकारों को कथ्य की विस्तृत जमीन लिए दिखाई देतें हैं| उनकी रचनाशीलता का स्वागत है | मुझे लगता है कि सभी आंचलिक और देशज शब्दों को साधकर ही प्रयोग किया जाना चाहिए|

संपर्क - 9868031384,b.mishra59@gmail.com 

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बुधवार, दिसंबर 05, 2018



'मानो पहली बार मिला हूँ '  # भारतेंदु मिश्र 

विज्ञान व्रत 

   'तुमसे जितनी बार मिला हूँ/पहली पहली बार मिला हूँ|'हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में ख़ास तौर पर  छोटी बहर में अपनी मुकम्मल बात कहने वाले मशहूर कवि/शायर  अग्रज विज्ञान व्रत की कुछ ग़जलें दोस्तों के लिए पेश कर रहा हूँ| विज्ञान व्रत जी के अब  तक प्रकाशित 'ग़ज़ल संग्रह' सात हैं। सात संग्रहों में चार संग्रहों के चार संस्करण और एक संग्रह के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।उनकी गजलों में जिस तरह छोटी छोटी दिल को सुकून देने वाली कारीगरी के नक्श उभरते हैं, तकरीबन उसी तरह के नक्श उनकी चित्रकारी में  भी बहुत दिलकश अंदाज से चमकते हुए हमारा दिल और दिमाग अपनी ओर खींच लेते हैं| छोटे छोटे कैनवास पर उनकी तूलिका रंगों से खेलती है तो यह कहना कठिन हो जाता है कि वे शायर बड़े हैं या चित्रकार बड़े हैं| शब्दों को मितव्ययिता  से और रंगों को जिस संयोजन की वास्तविकता से विज्ञान जी प्रस्तुत करते हैं वह काबिले तारीफ़ है| दोस्तों के लिए चुनी हुई  कुछ उनकी ग़ज़लें  उनसे किये गए सवालों के जवाबों और  उनकी पेंटिंग्स के साथ पेश हैं| उनकी किताबें क्रमश:-1   "बाहर धूप खड़ी है "  2   "चुप की आवाज़ "  3  " जैसे कोई लौटेगा 4   "तब तक हूँ 5   " मैं जहाँ हूँ 6   " लेकिन ग़ायब रौशनदान "    7   " याद आना चाहता हूँ " 8 " खिड़की भर आकाश "-(दोहा संग्रह),प्रकाश्य-नवगीत संग्रह - " नेपथ्यों में कोलाहल " और  "इल्ली-गिल्ली,अक्कड़-बक्कड़" :(बाल कवितायेँ ) हैं|

   सवाल जवाब-


भारतेन्दु मिश्र : छोटी बहर की ग़ज़ल का मतलअ और इतनी छोटी बहर की ग़ज़ल कहने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ ?

विज्ञान व्रत: 70 के दशक के अंतिम वर्ष की बात है - शायद फ़रवरी का महीना था मैं सिविल लाइंस दिल्ली में एक दूकान पर पान लेने का इन्तज़ार कर रहा था कि एक पंक्ति दिमाग़ में कौंधी ----
    "सब कुछ एक - बराबर है " ......
उसी क्षण दूसरा मिसरा भी हो गया ! ....
    "कितना झूठ  सरासर है "  
बस क्या था ! मैं पान-वान खाना भूल कर घर की तरफ़ भागा ....
रास्ते में ही ग़ज़ल हो गयी ! घर पहुँच कर वो सारी 'ग़ज़लें' फाड़ कर फेंकीं जो मैं तीन - चार  वर्षों से गोष्ठियों में पढ़कर तथाकथित 'वाहवाही' बटोर रहा था।
हाँ ! तो उस पहली ग़ज़ल का मतलअ यों हुआ -----
       " सब कुछ एक - बराबर है 
         कितना  झूठ   सरासर  है " 
इसके बाद तो सब कुछ आपके समक्ष है ही।

भारतेन्दु मिश्र : सुना है आप नवगीत लिखने की ओर अग्रसर हो गये हैं !

विज्ञान व्रत : जी! नवगीत लिखने की ओर अग्रसर अब नहीं हुआ हूँ,
ग़ज़लों से पहले गीत ही लिखे और लगभग 40-45 , सभी प्रेमगीत थे ! गोष्ठियों में कुछ सुनाये भी और ' श्रोताओं ' ने 
ताली-वाली भी बजायी लेकिन मैंने महसूस किया कि जो मैं कहना चाहता हूँ वह इन गीतों में नहीं है ! इसी वक़्त कुछ ऐसा हुआ कि ग़ज़लों ने मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया। वैसे ग़ज़लों के साथ-साथ मैं छिटपुट गीत भी लिखता रहा लेकिन अब इन गीतों का 'रंग' कुछ और था ! एक ख़ास बात -- इसके बाद मैंने स्वयम् को कभी गीतकार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया और पिछले क़रीब 40 वर्षों में जो गीत ख़ामोशी से काग़ज़ों पर उतरते रहे उन्हीं गीतों का संकलन अब "नेपथ्यों में कोलाहल " के नाम से आ रहा है।


भारतेन्दु मिश्र : दोहों में आपको बेहतरीन सफलता मिली थी फिर दोहों की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़े ? शायद तसल्ली नहीं मिली अपने को मुकम्मल तौर पर कह लेने की !

विज्ञान व्रत : मिश्र जी ! दोहे एक झटके में हो गये थे, अनायास !
वैसे मैंने कभी भी  कोई रचनात्मक कार्य सायास किया भी नहीं।
क़रीब तीन सौ दोहे चार-पाँच दिन में ही हो गये ! आदरणीय 'इन्द्र' जी का आदेश हुआ कि मेरे दोहों का संकलन आना चाहिए वैसे इसके पूर्व आदरणीय प्रो देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' जी द्वारा सम्पादित "सप्तपदी" 6th
में मेरे 101 दोहे संकलित हो चुके थे।  इस तरह 'इन्द्र' के कहने पर मेरा पहला दोहा संकलन "खिड़की भर आकाश" का प्रथम संस्करण 2006 में आया और अब तक इसके चार संस्करण आ चुके हैं !


भारतेन्दु मिश्र : कला की दुनिया में विज्ञान का क्या स्थान है ?

विज्ञान व्रत : कला यानी चित्रकला। जहाँ तक तकनीकी पक्ष का प्रश्न है तो चित्रकला पूर्णत: वैज्ञानिक है लेकिन कल्पना का भी इसमें एक महत्वपूर्ण स्थान है। हाँ यदि 'विज्ञान' का तात्पर्य मेरे नाम से है तो अपने बारे में कुछ भी कहना आत्मश्लाघा होगी लेकिन आपने पूछा है तो इतना कहूँगा कि मेरी कलाकृतियों की 39 एकल - प्रदर्शनियाँ 
देश-विदेश की महत्वपूर्ण कलादीर्घाओं में प्रदर्शित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त देश की सर्वोच्च और प्रतिष्ठित कला अकादमियों में मेरे चित्र प्रदर्शित हो चुके हैं। देश-विदेश के लगभग 25 कलाशिविरों में मेरी सक्रिय भागीदारी रही है। राष्ट्रपति भवन ,  देश की महत्वपूर्ण कलाअकादमियों और देश-विदेश के व्यक्तिगत संग्रहों में मेरे शताधिक चित्र संग्रहीत हैं। और भी काफ़ी कुछ है.......


भारतेन्दु मिश्र : कैनवस और रंग किस तरह के इस्तेमाल करते हैं ?

विज्ञान व्रत : पेन्सिल , काग़ज़ , कैनवस , रंग ( Water colours ,
Oil colours और Acrylic colours ) यानी कला सामग्री के लिये मुझे कभी कोई समझौता नहीं करना पड़ा सदा सर्वश्रेष्ठ सामग्री प्रयोग की।


भारतेन्दु मिश्र : आपकी paintings की प्रदर्शनियाँ कई देशों में लगायी जा चुकी हैं , पुरस्कार आदि भी मिले होंगे। कला अध्यापक के भीतर से यह कलावंत कवि और चित्रकार कब और कैसे 
निकला ?

विज्ञान व्रत : जी ! जैसा मैं पहले कह चुका हूँ -- इटली, फ़्रांस, जर्मनी,  नीदरलैंड, इंग्लैंड, स्विट्ज़रलैंड, मॉरिशस, सिंगापुर, भूटान आदि देशों में मेरी एकल और समूह प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं। जहाँ तक पुरस्कारों का सम्बन्ध है तो मुझे उत्तर प्रदेश की "ललित कला अकादमी" और पंजाब की "Indian Academy of Fine Arts" अमृतसर ने मुझे कई बार पुरस्कृत और सम्मानित किया है। 
भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय ने "Senior Fellowship" से सम्मानित किया है। यह Fellowship चित्रकला क्षेत्र के लिये थी।
साहित्यिक योगदान के लिये मुझे लंदन में "वातायन सम्मान" से नवाज़ा गया , सहारनपुर में "समन्वय सम्मान",
गुरुग्राम में "सुरुचि सम्मान", नाथद्वारा में "साहित्य मण्डल सम्मान",
पंचकुला में "ताज-ए-हिन्दुस्तान", माॅरिशस और सिंगापुर में कई सम्मानों से सम्मानित किया गया।
अब आपका दूसरा प्रश्न -- मिश्र जी !  यह चित्रकार और कवि दोनों  मुझमें बचपन से ही विद्यमान हैं। मुझे याद है वह तस्वीर जो मैंने पहली या दूसरी कक्षा में बनायी थी। तीसरी-चौथी कक्षा में मुझे  स्कूल में  होने वाले कवि-सम्मेलनों को सुनने का चस्का लग गया था। सातवीं-आठवीं कक्षा में ठीक-ठाक तुकबन्दी कर लिया करता था।
उस समय मेरी कविताएँ व्यंग्यात्मक होती थीं जिनके लिये मुझे कई बार डाँट-फटकार और मार भी पड़ी !


भारतेन्दु मिश्र : इन दिनों क्या कर रहे हैं ? सम्मान और यश ख़रीदने वाले लुटेरों और लंपटों से भरी इस दुनिया में कला और कविकर्म से सन्तुष्ट हैं ?

विज्ञान व्रत : आजकल निरन्तर लिख रहा हूँ। 
आने वाले विश्व पुस्तक मेले में मेरी चार पुस्तकें आने वाली हैं ---
दो ग़ज़ल संग्रह, एक नवगीत संग्रह और एक बालगीत संग्रह।
Paintings भी करता रहता हूँ , sketches तो लगभग प्रतिदिन करता हूँ। एक ग़ज़ल संग्रह और एक कविता संग्रह प्रकाशन के लिये तैयार हैं। एक उपन्यास पर कार्य चल रहा है। बीच-बीच में भूमिकाएँ और समीक्षाएँ भी लिखता रहता हूँ।
यश तो किसी के द्वारा किये गये कार्य का प्रतिफल है। पाठकों से जो प्यार मिला उससे आश्वस्त हूँ। कला के क्षेत्र में और लेखन के क्षेत्र में जो भी सम्मान प्राप्त हुए वे सभी स्वयमेव मिले। मैंने कभी भी कोई जुगाड़ न किया है और न कभी करूँगा।
अपनी चित्रकला और कविकर्म से मैं पूर्णतया संतुष्ट हूँ लेकिन  हर चित्र के बाद और साहित्यिक रचना के पश्चात प्रतीत होता है कि अभी श्रेष्ठतर होना है !

      ----
       
कुछ ग़ज़लें
 1.

जब   उन्हें   महसूसता   हूँ
रब   उन्हें    महसूसता   हूँ

मैं  रहा  अहसास  जिनका 
अब   उन्हें   महसूसता   हूँ

अब किसी को क्या बताऊँ
कब   उन्हें   महसूसता   हूँ

आज  जो हस्सास हूँ  कुछ 
तब   उन्हें   महसूसता   हूँ

आज  अपनी  ज़िंदगी का 
ढब   उन्हें   महसूसता  हूँ

   2.            

या  तो  मुझसे  यारी  रख
या  फिर  दुनियादारी रख

जीने   की    तैयारी   रख
मौत से  लड़ना जारी रख

ख़ुद  पर   पहरेदारी  रख
अपनी     दावेदारी    रख

लहजे  में   गुलबारी  रख
लफ़्ज़ों  में   चिंगारी  रख

जिससे  तू  लाचार न  हो
इक   ऐसी  लाचारी  रख
    3.

आपका   आलम    रहा    हूँ
इक  मुजस्सम   ग़म  रहा  हूँ

कब  किसी  से  कम  रहा हूँ
आपका   परचम    रहा    हूँ

आप   भी   मुझमें    रहे   हो
और  यूँ   मैं   'हम'    रहा  हूँ

आप  तो   पहचान   लें    ना
आपका    मौसम   रहा    हूँ

क़द मेरा भी कम न था कुछ 
एहतरामन   ख़म    रहा   हूँ


4.

जुगनू   ही     दीवाने    निकले 
अँधियारा    झुठलाने    निकले 

ऊँचे    लोग    सयाने    निकले 
महलों   में    तहख़ाने   निकले 

वो तो  सबकी  ही  ज़द  में  था
किसके  ठीक  निशाने  निकले 

आहों   का   अंदाज़   नया  था 
लेकिन   ज़ख़्म  पुराने  निकले 

जिनको पकड़ा हाथ समझ कर 
वो     केवल    दस्ताने   निकले 

       5.

सुन  लो   जो   सय्याद   करेगा 
वो    मुझको   आज़ाद   करेगा 

आँखों   ने   ही  कह  डाला  है 
तू   जो   कुछ   इरशाद  करेगा 

एक   ज़माना   भूला    मुझको
एक    ज़माना     याद    करेगा 

काम  अभी   कुछ  ऐसे  भी  हैं
जो   तू   अपने    बाद    करेगा 

तुझको  बिल्कुल  भूल  गया  हूँ
जा   तू   भी  क्या  याद   करेगा



 6.

क्या   बनाऊँ    आशियाँ
कम   पड़ेगा   ये    जहाँ

बिजलियाँ ही बिजलियाँ
और    मेरा    घर    यहाँ

एक  थे     हम   दो  यहाँ
कौन    आया     दरमियाँ

ढूँढ़ते   हो    क्यों    निशाँ
वो   ज़माने    अब   कहाँ

था   जहाँ   से   वो   बयाँ
अब   नहीं   हूँ    मैं   वहाँ

         7.
जो   सदा  से   लामकाँ   है 
वो   मुझे   रखता  कहाँ   है 

ख़ुद   नहीं  महफ़ूज़  है  जो
क्यों    हमारा   पासबाँ    है 

तू  अगर  मंज़िल   नहीं  तो
फिर   मुझे  जाना  कहाँ  है

मिल  चुका  हूँ  आपसे  पर
आपको    देखा    कहाँ   है 

आप   बोलें   या    न   बोलें
आपका    चेहरा    बयाँ    है


   8.
मुस्कुराना     चाहता     हूँ
क्या  दिखाना   चाहता  हूँ

याद  उनको  भी  नहीं  जो
वो    भुलाना    चाहता   हूँ 

जिस मकाँ में  हूँ  उसे  अब 
घर   बनाना    चाहता     हूँ

क़र्ज़  जो  मुझ  पर नहीं  है
क्यों   चुकाना   चाहता   हूँ

आपकी जानिब से ख़ुद को
आज़माना      चाहता     हूँ

  9.

कुछ  नायाब  ख़ज़ाने  रख 
ले    मेरे    अफ़साने    रख 

जिनका   तू   दीवाना    हो 
ऐसे     कुछ    दीवाने   रख 

आख़िर  अपने   घर  में  तो 
अपने    ठौर - ठिकाने   रख 

मुझसे   मिलने - जुलने   को 
अपने   पास   बहाने     रख 

वरना   गुम    हो     जाएगा 
ख़ुद को  ठीक-ठिकाने  रख



10.
घर  तो   इतना  आलीशान 
लेकिन   ग़ायब   रौशनदान 

जब घर में हों सब मेहमान
कौन करे  किसका सम्मान 

बढ़ता   जाता   है   सामान
छोटा    होता   घर- दालान 

घर  है  रिश्तों  से  अनजान 
अपने  घर  में   हूँ   मेहमान 

सारी  बस्ती   एक - समान
किसके घर की  है पहचान 

   11.                

चेहरे   पर    मुस्कान     रखूँ
क्यूँ   फ़ानी    पहचान    रखूँ

जो    तेरा     अरमान     रखूँ
ऐसी    क्या    पहचान    रखूँ 

पहचानूँ    इस    दुनिया   को 
पर   ख़ुद  को   अंजान   रखूँ

खो    जाऊँ     पहचानों     में
क्यूँ    इतनी    पहचान    रखूँ

मैं   हूँ ,   मन है ,   दुनिया   भी 
अब  किस-किसका ध्यान रखूँ

12.










जुगनू   ही     दीवाने    निकले 
अँधियारा    झुठलाने    निकले 

ऊँचे    लोग    सयाने    निकले 
महलों   में    तहख़ाने   निकले 

वो तो  सबकी  ही  ज़द  में  था
किसके  ठीक  निशाने  निकले 

आहों   का   अंदाज़   नया  था 
लेकिन   ज़ख़्म  पुराने  निकले 

जिनको पकड़ा हाथ समझ कर 
वो     केवल    दस्ताने   निकले 

                13.

सुन  लो   जो   सय्याद   करेगा 
वो    मुझको   आज़ाद   करेगा 

आँखों   ने   ही  कह  डाला  है 
तू   जो   कुछ   इरशाद  करेगा 

एक   ज़माना   भूला    मुझको
एक    ज़माना     याद    करेगा 

काम  अभी   कुछ  ऐसे  भी  हैं
जो   तू   अपने    बाद    करेगा 

तुझको  बिल्कुल  भूल  गया  हूँ
जा   तू   भी  क्या  याद   करेगा
*******************************************
प्रस्तुति : भारतेंदु मिश्र