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(गुलाब सिंह -9936379937)
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गुलाब सिंह के नवगीत # भारतेंदु
मिश्र
बैसवारा नवगीत समारोह (नवम्बर
-2018) से लौटते समय अनेक कवियों की जो पुस्तकें मिलीं उनमें गुलाब सिंह जी की दो
पुस्तकें भी शामिल हैं जो मुझे कुछ कहने के लिए प्रेरित कर रही हैं| एक समय था जब
नवगीत में आंचलिक बोध के स्वर बुहत मार्मिक ढंग से उभर रहे थे| ठाकुर प्रसाद सिंह
के नवगीत हिन्दी नवगीत की परंपरा को आगे बढाते हैं| इसी क्रम में देवेन्द्र कुमार
तथा अन्य आंचलिक स्वर के नवगीत साधकों का भी नाम लिया जा सकता है| सत्तर के दशक से
नवगीत सृजन में सक्रिय हुए चर्चित वरिष्ठ नवगीतकार गुलाब सिंह की रचनाएं
डॉ.शंभुनाथ सिंह जी ने ‘नवगीत दशक-2’ में और ‘नवगीत अर्धशती’ में संकलित की थीं|
उनके गीतों में गाँव की प्राकृतिक सुगन्ध अपने मुहावरे के साथ विद्यमान है| जहां
तक मैं समझता हूँ वे मंचीय कविता के प्रपंच से अपनी रचनाशीलता को बचाए रखने में
समर्थ रहे हैं|नवगीत की सही दिशा इसी ओर आगे बढ़ते रहने से दिखाई देती है| एक अंश
देखें-
‘शब्दों के हाथीं पर /ऊंघता
महावत है/गाँव मेरा/लाठी और भैंस की कहावत है|
शीत घाम का वैभव/रातों का
अन्धकार/पकते गुड़ की सुगंध/धुल धुंए का गुबार|
पेट पीठ के रिश्ते ढो रहा
यथावत है|’ ( 25-धूल भरे पाँव)
गुलाब सिंह के अब तक चार
नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जो क्रमश:-धूल भरे पाँव,बांस वन और बांसुरी,जड़ों
से जुड़े हुए’ और ‘कभी मिटती नहीं संभावना’ हैं| उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा जैसे
लोग सुबह शाम नवगीत जोड़ने में लगे रहते हैं वैसा नहीं बल्कि अपने ग्रामीण आंचलिक जीवन
के यथार्थ को रागात्मक स्वर में अपनी आंचलिक जनता यानी किसान और श्रमिक वर्ग के
लिए लिखा| जिसने पूर्वी अवधी वाले आंचलिक गाँव के दृश्य और लोक जीवन को निकट से
नहीं देखा उन्हें गुलाब सिंह के नवगीतों के निहितार्थ को समझाने में कठिनाई हो
सकती है| लेकिन गुलाब सिंह के नवगीत अपने पाठक के सुख दुःख को यथारूप रखने में
समर्थ हैं| एक चित्र देखें-
‘रामदीन/ अंधियारे की कुछ
परतें फाड़ रहे|
खुरपी लेकर/ मरी भैंस की
खाल उतर रहे|’ (35 -धूल भरे पाँव)
नवगीत में इस प्रकार के
चित्र उमाकांत मालवीय,रमेश रंजक,सत्यनारायण,महेश अनघ,कैलाश गौतम, और दिनेश सिंह के यहाँ भी देखने को मिलते हैं| तात्पर्य यह कि
ये कोई एकदम नए प्रयोग नहीं हैं तथापि इनमें अनुस्यूत अपने समय की पीड़ा अपने समाज
के साक्ष्य नवगीत की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए हैं|
गुलाब सिंह जी की कविताई
में –खेत ,बाग़ ,किसान की सामाजिक स्थिति गाँव की श्रमशील स्त्रियों के बिम्ब कटी
हुई फसलों के साथ नवगीत की पूंजी बन जाते हैं|दूसरी ओर मछली,भात,नदी और पाल के
सामंती सवाल भी कवि अपने बिम्बों से हल करने का प्रयत्न करता है| एक अंश देखें-
बांस पर बैठे परिंदे/हवा का
रुख भांपते हैं
जब हबेली में लगे/ रंगीन
परदे कांपते हैं|
एक शहजादी समय पर /छींट
जाती चार दाना
जल है भीतर नदी के/ घाट से
हट कर नहाना|( 12-बांस वन और बांसुरी )
पूर्वी अवधी में और भोजपुरी
में छींट जाने का जो अर्थ है जबतक वह नही समझा जाएगा तब तक इस गीत बिम्ब को समझना
कठिन होगा| दान करना या दक्षिणा स्वरूप अपनी प्रजा को कुछ देना ही छींट जाने का
अभिप्राय है| यहाँ यह शब्द ही नहीं बल्कि पूरी दान दक्षिणा देने की परंपरा है उसकी
लोक व्यंजना उभर कर सामने आयी है|पूरा नवगीत बिम्ब नए कथ्य के साथ मार्मिक तो है
ही लोक व्यंजना के कारण इसमे अतिरिक्त सौन्दर्य की अभिव्यक्ति हो रही है|ऐसे अनेक
नवगीत बिम्ब कवि के गीतों को नयी व्यंजना देते हैं-
‘धुले पान सी नर्म
हथेली/उभरी हुई लकीरें
तेज छुरी सी साँसें /मन का
हराहरापन चीरें|’(21-बांस वन और बांसुरी)
नए बिम्बों को नए कथ्य और नयी भाषा के साथ जोड़ने का उपक्रम जब गीत की
रागात्मकता में ढलता है ,तो नवगीत बनाता है,परन्तु नयापन लाने में तुकांत खोजने
में जब कहीं भूल हो जाती है या संतुलन बिगड़ता है तो शिल्प कमजोर हो जाता है|एक अंश
देखें-
‘पांवों से उलझी पगडंडी/दूर
पड़ाव हुए|
..................................................
अंतरिक्ष से धरती के हों
रोज सलाम – दुए |’ (81-बांस वन और बांसुरी)
यहाँ गीत तो अपनी जगह है लेकिन ‘सलाम दुए’ प्रयोग मेरे हिसाब से उचित नहीं लगता,क्योकि
सलाम दुआ का प्रयोग किया जाता है | दुआ का
बहुवचन दुआएं बनेगा| नवगीत की साधना में कथ्य और शिल्प दोनों का संतुलन बनाना
आवश्यक होता है|जहां तक कथ्य की बात है तो गुलाब सिंह जी के गीतों में आंचलिकता का
जन पक्ष बखूबी उभरता है सामंती मूल्यों पर एक और मार्किक व्यंग्य देखें-
हाथी पर सोने के हौदे/घोड़े
पर चांदी की जीन
दोनों के चलने की खातिर/हम
होते हैं सिर्फ जमीन| (82- बांस वन और बांसुरी)
अंतत: वरिष्ठ कवि गुलाब
सिंह के नवगीत हमारे नए नवगीतकारों को कथ्य की विस्तृत जमीन लिए दिखाई देतें हैं|
उनकी रचनाशीलता का स्वागत है | मुझे लगता है कि सभी आंचलिक और देशज शब्दों को
साधकर ही प्रयोग किया जाना चाहिए|
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