रविवार, अक्तूबर 30, 2011

निराला जयंती पर पुनर्पाठ हेतु



गीत निराला के

भारतेन्दु मिश्र

युग बीत गया,निराला की कविता नही रीती। वो आज भी प्रासंगिक हैं उनके गीत कालजयी हैं। छन्दोबद्ध कवियों को निराला से बहुत कुछ सीखना है। सन-1923 में निराला का पहला कविता संग्रह –अनामिका- प्रकाशित हुआ। अनामिका में ही अधिवास शीर्षक एक कविता है जिसमें निराला कहते हैं-
मैने मै शैली अपनायी
देखा दुखी एक निज भाई
दुख की छाया पडी हृदय में झट उमड वेदना आयी।
यह कविता सन 1923 या उससे कुछ पहले की ही होनी चाहिए,बहरहाल निराला की कविता का प्रयोजन उनकी इन्ही पंक्तियों से साफ झलकता है कि निराला दुखदग्ध मनुष्य की वेदना के कवि हैं। असल में निराला करुणा के कवि हैं। सरोज स्मृति हिन्दी का पहला शोक गीत है। घनघोर शोक की दशा में भी निराला छन्द नही तोडते। वे दुख को गरल समझकर पी जाने वाले सिद्ध कवि हैं। वे असहाय दीन दुखियों के दुखों के गीतकार हैं। यह वह समय था जब अधिकांश रचनाकार स्वतंत्रता की लडाई के गीत लिख रहे थे। हालाँकि कुछ कवि धर्म और दर्शन की पहेलियाँ सुलझाने में भी लगे थे।निराला की इसी जमीन पर पढीस और बंशीधर शुक्ल जैसे किसान चेतना के कवि भी इसी समय में हुए। यह वह समय था जब भारतीय जीवन मे बहुत तेजी से बदलाव हो रहे थे,लेकिन निराला ने छन्द नही छोडा बल्कि वो तो नए से नए छन्दविधान को स्वर देने मे लगे थे। अत: निराला छन्द साधना के कवि हैं। जब वो कहते हैं -मैने मैं शैली अपनायी- तो इसका अर्थ यही है कि वो अपने समय के छायावादी कवियों से हटकर अपना मार्ग बना रहे थे। यहीं से उनकी मौलिकता का अन्दाज लगाया जा सकता है। निराला के इसी वाक्य को लेकर कुछ आलोचको ने उन्हे छन्दमुक्त कविता का प्रवर्तक और स्वच्छन्दतावादी कवि सिद्ध करने की कोशिश की है,जबकि यह पूरा सच नही था। यदि ऐसा होता तो निराला छन्दहीन कविताएँ ही रचते रहते। निराला तो संवाद धर्मी गीत लिख रहे थे।
-बाँधों न नाव इस ठाँव बन्धु /पूँछेगा सारा गाँव बन्धु। जैसे अनेक गीत निराला ने रचे हैं।किसान चेतना और ग्राम्य जीवन के बहुत से चित्र निराला के गीतों की शक्ति बनकर उभरते हैं ।
निराला की रचनावली में जो कविताएँ संकलित हैं उन्हे देखकर यह साफ हो जाता है कि वे अंततक छन्दोबद्ध कविताएँ ही लिखते रहे,बल्कि निराला नए छन्दो का सृजन भी करते रहे। कविता की अखण्ड लय ही निराला की साधना का मूल है। वे उन विरल कवियो में से हैं जिन्हे संगीत का भी पूरा ज्ञान है। वे राग रागनियों में निबद्ध गीतो की रचना भी करते हैं। उनके अनेक गीतों का सुर ताल सधा हुआ है। वे पक्के राग मे भी गाये जाते हैं। वे सहज रूप मे ही नवगीत की परिभाषा देते हुए चलते हैं-
नवगति नव लय ताल छन्द नव
नवल कंठ नव जलद मन्द्र रव
नव नभ के नव विहग वृन्द को
नव पर नव स्वर दे।..वरदे वीणावादिनि वर दे।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री ने अपनी पुस्तक –अनकहा निराला- मे इस बात पर विशेष बल दिया है और निराला के गीतों मे प्रयुक्त रागों की विस्तार से चर्चा करते हुए वे कहते हैं-‘वैसे तो निराला जी ने चित्र और संगीत हीन एक पंक्ति भी नही लिखी ,किंतु कभी कभी उनमें कुछ ऐसा लोकोत्तर अनोखापन आ गया है कि देखते ही बनता है। पृ.194(अनकहा निराला) निराला महाप्राण हैं क्योकि उनके गीतो में दीन जन के प्राण बजते हुए सुने जा सकते हैं। निर्धन लाचार लोगों की पीडा का स्वर उनके गीतो मे सुना जा सकता है। वे छायावाद के निरे सुकुमार कवि नही हैं,वे रहस्यवाद के चमत्कारी कवि भी नही हैं।वे तो प्रगतिशील चेतना के गीतकार हैं।छायावादोत्तर -नवगीत,जनगीत आदि अनेक प्रगतिशील आन्दोलनो को उर्वर भूमि निराला के गीतों से ही मिलती है। संवेदना का जो मार्मिक विस्तार निराला अपने गीतों द्वारा कर चुके हैं उससे बहुत कुछ आगे हमारे गीतकार नही बढ पाये हैं।वैचारिक स्तर पर निराला समाज के अतिदीन दुखी दलित और अंतिम पंक्ति मे खडे व्यक्ति के दुखों की समीक्षा ही नही करते बल्कि सामंतों को टोकते हुए चलते हैं।सन 1929 के आसपास लिखे गये गीत का अंश देखिए-
छोड दो जीवन यों न मलो
ऐठ अकड उसके पथ से तुम रथ पर यों न चलो।
यह पूरा गीत उस समय के सामंतवादी ठाठ के खिलाफ आम आदमी के साथ खडे हुए निराला की गवाही देता है।यह है निराला की काव्य चेतना सामंतवादी ऐठ अकड के खिलाफ दलित जन का समर्थन करती है। निराला यहाँ सच्चे समाजवादी दिखाई देते हैं।दीन दुखी जन के हित में निराला किसी हठयोगी की तरह डटे हुए दिखाई देते हैं तो कहीं ईश्वर से प्रार्थना करते हुए तुलसी जैसे संत कवियों के समीप खडे मिलते हैं- दलित जन पर करो करुणा दीनता पर उतर आये प्रभु तुम्हारी शक्ति अरुणा। ध्यान देने की बात यह है कि निराला का भक्तिभाव स्वर्ग मोक्ष प्राप्त करने वाला नही है। वे तो अपने सब संचित फल लुटाने वाले हैं।भिक्षुक शीर्षक कविता भी उनकी प्रारम्भिक कविताओ में है। भिक्षुक की लाचारी का इतना सजीव चित्रण सम्भवत:हिन्दी कविता में निराला से पहले अन्यत्र नही मिलता। कलेजे के दो टुकडे करने वाला मार्मिक डृश्य अपना कलेजा चीर कर निराला देखते हैं और दिखाते हैं। करुणा ही चीत्कार करती है निराला की कविता में। इस पूरी कविता को पढने के बाद उनके समय की भुखमरी से उत्पन्न लाचारी का स्पष्ट आकलन किया जा सकता है। निराला का भिक्षुक आजकल जैसा पेशेवर भिखारी नही है-
वह आता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता
पथ पर आता।
भीख माँगने वाले आज भी कम नही हुए हैं बल्कि पेशेवर हो गये हैं। विचारधाराएँ और सरकारें दमतोड चुकी हैं। निराला के भिक्षुक के मन में पश्चात्ताप है। यह बोध ही उसे पेशेवर भिखारियो से अलग करता है। शायद इसीलिए निराला की करुणा फूटकर बह निकली है। निराला कल्पना की कोई गुलाबी उडान के कवि नही हैं। वे असल मे जनकवि भी हैं,महाप्राणत्व की प्रतिष्ठा भी उन्ही में है। यह कविता निराला के श्रेष्ठ प्रगीतो में से एक है। निराला अपने समय में छायावादी रोमानियत को फलाँग कर आगे बढे हैं। अपने समय मे वैचारिक स्तर पर आगे बढना ही तो प्रगतिशीलता है। किसी दल की सदस्यता लेकर किसी खेमे मे शामिल होकर निराला प्रगतिशील नही बने, बल्कि वे तो प्रगति शीलता के अग्रदूत हैं। इसी क्रम में पत्थर तोडती महिला बिम्ब देखें-
वह तोडती पत्थर
देखते देखा उसे मैने इलाहाबाद के पथ पर।
हिन्दी में इस तरह की छान्दसिक कविताएँ निराला से पहले नही लिखी गयीं जिनमें मज्दूर महिला का श्रम सौन्दर्य अंकित हो। ऐसे प्रगीत लिखना तो बहुत बडी साधना की बात है। उनके गीतो मे बिम्बो और प्रतीको के भटकाऊ जंगल नही हैं। उनकी कविताओ में अंत:सलिला की तरह लय धडकती है। वे सीधी सादी भाषा में सुकोमल और भीषण संवेदना के मर्मस्पर्शी कवि हैं। इसी लिए जानकीवल्लभ शास्त्री उन्हे विरोधो के सामंजस्य का कवि कहते हैं। सुकोमल संवेदना की सहज अभिव्यक्ति की दृष्टि से प्रणय और दाम्पत्य के विरल गीत अपने समय में निराला ने रचे हैं,गृहरति व्यंजना का स्वर देखें-
सुख का दिन डूबे डूब जाय
तुमसे न सहज मन ऊब जाय।
खुल जाय न गाँठ मिली मन की
लुट जाय न राशि उठी धन की
सारा जग रूठे रूठ जाय।
जहाँ सहज सौन्दर्य की उन्नत राशि है और जिस दाम्पत्य में एक मन के साथ दूसरे मन की गाँठ कसी है वह बना रहे बेशक काल्पनिक या अनिर्वचनीय सुख का दिन डूबता है तो डूब जाये। फिर तो निराला सारी दुनिया की भी बात नही मानते। दाम्पत्य बोध का ऐसा सुन्दर गीत अन्यत्र हिन्दी मैने नही पढा। इसी प्रकार एक और गीत में दाम्पत्य बोध का निराला का यही स्वर दृष्टव्य है निराला यहाँ भी अपने समकालीनों से अलग अपनी पहचान के साथ खडे हैं-
जैसे हम हैं वैसे ही रहें लिए हाथ एक दूसरे का अतिशय सुख के सागर में बहें।
एक और चित्र देखें-
पिय के हाथ जागाये जागी
ऐसी मैं सो गयी अभागी।
सहयोग साहचर्य और बहुत कुछ संत मत के निकट के सुन्दर चित्र निराला की कविता मे साफ तौर से दिखाई देते हैं जो अपनी सहजता और अनुभूति के कारण आकर्षक लगते हैं। निराला बहुआयामी कवि हैं उनकी कविता के अनेक स्तर हैं उनकी कविता के अनेक स्वर हैं। वो किसी एक विचार या विचारधारा में बँधकर नही चलते। जो नई राह बनाते हैं वो बनी बनायी राह पर कैसे चल सकते हैं। हम कह सकते हैं कि निराला वसुधैव कुटुम्बकं के कवि हैं। जानकीवल्लभ शास्त्री के अनुसार-“ निराला अद्वैतवादी भी हैं,द्वैतवादी भी हैं,भक्त भी हैं और ज्ञानी भी और क्रांतिकारी भी,लौह प्रहार तथा ललकार भी और और आत्म परमात्म मिलन की मधुर झंकार भी।वह वैयक्तिक अनुभूतियों के स्वर्ग में विचरने वाला मुक्त विहग भी हैऔर पतनोन्मुख रूढ प्रिय संस्कृति की विहग बालिका के लिए भयंकर बाज भी,उसमें लौकिक प्रेम की ललक भी है और आध्यात्मिक भूमि पर अनुभूति का आत्मपुलक भी,निराला विरोधों का स्वयं सामंजस्य और सामंजस्यो का विरोध हैं।“ (पृ.117 अनकहा निराला)
यहाँ साफ शब्दों मे कहें तो निराला सिद्ध रचनाकार साबित होते हैं। वो कुशल रचनाकार की तरह सब विचार धाराओ मे से जन्नोन्मुखी संवेदना का चुनाव करते हैं। कुछ कबीर की तरह ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर’ वाली मुद्रा में। अपनी इन्ही विशेषताओ के कारण निराला आधुनिक युग के विशिष्त और युग प्रवर्तक कवि हैं।उनके गीतो को भी मार्क्स,फ्रायड,लोहिया या विवेकानन्द ,अम्बेडकर अथवा गान्धी में से किसी एक की विचारधारा से जोडकर नही देखा जा सकता। निराला इन सभी अपने समय के महापुरुषों के विचारों को सुन समझकर अपनी राह बनाते हैं सम्भवत: इसी लिए वो कहते हैं-“मैने मैं शैली अपनायी”। निराला को जब जो अपने रचनासमय के लिए उपयुक्त जान पडा उसे गृहण किया और जो अनुपयुक्त जान पडा उसे छोड दिया।
निरला की रचनावली और विशेषकर आराधना में प्रकाशित गीतों को पढने से लगता है निराला भक्त कवि हैं।निराला के गीतों मे सूर तुलसी मीरा आदि भक्त कवियों की सी संवेदना की तडप विद्यमान है।यद्यपि वो धार्मिक कर्मकाण्ड वाली आस्था के कवि नही हैं जहाँ एक ओर कहीं वो अपने गीतों में नाम जपने का संकेत देते हैं तो वहीं दूसरी ताल ठोककर खडे होते हैं। राम की शक्ति पूजा में निराला की ओजस्विता और काव्य शक्ति की अनेक भंगिमाएँ स्पष्ट होती हैं तो दूसरी ओर उनके अनेक गीत सहजा भक्ति के मार्ग का अवलम्बन करते हैं। उदाहरणार्थ-

नाचो हे रुद्र ताल/आँचो जग ऋजु अराल।
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दुख के सुख पियो ज्वाला/शंकर के स्मर-शर की हाला।
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कामरूप हरो काम/जपूँ नाम राम-राम।
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वरदे वीणा वादिनि वर दे
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भारति जय विजय करे/कनक शस्य-कमल धरे।

यह अपने निजी सुख स्वार्थ पूर्ति या स्वर्ग सुख की कामना या ईस्वर से वरदान माँगने की निरी मानवीय मुद्रा नही है। यह निराला का युगधर्म भी है और व्यक्तिगत जीवन का सत्य भी। निराला के गीतो के पुनर्पाठ और नयी पाठचर्या की आवश्यकता है। उनकी छन्दसिक रचनाएँ ही उनके मनोभावो के भेद खोल सकती हैं। वे निरे
प्रयोगवादी भी नही हैं। निराला साफ करते हैं अपने भक्ति भाव को और कहते हैं-
नर जीवन के स्वार्थ सकल
बलि हों तेरे चरणो पर माँ
मेरे श्रम संचित सब फल।
आम तौर पर भक्ति और प्रगति दोनो पृथक मार्ग हैं किंतु निराला की भक्ति में उनकी प्रगतिशीलता साफ नजर आती है-जब वो कहते हैं नर जीवन के स्वार्थ सकल अर्थात मनुष्य जीवन के असंख्य छोटे बडे व्यक्तिगत स्वार्थ सबका बलिदान करता हूँ। इसके आगे कहते हैं–श्रम संचित सब फल-अर्थात अपने परिश्रम से अर्जित कर्मफल का ही अर्पण है। किसी अन्य पूर्वज या अनुज द्वारा अर्जित किसी फल या सम्पदा की बात नही कर रहे हैं निराला क्योकि मनुष्य का अपने श्रम द्वारा अर्जित फल पर ही नैतिक अधिकार होता है। इसके बदले में किसी फल की कामना तो है ही नही । हम इसे निराला की राष्ट्रीय चेतना के रूप में भी व्याख्यायित कर सकते हैं। तात्पर्य यह कि निराला के गीतो में कथ्य और संवेदना के जितने स्तर हैं कदाचित ही किसी दूसरे कवि के पास हों। अत: यह मान लेना कि केवल वैचारिकता के आग्रह में निराला ने छन्द तोड दिया,सही नही है। इस बात को स्वयं उनके गीत ही प्रमाणित करते हैं जहाँ वो नए शिल्प में नयी लय लेकर उपस्थित होते हैं। निराला अपनी सर्जना से तमाम छन्दविरोधियों को उत्तर देते है जैसे शक्ति पूजा में उन्होने राम को सन्देश दिलाया है-“आराधन का दृढ आराधन से दो उत्तर।“ वो सिद्धावस्था के जाग्रत कवि हैं। इसी लिए निराला नयी कविता ही नही नवगीत,जनगीत जैसे आन्दोलनो के प्रेरणा पुरुष के रूप में देखे जाते हैं। नवगीत जनगीत जैसे आन्दोलनो की जो पृष्ठभूमि सन 1950 के आसपास तैयार हो रही थी निराला उस दिशा में 1943 मे ही सार्थक प्रयोग कर चुके थे। बाद में अणिमा में संकलित उनका यह गीत देखिए-
चूँकि यहाँ दाना है इसीलिए दीन है ,दीवाना है। लोग हैं महफिल है नग्में हैं ,साज है,दिलदार है और दिल है शम्मा है,परवाना है। निराला अपने समाज के उपेक्षित जन के लिए अपनी कविता के औजार से लडते रहे। युगदृष्टा साहित्यकार हमेशा से ही अपने समय की समालोचना में उपेक्षा का शिकार रहा है। निराला भी शिकार हुए तब निराला ने अपने समय के आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को सम्बोधित यह गीत लिखा-
जब से एफ.ए.फेल हुआ है/हमारे कालेज का बचुआ
नाक दबाकर सम्पुट साधै/महादेव जी को आराधै
भंग छानकर रोज रात को/ खाता माल पुआ
बाल्मीकि को बाबा मानै/नाना व्यासदेव को जानै
चाचा महिषासुर को,दुर्गा जी को सगी बुआ
हिन्दी का लिक्खाड बडा वह/जब देखो तब अडा पडा वह
छायावाद रहस्यवाद के/भावो का बटुआ
धीरे धीरे रगड-रगड कर/श्री गणेश से झगड झगड कर
नत्थाराम बन गया है अब /पहले का नथुआ।
जिस कवि मे आलोचक से आँख मिलाकर बात करने और ताल ठोककर दो हाथ करने की क्षमता होगी वही निराला के स्वाभिमान और उनके गीत की लय को पकड सकता है। बाद मे शुक्ल जी ने निराला जी को पढा भी और उनपर लिखा भी। समर्थ रचनाकार आलोचना की बैसाखी के सहारे खडा नही होता। निराला को अपनी रचना पर दृढ विस्वास था। यह आत्मविश्वास ही उनकी मैं शैली है। कहना न होगा कि निराला के गीत कहीं न कहीं कालिदास,जयदेव,तो कहीं तुलसी मीरा,तो कहीं गुरुदेव रवीन्द्र की गीत परम्परा को आगे बढाते हैं। निराला के गीत इस सीमा तक अपने कथ्य भाषिक-व्यंजना और सवेदना से नए हैं कि बाद के गीतोन्मुख तमाम आन्दोलन उनकी रचनाशीलता का परिविस्तार ही साबित होते हैं। निराला के परवर्ती प्रमुख कवियों में नागार्जुन,त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल आदि सभी प्रगतिशीलो ने भी गीत की शक्ति विस्तार ही दिया। निराला के नवगीतो की बानगी देखें- मानव जहाँ बैल घोडा है कैसा तन मन का जोडा है। तथा- बान कूटता है ऐसे बैठे ठाले सुख का राज लूटता है। मुक्तिबोध कविता में जिस मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र की चर्चा करते हैं और डाँ. रामविलास शर्मा जिस श्रम सौन्दर्य की बात करते हैं उसकी रूपरेखा हिन्दी नवगीत के शिल्प मे निराला की देन है।विशेषता यह भी है कि निराला का चिंतन भारतीय काव्यमूल्यो से अनुप्राणित है। अत: उनके गीतों की विवेचना भी भारतीय परिवेष मे विकसित मूल्यों के आधार पर ही की जा सकती है। निराला की कविता में वाक्य और अर्थ कहीं लँगडाता नही है। विराम और अर्धविराम चिन्हों तक का प्रयोग निराला करते चलते हैं।
तात्पर्य यह कि वो अपने पाठ्य को लेकर पूरी तरह सजग हैं।यही कारण है कि निराला के गीत पाठ्य और श्रव्य दोनो रूपों मे सहृदयो को मंत्रमुग्ध करने की क्षमता रखते हैं। निराला ने अपनी कविता के जो मानदण्ड बनाये वो निभाये। इसे ही उन्होने मैं शैली कहा है।घनघोर निराशा की स्थिति में भी वह आशा की किरण खोज ही लेते हैं।आसन्न मृत्यु की स्थिति में संकट की स्थिति में भी निराला गीत का साथ नही छोडते।अपनी अंतिम गीत रचना में वो कहते हैं-
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है
आशा का प्रदीप जलता है हृदय कुंज में
अन्धकार पथ एक रश्मि से सुझा हुआ है
दिंड्निर्णय ध्रुव से जैसे नक्षत्र –पुंज में।
सम्भवत;यही निराला की अंतिम रचना है जो अगस्त 1961 के आसपास रची गयी और सान्ध्यकाकली में संकलित है। इस कविता में भी दिंड्निर्णय ध्रुव से कहकर अपने अटल विश्वास को दृढ करते हैं। निराला अपनी रचनाशीलता की आग को अपनी मुट्ठी में जीवन पर्यंत कसे रहे। तात्पर्य यह है कि निराला की स्वच्छन्दता को छन्दहीनता से जोडकर देखना अनुचित है। निराला के यहाँ छन्द कमजोरी नही है। वह तो सहृदय को आच्छादित करने या हृदयव्यापी बनाने के अर्थ में है। छन्दो के अनंत रूप हैं निराला की कविता में-कहीं लयांविति के रूप में कहीं सांगीतिक लय के रूप में कहीं संवाद धर्मिता के रूप में वो प्रकट होते चलते हैं। डाँ रामविलास शर्मा से बेहतर शायद ही कोई निराला को जान पाया हो।शर्मा जी ने भी निराला की प्रशस्ति अपने एक गीत से ही की थी-
यह कवि अपराजेय निराला जिसको मिला गरल का प्याला
ढहा और तन टूट चुका है पर जिसका माथा न झुका है
शिथिल त्वचा ढलढल है छाती लेकिन अभी सँभाले थाती
और उठाये विजय पताका यह कवि है अपनी जनता का।
निराला अपराजेय हैं क्योकि वह अपनी रचनाशीलता से लगातार जनता से जुडे रहे हैं। निराला समर्थ गीतकार हैं जो टूटकर भी लगातार आत्मस्वाभिमान से उन्नत मस्तक होकर अपनी जनता के दुखों को अपने गीतों से माँजते रहे।
उनका छन्दसौष्ठव और वाक्य विन्यास देखकर उनकी काव्य प्रतिभा का अनुमान लगाया जा सकता है। निराला की गीत परम्परा का विस्तार प्रगतिशील कवियो ने भी किया। बाद में यही परम्परा आगे जाकर नवगीत और जनगीत के रूप में प्रतिफलित हुई जिसके परिणाम स्वरूप राजेन्द्रप्रसाद सिंह,शम्भुनाथ सिंह,मुकुट बिहारी सरोज,रमेश रंजक,ठाकुर प्रसाद सिंह,वीरेन्द्र मिश्र,नईम,उमाकांत मालवीय,देवेन्द्रशर्मा इन्द्र,माहेश्वर तिवारी जैसे अनेक नवगीतकार जनगीतकार उभरे। नवगीत आन्दोलन के बाद छायावादी गीत परम्परा का लगभग अवसान हो गया। निराला की समर्थ गीत प्रतिभा कहीं न कहीं नवगीतकारो को लागातार प्रेरणा देती रही।नई पीढी के नवगीतकारो मे संवेदना के स्तर पर और नई जमीन देखने को मिलती है किंतु छन्दहीन कवितावादियो ने काव्यं गीतेन हन्यते की गलत व्याख्या करके अपनी सुविधा के आधार पर हिन्दी कविता का बहुत आहित किया। दूसरी ओर नये कवियो मे जो नवगीत लिख रहे हैं उनमे वाक्य गठन,भाषिक रचना,तथा सहज सरल जीवन को मुखरित करने वाली समर्थ छन्द रचना का अभाव दिखता है। नये कवि के पास समय नही है।साधना और अभ्यास की कमी इसका मूल कारण है। किसी भी संवेदना को छन्द मे प्रस्तुत किया जा सकता है बशर्ते साधना और अभ्यास किया जाये। निराला अपनी रचनाओ को बार बार माँजते हुए आगे बढते हैं वो कहीं स्वयं को दुहराते नहीं,विचार- भाव- भाषा-शिल्प आदि के प्रयोग उनके यहाँ नए हैं। निराला के बहुत से गीत हैं जिनकी गहन विवेचना होनी चाहिए। यहाँ इस लेख में निराला के गीतो की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करना भर ही मेरा उद्देश्य है।निराला के यहाँ जीवन और कविता में फर्क नही है।यही कारण है कि निराला के गीत आज के समय में भी प्रासंगिक हैं उनकी छन्दसिकता और जनपक्षधरता की दृष्टि से भी उनके पुनर्पाठ की आवश्यकता बनी हुई है।

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सोमवार, अक्तूबर 03, 2011



नवगीत एकादश की दो समीक्षाएँ

1.संघर्ष को स्वर देते नवगीत

*वेदप्रकाश भारद्वाज

नवगीत के समवेत संकलनों का प्रकाशन तो इस विधा के अस्तित्व मे आने के साथ ही हो गया था। सन 1958 में गीतांगिनी 1964 में कविता चौसठ 1969 में पाँच जोड बाँसुरी के अलावा नवे दशक में प्रकाशित हुए नवगीत दशकों व नवगीतअर्धशती सहित कई समवेत संकलन आये है परन्तु सभी की अपनी एक सीमा थी।यह सीमा हर उस विधा के साथ होती है जो रचनात्मक दृष्टि से समृद्ध होती है।आज किसी भी विधा के किसी भी समवेत संकलन को विधा का प्रतिनिधि संकलन नही कहा जा सकता उसे भी नही जो प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं। अच्छी बात ये है कि कवि संपादक डाँ.भारतेन्दु मिश्र ने ऐसे किसी प्रतिनिधित्व का दावा नही किया है।हाँ उन्होने भोजपुरी,रुहेली,बुन्देली,अवधी व हरियाणवी लोक जीवन व लोक मानस से जुडे नवगीतकारों को एक स्थान पर एकत्रित किया है।इस संकलन में ग्यारह नवगीतकारों के 110 नवगीत संकलित हैं।ये नवगीतकार हैं-जगदीश श्रीवास्तव,पाल भसीन,राधेश्याम बन्धु,राधेश्याम शुक्ल,हरिशंकर सक्सेना,श्यामनारायण मिश्र,सुरेन्द्र कुमार पाठक,भोलानाथ,भारतेन्दु मिश्र,शशिकांत गीते और शरद सिंह ।

नवगीत एक ओर जहाँ मानवीय रिश्तों की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर समसामयिक यथार्थ और आधुनिकता व आधुनिकोत्तर बोध की अभिव्यक्ति हैं। इस संकलन की रचनाओ मे ये तीनो स्वर विद्यमान हैं। यह अलग बात है कि हर कविता का अपना अलग तेवर है। जगदीश श्रीवास्तव के नवगीतो मे संघर्ष का भाव प्रबल है तो पाल भसीन के गीतों में संघर्ष के साथ साथ संवेदना में आज के व्यक्तित्व का संकट-स्वप्नभंग की स्थिति जैसी त्रासदियाँ भी हैं जो बहुत कम गीतकारो के यहाम हैं। इस लिहाज से पाल भसीन की रचनाओ का फलक और विस्तृत हो जाता है।

राधेश्याम बन्धु के गीतो से अदम्य जिजीविषा नजर आती है और चेतावनी का स्वर भी कि जो अभी तक मौन थे वे शब्द बोलेंगे/हर महाजन की बही का भेद खोलेंगे। राधेश्याम शुक्ल सत्ता की विसंगतियो और त्रासदियो का विश्लेषण करते हुए चलते हैं जो उन्हे कहीं कहीं उदास करता नजर आता है।हरिशंकर सक्सेना,श्यामनारायण मिश्र,सुरेन्द्र पाठक,भोलानाथ,भारतेन्दु मिश्र,शशिकांत गीतेऔर शरद सिंह के गीतो में भी सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की चक्की में पिसते व्यक्ति की पीडा ही अधिक मुखरित हुई है और यही बात इस समवेत संकलन को एक सूत्र से बाँधती भी है।

इस संकलन की रचनाओ के साथ एक अच्छी बात यह भी है कि इनमें प्रयुक्त बिम्ब और प्रतीक नवीनता लिए हुए हैं।चूँकि संपादक ने रचनाओ के चयन में कठोरता बरती है इस लिए संकलन में अच्छी रचनाएँ ही आयी हैं। जाहिर है कि बहुत से जाने पहचाने नाम इसमें नही हैं और यह कोई अवगुण नही है।प्रत्येक संपादक की अपनी दृष्टि और पँहुच होती है।वह उसी दायरे में चयन करता है।फिर किसी एक संकलन में आज सभी मौजूदा गीतकारों को शामिल कर पाना सम्भव नही है।इसके लिए एक नही कई नवगीत एकादश का प्रकाशन करना होगा।

राष्ट्रीयसहारा दैनिक(1 -1-1995)नई दिल्ली पृ.7 से साभार।

2.

स्वीकार और अस्वीकार के बीच नवगीत

*राम अधीर

हिन्दी की एक समर्थ विधा पारम्परिक गीत को नकारते हुए गत दशको से नवगीत साहित्य के क्षितिज पर उभरा है और वह भी तेजी से ,इसमे दो मत नही कि कथ्य की ताजगी और शब्दो के चमत्कार ने नवगीत को अपनी जगह कायम करने का अवसर दिया है किंतु क्या नवगीत और पुराने पारंपरिक के बुनियादी चरित्र मे कोई अंतर है,इस पर आज भी बहस की काफी गुंजाइश है।यह सवाल नवगीत के जन्म से आज तक अनुत्तरित ही है। छन्द विधान का जो स्वरूप पुराने गीत मे है वह नवगीत में भी है।शहरी संत्रास और आम आदमी के दर्द ,कुंठा,विफलता,नैराश्य और आगामी कल को नवगीत में पूरी ताजगी के साथ बयान करने की कोशिश की जाती है।इसने निश्चय ही अच्छे हस्ताक्षर दिए हैं।स्व.डाँ शम्भुनाथ सिंह इसके प्रवर्तक माने जाते हैं। शब्द सामर्थ्य और कथ्य का ऐन्द्रजालिक स्वरूप ही नवगीत को प्राणवत्ता प्रदान करता है।

हाल ही सहकार के आधार पर अयन प्रकाशन दिल्ली ने नवगीत एकादश के नाम से कुल ग्यारह नव्वगीतकारो की बढिया संकलन प्रकाशित किया है-इसमें 6 नवगीतकार तो मध्य प्रदेश के ही हैं और पाँच अन्य राज्यो के ।विशेषता यह है कि इसमें सागर की सुश्री शरद सिंह एकमात्र महिला गीतकार हैं और उनकी पहचान समूचे मध्य प्रदेश में नवगीतकार के रूप में अनूठी है।वह नवगीत की प्रदेश की एकमात्र समर्थ हस्ताक्षर हैं।शरद के गीतो में आत्मकथ्य का प्रगल्भ स्वरूप अगर रूपायित हुआ है तो वह उस दर्द को जीती हैं जो आम आदमी का है जैसे-

बीत गये जाने कितने दिन/धूप ओढते धूप बिछाते/पैरो के छाले भी फूटे/होठो के ताले भी टूटे/देर नही लगती/भाई जी।

भाई जी! सम्बोधन मे आत्मीयता का बोध होता है तो विफलता से उपजी पीडा की आहट भी आती है।उनके दो अन्य गीतो मे बस्तर के आदिम जीवन से जुडने जोडने का पूरा प्रयास हुआ है।फाँके की बारी में शरद सिंह का नवगीतकार बहिर्मुखी होकर अन्दर झाँकता है अन्यथा ये पंक्तियाँ अजन्मी रह जातीं-

हफ्ते में एक दिन /फाँके की बारी/दैनिक वेतन भोगी/छुट्टी इतवारी/जोड जोड दुखते हैं/यंत्रो के साथ जुटे चुप ही तो रहना है/चाहे बिंवाई फटे /कट कट कर मिलती है /शाम को दिहाडी।

आज के ताजे हालातो का यह सही निरूपण कहा जा सकता है।संग्रह में श्यामनारायण मिश्र अपनी कल्पनाशीलता और बिंब प्रतीको के लिए सर्वपरिचित हैं उनका कथ्य लोक संस्कृति और लोक जीवन से जुडने का अनूठा माद्दा रखता है।एक गीत में उनकी बानगी है-

महानगर में मै उदास/तुम्स क्स्बे मे ऊबीं/मै तो अपनी आग जला/दुख अपने तुम डूबीं/अमृत जन्म मिले शायद/इस घोर जन्म के बाद/मन भर सौ अवसाद।

श्यामनारायण मिश्र ने प्रकृति के अनेक चित्र अपने गीतो मे उकेरे हैं जिंको संकलित गीतो मे जगह नही मिली।बहरहाल निश्चय ही इस संग्रह में उनकी अपनी पहचान है।इसी क्रम में भोलानाथ एक उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं यथार्थ के धरातल पर उनका यह गीत सचेत करता है-

प्यास भीतर की बुझा पाती नही/गंगाजली यह काँच की/आग की लपटें दफन हैं/एक मुट्ठी रेत में/मेटकर सोना उगी हैं/नागफनियाँ खेत में/शौर्य का साहस जुटा पाती नही/मुह मंडली यह पाँच की।

काव्य की यह सफाई उनके अन्य गीतो में भी दृष्टव्य है।संकलन मे सुरेन्द्र पाठक और शशिकांत गीते भी ठीक हैं।

नवगीतकार भारतेन्दु मिश्र का यह कथन सही लगता है कि नवगीत में छन्द है,लालिय है,उक्ति वैचित्र्य है,युगबोध है फिर भी उसका विरोध किया जा रहा है।उसी प्रकार भूमिका में डाँ. राजेन्द्र गौतम की यह बात अपनी जगह बानगी है कि गीत समकालीन कविता में अविच्छिन्न है।उसकी अपनी विशिष्ट मुद्रा है,अपना व्यक्तित्व है-पर न तो वह कविता से अलग कुछ है और नही वह झरे पत्ते की तरह विगत महत्व की विधा है। कुलमिलाकर संग्र्ह की भूमिका का अत्यंत ही महत्व है।सम्पादन श्री भारतेन्दु मिश्र ने किया है। कृति का मुद्रण लुभावना है और रचनाओ का अपना स्तर है।

नवभारत भोपाल(23-10-1994) से साभार

पुस्तक: नवगीत एकादश

सम्पादक: डाँ.भारतेन्दु मिश्र

प्रकाशन: अयन प्रकाशन 1/20 महरौली नयी दिल्ली-30

मूल्य: रु 75/

संस्करण:1994

रविवार, सितंबर 04, 2011

जन्मशती पर

जन्मशती पर

दृढ आस्था के कवि:कन्हैया लाल मत्त

भारतेन्दु मिश्र

लखनऊ से दिल्ली आने के बाद भाई योगेन्द्र जी से सन 1989-1990 के आसपास मुलाकात हुई तब तक उन्हे एक नवगीतकार के रूप मे जान चुका था।इससे पहले वरिष्ठ नवगीतकार देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी के माद्ध्यम से उनके गीत परिवार मे (बाबूराम शुक्ल,बाबूलाल गोस्वामी,राजेन्द्र गौतम,पाल भसीन,योगेन्द्रदत्त शर्मा)के साथ मैं भी सन 1987 मे शामिल हो चुका था। फिर जब से योगेन्द्र जी के साहित्यिक परिवार से मुलाकात हुई तो धीरे धीरे हम पं. कन्हैयालाल मत्त जी के परिवेश से जुडते गये।पहली बार मैने मत्त जी को योगेन्द्र जी के पूज्य पिता जी के रूप मे देखा।मत्त जी जितने सादे थे उतने ही गम्भीर सुकवि थे। फक्कडपन और मस्ती उनका स्वभाव था।कुलमिलाकर सादा जीवन उच्च विचार वाली शैली के अनुयायी के रूप मे मैने उन्हे देखा।आगरा अर्थात बृजमंडल की काव्यपरम्परा के साक्षात जीवंत प्रतिमान के रूप में मैने उन्हे पाया।फिर तो लगातार उनके जन्मदिन की काव्यगोष्ठी मे अनेक वर्षों तक उनके सानिद्ध्य में बैठने का अवसर मिलता रहा।साहित्य की दुनिया के लोग उन्हे बाल साहित्यकार मे जानते हैं किंतु मत्त जी ने जो श्रम सौन्दर्य के गीत लिखे हैं वे हिन्दी के बडे साहित्यकारों के यहाँ भी दुर्लभ हैं।बाजीगर,रिक्शेवाला, सपेरा, चाटवाला, गुब्बारेवाला, कठपुतलीवाला जैसे श्रमजीवियों पर लिखे उनके गीत तो मुझे दंग करते रहे हैं-एक राज शीर्षक गीत का अंश देखिए-

ये रन्दा गुनिया साहुल,मुगरी-ये करनी कसले

मैं इनके द्वारा हल करता हूँ बुनियादी मसले

मैं ईंट रेत गारे चूने का खेल दिखाता हूँ

है सृजन कर्म मुझको प्यारा मैं राज कहाता हूँ।

ऐसे अनेक गीत मत्त जी ने उस समय रचे जब अधिकांश गीतकार छायावादी रोमानियत के तराने गाने में लगे थे। गूढ कविताई वाले प्रतीकों और बिम्बों की आलंकारिक शैली उनके यहाँ नही है। वे तो सहज कवि हैं-एकदम सादा-कोई बडी महत्वाकान्क्षा भी नही दिखाई देती थे मुझे उनमें स्वयं के लिए। बस वे संगच्छध्वम संवदध्वम संवोमनासि जानताम वाली आर्ष परम्परा के व्यक्ति थे।उनका साँवला सुन्दर चेहरा और समंवयवादी गहरी दृष्टि बहुत प्रभावित करती थी मुझे।अपने कवि कुटीर में अपने सन्युक्त परिवार के साथ मैने उन्हे एक आदर्श पिता और आदर्श गृह स्वामी के रूप मे देखा। संयोगवश उन्हे मेरा एक गीत मैं चन्द्रापीड बनूँ तुम हो कादम्बरी

स्वर्ग से उतर आओ सोनपरी,सोनपरी।

-बहुत पसन्द आया था तो जब भी उनके सानिध्य मे काव्यपाठ का अवसर मिलता तो अक्सर वो इस गीत को सुनाने के लिए कहा करते थे।राधा कृष्ण प्रणय के मूल स्वर वाले उनके कई गीत बहुत मार्मिक हैं। लगभग पाँच छह ऐसी नितांत आत्मीय गोष्ठियों मे उन्हे सुनने का अवसर मिला। कई बार तो भाई योगेन्द्र जी ने गोष्ठियों का संचालन करने का अवसर भी मुझे सौपा। योगेन्द्र जी के घर जाने पर आज भी उनकी वही कुर्ता सदरी पहने तखत पर बैठे हुए दुबले पतले शरीर वाली श्यामल छवि मन मे भास्वर हो उठती है। वे अक्सर खिलाने पिलाने के अलावा घर परिवार की कुशल क्षेम आदि भी पूछते थे। उनका अपना जीवन संघर्ष भी रहा होगा लेकिन कभी उन्होने आत्मगाथा बडबोले स्वर मे नहीं सुनायी।पराधीन और स्वाधीन दोनो तरह के भारत उन्होने देखे थे। एक जातीय स्वर और राष्ट्र- भक्ति का भाव उनके गीतों मे भरा हुआ है। एक बेहद संस्कारी सहज व्यक्ति की छवि मैने उनमे देखीऔर वही छवि उनके गीतों का मूल स्वर है। वस्तुत: वे आस्था के कवि दृढ हैं-यह आस्था श्रम के प्रति हैं-सकारात्मक मूल्यों की है।यही कारण है कि उनके प्राय;यहाँ विद्रोह नकार और व्यंग्य कम दिखाई देते हैं।

ये कवि कुटीर मे होने वाली आत्मीय गोष्ठियाँ मुझ जैसे नये रचनाकार के लिए बडी प्रेरक होती थीं।इन गोष्ठियों मे प्रसिद्ध कथाकार से.रा.यात्री,देवेन्द्रशर्मा इन्द्र,कमलेश भट्ट कमल,ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग,वेद प्रकाश शर्मा,श्याम निर्मम, आदि से भी मुलाकात होती थी। एक दो बार वहीं स्व.शमशेर आलम खान से भी मुलाकात हुई शमशेर जी उन दिनों मत्त जी पर शोध कर रहे थे। मत्त जी किशोर वय के बच्चों के मन में आस्था और सकारात्मक बोध भरने के लिए गीत रचना करते रहे। इसके बाद भी वो बातों बातों में कहा करते थे कि -मैं कवि नहीं हूँ-मैं बस तुकबन्दी कर लेता हूँ।

उनकी इस प्रकार की विनम्रता मुझे आज भी प्रणम्य लगती है। आशीस देने के लिए बढा हुआ उनका हाथ और उनकी आँखों की चमक आज भी मुझे कहीं गहरे तक जोडे हुए है। उनकी कुछ पंक्तियाँ तो मन पर अमिट हो गयी हैं-

मेरी आखों में अश्रु,अधर पर मधुर हास है

मैं कवि हूँ,मेरे स्वर में शंकर का निवास है।

ध्यान देने की बात है कि शंकर आदि देव हैं,शंकर नाश और सृजन के भी प्रतीक हैं।शंकर सर्वहारा के स्वामी हैं।वो पशुपति भी हैं-नागपति भी हैं-महादेव हैं-अवढर दानी हैं-आर्य अनार्य -राक्षस आदि सभी के स्वामी हैं। अवसर आने पर समय का गरल भी वही पी जाते हैं।ऐसे शंकर का निवास जिस कवि के स्वर में है वो हैं पं कन्हैया लाल मत्त। उनकी स्मृति को प्रणाम। समर्थ कवि उस बरगद की भाँति होता है जिसकी गहनता का छोर नही मिलता।कवि कुटीर की अनेक गोष्ठियों की यादें हैं।उनकी स्नेहछाया मे जुडाने का जितना अवसर मुझे मिला वह मेरा सौभाग्य है।


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मंगलवार, अप्रैल 19, 2011


नागार्जुन की छान्दस चेतना

भारतेन्दु मिश्र

नागार्जुन बडे रचनाकार है क्योंकि वे छन्द साधना के कवि हैं। वे अनेक भाषाओं में कविता करते चलते हैं, संस्कृत-बांग्ला-मैथिली और हिन्दी मे उन्होने समान रूप से कविताएँ लिखी हैं। वो अपने जन को पहचानते हैं।अपने जन की समस्या को जानते हैं।वे जीवन की प्रतिस्पर्धा में संघर्षरत असफल दिखाई देने वाले आम आदमी के कवि हैं-सफल हुए लोगों के गीत तो सभी गाते हैं।नेताओ के दरबारों या लालाओं के कविसम्मेलनो की उन्हे कभी परवाह नही रही।ऐसा निरपेक्ष धरती का कवि ही इस प्रकार लिख सकता है-

जो नही हो सके पूर्णकाम

मैं उनको करता हूँ प्रणाम।

जो छोटी सी नैया लेकर ,उतरे करने को उदधि पार

मन की मन में ही रही, स्वयं हो गये उसी मे निराकार

उनको प्रणाम।

जो उच्च शिखर की ओर बढे,रह-रह नव-नव उत्साह भरे

पर कुछ ने ले ली हिमसमाधि,कुछ असफल ही नीचे उतरे

उनको प्रणाम।

जिनकी सेवाएँ अतुलनीय पर विज्ञापन से रहे दूर

प्रतिकूल परिस्थिति ने जिनके कर दिए मनोरथ चूर चूर

उनको प्रणाम।

इस प्रकार के गीत हिन्दी साहित्य मे बहुत कम हैं। यहाँ नागार्जुन का लक्ष्य तमाम वो असफल से दीखने वाले लोग हैं जिनका कीर्तिगायन समय ने नही किया जबकि वे सब अपने संघर्ष के लिए उल्लेखनीय अवश्य थे।जो कवि संघर्ष की मूल चेतना को जानता है और संघर्षशीलता के बाद असफलता की पीडा को पहचानता है वही ऐसा लिख सकता है।

नागार्जुन की काव्यभाषा उनके चिंतन की तरह साफ सुथरी है।हालाँकि नागार्जुन के काव्य समय पर छायावद का गहरा प्रभाव था किंतु बाबा के गीत छायावादी गीतो के प्रभाव से न केवल मुक्त हैं बल्कि प्रगतिशील चेतना की ध्वजा फहराते चलते हैं।वे प्रतीको के माध्यम से कल्पना के बहुअर्थी सूक्ष्म बिम्ब कभी नही रचते।यह विशेषता तुलसी की कविताई मे स्पष्ट परिलक्षित होती है।तुलसीदास लोकजीवन के महान कवि हैं उसी प्रकार नागार्जुन अपने समय के अपने लोक के बडे कवि हैं। बाबा के गीत संस्कृत निष्ठ भाषा के बावजूद प्रसाद की तरह गूढ नही होते-

इन्दुमती के मृत्यु शोक से ,अज रोया या तुम रोये थे?

कालिदास सच-सच बतलाना

शिव जी की तीसरी आँख से, निकली हुई महा ज्वाला में

घृतमिश्रित सूखी समिधा सम, कामदेव जब भस्म हो गया

रति का क्रन्दन सुन आँसू से, तुमने ही तो दृग धोये थे।

वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका,प्रथम दिवस आषाढ मास का

देख गगन में श्याम घन घटा,विधुर यक्ष का मन था उचटा

खडे-खडे तब हाँथ जोडकर,चित्रकूट के सुभग शिखर पर

उस बेचारे ने भेजा था ,जिनके ही द्वारा सन्देशा

उन पुष्करावर्त मेघों का -साथी बनकर उडने वाले

कालिदास सच-सच बतलाना, पर पीडा से पूर-पूर हो

थक-थक कर औ चूर चूर हो, प्रियवर तुम कब तक सोये थे?

रोया यक्ष कि तुम रोये थे।

इस महान गीत में कालिदास जैसे कवि की समग्रकविता का काव्यप्रयोजन सहज रूप मे समझा जा सकता है। कुमारसम्भव,रघुवंश और मेघदूत तीनो काव्यग्रंथों में व्यंजित काव्य हेतु की ओर साफ संकेत नागार्जुन देते हैं। कालिदास की कविता की प्रमुख विशेषता वैदर्भी रीति और प्रसाद गुण है वहीं बाबा की कविता में प्रगतिवादी चेतना का सहज सौन्दर्य प्रातिफलित और परिलक्षित होता है।इस गीत मे भी वे जिस करुणा की बात करते हैं वह आम आदमी की करुणा का ही प्रतिफलन है। कालिदास बाबा के प्रिय कवि हैं ऐसा प्रतीत होता है।विद्यापति-जयदेव-तुलसी आदि नागार्जुन के आदर्श रहे होंगे।कुछ और ध्यान से देखें तो निराला से भी बाबा सीखते हुए आगे बढते हैं।नागार्जुन और जानकीवल्लभ शास्त्री एक समय मे संस्कृत के कवि के रूप मे प्रसिद्ध हुए।किंतु आगे चलकर दोनो ही हिन्दी के क्षेत्र मे आ गये। नागार्जुन की एक संस्कृत कविता देखें-

लक्ष्मी:प्रतीक्षते विष्णुं बहिरागंतुमुद्यतम।

सागरे चुलके कृत्वा सुखं शेते महामुनि:।

अर्थात जिस समुद्रमंथन से बाहर आने को तत्पर लक्ष्मी की प्रतीक्षा विष्णु करते हैं,उसी समुद्र को अपने चुल्लू मे भरकर महामुनि सुख से निश्चिंत होकर सोते हैं। तात्पर्य यह कि बाबा नागार्जुन सिधियों के कवि हैं उनका मार्ग मुनियों वाला हैं।वे सत्ता की चमक दमक से दूर हैं। यही लोक परम्परा हैं-यही ऋषि परम्परा है जहाँ लक्ष्मी के पीछे भागने वाले सत्ताधारियों को कोपीन लगाने वाले ऋषियों ने सदैव तिरस्कृत किया है। नागार्जुन मे सर्वहार के संघर्ष और उसके जीवन के प्रति अटूट विश्वास है।देखें इस प्रगीत में-

बस थोडी और उमस

बस थोडी और धूप

बस थोडा और पानी

बस थोडी और हवा

-क्या देर है भला बाहर आने में।

आज मैं बीज हूँ

कल रहूँगा अंकुर

बटुर-बटुर आयेगी दुनिया

मुझे देखने को आतुर

आज मै बीज हूँ

अलक्षित नाचीज हूँ

गर्क हूँ धरती की जादुई कोख में।

कवि को अपने भविष्य पर हमेशा से विश्वास रहा है। वह अलक्षित बीज की तरह उमस-धूप-पानी और हवा को सहने के साथ ही बीज से नवांकुर की तरह नई पहचान से खडा होना जानता है।यह नैसर्गिक आस्था बोध नागार्जुन को बडा कवि बनाता है।नागार्जुन विशाल धरती के कवि हैं-

नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है

यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है

मेरी भी आभा है इसमें।

नागार्जुन की कविताई की सबसे शक्ति उनकी अभिनव छान्दस चेतना और प्रगतिशीलता है।वे विशाल प्रकृति के कवि प्रतीत होते हैं,किंतु मनुष्य जीवन के छोटे बडे सरोकारों के आरपार देखने की आँख उनके पास है। इसी लिए तो वे जनकवि हैं,इसी लिए वे लोक के गायक हैं। वे नयी छन्दसचेतना के कवि हैं। बाद के जो कवि छान्दस कविता को मुह बिराने लगे उनकी कविताओं मे निराला,नागार्जुन,त्रिलोचन,केदारनाथ अग्रवाल आदि जैसी काव्यत्व शक्ति कभी नही आ सकी।देखें बाबा के एक प्रगीत की संरचना जो केदारनाथ अग्रवाल जी को केन्द्र मे रखकर लिखा गया है-

जनगणमन के जाग्रत शिल्पी

धरती के तुम पुत्र गगन के तुम जामाता

नक्षत्रों के स्वजन कुटुम्बी

सगे बन्धु तुम नद नदियों के

झरी ऋचा पर ऋचा तुम्हारे सबल कण्ठ से

स्वर लहरी पर थिरक रही है युग की गंगा

अजी तुम्हारी शब्दशक्ति ने बाँध लिया है

भुवनदीप कवि नेरूदा को

मैं बडभागी, क्योकि प्राप्त है मुझे तुम्हारा

निश्छल निर्मल भाईचारा

मैं बडभागी, तुम जैसे कल्याण मित्र का

जिसे सहारा

मैं बडभागी, क्योंकि चारदिन

बुन्देलों के साथ रहा हूँ।

मैं बडभागी,क्योंकि केन की

लहरों मे कुछ देर बहा हूँ।

बडभागी हूँ बाँट दिया करते हो

हर्ष विषाद

बडभागी हूँ बार-बार करते

रहते हो याद।

तात्पर्य यह है कि अंत में तो वही कविताएँ शेष रह जाती हैं जिनमे अपने पाठकों से लम्बे समय तक जुडाव रहता है। जो कविताएँ गायी जा सकती हैं-वे याद रहती हैं।जो याद रहती हैं उनकी ही प्रासंगिकता को रेखांकित किया जाता है। अब पावस को ही ले तो बाबा का बहुत चर्चित गीत याद आता है

अमल धवल गिरि के शिखरों पर

बादल को घिरते देखा है।

छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को

मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है

बादल को घिरते देखा है।

इस पूरे गीत मे नैसर्गिकता का सौन्दर्य सहज रूप मे आकर्षित करता है। यह गीत भी कालिदास के मेघदूत की याद दिलाता है। बडा कवि वह होता है जिसकी कविता मे अपने परवर्ती कालजयी कवियों की महान रचनाओ का पता भी मिलता है।छन्द साधना ऐसी कि कहीं से भी एक शब्द इधर का उधर हो जाये तो अर्थ का पता नही मिलेगा। मेघ को लेकर बाबा का एक और गीत है-

धिन-धिन-धा धमक-धमक /मेघ बजे

दामिनि यह गयी दमक/मेघ बजे

दादुर का कण्ठ खुला/मेघ बजे

धरती का हृदय धुला/ मेघ बजे

पंक बना हरिचन्दन /मेघ बजे

हल का है अभिनन्दन/मेघ बजे

धिन-धिन-धा।

इस पूरे गीत मे वर्षा के विविध रंग नागार्जुन लेकर चलते हैं। धरती कैसे मेघों क स्वागत करती है,और किसान कैसे हल का आषाढ मे अभिनन्दन करता है।पानी बरसेगा तभी तो धरती पर खुशहाली आयेगी।मनुष्य और जीव जगत सब प्रसन्न होकर गा रहे हैं।इस गीत का नाद सौन्दर्य वर्षागम के लिए उत्सुक हमारे गाँवों मे मेघ-मल्हार गाने वाले किसान परिवारों से हमे जोडता है। दूसरी ओर नागार्जुन ईश्वरवादी बेतुकी आस्था की सोच को नकारते हुए आम आदमी को केवल संघर्ष की प्रेरणा देते हैं।हम सब जानते हैं कि संसार का कोई काम बिना सार्थक प्रयत्न और संघर्ष के सम्भव नही है फिर अपनी असफलता के लिए अपराधी बन कर मन्दिरों मे पश्चात्ताप करने से क्या होगा? नागार्जुन का यह असली मार्क्सवादी स्वरूप है इसे हम अपने भारतीय दार्शनिक परिप्रेक्ष्य मे कहें तो चार्वाकवादी या लोकायतवादी पक्ष है-

कल्पना के पुत्र हे भगवान/चाहिए मुझको नही वरदान

दे सको तो दो मुझे अभिशाप/प्रिय मुझे है जलन, प्रिय संताप

चाहिए मुझको नही यह शांति/चाहिए सन्देह, उलझन ,भ्रांति

रहूँ मैं दिन रात ही बेचैन/आग बरसाते रहें ये नैन

करूँ मैं उद्दण्ता के काम/लूँ न भ्रम से भी तुम्हारा नाम

करूँ जो कुछ सो निडर निश्शंक/हो नही यमदूत का आतंक

घोर अपराधी सदृश हो नत वदन निर्वाक/बाप दादो की तरह रगडूँ न मैं निज नाक

मन्दिरों की देहरी पर पकड दोनो कान/हे हमारी कल्पना के पुत्र हे भगवान।

नागार्जुन जानते हैं कि अशांति और बेचैनी ही संघर्ष और क्रांति को जन्म देती है।ईश्वरवादी होकर हम केवल भाग्यवादी की तरह सोचने लगते हैं।सच तो यही है कि ईश्वर केवल मनुष्य की एक खूबसूरत कल्पना मात्र है। सामाजिक रूढियों को तोडकर नया रास्ता दिखाना भी बडे कवि का काम है। यही प्रगतिशीलता है कि हम अपनी परम्परा से क्या और कितना गृहण करें? किसी भी समाज मे सबकुछ ग्राह्य और सबकुछ त्याज्य कभी नही होता। सच्चे कवि के पास अपना विवेक होता है कि वह अपने समाज के लिए कितना ग्राह्य है यह रेखांकित करता चले। बाबा रूप सौन्दर्य-माधुर्य और कल्पना के कवि नहीं हैं-वे तो यथार्थ और संघर्ष के कवि हैं।मिथिलांचल से सम्भवत:दिल्ली आते समय सन 1966 में नागार्जुन अंतिम मैथिली गीत लिखते हैं-

अहिबातक पातिल फोडि-फाडि/पहिलुक परिचय कें तोडि ताडि

पुरजन परिजन सबकें छोडि-छाडि/हम जाय रहल आन ठाम

माँ मिथिले ई अंतिम प्रणाम।

यहाँ कवि की अपने घर गाँव और परिजनों को छोडने की वेदना साफ तौर पर देखी जा सकती है। बाबा नागार्जुन अनेक भाषाओं और अनेक लोक संस्कृतियों के गायक हैं। यह हिन्दी के कवियों का सौभाग्य है हिन्दी मे ऐसा कवि है जो अनेक भाषासंस्कृतियों मे निर्बाध रूप से आवाजाही करता है। हिन्दी के अलावा संस्कृत, मैथिली और बाग्ला मे भी नागार्जुन कविता करते थे। नागार्जुन ने संख्या मे बहुत अधिक गीत भले ही न लिखे हों लेकिन जो लिखें हैं वे बेजोड हैं।खासकर अकाल पर सन 1952 में लिखा गया उनका यह गीत तो आज भी बिहार की बाढग्रस्त जनता का ताजा बिम्ब सा प्रतीत होता है-

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास

कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास

कई दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गस्त

कई दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।

दाने आये घर के अन्दर कई दिनों के बाद

धुआँ उठा आँगन से ऊपर कई दिनों के बाद

चमक उठीं घर-भर की आँखें कई दिनों के बाद

कौओं ने खुजलाई पाँखें कई दिनों के बाद।

और इसी क्रम में देखें-अकाल के बाद के गीत का एक अंश-

बहुत दिनों के बाद /अबकी मैं जी भर सुन पाया

धान कूटती किशोरियों की कोकिल कंठी तान।

जिसने बाढ की त्रासदी को नही देखा वह उसकी भयावहता का आकलन नहीं कर सकता। आज भी दूर-दराज मे बाढ आने पर ऐसे दृश्य आम बात है।मेरा मानना कि नागार्जुन की कविता की सबसे बडी शक्ति उनकी लोकानुरूप छन्दधर्मिता और भाषाचेतना है जिसकी ओर प्राय: आलोचकों ने कम ध्यान दिया है। किसी कवि का लोकवादी होना और जनोन्मुख होना तभी सम्भव है जब उसकी कविताओं को लोक मे व्याप्त लोक धुनों मे गाया जाता है।विचारधारा कोई भी हो वह हमारी लोक चेतना को आत्मसात किए बिना आगे नही बढती। नागार्जुन की कविताई मे विचारधारा और लोकजीवन की संवेदना का वास्तविक प्रकटीकरण दिखाई देता है।वो कोरे मार्क्सवादी या जनवादी नही हैं,इसीलिए बडे हैं।ऐसे कवि आने वाली पीढी के लिए न केवल प्रेरणा देते हैं बल्कि संघर्ष करते समय परिस्थितियों का डट कर मुकाबला करने का आत्मबल भी प्रदान करते हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 08, 2011

श्रद्धांजलि

निराला के समकालीन महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री नही रहे

डॉ. भारतेन्दु मिश्र


सब अपनी अपनी कहते है।
कोई न किसी की सुनता है ,नाहक कोई सिर धुनता है
दिल बहलाने को चल फिर कर,फिर सब अपने में रहते है।
सबके सिर पर है भार प्रचुर,सबका हारा बेचारा उर
अब ऊपर ही ऊपर हँसते,भीतर दुर्भर दुख सहते है।
ध्रुव लक्ष्य किसी को है न मिला,सबके पथ में हैशिला शिला
ले जाती जिधर बहा धारा,सब उसी ओर चुप बहते हैं।

ऐसी सहज गीत कविता धारा के कवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री हिन्दी कविता के उन महान कवियों में से एक थे जिन्होंने छंदोबद्ध हिन्दी कविता के कई युग एक साथ जिये थे। प्रारंभ में शास्त्री जी संस्कृत में कविता करते थे। उनका संस्कृत कविताओं का संकलन काकली के नाम से 1930 के आसपास प्रकाशित हुआ। संस्कृत साहित्य के इतिहास में नागार्जुन और शास्त्री जी को देश के नवजागरण काल का प्रमुख संस्कृत कवि माना जाता है। निराला जी ने काकली के गीत पढ़कर ही पहली बार उन्हे प्रिय बाल पिक संबोधित कर पत्र लिखा था। कुछदिन बाद निराला जी स्वयं उनसे मिलने काशी पहुँचे थे । कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव भी दिये थे। बाद में वे हिन्दी में आगये। शास्त्री जी स्वीकार करते हैं कि निराला ही उनके प्रेरणास्रोत रहे हैं। या कहें कि वे महाप्राण निराला के ही परामर्श से हिन्दी कविता में आये। आये तो छाते ही चले गये। वह छायावाद का युग था। निराला ही उनके आदर्श बने हैं। आज(7-4-11) उम्र के 96वर्ष पूर्ण कर वे अनंत मे लीन हो गये। वे गत दो द्शको से लगभग विश्राम की मुद्रा में थे। निराला भी अपने अंतिम दिनों में समाधि की स्थिति में चले गये थे। निराला का संबंध बंगाल से था। वे जिस महिषासुर –मर्दिनी श्यामा सरस्वती की ओर संकेत करते चलते हैं शास्त्री जी उसी श्यामा सरस्वती के उपासक रहे हैं। खास कर निराला के उत्तर काव्य का उनके गीतों पर भी कहीं न कहीं गहरा प्रभाव पड़ा होगा। राधा सात खण्डों में विभक्त उनका महाकाव्य है। रूप- अरूप, तीर -तरंग, शिप्रा, मेघगीत, अवन्तिका ,धूपतरी, श्यामा- संगीत आदि शास्त्री जी के प्रसिद्ध काव्यसंग्रह हैं। इसके अतिरिक्त गीतिनाट्य, उपन्यास, नाटक, संस्मरण,आलोचना
ललित निबंध आदि उनकी अन्य अभिव्यक्ति की विधायें रही हैं हंसबलाका(संस्मरण) –कालिदास(उपन्यास)-अनकहा निराला(आलोचना) उनकी विख्यात गद्य पुस्तकें हैं- जिनके माध्यम से शास्त्री जी को जाना जाता है और आगे भी जाना जाता रहेगा।सहजता – दार्शनिकता और संगीत उनके गीतों को लोकप्रिय बनाते हैं। वे संस्कृति के उद्गाता हैं। वे रस और आनंद के कवि हैं। राग केदार उनका प्रिय राग रहा है। उनके कई गीत राग केदार में निबद्ध है। अपने गीतों के विषय में वे कहते हैं-
मेरे गीतों में जीवन का दूसरा पहलू है जो शांति और स्थिरता का कायल है। गोल गोल घूमना इसमें नही है। बाहर से कुछ छीन झपटकर ले आने की खुशी नही अपने को पाने का आनंद है। (अष्टपदी पृ.220)
अपने कूल्हे की शल्यचिकित्सा हेतु जब शास्त्री जी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में भर्ती थे ,सन् 1988 की घटना है तभी उनके प्रथम दर्शन हुए। फिर कई बार आदरणीय इन्द्र जी ,राजेन्द्र गौतम और पाल भसीन के साथ अस्पताल में उनसे कई मुलाकातें हुईं। तब शास्त्री जी कई महीने चिकित्सा लाभ के लिए दिल्ली में रहे थे।
एकबार उनसे मिलने उनके आवास निराला निकेतन,मुजफ्फरपुर जाने का भी सुयोग बना । एक पत्रिका के लिए मैने उनसे तभी बातचीत भी की थी । उनकी भव्यता ,उनकी दार्शनिकता और उनकी जीवन शैली वैदिक ऋषि परंपरा की याद दिलाती है। जैसा निराला कहते थे मैने मै शैली अपनायी वैसे ही शास्त्री जी ने अपने जीवन के मानक स्वयं गढे हैं । यह जो अपने को पाने का आनंद है असल में वही कविता का शाश्वत मूल्य है। शास्त्री जी की हर रचना नये सिरे से आत्म मंथन की प्रक्रिया के सूत्र खोलती चलती है। वह दौर भी था जब वे कविसम्मेलनों में खूब सुने सराहे जाते थे। एक ओर राधा जैसा विराट महाकाव्य जहाँ उनके विशाल साहित्यिक व्यक्तित्व का परिचायक है वहीं निम्नलिखित गीत पंक्तियाँ उनकी सहज भावधारा की और संकेत करती हैं-
बादलों से उलझ,बादलों से सुलझ
ताड़ की आड़ से चाँद क्या झाँकता।
............. उनके गीतों में सहजता का सौन्दर्य उल्लेखनीय है। जीवजगत की तमाम उलझनों को पार करते हुए मनुष्य की आत्मा अंतत: -परमात्मा की खोज में भटकती है।
शास्त्री जी बहुत सरल बिंब के माध्यम इस सनातन भाव को चित्रित करते हैं-
बना घोंसला पिंजड़ा पंछी
अब अनंत से कौन मिलाये
जिससे तू खुद बिछड़ा पंछी।
-शास्त्री जी निम्न गीत बिंब में संयम के सौंन्दर्य बिंब और संतुलन की ओर संकेत करते चलते हैं। श्रंगार उनका प्रिय रस है। माधुर्य उनकी कविता का गुण है। सत्यं शिवं सुन्दरम् उनके काव्य का प्रयोजन है। वे लोक और परलोक दोनो के कवि हैं। कालिदास,तुलसी,शेक्सपीयर,मिल्टन,रवीन्द्र नाथ ठाकुर ,प्रसाद और निराला उनके प्रिय कवि हैं । वैसे कहीं न कहीं वे बुद्ध के मध्यम मार्ग से भी गहरे तक प्रभावित जान पड़ते हैं--

जो कसो, टूट जाये,तुनुक तार ये
ढील दो,छंद-लय हों निराधर ये
साज यह जिंदगी का नहीं दिल्लगी
जो छुओ छेड़ दो और बजता चले।
तुम कि तनहाइयाँ ढूँढते शून्य की
चाँद तारे तुम्हारे लिए हैं जले।
...........
मुक्त आकाश और गहन समुद्र जैसी उनकी कविता जितनी सहज प्रतीत होती है असल में वह उतनी ही गंभीर होती है। छायावादी गीत परंपरा की छवि देखिये कितनी मार्मिक बनकर उभरी है--
प्राणों में प्रिय दीप जलाओ
जिसकी शिखा न हो धूमाकुल,
सजग शांत वह ज्योति जगाओ।
ऊँची अहंकार की कारा,दिखता नभ में एक न तारा
अंध कक्ष में जीवन हारा,आत्मबोध का मिले सहारा
मन को और न गहन बनाओ।
...........निम्न पंक्तियों में तो वे बहुत कुछ निराला की तरह ही गाते हुए दिखायी दे रहे हैं। अलख रूप की जिस चेतना की ओर उनका संकेत है उसकी व्यंजना कितनी अद्भुत है। उच्वसित उदासी और अश्रु हास का बिखरता हुआ रूप कितना विलक्षण है कि धरती और गगन त्आह्लादित हो रहे हैं। असल में यही मूलप्रकृति और पुरुष का शाश्वत उल्लास है--
नाम हीन सहस्र नामों में खिला
अलख अनमिल विकल तिल तिल में मिला
उच्वसित होती उदासी
अश्रु हास बिखर रहा है
रूप निर्झर झर रहा है
मृणमयी मधुरस पगी है
विहँस गगन शिखर रहा है
...........शास्त्री जी की कविताओं में कलिदास जगह जगह झाँकते चलते हैं। बादलों के माध्यम से शास्त्री जी ने कई गीत रचे हैं । नागार्जुन ने भी कालिदास सच सच बतलाना जैसा प्रसिद्ध गीत उन्ही दिनों में लिखा था। निम्न पंक्तियाँ देखें--
काली रात नखत की पाँतें-आपस में करती हैं बातें
नई रोशनी कब फूटेगी?
बदल बदल दल छाये बादल
क्या खाकर बौराये बादल
झुग्गी-झोपड़ियाँ उजाड़ दीं,कंचन महल नहाये बादल।
......... और यह वर्षान्त का चित्र तो विलक्षण ही है। प्रकृति के माध्यम से यहाँ अद्भुत रागात्म सौंदर्य अपनी छटा बिखेर रहा है । यह पूरा का पूरा गीत मेरे प्रिय गीतों मे से एक है। यहाँ फिर लगता है शास्त्री जी कहीं निराला से दो-दो हाथ कर रहे हैं । कहना कठिन है कि वे सहज सौंदर्य के कवि हैं ,लोकोन्मुख खेत-वन-उपवन- जनजीवन के कवि हैं या कि वैदिक ऋषि परंपरा के कवि हैं --
अंबर तर आया।
परिमल मन मधुबन का –तनभर उतराया।
थरथरा रहे बादल ,झरझरा बहे हिमजल
अंग धुले,रंग घुले –शरद तरल छाया।
पवन हरसिंगार-हार निरख कमल वन विहार
हंसों का सरि धीमी –सरवर लहराया।
खेत ईख के विहँसे,काँस नीलकंठ बसे
मेड़ो पर खंजन का जोड़ा मँडराया।
चाँदनी किसी की पी ,आँखों ने झपकी ली
सिहरन सम्मोहन क्या शून्य कसमसाया।
सुन्दरता शुभ चेतन ,फहरा उज्ज्वल केतन
अर्पित अस्तित्व आज –कुहरायी काया।
आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री सत्यं शिवं सुन्दरम् की अजस्र भाव धारा के कवि रहे हैं। उनके ये गीत राग रागिनियों में विधिवत निबद्ध हैं । वे किसी खास विचारधारा के कवि नही थे।अलबत्ता समालोचना की सभी धारायें जहाँ संगमित होकर प्रयाग की रचना करती हैं वहाँ से आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री को चीन्हने का जतन करना होगा। वे बहुपठित साधनासिद्ध कवि थे। वे मूलत:संस्कृत भाषा और साहित्य के आचार्य रहे हैं। अंग्रेजी-बांग्ला –हिन्दी आदि अनेक भाषाओं के विद्वान और अनेक भाषाओं के रचनाकार के रूप में उनकी ख्याति रही है। राका और बेला जैसी पत्रिकाओं के संपादक के रूप में उनकी छवि सभी हिन्दी जगत के विद्वानों में चर्चित रही है। हंसबलाका, निराला के पत्र, अनकहा निराला जैसी उनकी पुस्तकें हिन्दी साहित्य की संस्मरणात्मक आलोचना की दिशा को प्रखर करती हैं। डाँ.रामविलास शर्मा जी ने निराला पर काम करते हुए अनेक स्थलों पर शास्त्री जी का उल्लेख किया है। साहित्यिक गुटबंदियों से दूर मुजफ्फरपुर जैसे शहर में उन्होंने अपना पूरा जीवन व्यतीत किया । अपना खून पसीना लगाकर बेला जैसी साहित्यिक पत्रिका का संपादन करते रहे।अंतिम समय तक अपने निराला निकेतन मे गायों,बिल्लियों और संस्कृत परम्परा के निर्धन विद्यार्थियो को सदैव स्थान देते रहे।तथाकथित महान आलोचकों की दृष्टि में वे सदा अलक्षित ही रहे। गीतकारों और तमाम छंदधर्मी कवियों के वे आदर्श रहे हैं।छंदोबद्ध कविता के इतिहास मे जानकीवल्लभ शास्त्री जी जैसे महान कवियों का अवदान भारतीय काव्य परंपरा के विकास में स्वर्णाक्षरौं में लिखा जाएगा। अंतत: ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उनकी आत्मा को चिरशांति प्रदान करे तथा उनके परिजनो को यह दुख सहने की शक्ति प्रदान करे।

शनिवार, जनवरी 15, 2011

छंद प्रसंग: विहंगम आकलन

छंद प्रसंग: विहंगम आकलन
हिन्दी कविता-2010-विहंगम आकलन
संवेदना की जडे धरती से आसमान तक अपना नेटवर्क लगातार रचती हैं
भारतेन्दु मिश्र
शमशेर ने कहा था-मै वो आइना हूँ जिसमे आप हैं- अर्थात कविता वही होती हैंजिसमे आम आदमी के सरोकार साफ नजर आते है। इस आधार पर यदि हम गत वर्ष यानी 2010 कीकविता का आकलन करते हैं तो हमे कवियो की आम आदमी के प्रति प्रतिबद्धता साफ दिखाईदेती है।कविता कभी न खत्म होने वाली सदानीरा है।मनुष्य की अंतरचेतना की तमाम ध्वनियाँसदैव कविताओ मे प्रतिबिम्बित होती रहती है। कविता साहित्य की मुख्य विधा है कविताके अनेक रूप हैं।और हर समय मे सभी जगह कविता की विविध वर्णी छवियाँ सदैव विद्यमानरही हैं। जहाँ तक पिछले वर्ष मे हिन्दी कविता की स्थित का आकलन करने की बात है तोगत वर्ष मे भी हमारे सामने कविता की अनेक भंगिमाएँ दिखायी देती हैं,और उनमे झलकतीमार्मिक संवेदना के बिम्ब आकर्षित करते हैं। हमारे समय को नवीन भंगिमा से देखतेहुए अनेक कवि लगातार अपनी कविताओ के साथ उपस्थित मिलते हैं। वरिष्ठ कनिष्ठहरप्रकार के कवि अपनी तरह से इस वर्ष भी अपनी कविताओ के साथ इस वर्ष सबसे ज्यादाअंतर्जाल के ब्लागो,नेट पत्रिकाओ आदि मे खूब उभरे हैं। रामदरस मिश्र हो यादेवेन्द्र शर्मा इन्द्र,उदयप्रकाश,बोधिसत्व हो या अन्य कवि जिनमे सुनीताजैन,व्योमेश शुक्ल,बद्रीनारायण,गिरिराज किराडू,रंजना जैसवाल,अम्बरीशश्रीवास्तव,ऋषिवंश,रमेश प्रजापति,हरकीरत हीर,विमलेश त्रिपाठी,वन्दना शुक्ल आदि,सभी नए पुराने कवि नेट पत्रिकाओ पर लगातार अपनी कविताओ के साथ दिखाई देने लगे हैं।
नेट पर कविता की एक नई दुनिया लगातार आकार ले रही है। पूर्णिमा वर्मन कीअनुभूति पत्रिका के अलावा सृजनगाथा,गवाक्ष,अनहद आदि का महत्व लगातार दुनिया भर मे अंतर्जालके पाठको की दृष्टि से बढता जा रहा है। इन्हे लोग पढते भी हैं और टिप्पणियाँ भीकरते हैं। यहाँ मुक्त छन्द के अलावा दोहे हैं,गजले हैं,गीत हैं,नवगीत हैं।नवगीत कीतो पाठशाला चलायी जा रही है।
अब जब अधिकांश प्रकाशको ने कविता पुस्तके छापनी बन्द कर दी हैं,तो भी कविहारा नही है वह अपने सहयोग से ही अपनी कविताएँ प्रकाशित कराने मे लगा है। यह वर्षनेट पर प्रकाशित कविताओ की दृष्टि से क्रांतिकारी प्रगति लेकर आया है। जहाँ तक समकालीनकविताओ की विषयवस्तु की बात है तो उसमे कोई विशेष नयापन नही है किंतु प्रेम दुख- करुणा- राजनीति- बाजार की मार ,मँहगाई आदिके साथ व्यक्तिगत लालसाएँ भी कवियो की कविताओ के विषय के रूप मे सामने आयी हैं।
इसी वर्ष लीलाधर मंडलोई द्वारा सम्पादित कविता का समय शीर्षक काव्यसंकलन मे पच्चीस कवियो की कविताओ का संकलन किया गया है जिनमे अधिकांश कविनये हैं। लेकिन उनकी कविताएँ किसी तरह से कमजोर नही कही जा सकतीं। इस संकलन मेसविता भार्गव,प्रदीप जिलवाने,ज्योति चावला,अरुणा राय,रमेश आजाद,मंजुलिकापाण्डेय,विनोदकुमार सिन्हा,अरुण शीतांश,अच्युतानन्द मिश्र,ब्रजेश कुमार पाण्डेयजैसे नये पुराने कवि एकत्र उपस्थित हैं।
एकल संग्रहो मे रामदरस मिश्र केसंकलन-कभी कभी इन दिनो मे नई संवेदना की अनेक कविताए हैं,इस संकलन मेगीत,गजल,अन्य कविताएँ सब एकत्र है। बसंत हरसिंगार के अलावा कवि ने अपनी पत्नीसरस्वती जी पर कविता लिखी है जिसका शीर्षक है-सरस्वती जी पचहत्तर की हुई।विजेन्द्रका चौदहवा संकलन आँच मे तपा कुन्दन प्रकाशित हुआ है। नन्दकिशोर आचार्य काकविता संग्रह-गाना चाहता पतझड इसी वर्ष आया है। नन्द किशोर आचार्य कीकविताओ मे भाषा का माधुर्य और गीतात्मकता की आभा देखने को मिलती है। इसी क्रम मेविष्णु नागर का संकलन-घर के बाहर घर ,हेमंत शेष का संकलन-तथाकथितप्रेमकविताएँ मे प्रेम के विविध रंग है।,राजेन्द्र नागदेव का कविता संकलन-पत्थरमे बन्द आदमी मे बाजार की त्रासदी की पीडा के स्वर हैं।सुदीप बनर्जी का संकलन-उसेलौट आना चाहिए मे कवि के मृत्यु संघर्ष की त्रासदी के स्वर साफ तौर पर देखे जासकते हैं। कथाकार दूधनाथ सिंह का कविता संग्रह-युवा खुशबू और अन्य कविताएँशीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इन कविताओ मे कवि के अनेक काव्य बिम्ब आख्यानक शैली मेउभरे हैं। प्रभात पाण्डे ने हिन्दी मे उमराव जान पर लम्बी कविता लिखी है।इस कविता मे कवि का श्रद्धांजलि वाला स्वर बहुत मार्मिक बन पडा है।
इसके अतिरिक्त गोरखपुर के कविगणेश पाण्डेय के कविता संग्रह जापानी बुखार मे नयी संवेदना की मार्मिकतादेखे-
क्या पहले भी मच्छर के काटने से /मर जाते थे कपिलवस्तु के लोग/क्या पहलेभी धान के सबसे अच्छे खेतों मे /छिपे रहते थे जहरीले मच्छर/जापानी।
शशिशेखर शर्मा का संकलन-हरसिंगार के सपने,युवा कवि प्रेमशंकर शुक्लका संकलन-झील एक नाव है मे कवि पानी और झील की चिंताओ के स्वर है। राधेश्यामतिवारी का संकलन-इतिहास में चिडिया मे भी घर और बाहर की मार्मिक कविताएँहैं। विनोद कुमार के संकलन नीलीआग से गुजरते हुए मे-संडासमे मरे हुए आदमी का चेहरा जैसी अत्यंत मार्मिक कविताएँ हैं।
सन2010 केदार नाथ अग्रवाल,नागार्जुन,शमशेर ,अज्ञेय जैसे कवियो की जन्मशतीका वर्ष भी रहा। अनेक स्तरो पर कविता की व्याख्याए और पुनर्पाठ भी इस वर्ष हुए।इसी समय मे अष्टभुजा शुक्ल जैसे अपनी माटी से जुडे कवियो की भी कविताएँ लगातार आयीहैं। अखबारी रिपोर्टिंग की तर्ज पर तो नमालूम कितनी ही कविताएँ लगातार प्रकाशितहोती रहती हैं। इस बरस कविता के खाते मे भले ही कुछ बहुत बडा काम नहुआ हो तो भीहिन्दी कविता के खाते मे लगातार नई विकसित मार्मिक व्यंजनाएँ तो देखने को मिलती हीहैं। भारतीय ज्ञानपीठ ने अज्ञेय संचयन का प्रकाशन किया है।जिसका सम्पादनव्रि.कवि कन्हैयालाल नन्दन ने किया है। बच्चन जी कविताओ का संचयन अमिताभ बच्चन नेकिया है। इसके साथ ही उल्लेखनीय यह भी रहा कि इसी वर्ष कविवर
अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध ग्रंथावली का भी प्रकाशन हुआ है। लीलाधर मन्डलोई के दोकविता संकलन प्रकाशित हुए हैं जो क्रमश: -एक बहुत कोमल तान और लिखे मेदुक्ख है। ये छोटी कविताएँ है जो सूक्तियो की शैली मे सीधा प्रभाव करतीहैं। सुनीता जैन के दो कविता संग्रह आये हैं-हरेवा और रसोई की खिडकी सेये दोनो काव्य संकलन कवयित्री की सतत सक्रियता को प्रमाणित करते हैं। किरण अग्रवालका कविता संग्रह-रुकावट के लिए खेद है,रश्मि रेखा के कविता संग्रह सीढियोका दुख मे नारी विमर्श की कुछ नई कविताएँ देखने को मिलती हैं। स्त्री के घरसंसर की नई लय को कवयित्री पकड कर चलती है। चित्रकार वन्दना देवेन्द्र के कवितासंग्रह- आत्महत्या के पर्याय मे भी स्त्री दुख के अनेक बिम्ब देखने कोमिलते हैं।
यह कविता का एक पक्ष है कविता के छान्दसिक पक्ष की बात भी समग्र कविता केआइने मे अपनी स्पष्ट छवि के साथ लगातार पर्तिबिम्बित होती रही है गीत,नवगीत,दोहे,गजल आदि रचने वाले कवि भी कविता की नई भूमिका रचते हैं।
वरिष्ठ गीतकार देवेन्द्र शर्मा इन्द्र का गजल संग्रह भूला नही हूँ मैंइसवर्ष आया है एक अशार देखे-
रात भर जागते रहे हैं हम
धुन्ध मे गुमशुदा सहर के लिए।
अस्सी की उम्र के करीब पहुचने वाले इन्द्र जी ने नवगीत,दोहे और गजल केअलावा अनेक विधाओ मे लगातार कविता की है। सम्भवत; यह कवि का पच्चीसवाँ कवितासंग्रह है। वो आज भी किसी खूबसूरत सुबह की प्रतीक्षा मे हैं। कवि का स्वभाव ऐसा हीहोता है। एक और अशार देखे अभी और कहने की तमन्ना कवि मे बाकी है-
अभी तो छेडा है साज मैने/अभी जुबाँ तक हिली नही है
जो सबके दिल को पसन्द आये वो बात मैने कही नही है।
छन्द प्रसंग की बात को और आगेबढाते हुए आगे चलते हैं इसीवर्ष गीतकार वीरेन्द्र आस्तिक द्वारा सम्पादित समकालीन गीत संग्रह-धार पर हम -2का प्रकाशन हुआ है।इस गीत संकलन में नए पुराने सोलह कवियो के गीत संकलित हैं जिनकेनाम क्रमश:-कुमार रवीन्द्र,मधुसूदन साहा,अश्वघोष,राम सेंगर,नचिकेता,विष्णुविराट,महेश अनघ, महेन्द्र नेह, योगेन्द्र दत्त शर्मा,ओमप्रकाश सिंह,राजेन्द्रगौतम,विनोद श्रीवास्तव,जयचक्रवर्ती,भारतेन्दु मिश्र,यशोधरा राठौर और मनोज जैन मधुरके नाम शामिल हैं। कविता के खाते मे इस गीत संकलन का अच्छा प्रभाव कहा जा सकता है।विशेष उल्लेखनीय यह भी रहा कि इस पुस्तक के बहाने क्रमश: कानपुर और भोपाल मे गीतनवगीत विमर्श पर केन्द्रित गैर सरकारी आयोजनो के माध्यम से संगोष्ठियाँ भी आयोजितकी गयीं|
इसे कविता के लोकस्वर का प्रकटीकरण भी कहा जा सकता है। वरिष्ठ नवगीतकारकुमार रवीन्द्र का एक गीत देखें-
कहो सुगना/हाल क्या है अब तुम्हारा/कटे जंगल/नदी रुक रुक कर बही/सडक आयीहै तुम्हारे गाँव तक/यह है सही/गया है वनदेवता का घर सँवारा/द्वार पर/रथ खडा सपनोसे लदा/मत कहो वह साथ लाया आपदा/बावरी हो/खोजती तुम शुक्र तारा/शहर तक तुम जासकोगी जब कभी/वहीं पर तो /हाट हैं ऊँचे सभी/बेचना तुम /वहाँ अपना मन कुँआरा।
नई संवेदना को न्योता देते हुए वरिष्ठ गीतकार नचिकेता कहते है-

आना जैसे /लहू धमनियो मे आता है/और नयन मे खुशियो का जल भर जाता है/बनकेमीठी नजर/थके तन को सुहराना/आना /मेरे घर हर दिन /उत्सव सा आना।
इसी क्रम मे युवा कवयित्री यशोधरा राठौर के उलझे सवाल गीत का अंश देखें-
खडी खडी /मै सोच रही हूँ/झोल समय का /नोच रही हूँ/काला कुछ /दिख रहा दालमें /फँसी मकडियाँ रही/ जाल में/मै उलझी उलझे सवाल में।
एक और युवा गीतकार मनोज जैन मधुर का गृहरति व्यंजना वाला स्वर देखे-

गहन उदासी अम्मा ओढे/शायद ही अब चुप्पी तोडे/चिडिया सी उड जाना चाहे/तनपिंजरे के तार तोडकर/चले गये बाबू जी /घर मे /दुनिया भर का /दर्द छोडकर।
इसप्रकार धार पर हम -2 सचमुच एक गीतो का एक अच्छा सकलन कहा जा सकता है।
कविता सन 2010 के खाते मे ऐसेसमवेत संकलनो का ऐतिहासिक महत्व है। इसके साथ ही इस वर्ष बैसवाडी भाषा के गीतो कासंग्रह आया है जिसके कवि हैं चन्द्र प्रकाश पाण्डेय।पुस्तक का शीर्षक बैसवाडीके नये गीत है। ये गीत जायसी तुलसी वाली भाषा मे कवि ने रचे हैं।यही कवि कीमातृभाषा है। घर मे काम करने वाली नौकरानी रामकली का चित्र देखें-

कामे काजे रामकली/अटके चारे रामकली/आँगन और/दुआरु बट्वारै/लरिका चकियाचूल्हु सँभारै/ख्यात निरावै रामकली।
इस वर्ष भी गीतो के अनेक संकलन आये हैं जिनमे- श्रीकृष्ण शर्मा का
एक अक्षर मौन,वरिष्ठ कवि अनुराग गौतम के दो गीत संकलन क्रमश;-सोनजुहीकी गन्ध और आँगन मे सोनपरी प्रकाशित हुए हैं। अन्य उल्लेखनीय गीतसंकलनो मे क्रमश;- यतीन्द्रनाथ राही का-अँजुरी भर हरसिंगार ,मधुसूदन साहाका-
सपने शैवाल के,नेहा वैद का चाँद अगर तुम रोटी होते,अजय पाठक का
गीत मेरे निरगुनिया और देवेन्द्र सफल का-लेख लिखे माटी ने आदि काप्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। कहा जा सकता है कि हिन्दी कविता मे गीत नवगीत की आँच अभीमन्द नही पडी है।ये सब कवि छन्दोबद्ध कविता के अनुयायी है इस लिए इनके पास अनुभूतिकी गहनता तो है किंतु विचार की स्पष्टता कुछ ही गीतकारो के गीतो मे मिलती है।
आगे बढकर देखते है तो इसी वर्ष वरिष्ठ गजलकार जहीर कुरेशी की कविताई कोरेखांकित करते हुए उनपर अभिनन्दन ग्रंथ प्रकाशित हुआ हैजिसका शीर्षक जहीर कुरेशी महत्व और मूल्यांकन। हिन्दी गजलऔर नवगीत की दृष्टि से जहीर कुरेशी एक महत्वपूर्ण नाम है। युवा कवि विनय मिश्र नेयह काम बहुत सुन्दर ढंग से किया है। जहीर साहब की एक गजल के कुछ अशार देखें

नवयुवक दूध के उफान मिले/उनकी बातों मे आसमान मिले।
हँसते चेहरो को खोदकर देखा/लोग दुख दर्द की खदान मिले।
लोग कुत्तो से बेखबर निकले/लोग मित्रो से सावधान मिले।
गजलो के क्षेत्र मे कुछ अन्य नाम इस प्रकार है-किशन स्वरूप का गजल संग्रह-आहट,मेयारसनेही का संग्रह-खयाल के फूल और सखावत शमीम का संग्रह-खाब की रहगुजरआदि इस साल के उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं।
गीत और गजल के साथ ही हिन्दीकविता मे पिछले दो दशको से दोहो की खूब चर्चा होती रही है। लगातार बीस वर्षो सेदोहा कहते चले आ रहे पाल भसीन के सद्य; प्रकाशित काव्य संकलन मे कवि के गीतो केसाथ ही उनके एक सौ पन्द्रह दोहे संग्रहीत हैं। कहना न होगा कि पाल भसीन हिन्दी मेदोहा आन्दोलन के उन्नायक रहे हैं। संकलन का शीर्षक है-खुशबू की सौगातसंग्रह के दो दोहे देखे-

अब न कहूँ तो कब कहूँ/सहूम कहाम तक और
पीडा के इस घाट का/मै ही क्यो सिरमौर?
अपनापन अब बोझ है/रहा न मन का चाव
नही बचेगी डूबती-सम्बन्धो की नाव।
गीतकार देवेन्द्र सफल के एक गीतका अंश देखे कि किस प्रकार छन्दोबद्ध कवि लगातार अपने लोक को और जीवन के सरोकारोको संवेदना के शिल्प मे बाँधता चला आ रहा है-

सुना गाँव मे मरा भूख से /तडप-तडप महिपाल/अच्छा हुआ शहर तुम आये भैया मोतीलाल/सिकुड गये हैं खेत /एक बीघे के ग्यारह हिस्से/आये दिन लाठी चलती है/सुने सभीके किस्से/नमक न सहज/मयस्सर/अब तो दुर्लभ लगती दाल।
अंतत:इस वर्ष भी कविता के खातेमे लगातार नयी संवेदना की सघन व्यंजना मे वृद्धि हुई है। इस कठिन समय कीअभिव्यक्ति समकालीन कवियो ने लगातार की है।सन 2010 मे मराठी के बडे कवि नारायणगंगाराम सुर्वे का निधन हो गया अपने कठिन समय को जीते हुए नारायण सुर्वे की कविताका नामदेव ढसाल द्वारा किया हिन्दी अनुवाद देखें-कविता का शीर्षक है-मुश्किल होताजा रहा है

हर रोज खुद को धीरज देते जीना मुश्किल होता जारहा है/कितना रोके खुद हीखुद को मुश्किल होता जारहा है/फूट-फूटकर रोने वाले मन को,थपकियाँ दे देकर सुलाताहूँ/भूसी भरकर बनाए हुए पशु को देखकर,रुकना मुश्किल है/समझौते मे ही जीनाहोगा,जीता हूँ,पर रोज,मुश्किल होता जा रहा/अपना अलग से अस्तित्व होते हुए भी,उसेनकारना,मुश्किल होता जा रहा/समझ पाता हूँ,समझाता हूँ,बावजूद समझाने के,नही समझपाता हूँ/कोठरी मे जलती दियासलाई नही गिरेगी,इसकी गारंटी देना,मुश्किल होता जा रहाहै।
हमारे कवि लगातार इस मुश्किल समय मे अपनी कविताओ के उजाले से ही आगे बढते रहेहै। आशा है यह क्रम सतत यूँ ही जारी रहेगा।