रविवार, दिसंबर 16, 2018


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(गुलाब सिंह -9936379937)


गुलाब सिंह के नवगीत # भारतेंदु मिश्र 




  

बैसवारा नवगीत समारोह (नवम्बर -2018) से लौटते समय अनेक कवियों की जो पुस्तकें मिलीं उनमें गुलाब सिंह जी की दो पुस्तकें भी शामिल हैं जो मुझे कुछ कहने के लिए प्रेरित कर रही हैं| एक समय था जब नवगीत में आंचलिक बोध के स्वर बुहत मार्मिक ढंग से उभर रहे थे| ठाकुर प्रसाद सिंह के नवगीत हिन्दी नवगीत की परंपरा को आगे बढाते हैं| इसी क्रम में देवेन्द्र कुमार तथा अन्य आंचलिक स्वर के नवगीत साधकों का भी नाम लिया जा सकता है| सत्तर के दशक से नवगीत सृजन में सक्रिय हुए चर्चित वरिष्ठ नवगीतकार गुलाब सिंह की रचनाएं डॉ.शंभुनाथ सिंह जी ने ‘नवगीत दशक-2’ में और ‘नवगीत अर्धशती’ में संकलित की थीं| उनके गीतों में गाँव की प्राकृतिक सुगन्ध अपने मुहावरे के साथ विद्यमान है| जहां तक मैं समझता हूँ वे मंचीय कविता के प्रपंच से अपनी रचनाशीलता को बचाए रखने में समर्थ रहे हैं|नवगीत की सही दिशा इसी ओर आगे बढ़ते रहने से दिखाई देती है| एक अंश देखें-
‘शब्दों के हाथीं पर /ऊंघता महावत है/गाँव मेरा/लाठी और भैंस की कहावत है|
शीत घाम का वैभव/रातों का अन्धकार/पकते गुड़ की सुगंध/धुल धुंए का गुबार|
पेट पीठ के रिश्ते ढो रहा यथावत है|’  ( 25-धूल भरे पाँव)
गुलाब सिंह के अब तक चार नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जो क्रमश:-धूल भरे पाँव,बांस वन और बांसुरी,जड़ों से जुड़े हुए’ और ‘कभी मिटती नहीं संभावना’ हैं| उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा जैसे लोग सुबह शाम नवगीत जोड़ने में लगे रहते हैं वैसा नहीं बल्कि अपने ग्रामीण आंचलिक जीवन के यथार्थ को रागात्मक स्वर में अपनी आंचलिक जनता यानी किसान और श्रमिक वर्ग के लिए लिखा| जिसने पूर्वी अवधी वाले आंचलिक गाँव के दृश्य और लोक जीवन को निकट से नहीं देखा उन्हें गुलाब सिंह के नवगीतों के निहितार्थ को समझाने में कठिनाई हो सकती है| लेकिन गुलाब सिंह के नवगीत अपने पाठक के सुख दुःख को यथारूप रखने में समर्थ हैं| एक चित्र देखें-
‘रामदीन/ अंधियारे की कुछ परतें फाड़ रहे|
खुरपी लेकर/ मरी भैंस की खाल उतर रहे|’ (35 -धूल भरे पाँव)
नवगीत में इस प्रकार के चित्र उमाकांत मालवीय,रमेश रंजक,सत्यनारायण,महेश अनघ,कैलाश गौतम,  और दिनेश सिंह  के यहाँ भी देखने को मिलते हैं| तात्पर्य यह कि ये कोई एकदम नए प्रयोग नहीं हैं तथापि इनमें अनुस्यूत अपने समय की पीड़ा अपने समाज के साक्ष्य नवगीत की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गए हैं|
गुलाब सिंह जी की कविताई में –खेत ,बाग़ ,किसान की सामाजिक स्थिति गाँव की श्रमशील स्त्रियों के बिम्ब कटी हुई फसलों के साथ नवगीत की पूंजी बन जाते हैं|दूसरी ओर मछली,भात,नदी और पाल के सामंती सवाल भी कवि अपने बिम्बों से हल करने का प्रयत्न करता है| एक अंश देखें-
बांस पर बैठे परिंदे/हवा का रुख भांपते हैं
जब हबेली में लगे/ रंगीन परदे कांपते हैं|
एक शहजादी समय पर /छींट जाती चार दाना
जल है भीतर नदी के/ घाट से हट कर नहाना|( 12-बांस वन और बांसुरी )
पूर्वी अवधी में और भोजपुरी में छींट जाने का जो अर्थ है जबतक वह नही समझा जाएगा तब तक इस गीत बिम्ब को समझना कठिन होगा| दान करना या दक्षिणा स्वरूप अपनी प्रजा को कुछ देना ही छींट जाने का अभिप्राय है| यहाँ यह शब्द ही नहीं बल्कि पूरी दान दक्षिणा देने की परंपरा है उसकी लोक व्यंजना उभर कर सामने आयी है|पूरा नवगीत बिम्ब नए कथ्य के साथ मार्मिक तो है ही लोक व्यंजना के कारण इसमे अतिरिक्त सौन्दर्य की अभिव्यक्ति हो रही है|ऐसे अनेक नवगीत बिम्ब कवि के गीतों को नयी व्यंजना देते हैं-
‘धुले पान सी नर्म हथेली/उभरी हुई लकीरें
तेज छुरी सी साँसें /मन का हराहरापन चीरें|’(21-बांस वन और बांसुरी)
नए बिम्बों को नए कथ्य  और नयी भाषा के साथ जोड़ने का उपक्रम जब गीत की रागात्मकता में ढलता है ,तो नवगीत बनाता है,परन्तु नयापन लाने में तुकांत खोजने में जब कहीं भूल हो जाती है या संतुलन बिगड़ता है तो शिल्प कमजोर हो जाता है|एक अंश देखें-
‘पांवों से उलझी पगडंडी/दूर पड़ाव हुए|
..................................................
अंतरिक्ष से धरती के हों रोज सलाम – दुए |’  (81-बांस वन और बांसुरी) यहाँ गीत तो अपनी जगह है लेकिन ‘सलाम दुए’ प्रयोग मेरे हिसाब से उचित नहीं लगता,क्योकि सलाम दुआ का प्रयोग किया जाता  है | दुआ का बहुवचन दुआएं बनेगा| नवगीत की साधना में कथ्य और शिल्प दोनों का संतुलन बनाना आवश्यक होता है|जहां तक कथ्य की बात है तो गुलाब सिंह जी के गीतों में आंचलिकता का जन पक्ष बखूबी उभरता है सामंती मूल्यों पर एक और मार्किक व्यंग्य देखें-
हाथी पर सोने के हौदे/घोड़े पर चांदी की जीन
दोनों के चलने की खातिर/हम होते हैं सिर्फ जमीन| (82- बांस वन और बांसुरी)
अंतत: वरिष्ठ कवि गुलाब सिंह के नवगीत हमारे नए नवगीतकारों को कथ्य की विस्तृत जमीन लिए दिखाई देतें हैं| उनकी रचनाशीलता का स्वागत है | मुझे लगता है कि सभी आंचलिक और देशज शब्दों को साधकर ही प्रयोग किया जाना चाहिए|

संपर्क - 9868031384,b.mishra59@gmail.com 

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बुधवार, दिसंबर 05, 2018



'मानो पहली बार मिला हूँ '  # भारतेंदु मिश्र 

विज्ञान व्रत 

   'तुमसे जितनी बार मिला हूँ/पहली पहली बार मिला हूँ|'हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में ख़ास तौर पर  छोटी बहर में अपनी मुकम्मल बात कहने वाले मशहूर कवि/शायर  अग्रज विज्ञान व्रत की कुछ ग़जलें दोस्तों के लिए पेश कर रहा हूँ| विज्ञान व्रत जी के अब  तक प्रकाशित 'ग़ज़ल संग्रह' सात हैं। सात संग्रहों में चार संग्रहों के चार संस्करण और एक संग्रह के दो संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं।उनकी गजलों में जिस तरह छोटी छोटी दिल को सुकून देने वाली कारीगरी के नक्श उभरते हैं, तकरीबन उसी तरह के नक्श उनकी चित्रकारी में  भी बहुत दिलकश अंदाज से चमकते हुए हमारा दिल और दिमाग अपनी ओर खींच लेते हैं| छोटे छोटे कैनवास पर उनकी तूलिका रंगों से खेलती है तो यह कहना कठिन हो जाता है कि वे शायर बड़े हैं या चित्रकार बड़े हैं| शब्दों को मितव्ययिता  से और रंगों को जिस संयोजन की वास्तविकता से विज्ञान जी प्रस्तुत करते हैं वह काबिले तारीफ़ है| दोस्तों के लिए चुनी हुई  कुछ उनकी ग़ज़लें  उनसे किये गए सवालों के जवाबों और  उनकी पेंटिंग्स के साथ पेश हैं| उनकी किताबें क्रमश:-1   "बाहर धूप खड़ी है "  2   "चुप की आवाज़ "  3  " जैसे कोई लौटेगा 4   "तब तक हूँ 5   " मैं जहाँ हूँ 6   " लेकिन ग़ायब रौशनदान "    7   " याद आना चाहता हूँ " 8 " खिड़की भर आकाश "-(दोहा संग्रह),प्रकाश्य-नवगीत संग्रह - " नेपथ्यों में कोलाहल " और  "इल्ली-गिल्ली,अक्कड़-बक्कड़" :(बाल कवितायेँ ) हैं|

   सवाल जवाब-


भारतेन्दु मिश्र : छोटी बहर की ग़ज़ल का मतलअ और इतनी छोटी बहर की ग़ज़ल कहने का सिलसिला कैसे शुरू हुआ ?

विज्ञान व्रत: 70 के दशक के अंतिम वर्ष की बात है - शायद फ़रवरी का महीना था मैं सिविल लाइंस दिल्ली में एक दूकान पर पान लेने का इन्तज़ार कर रहा था कि एक पंक्ति दिमाग़ में कौंधी ----
    "सब कुछ एक - बराबर है " ......
उसी क्षण दूसरा मिसरा भी हो गया ! ....
    "कितना झूठ  सरासर है "  
बस क्या था ! मैं पान-वान खाना भूल कर घर की तरफ़ भागा ....
रास्ते में ही ग़ज़ल हो गयी ! घर पहुँच कर वो सारी 'ग़ज़लें' फाड़ कर फेंकीं जो मैं तीन - चार  वर्षों से गोष्ठियों में पढ़कर तथाकथित 'वाहवाही' बटोर रहा था।
हाँ ! तो उस पहली ग़ज़ल का मतलअ यों हुआ -----
       " सब कुछ एक - बराबर है 
         कितना  झूठ   सरासर  है " 
इसके बाद तो सब कुछ आपके समक्ष है ही।

भारतेन्दु मिश्र : सुना है आप नवगीत लिखने की ओर अग्रसर हो गये हैं !

विज्ञान व्रत : जी! नवगीत लिखने की ओर अग्रसर अब नहीं हुआ हूँ,
ग़ज़लों से पहले गीत ही लिखे और लगभग 40-45 , सभी प्रेमगीत थे ! गोष्ठियों में कुछ सुनाये भी और ' श्रोताओं ' ने 
ताली-वाली भी बजायी लेकिन मैंने महसूस किया कि जो मैं कहना चाहता हूँ वह इन गीतों में नहीं है ! इसी वक़्त कुछ ऐसा हुआ कि ग़ज़लों ने मुझे अपनी गिरफ़्त में ले लिया। वैसे ग़ज़लों के साथ-साथ मैं छिटपुट गीत भी लिखता रहा लेकिन अब इन गीतों का 'रंग' कुछ और था ! एक ख़ास बात -- इसके बाद मैंने स्वयम् को कभी गीतकार के रूप में प्रस्तुत नहीं किया और पिछले क़रीब 40 वर्षों में जो गीत ख़ामोशी से काग़ज़ों पर उतरते रहे उन्हीं गीतों का संकलन अब "नेपथ्यों में कोलाहल " के नाम से आ रहा है।


भारतेन्दु मिश्र : दोहों में आपको बेहतरीन सफलता मिली थी फिर दोहों की राह पर आगे क्यों नहीं बढ़े ? शायद तसल्ली नहीं मिली अपने को मुकम्मल तौर पर कह लेने की !

विज्ञान व्रत : मिश्र जी ! दोहे एक झटके में हो गये थे, अनायास !
वैसे मैंने कभी भी  कोई रचनात्मक कार्य सायास किया भी नहीं।
क़रीब तीन सौ दोहे चार-पाँच दिन में ही हो गये ! आदरणीय 'इन्द्र' जी का आदेश हुआ कि मेरे दोहों का संकलन आना चाहिए वैसे इसके पूर्व आदरणीय प्रो देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' जी द्वारा सम्पादित "सप्तपदी" 6th
में मेरे 101 दोहे संकलित हो चुके थे।  इस तरह 'इन्द्र' के कहने पर मेरा पहला दोहा संकलन "खिड़की भर आकाश" का प्रथम संस्करण 2006 में आया और अब तक इसके चार संस्करण आ चुके हैं !


भारतेन्दु मिश्र : कला की दुनिया में विज्ञान का क्या स्थान है ?

विज्ञान व्रत : कला यानी चित्रकला। जहाँ तक तकनीकी पक्ष का प्रश्न है तो चित्रकला पूर्णत: वैज्ञानिक है लेकिन कल्पना का भी इसमें एक महत्वपूर्ण स्थान है। हाँ यदि 'विज्ञान' का तात्पर्य मेरे नाम से है तो अपने बारे में कुछ भी कहना आत्मश्लाघा होगी लेकिन आपने पूछा है तो इतना कहूँगा कि मेरी कलाकृतियों की 39 एकल - प्रदर्शनियाँ 
देश-विदेश की महत्वपूर्ण कलादीर्घाओं में प्रदर्शित हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त देश की सर्वोच्च और प्रतिष्ठित कला अकादमियों में मेरे चित्र प्रदर्शित हो चुके हैं। देश-विदेश के लगभग 25 कलाशिविरों में मेरी सक्रिय भागीदारी रही है। राष्ट्रपति भवन ,  देश की महत्वपूर्ण कलाअकादमियों और देश-विदेश के व्यक्तिगत संग्रहों में मेरे शताधिक चित्र संग्रहीत हैं। और भी काफ़ी कुछ है.......


भारतेन्दु मिश्र : कैनवस और रंग किस तरह के इस्तेमाल करते हैं ?

विज्ञान व्रत : पेन्सिल , काग़ज़ , कैनवस , रंग ( Water colours ,
Oil colours और Acrylic colours ) यानी कला सामग्री के लिये मुझे कभी कोई समझौता नहीं करना पड़ा सदा सर्वश्रेष्ठ सामग्री प्रयोग की।


भारतेन्दु मिश्र : आपकी paintings की प्रदर्शनियाँ कई देशों में लगायी जा चुकी हैं , पुरस्कार आदि भी मिले होंगे। कला अध्यापक के भीतर से यह कलावंत कवि और चित्रकार कब और कैसे 
निकला ?

विज्ञान व्रत : जी ! जैसा मैं पहले कह चुका हूँ -- इटली, फ़्रांस, जर्मनी,  नीदरलैंड, इंग्लैंड, स्विट्ज़रलैंड, मॉरिशस, सिंगापुर, भूटान आदि देशों में मेरी एकल और समूह प्रदर्शनियाँ लग चुकी हैं। जहाँ तक पुरस्कारों का सम्बन्ध है तो मुझे उत्तर प्रदेश की "ललित कला अकादमी" और पंजाब की "Indian Academy of Fine Arts" अमृतसर ने मुझे कई बार पुरस्कृत और सम्मानित किया है। 
भारत के सांस्कृतिक मंत्रालय ने "Senior Fellowship" से सम्मानित किया है। यह Fellowship चित्रकला क्षेत्र के लिये थी।
साहित्यिक योगदान के लिये मुझे लंदन में "वातायन सम्मान" से नवाज़ा गया , सहारनपुर में "समन्वय सम्मान",
गुरुग्राम में "सुरुचि सम्मान", नाथद्वारा में "साहित्य मण्डल सम्मान",
पंचकुला में "ताज-ए-हिन्दुस्तान", माॅरिशस और सिंगापुर में कई सम्मानों से सम्मानित किया गया।
अब आपका दूसरा प्रश्न -- मिश्र जी !  यह चित्रकार और कवि दोनों  मुझमें बचपन से ही विद्यमान हैं। मुझे याद है वह तस्वीर जो मैंने पहली या दूसरी कक्षा में बनायी थी। तीसरी-चौथी कक्षा में मुझे  स्कूल में  होने वाले कवि-सम्मेलनों को सुनने का चस्का लग गया था। सातवीं-आठवीं कक्षा में ठीक-ठाक तुकबन्दी कर लिया करता था।
उस समय मेरी कविताएँ व्यंग्यात्मक होती थीं जिनके लिये मुझे कई बार डाँट-फटकार और मार भी पड़ी !


भारतेन्दु मिश्र : इन दिनों क्या कर रहे हैं ? सम्मान और यश ख़रीदने वाले लुटेरों और लंपटों से भरी इस दुनिया में कला और कविकर्म से सन्तुष्ट हैं ?

विज्ञान व्रत : आजकल निरन्तर लिख रहा हूँ। 
आने वाले विश्व पुस्तक मेले में मेरी चार पुस्तकें आने वाली हैं ---
दो ग़ज़ल संग्रह, एक नवगीत संग्रह और एक बालगीत संग्रह।
Paintings भी करता रहता हूँ , sketches तो लगभग प्रतिदिन करता हूँ। एक ग़ज़ल संग्रह और एक कविता संग्रह प्रकाशन के लिये तैयार हैं। एक उपन्यास पर कार्य चल रहा है। बीच-बीच में भूमिकाएँ और समीक्षाएँ भी लिखता रहता हूँ।
यश तो किसी के द्वारा किये गये कार्य का प्रतिफल है। पाठकों से जो प्यार मिला उससे आश्वस्त हूँ। कला के क्षेत्र में और लेखन के क्षेत्र में जो भी सम्मान प्राप्त हुए वे सभी स्वयमेव मिले। मैंने कभी भी कोई जुगाड़ न किया है और न कभी करूँगा।
अपनी चित्रकला और कविकर्म से मैं पूर्णतया संतुष्ट हूँ लेकिन  हर चित्र के बाद और साहित्यिक रचना के पश्चात प्रतीत होता है कि अभी श्रेष्ठतर होना है !

      ----
       
कुछ ग़ज़लें
 1.

जब   उन्हें   महसूसता   हूँ
रब   उन्हें    महसूसता   हूँ

मैं  रहा  अहसास  जिनका 
अब   उन्हें   महसूसता   हूँ

अब किसी को क्या बताऊँ
कब   उन्हें   महसूसता   हूँ

आज  जो हस्सास हूँ  कुछ 
तब   उन्हें   महसूसता   हूँ

आज  अपनी  ज़िंदगी का 
ढब   उन्हें   महसूसता  हूँ

   2.            

या  तो  मुझसे  यारी  रख
या  फिर  दुनियादारी रख

जीने   की    तैयारी   रख
मौत से  लड़ना जारी रख

ख़ुद  पर   पहरेदारी  रख
अपनी     दावेदारी    रख

लहजे  में   गुलबारी  रख
लफ़्ज़ों  में   चिंगारी  रख

जिससे  तू  लाचार न  हो
इक   ऐसी  लाचारी  रख
    3.

आपका   आलम    रहा    हूँ
इक  मुजस्सम   ग़म  रहा  हूँ

कब  किसी  से  कम  रहा हूँ
आपका   परचम    रहा    हूँ

आप   भी   मुझमें    रहे   हो
और  यूँ   मैं   'हम'    रहा  हूँ

आप  तो   पहचान   लें    ना
आपका    मौसम   रहा    हूँ

क़द मेरा भी कम न था कुछ 
एहतरामन   ख़म    रहा   हूँ


4.

जुगनू   ही     दीवाने    निकले 
अँधियारा    झुठलाने    निकले 

ऊँचे    लोग    सयाने    निकले 
महलों   में    तहख़ाने   निकले 

वो तो  सबकी  ही  ज़द  में  था
किसके  ठीक  निशाने  निकले 

आहों   का   अंदाज़   नया  था 
लेकिन   ज़ख़्म  पुराने  निकले 

जिनको पकड़ा हाथ समझ कर 
वो     केवल    दस्ताने   निकले 

       5.

सुन  लो   जो   सय्याद   करेगा 
वो    मुझको   आज़ाद   करेगा 

आँखों   ने   ही  कह  डाला  है 
तू   जो   कुछ   इरशाद  करेगा 

एक   ज़माना   भूला    मुझको
एक    ज़माना     याद    करेगा 

काम  अभी   कुछ  ऐसे  भी  हैं
जो   तू   अपने    बाद    करेगा 

तुझको  बिल्कुल  भूल  गया  हूँ
जा   तू   भी  क्या  याद   करेगा



 6.

क्या   बनाऊँ    आशियाँ
कम   पड़ेगा   ये    जहाँ

बिजलियाँ ही बिजलियाँ
और    मेरा    घर    यहाँ

एक  थे     हम   दो  यहाँ
कौन    आया     दरमियाँ

ढूँढ़ते   हो    क्यों    निशाँ
वो   ज़माने    अब   कहाँ

था   जहाँ   से   वो   बयाँ
अब   नहीं   हूँ    मैं   वहाँ

         7.
जो   सदा  से   लामकाँ   है 
वो   मुझे   रखता  कहाँ   है 

ख़ुद   नहीं  महफ़ूज़  है  जो
क्यों    हमारा   पासबाँ    है 

तू  अगर  मंज़िल   नहीं  तो
फिर   मुझे  जाना  कहाँ  है

मिल  चुका  हूँ  आपसे  पर
आपको    देखा    कहाँ   है 

आप   बोलें   या    न   बोलें
आपका    चेहरा    बयाँ    है


   8.
मुस्कुराना     चाहता     हूँ
क्या  दिखाना   चाहता  हूँ

याद  उनको  भी  नहीं  जो
वो    भुलाना    चाहता   हूँ 

जिस मकाँ में  हूँ  उसे  अब 
घर   बनाना    चाहता     हूँ

क़र्ज़  जो  मुझ  पर नहीं  है
क्यों   चुकाना   चाहता   हूँ

आपकी जानिब से ख़ुद को
आज़माना      चाहता     हूँ

  9.

कुछ  नायाब  ख़ज़ाने  रख 
ले    मेरे    अफ़साने    रख 

जिनका   तू   दीवाना    हो 
ऐसे     कुछ    दीवाने   रख 

आख़िर  अपने   घर  में  तो 
अपने    ठौर - ठिकाने   रख 

मुझसे   मिलने - जुलने   को 
अपने   पास   बहाने     रख 

वरना   गुम    हो     जाएगा 
ख़ुद को  ठीक-ठिकाने  रख



10.
घर  तो   इतना  आलीशान 
लेकिन   ग़ायब   रौशनदान 

जब घर में हों सब मेहमान
कौन करे  किसका सम्मान 

बढ़ता   जाता   है   सामान
छोटा    होता   घर- दालान 

घर  है  रिश्तों  से  अनजान 
अपने  घर  में   हूँ   मेहमान 

सारी  बस्ती   एक - समान
किसके घर की  है पहचान 

   11.                

चेहरे   पर    मुस्कान     रखूँ
क्यूँ   फ़ानी    पहचान    रखूँ

जो    तेरा     अरमान     रखूँ
ऐसी    क्या    पहचान    रखूँ 

पहचानूँ    इस    दुनिया   को 
पर   ख़ुद  को   अंजान   रखूँ

खो    जाऊँ     पहचानों     में
क्यूँ    इतनी    पहचान    रखूँ

मैं   हूँ ,   मन है ,   दुनिया   भी 
अब  किस-किसका ध्यान रखूँ

12.










जुगनू   ही     दीवाने    निकले 
अँधियारा    झुठलाने    निकले 

ऊँचे    लोग    सयाने    निकले 
महलों   में    तहख़ाने   निकले 

वो तो  सबकी  ही  ज़द  में  था
किसके  ठीक  निशाने  निकले 

आहों   का   अंदाज़   नया  था 
लेकिन   ज़ख़्म  पुराने  निकले 

जिनको पकड़ा हाथ समझ कर 
वो     केवल    दस्ताने   निकले 

                13.

सुन  लो   जो   सय्याद   करेगा 
वो    मुझको   आज़ाद   करेगा 

आँखों   ने   ही  कह  डाला  है 
तू   जो   कुछ   इरशाद  करेगा 

एक   ज़माना   भूला    मुझको
एक    ज़माना     याद    करेगा 

काम  अभी   कुछ  ऐसे  भी  हैं
जो   तू   अपने    बाद    करेगा 

तुझको  बिल्कुल  भूल  गया  हूँ
जा   तू   भी  क्या  याद   करेगा
*******************************************
प्रस्तुति : भारतेंदु मिश्र 


          

बुधवार, नवंबर 21, 2018


समीक्षा

‘नई सदी के नवगीत की भूमिका’

डॉ.भारतेंदु मिश्र

‘होटल वाले लड़के दिनभर /पुडिया पान चबाते हैं|’ -(राम नारायण रमण -पृ.67 खंड 4,नई सदी के नवगीत) ‘अधनंगे अधभूखे /बचपन की गिनती/जाने किस रेखा के ऊपर नीचे है’| -(जगदीश पंकज-पृ.119 वही)‘कुछ अपनों को कुहनी मारी/कुछ रिश्तों पर पाँव धरे/यो हमने सोपान चढ़े |’(संध्या सिंह,पृ.170 –वही)
इसी प्रकार नई सदी के और भी अनेक नवगीतकारों की रचनाशीलता नई सदी के नवगीत की भूमिका रच रही है,जिनमें कुछ के नाम क्रमश:- राम किशोर दहिया,रामचरन राग,रामशंकर वर्मा,मालिनी गौतम,योगेन्द्र वर्मा व्योम ,आनंद तिवारी,संजय शुक्ल,शशिपुरवार,कल्पना मनोरमा,राजा अवस्थी,रोहित रसिया,भावना तिवारी अवनीश सिंह चौहान,अवनीश त्रिपाठी,चित्रांश बाघमारे तक सब नवगीत के नए मुहावरे और नयी भाषा चेतना को लेकर आगे बढ रहे हैं इन सभी से नवगीत को बहुत आशाएं हैं| जो पहले से ही चर्चित और विख्यात हो चुके हैं उनका नाम लेना मैं बहुत आवश्यक नहीं समझता,उनकी रचनाशीलता से नवगीत की धारा यहाँ तक प्रवाहित होकर आयी है| नई संचेतना वाले नवगीत आज लिखे जा रहे हैं जिनका स्वागत है| इस दिशा में डॉ.ओमप्रकाश सिंह द्वारा संपादित और आयोजित ये पांच खण्डों वाली श्रंखला नवगीत की अविकल रचनाशीलता के संकलन की दृष्टि से अपने आप में महत्वपूर्ण है परन्तु किन्ही कारणों से संपादन और संपादकीयों को पढ़कर शोध दृष्टि से जितना आश्वस्त होना चाहिए उतना इसका महत्त्व नहीं बन पाया | इसमें मंचीय गीतकार और नवगीतकार सब एक साथ शामिल किये गए हैं| तात्पर्य यह कि जिनके सरोकार और जिनकी निष्ठा पूरी तरह से नवगीत की परिवर्तन कामी चेतना से नहीं जुडी है उन्हें भी नवगीतकारों में शामिल कर लिया गया है | यह चेष्टा मेरी दृष्टि में न तो डॉ.शंभुनाथ सिंह जी को ही मंजूर थी और न नवगीत के हित में है,क्योकि मंचीय गीतकारों की मंच लपकने के अलावा अन्य कोई निष्ठा नहीं होती| दूसरी ओर बहुत से नई सदी के प्रतिनिधि नवगीतकार इस श्रंखला में नहीं शामिल हैं|समवेत संकलनों की नवगीत में एक लम्बी परंपरा है लेकिन ‘नवगीत दशकों’ के प्रकाशन के बाद से ही नवगीतकारों ने उसे विवादित बना दिया था|फिर उसमें मंचीय गैर मंचीय तथा पूरब पश्चिम और मुजफ्फरपुर स्कूल,बनारस स्कूल तथा दिल्ली स्कूल जैसे खेमों के अलावा तरह तरह की जाति बिरादरी वाली घटिया खेमेबाजी के चलते नवगीत आन्दोलन को नवगीतकारों ने ही क्षति पंहुचाई है| प्राय: नवगीतकारों ने ही इस प्रकार के संग्रह भी तैयार किये हैं इसलिए उनके अपने जातीय और स्थानीय संकोच और सीमाएं भी रह जाती हैं| नवगीत दशक,1,2,3 में जो नियम और शर्तें तब शंभुनाथ जी ने रखी थीं|वे किसी हद तक बहुत काम की हैं,उनपर अभी विस्तार से विचार किया जाना चाहिए| आदरणीय  इन्दीवर जी ने डॉ.शंभुनाथ सिंह जी पर और नवगीत दशकों को लेकर जो महत्वपूर्ण कार्य किया है वह कदाचित इस दिशा में महत्त्व का होगा|
  डॉ.ओमप्रकाश सिंह जी की इस योजना में संकलित होने के लिए जो कुछ नवगीतकार इस प्रकार के सभी आयोजनों में शामिल होने के लिए तत्पर रहते हैं, वे यहाँ भी स्वत: प्रस्तुत हैं | नई सदी के पिछले सात आठ वर्षों में नवगीत के अनेक समवेत संकलन प्रकाशित हुए हैं परन्तु एक बात जो सब जगह दिखाई देती है वह यह कि संपादन चाहे  देवेन्द्र शर्मा इंद्र जी कर रहे हों,निर्मल शुक्ल कर रहे हों,नचिकेता, राधेश्याम बंधु ,योगेन्द्र दत्त शर्मा कर रहे हों या ओमप्रकाश सिंह कर रहे हों,एक जैसे ही रचनाकार और अधिकाँश एक जैसे ही नवगीत हैं,किन्तु एक  समय था कि डॉ.शंभुनाथ सिंह जी ने अनेक नवगीतकारों को सकारण शामिल नहीं किया था| इसलिए उनका संचयन अधिक प्रामाणिक और नवगीत की दिशा को आगे तक ले जाने वाला साबित हुआ| बहुत समय से इस प्रकार के समवेत संकलन नवगीत कवि निकालते आ रहे हैं|यह कोई नया उपक्रम नहीं है लेकिन इस बहाने कुछ नए नवगीतकारों को क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया गया है यह इस योजना की शक्ति है| इन पचहत्तर नवगीतकारों के अलावा भी कुछ नवगीतकार हैं जो किसी कारण से इस योजना में शामिल नहीं हो सके लेकिन उनकी रचनाशीलता नई सदी को और नवगीत की समग्र चेतना को प्रभावित करती है| संपादक ने जिन्हें शामिल नहीं किया या जो स्वत: शामिल नहीं हुए उनकी सूची के साथ ही उनके रचनात्मक अवदान पर सकारात्मक टिप्पणी दी जाती तो शोधार्थियों के लिए सुविधा होती|
 अपनी ओर से तमाम नए रचनाकारों को नवगीत की दृष्टि से संग्रहीत करने का महत्वपूर्ण कार्य डॉ.ओमप्रकाश सिंह जी ने किया है इसके लिए उन्हें बधाई|यह कतई सहज कार्य नहीं है,तथापि यह संग्रह है ये संचयन नहीं बन सका, जबकि डॉ.शंभुनाथ सिंह जी की ‘नवगीत दशक योजना’ संचयन के अंतर्गत आती है| नवगीत संग्रह तो बहुत से आ चुके हैं- तीनो दशकों के बाद ‘नवगीत अर्धशती’ ‘यात्रा में साथ साथ’,नवगीत एकादश,जैसे संकलन आये जिनमें रचना संचयन की एक पद्धति अपनाई गयी थी|जिनमे संचयन को लेकर एक तर्क दिया गया था| बाद में कन्हैयालाल नंदन जी ने साहित्य अकादमी के मंच से ‘श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन’ निकाला ’गीतों के सार्थवाह’ -श्याम निर्मम,,गीत शती-रामस्वरूप सिन्दूर,और निर्मल शुक्ल द्वारा संपादित –शब्दायन,नचिकेता का-गीतवसुधा आदि संकलन मात्र हैं| नंदन जी ने संचयन शब्द मात्र का प्रयोग किया था संचयन की प्रक्रिया उनके पास भी नहीं थी| हमें संकलन और संचयन का अर्थ और अंतर भी समझना होगा|संकलन में सभी प्रकार की रचनाएं संग्रहीत कर ली जाती हैं लेकिन संचयन में संपादक को रचनाएँ चुनकर उन्हें विषयवस्तु के अनुरूप विश्लेषित करना होता है और  तार्किक विवेचन द्वारा कुछ रचनाओं को खारिज भी करना पड़ता है| प्रामाणिकता की दृष्टि से बहुधा संचयन के लिए एक टीम बनाकर कार्य करना होता है| अब इस योजना में देवेन्द्र शर्मा इंद्र,नचिकेता,सुधांशु उपाध्याय, महेश कटारे सुगम,शैलेन्द्र शर्मा ,मनोज जैन मधुर,देवेन्द्र सफल, के अलावा रायबरेली के ही भाई विनय भदौरिया और ‘रमाकांत’ आदि की रचनाओं का संकलन नहीं किया गया है, हो सकता है मेरी तरह इनमें से कई कवि  स्वत: शामिल न हुए हों| तथापि मैं इन्हें भी नई सदी का प्रतिनिधि नवगीतकार मानता हूँ,इन सब में नई सदी के प्रतिनिधि नवगीतकार होने की भरपूर संभावना भी  हैं| मेरा यह मानना है कि अक्सर जो रचनाएँ सहज रूप से सतह पर तैरती हुई मिल जाती हैं विमर्श की दृष्टि से वे ज्यादा महत्त्व की नहीं होतीं| हमारी चिंता नवगीत के विमर्श को आगे बढाने की है,कौन शामिल है कौन नहीं यह गौण  विषय है|इस कार्य को समीचीन ढंग से किया जाता तो इस योजना की उपयोगिता और बढ़ जाती|मुझे डॉ.साहब ने दो खंड क्रमश: चार और पांच समीक्षार्थ भेजे हैं| उनके इस भागीरथ प्रयास का स्वागत है परन्तु मेरी दृष्टि में इस योजना में संपादन संबंधी कुछ  कमियाँ हैं जो रचनाकारों की ओर से नहीं बल्कि संपादन में परिलक्षित होती हैं-उनका उल्लेख अनुचित न होगा|
 नई सदी के सामाजिक मूल्यों पर संपादकीय टिप्पणी में जिस प्रकार विस्तार से सोदाहरण  चर्चा होनी चाहिए थी उसकी झलक चौथे और पांचवें खंड की भूमिकाओं में नहीं दिखती है|हालांकि पहले के खंड मैंने नहीं देखे| तथापि नई सदी के सामाजिक –सांस्कृतिक-राजनीतिक –वैज्ञानिक-आर्थिक और मनोवैज्ञानिक मूल्य केवल विक्सित ही नहीं हुए बल्कि पिछली सदी से पर्याप्त भिन्न भी हैं,विकास की इस भिन्नता को लेकर उत्तर आधुनिकता के बाद की समकालीनता पर चर्चा की जानी चाहिए| समग्र कविता ही नहीं जीवन के रूपाकार भी बदले हैं| स्त्री विमर्श दलित विमर्श और हमारे समय की किसान चेतना आदि जो नए समय की चुनौतियाँ है उनपर भी संपादकीय में सोदाहरण विचार नहीं किया गया|
 कुछ रचनाकार पिछली सदी में ही अपनी सर्वस्व अर्थात रचानात्मक ऊर्जा नवगीत को देकर विख्यात हो चुके हैं,वे न शामिल किये जाते तो  इसका महत्त्व अतिक्त बढ़ जाता| यदि शामिल करना ही था तो नई सदी के नए मुहाबरे और समकालीन मूल्यों के आधार पर विश्लेशित करके उनकी रचनाओं का चयन किया जाना चाहिए था|पचहत्तर के बजाय पन्द्रह नवगीतकार ही चुने जाते और नई सदी की रचनाशीलता के मूल्य व्याख्यायित किये जाते तो नवगीत विधा का विशेष लाभ होता| नए नवगीतकार जो नई सदी यानी वर्ष 2000 के बाद नवगीत में आये उनका उल्लेख या उनकी रचनाशीलता का उल्लेख ही इस योजना का अभिप्रेत होता तो उचित होता| नए पुराने सब को शामिल करने से नई सदी के  नवगीत की रचनात्मक भूमि अस्पष्ट हो गयी है| नई सदी की विषय वस्तु और रचाव में पर्याप्त नवाता है जो कहीं कहीं दिखाई देती है और संकलित कई नवगीतकारों में नजर नहीं आती|
  रचनात्मक कालक्रम का भी ध्यान संपादक को रखना चाहिए था जो नहीं रखा गया है| इस दृष्टि से समीक्षक की कठिनाई बढ़ गयी है| मेरी दृष्टि में आयु की वरिष्ठता के हिसाब से रचनात्मकता की वरिष्ठता उल्लेखनीय होती है| बहुत से नवगीतकार 60 वर्ष की आयु के बाद नवगीत में सक्रिय  हुए तो उन्हें हम यश मालवीय से पहले क्रम पर कैसे रख सकते हैं ? अर्थात वास्तविक आयु और नवगीत सृजन की आयु में अंतर दिखाई देना चाहिए था| यह क्रम निर्णय कवियों के प्रकाशित नवगीत संग्रहों अथवा उनकी रचनाओं की प्रकाशन तिथि के कालक्रम के आधार पर तय किया जाना चाहिये,न कि उनकी वास्तविक आयु से|इस रचनात्मकता के कालक्रम से  यदि कवियों को प्रस्तुत किया जाता तो यह संकलन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता | उदाहरण के लिए अभिनेता आमिर खान की उम्र से ज्यादा उम्र का कोई  व्यक्ति बाद में अभिनय के क्षेत्र  में आ जाता है तो अभिनय की बात करते समय क्या उसे हम आमिर खान से पहले रखेंगे ? और यदि कोई रख भी दे तो उसकी रचानात्मक वरिष्ठता स्वीकार कौन करेगा ? इसीप्रकार सभी अन्य कलाओं के क्षेत्र में समझना चाहिए| रचनात्मक अनुभव की उम्र और वास्तविक उम्र दो अलग अलग चीजें हैं| मुझे लगता है इस विषय पर हम सबको और विचार करना चाहिए|
 चौथे खंड में नई सदी के मूल्यों पर विचार करते समय बिना नवगीत के उद्धरणों के ही नवगीत संबंधी विचारों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है लेकिन वहीं संपादक जी ने पृष्ठ 28 पर अपना ही एक नवगीत अंश उद्धरण के रूप में प्रस्तुत किया है इसके स्थान पर अन्य 74 नवगीतकारों में से कुछ अन्य  उद्धरण होते  तो बात और प्रामाणिक लगती| दूसरी ओर कुछ मंचीय कवियों द्वारा गीत नवगीत के अंतर पर बहस जारी रखने का भी अब महत्त्व नहीं रहा गया है| ज्यादातर आत्मकथ्यों में नवगीत क्या है यही बात स्पष्ट करने की ललक दिखाई देती है| यह समझाने के लिए बार बार जो तमाम तर्क दिए गए हैं उनका भी अब बहुत महत्त्व नहीं रह गया है| इसके अलावा चौथे खंड की भूमिका में पृ-14 पर डॉ.राजेश सिंह के कथन का उद्धरण दिया गया है| यद्यपि उनकी नवगीत आलोचना की पुस्तक – ‘समकालीन नवगीत का विकास’ मैंने नहीं देखी|इस पुस्तक का प्रकाशन वर्ष और प्रकाशक आदि का विवरण भी दिया जाता तो अच्छा होता|
अधिक अच्छा होता कि इस योजना में न शामिल होने वाले जिन रचनाकारों का उल्लेख पाचवें खंड में पृ-38 पर किया गया है,उन पर भी सोदाहरण बात की जाती| यदि उनकी रचनाशीलता भी नई सदी के नवगीत को प्रभावित करती है तो उनपर केन्द्रित एक अलग से टिप्पणी तो होनी चाहिए थी| ताकि शोधार्थियों को स्पष्ट हो जाता कि जो कुछ श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ नवगीतकार इस योजना में शामिल नहीं हुए वो भी नई सदी के मूल्यों के नवगीत रच रहे हैं|
 .आज की तारीख में या वर्ष 2018 में  लिखा प्रत्येक नवगीत नई सदी का नवगीत कैसे हो सकता है ?इस बात पर जो विचार किया जाना चाहिए वह भी समुचित ढंग से नहीं हो पाया है|सोशल मीडिया पर नवगीत को लेकर बहुत काम किया जा चुका है और किया जा रहा है उसे नजरअंदाज करना कतई उचित नहीं है| उसका भी उल्लेख संपादकीयों में नहीं है| | पूर्णिमा वर्मन जी की इंटरनेट पत्रिका अनुभूति में हजारों नवगीत और अनेक नवगीत विषयक समीक्षात्मक  आलेख भी प्रकाशित  हो चुके हैं| ‘नवगीत की पाठशाला’ ‘नवगीत विमर्श’ जैसे अन्य इंटरनेट पर बने नवगीत समूह नवगीत की रचनाशीलता को गहरे तक प्रभावित कर रहे हैं| महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी वि.वि. की वेब साईट ‘हिन्दी समय’ पर भी नवगीत  और नवगीतकारों का संचयन संकलन प्रकाशित किया गया है| ‘हिन्दी विकीपीडिया’ आदि मंचों से पूरी दुनिया में नवगीत की पहचान बनी है| इसीप्रकार अभी दो वर्षों से भाई रामकिशोर दहिया का व्हाट्सेप ग्रुप –‘संवेदनात्मक आलोक’ जैसे आयोजन नवगीत के लिए किये गए तो इस प्रकार के सकारात्मक परिश्रम को संपादकीयों में एकदम नजरअंदाज कर दिया गया है| मैंने पहली बार कई नए युवा नवगीतकारों को इसी सोशल मीडिया के माध्यम से पढ़ा और जाना| वास्तव में ये फेसबुक,ब्लॉग,नेट पत्रिकाएँ आदि सब सोशल मीडिया के उपादान भी नई सदी के नवगीत की रचनाशीलता को गहरे तक प्रभावित कर रहे हैं| अच्छी, कम अच्छी कवितायेँ कहीं भी हो सकती हैं| वर्ष 2009 से लगातार मैं भी ‘छन्दप्रसंग’ ब्लॉग पर अनेक समीक्षात्मक आलेख और समीक्षाएं प्रकाशित करता आ रहा हूँ|
अंतत: मेरा मानना है कि जब हम ‘नयी सदी के नवगीत’  पर बात कर रहे हैं तो संपादन में सम्मिलित नवगीतकारों पर भी विस्तार से टिप्पणी करना अवश्यक था| बिना समुचित कारण के कुछ लोगों को शामिल कर लिया जाएगा तो एक भ्रम की स्थिति बन ही जाती है| उदाहरण के लिए नब्बे के दशक में देवेन्द्र शर्मा इंद्र जी ने ‘सप्तपदी ’  योजना बनायी हममें से अधिकाँश छंदोबद्ध कवि उसमें शामिल भी थे| हर खंड में सात दोहाकार शामिल किये गए लेकिन उसे विस्तार देने के चक्कर में ऐसे कई नए पुराने कवियों से दोहे लिखवाकर संख्या पूरी करनी पडी| परिणाम ये हुआ कि सप्तपदी जैसी नए दोहों की महत्वपूर्ण योजना से जिससे दोहे की नई रचनाशीलता का श्रीगणेश हुआ था, वह अनावश्यक विस्तार देने के चक्कर में असंतुलित हो गयी | इसप्रकार  दोहों की सर्जना भूमि विक्सित होने के साथ ही छिन्न भिन्न भी होने लगी| संपादक का कार्य वास्तविक रूप में यश देने वाला तभी  हो सकता है जब संपादक तटस्थ होकर विषय के साथ न्याय करे|मुझे लगता है कि ‘नई सदी के नवगीत’ को लेकर नवगीतकारों का जमावड़ा खडा कर लेने से काम नहीं चलेगा| संपादक को बताना होगा कि जिन लोगों ने कई दशक पूर्व नवगीत की परंपरा विकसित और  पल्लवित की थी नई सदी के दौर में भी वे किस प्रकार नवगीत के प्रतिनिधि हैं ?  इनमें संकलित अधिकाँश नवगीतकारों को मैं उन्हें नवगीत की गौरवशाली परंपरा में देखता हूँ| इसीलिए मुझे लगता है कि यदि रचनाओं के भीतर घुस कर देखा जाय तो इन ७५ नवगीतकारों में से अनेक मंचीय गीतकार,पारंपरिक गीतकार और पुराने ढंग की गीत चेतना दुहराने वाले नवगीतकार भी मिलेंगे|
 चौथे और पांचवे खण्डों की भूमिका लिखते समय  संपादक जी ने नवगीत की आलोचना और समीक्षा से जुड़े लोगों के बारे में भी सही ढंग से विचार नहीं किया है| डॉ. राजेन्द्र गौतम की समीक्षा और उनकी विख्यात पुस्तक –‘नवगीत उद्भव और विकास’ या उनके बाद में लिखे गए आलेखों का जिक्र किया जाना चाहिए था जिसका शताधिक शोधग्रंथों और आलोचना पुस्तकों में  उल्लेख किया जा चुका है| मुझे लगता है कि नवगीत की आलोचना के क्षेत्र में नाम उल्लेखनीय हो चुका है| विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जी के संपादन में ‘दस्तावेज’ का नवगीत अंक प्रकाशित हुआ था|इसके अलावा नई सदी में 2005 के बाद प्रकाशित माहेश्वर तिवारी जी के संपादन में –उ.प्र.हिन्दी संस्थान की पत्रिका-साहित्य भारती’ का नवगीत अंक,मधुकर अस्थाना जी के संपादन में आया - ‘अपरिहार्य’ का नवगीत विशेषांक भी संपादक को इस योजना को क्रियान्वित करने से पहले देखना चाहिए था | लगभग तीन दशकों से मैं भी गीत नवगीत की रचनाशीलता को देख रहा हूँ| अनेक संयोग मिले जब डॉ.ओमप्रकाश सिंह जी के साथ नवगीत पर विमर्श में शामिल भी रहा हूँ| उनकी किताब पर टिप्पणी भी की | बैसवारा से जुड़ा होने के नाते उनका स्नेह भी मिलता रहा|परन्तु प्रसन्नता इस बात की है कि मेरे भी अनेक तर्क उनके संपादकीय में बिना मेरे नाम के शामिल कर लिए गए हैं|
अंतत: चिंता है तो नई सदी के नवगीत की दिशा की है| शायद इसीलिए हम सब एकत्र हुए हैं|नई पीढी हमसे अधिक सजग और तार्किक है|आज भले ही लोग सामने खड़े होकर सवाल न करे लेकिन इस संग्रह की सार्थकता को लेकर ऐसे कई सवाल अवश्य उठ रहे हैं,उठेंगे और उठने भी चाहिए जो जाति धर्म और स्थानीय प्रश्नों से बहुत ऊपर हैं क्योकि आज नवगीत हिन्दी कविता की अन्तरराष्ट्रीय विधा है|संपादकीयों में अपनी ही पुस्तकों के सन्दर्भ देना और नवगीत दशकों की भूमिकाओं का सन्दर्भ अथवा अन्य आलोचकों का सन्दर्भ न दिया जाना भी मेरे लिए आश्चर्य की वस्तु है| काश यह जल्दबाजी में बनायी गयी महत्वाकांक्षी योजना नवगीत संग्रह के रूप में न होकर रचनाशीलता के आधार पर नए नवगीत की खोज और उसके संचयन पर केन्द्रित होती|कुछ कवियों के चित्र चिपकाए जाने के कारण वैचित्र्य भी प्रस्तुत करने लगे हैं| कवियों के चित्र न होते तो भी उनके नवगीतों में उनका चेहरा चमकता रहता| चाहे पचहत्तर की जगह पन्द्रह ही रह जाते तो उन्हें हम नई सदी के नवगीत की नयी पीढी का प्रतिनिधि मान लेते| बहरहाल मेरा मानना है कि नवगीत नवता की व्याकरण लेकर आगे बढ़ रहा है| चौथे और पांचवे खंड के अनेक नवगीतकार नई सदी की नवगीत चेतना का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते बल्कि नए मुहावरे को लेकर आश्वस्त भी करते हैं पर इनका भी संपादकीय में समुचित विश्लेषण किया जाता तो और अच्छा होता| साहित्य हो या जीवन समय के अनुरूप उसकी आलोचना भी होनी चाहिए | इसी तथ्य को युवा नवगीतकार चित्रांश बाघमारे के शब्दों रख कर अपनी बात समाप्त कर रहा हूँ-
पिता से भी बड़ा ओहदा /पुत्र जब से पा गया है
एक पूरा युग खिसक कर/ हाशिये पर आ गया है|- (चित्रांश बाघमारे-पृ.229 खंड 5 ,न.सदी के नवगीत)
तो नवगीत के रचाव और संवेदना में भी पीढ़ियों का अंतर आया है कुछ लोग भले ही पचास वर्ष पहले  श्रेष्ठ नवगीतों के जनक रहे हों लेकिन आज उनमें से कुछ लोग हाशिये पर भी आ गए हैं| समीक्षा के लिए ये पड़ताल जरूरी है|

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