रविवार, सितंबर 27, 2015

दिसम्बर 1984 की बात है युवारचनाकार मंच द्वारा 'दस दिशाएं' शीर्षक एक काव्य संकलन हमने प्रकाशित किया था संपादन मैने ही किया था।उसके लोकार्पण के लिए बाबू जी से आग्रह किया गया उन्होने हिन्दी भवन आने मे कुछ स्वास्थ्य के कारण असमर्थता जतायी तो हम युवारचनाकारो ने उन्हे उनके घर जाकर किताब लोकार्पित कराने के लिए तैयार कर लिया।उन्होने निसंकोच इसके लिए अपनी स्वीकृति दे दी।हमलोग मिठाई भी ले गये थे तो उसके लिए नाराज भी हुए लेकिन बाद मे सबको स्नेह सहित बैठाया। उस स्मृति के दो चित्र मुझे पुराने अलबम मे मिल गये।आगामी वर्ष 2016 उनका जन्मशती वर्ष भी है।बहरहाल दोस्तो के लिए पद्मभूषण पंडित अमृतलाल नागर जी का पावन स्मरण एक कविता के साथ-
अपनेपन की भाषा
भारतेन्दु मिश्र
 
बाबू जी के पानदान से
खाया था जो पान
भूला नही कभी
उनकी वो रसभीनी मुस्कान
तुकबन्दी करने का बस
कुछ शौक चढा था
उनसे मिलकर
बस उनको छू भर लेने का
नशा चढा था
बडी बडी आंखे थी उनकी
बहुत बडा दरवाजा भी था- मन भी था
बडी हवेली थी
लेकिन बस गली चौक की
थी संकरी
मन के संकोचो सी
साथ हमारे थे आवारा
युवा मित्र कुछ
युवा मंच के सारे साथी जा पहुंचे थे
उस दिन उनके घर
अपनी किताब लेकर
बहुत खुश हुए थे बाबू जी
हमे देखकर
जैसे कोई खुश होता है
घर का बूढा
मुस्काता जैसे
किसान नित नई फसल पर
बाबू जी ने हम सबको विधिवत बैठाया
खुलकर बातें कीं पढीस की
शर्मा जी की और निराला की
बीच बीच मे आ जाते थे
बातो मे यशपाल
ऐसे वैसे नही
बडे फक्कड थे अमृतलाल
नागर तो
भाषा की अंगुली पकड बने थे
बूंद बडा है या समुद्र
यह समझ न पाया
मानस को जो हंस मिला
उसने भी भटकाया

नाचा बहुत गोपाल
थिर हुई मन की आशा
सुधियो मे जलती रहती है
अपनेपन की भाषा ।



2 टिप्‍पणियां:

  1. सही समय पर बहुत अच्छी अभिव्यक्ति। धरोहर चित्रों के साथ। बधाई।

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  2. शुक्रिया भाई,नागर जी से की गयी बातचीत भी खोज रहा हूं उसका भी उपयोग किया जाएगा।

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