शनिवार, अप्रैल 25, 2020

काव्याख्यान :(भारतेंदु मिश्र की लम्बी कवितायेँ )

 दो टिप्पणियाँ -- राजेन्द्र नागदेव, रमेश प्रजापति  

समीक्षा-1 



'जीवन की सहस्र धाराओं का स्फुटित आख्यान
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                                          - रमेश प्रजापति

साहित्यकार भारतेंदु मिश्र जी का ताज़ा कविता संग्रह "काव्याख्यान" नाम से अनुज्ञा बुक्स प्रकाशन  दिल्ली से आया है। संग्रह में कुछ आख्यानधर्मी यानी लम्बी कविताएं हैं.. इस संग्रह की कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के अटूट सम्बंध को चित्रित किया गया है. संग्रह को प्रख्यात आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी को समर्पित किया गया है। 
     इस संग्रह की कविताएं जहां मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत हैं वहीं जन सरोकारों से भी लबालब है। इतना ही नहीं कुछ ऐतिहासिक जन श्रुतियों को भी आधार बना कर लिखी गई इन कविताओं में जीवन की सहस्र धाराएं स्फुटित हो रही हैं। प्रकृति चेतना और जन चेतना से युक्त इन कविताओं में कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी जीवन्त किया गया है।' मैं डीयर पार्क हूँ कविता'' प्रसिद्ध आलोचक और डीयर पार्क के स्तम्भ बाबा बिसनाथ अर्थात डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी  के व्यक्तित्व और जीवन शैली को बखूबी चित्रित करती है।" समुद्र का सहस्र फण" कविता सुनामी से प्रभावित पाराद्वीप की व्यथा कथा है..
          " समुद्र चुरा ले गया कश्तियाँ और जाल
            मछलियों के पिता ने निगल लिए 
            न जाने कितने मछुआरों के वंश
            पड़ी रह गईं छुंछी सीपियाँ और गूँगे शंख
            उसने सोख ली जीवन की सारी ऊर्जा।""
     " गढ़ सिरसी:महंतों की प्रेतात्माएं" कविता गढसिरसी गाँव की यात्रा की कुछ ऐतिहासिक स्थानों को देखकर उपजी कविता है जन कथाओं से उपजे कुछ वीभत्स सत्य भी शामिल हैं जैसेकि स्त्री जीवन की विडम्बनाएं, धर्म की आड़ में मनुष्यता पर चोट है। असंख्य अत्याचारों के बावजूद मनुष्यता ही विजयी होती है-
           " धर्म की सत्ता सिद्ध करने की फिराक में
             उजड़ ही जाते हैं मन्दिर
             अभिशप्त आत्माएं यह नहीं जानतीं
             कि मनुष्य धर्म से बड़ा होता है
             और मनुष्यता की नींव पर 
              मन्दिर खड़ा होता है।"
  अत: भारतेंदु मिश्र की इन कविताओं में भाषा की ताज़गी और जीवन की बयार है...कवि के यहां पहाड़ों के वैभव है उनकी ख़बसूरती है और साथ ही जीवन की कुछ यादें हैं यात्रा संस्मरणात्मक यह कविता अपने कथ्य से प्रभावित करती है।'

समीक्षक- राजेन्द्र नागदेव

समीक्षा#
##स्मृतियों का आख्यान
पुस्तक- काव्याख्यान
लेखक- डा. भारतेन्दु मिश्र

वरिष्ठ साहित्यकार डा. विश्वनाथ त्रिपाठीजी को उनके अस्सीवें जन्मदिन पर समर्पित यह पुस्तक अवधी एवंहिन्दी के सुपरिचित कवि-कथाकार डा भारतेन्दु मिश्र की लम्बी कविताओंका संग्रह है ऐसी कविताएँ सम्प्रति नगण्य ही लिखी जा रहीं हैं। लंबी कविताओं में कुछ तत्व अपरिहार्य होते हैं। कविता के अंत तक तारतम्य बनाए रखना चुनौती भरा कार्य होता है। इसीतरह उसमे पूरी कविता के पठन के दौरान पाठक की रुचि बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होताहै। संभवत: इसी कारण लंबी कविताओं की परंपरा समाप्त सी हो गई है। ऐसे में यह संग्रहआश्वस्त करता है कि अभी संभावनाएँ शेष हैं। भारतेन्दुजी ने इस क्षेत्र को छुआ है यहस्वागत योग्य है।
समीक्ष्य पुस्तक में सात लंबी कविताएं संग्रहित हैं जिनमे से तीन ‘बतकही में तैरते दोहे’, ‘गढ़ सिरसी’ और ‘कविप्रिया की थिरकनें’ कवि द्वारा की गईं यात्राओं पर आधारित हैं। उनमे कवि मन पर पड़े यात्रा-प्रभाव गहनता के साथ चित्रित हैं। ‘शिवताण्डव’और ‘आविष्कार हूँ’ संस्कृति और दर्शन पर आधारित हैं। ‘समुद्र का सहस्रफण’ सुनामी संबंधी है। संग्रह की सर्वाधिक लंबी और विशिष्ट कविता है ‘मैं डीयरपार्क हूँ’।हर कविता में एक आख्यान है। कवि ने इन्हें आख्यानधर्मी कविताएँ कहते हुए संग्रह का नाम ही काव्याख्यान रखा है।
लेखक की संस्कृत संबंधी पृष्ठभूमि कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित है।कविताओं को अलग-अलग विषयों की प्रकृति के अनुकूल उपयुक्त शब्द-संयोजन एवंअभिव्यक्ति में दक्षता के साथ ढाला गया है। ‘शिवताण्डव’ कविता में अजस्र प्रवाह एवं ओज है। ताण्डव की विभीषिका को अभिव्यक्त करती उपयुक्त शब्दावली का प्रयोग है। यहाँ पाठक का साक्षात्कार शाब्दिक ताण्डव से हो रहा है। अचूक, सटीक शब्दों और शब्दयुग्मों का प्रयोग है। उदाहरण-
“इधर उधर लहराता था/बाघम्बर धारे सर्पजाल/उन पर शोभित था मुंडमाल/नर्तन
के क्षण घर्षण होता/जब मुण्ड-मुण्ड टकराते थे/घनघोर घनेरी घटा बीच/ पलभर प्रकाश भर
जाते थे” ( ‘शिवताण्डव’ पृ 20)।
दो कविताएँ ‘मैं डीयर पार्क हूँ’ और ‘शिवताण्डव’ विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करतीं हैं। प्रथम कविता में दिल्ली के दिलशाद गार्डन स्थित ‘डीयर पार्क’ का मानवीकरण है। यह पार्क द्वारा वर्णित उसका आत्मकथ्य है। यह पार्क हिंदी साहित्य जगत में अपरिचित नहीं है। इसकी गतिविधियों की चर्चा अक्सर फेसबुक और अन्य
इलेक्ट्रानिक माध्यमों में होती रहती है। इस सबसे लंबी कविता में पार्क अपने भौतिक,साहित्यिक और सामाजिक रूपों में मूर्तिमंत हो उठा है। यह कविता वहाँ के ‘बतकहीमण्डल’-जो साहित्यकारों का मिलन अड्डा है- के सदस्यों के स्वभाव, रुचियों, व्यवहार आदि को काव्य-दर्पण में प्रदर्शित करती है और आसपास चल रही गतिविधियों को यथार्थ रूप में व्यक्त करती है।
‘गढ़ सिरसी’ शीर्षक कविता में कभी वैभवशाली रहे महंतों के भवनों के खण्डहर हो जाने का जीवंत चित्रण है- ‘उस अष्टभुजाकार कक्ष में/ जहां रहते थे महंत / लोटते हैं कुत्ते/ लिख दिया
है अब उस पर किसी ने/ ‘कुत्ते का कमरा’/ अब वहाँ कोई सविधान नहीं /शेष हैं कबूतर और उनकी गुटर गूं / फड़फड़ाते हैं चमगादड़/बावड़ी की दीवारों को तोड़ कर/उग रहे हैं बरगद और पीपल/बची हैं दिवंगत महंतों की समाधियाँ’ (‘गढ़ सिरसी’ – पृ-32)
‘कविप्रिया की थिरकनें’ कविता की ये पंक्तियाँ पाठक को आज भी सहजता से अतीत में ले जातीं हैं। “आज भी झनझनाते हैं घुंघरू/गमकता है तबला/फूटती है स्वर लहरी/आरोह के साथ/गति यति अवरोह में/ श्रुति और विराम/ सब कुछ बजता है/अविराम बजता है बियाबान/गूंजते हैं सदियों के सन्नाटे/थिरकती हैं सदियों की चुप्पियाँ” (पृ- 24)
छंदमुक्त शैली में होते हुए भी कवियाओं में छांदिक कविताओं की सी लय है जो पाठक को अंत तक बाँधे रहती है। जैसा रचनाकार अपनी संक्षिप्त भूमिका में कहते हैं ये कविताएं आख्यानधर्मी हैं। लंबी कविताओं में आख्यानधर्मिता संभवत: स्वत: ही आ जाती है, अन्यथा उनके मात्र भिन्न- भिन्न काव्य अंशों का संग्रह मात्र हो जाने का खतरा पैदा हो जाता है। उनमे तारतम्य बनाए रखना कठिन हो जाता है। ये कविताएं उस दोष से मुक्त हैं।हर कविता के आरंभ में विख्यात चित्रकार संदीप राशिनकर के उत्कृष्ठ भावपूर्ण अमूर्तन शैली के रेखांकन हैं। वे पुस्तक को अतिरिक्त सौष्ठव प्रदान करते हैं।
यह एक वरिष्ठ कवि की पठनीय-संग्रहणीय  पुस्तक है।
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पुस्तक- ‘काव्याख्यान’ (कविता), लेखक- डा भारतेन्दु मिश्र
पृष्ठ संख्या- 72, मूल्य- रु 125/-
प्रथम संस्करण- 2020
प्रकाशक- अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं 1E, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032
लेखक- डा. भारतेन्दु मिश्र
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समीक्षा -2
जीवन की सहस्र धाराओं का स्फुटित आख्यान
- रमेश प्रजापति
रमेश प्रजापति - कविता कोश
साहित्यकार भारतेंदु मिश्र जी का ताज़ा कविता संग्रह "काव्याख्यान" नाम से अनुज्ञा बुक्स प्रकाशन दिल्ली से आया है। संग्रह में कुछ आख्यानधर्मी यानी लम्बी कविताएं हैं.. इस संग्रह की कविताओं में प्रकृति और मनुष्य के अटूट सम्बंध को चित्रित किया गया है. संग्रह को प्रख्यात आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी को समर्पित किया गया है।
इस संग्रह की कविताएं जहां मानवीय संवेदना से ओत-प्रोत हैं वहीं जन सरोकारों से भी लबालब है। इतना ही नहीं कुछ ऐतिहासिक जन श्रुतियों को भी आधार बना कर लिखी गई इन कविताओं में जीवन की सहस्र धाराएं स्फुटित हो रही हैं। प्रकृति चेतना और जन चेतना से युक्त इन कविताओं में कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को भी जीवन्त किया गया है।' मैं डीयर पार्क हूँ कविता'' प्रसिद्ध आलोचक और डीयर पार्क के स्तम्भ बाबा बिसनाथ अर्थात डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी जी के व्यक्तित्व और जीवन शैली को बखूबी चित्रित करती है।" समुद्र का सहस्र फण" कविता सुनामी से प्रभावित पाराद्वीप की व्यथा कथा है..
" समुद्र चुरा ले गया कश्तियाँ और जाल
मछलियों के पिता ने निगल लिए
न जाने कितने मछुआरों के वंश
पड़ी रह गईं छुंछी सीपियाँ और गूँगे शंख
उसने सोख ली जीवन की सारी ऊर्जा।""
" गढ़ सिरसी:महंतों की प्रेतात्माएं" कविता गढसिरसी गाँव की यात्रा की कुछ ऐतिहासिक स्थानों को देखकर उपजी कविता है जन कथाओं से उपजे कुछ वीभत्स सत्य भी शामिल हैं जैसेकि स्त्री जीवन की विडम्बनाएं, धर्म की आड़ में मनुष्यता पर चोट है। असंख्य अत्याचारों के बावजूद मनुष्यता ही विजयी होती है-
" धर्म की सत्ता सिद्ध करने की फिराक में
उजड़ ही जाते हैं मन्दिर
अभिशप्त आत्माएं यह नहीं जानतीं
कि मनुष्य धर्म से बड़ा होता है
और मनुष्यता की नींव पर
मन्दिर खड़ा होता है।"
अत: भारतेंदु मिश्र की इन कविताओं में भाषा की ताज़गी और जीवन की बयार है...कवि के यहां पहाड़ों के वैभव है उनकी ख़बसूरती है और साथ ही जीवन की कुछ यादें हैं यात्रा संस्मरणात्मक यह कविता अपने कथ्य से प्रभावित करती है।

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