सोमवार, जून 27, 2016


सच से साक्षात्कार कराते गीत(पाठकीय प्रतिक्रिया )
#राकेश कुमार श्रीवास्तव
         
 जब कोई युवा गीतकार किसी वरिष्ठ गीतकार के गीतों को पढ़ता है। तो उसकी स्थिति समंदर के किनारे बैठकर कंकड़ बीनने जैसी होती है। वह अपने कद के नाप तौल में जुट जाता है। कई भरम टूट जाते हैं। रश्मि शील जी द्वारा सम्पादित पुस्तक"अनुभव की सीढ़ी"में जब मैंने भारतेंदु जी के नवगीतों को पढ़ा तो लगा कि गीतकार कहलाने में और होने में कितना फर्क होता है। मंचो ने गीत को आम आदमी से दूर कर दिया है। ऐसे में भारतेंदु जी जैसे वरिष्ठ नवगीतकारों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। युवा कवि जो संभावनाशील हैं वे मंचो की ओर दौड़ रहे हैं या यूँ कहें यथार्थ से दूर हो रहे हैं। गीत इस समय कठिन दौर में है।नए कवि सपाट बयानी में रत हैं ऐसे में भारतेंदु जी के गीत उम्मीद की किरण हैं।और इस किरण को और उजास देने का भागीरथी प्रयास डॉ रश्मी शील शुक्ला ने किया है जिन्होंने भारतेंदु जी के नवगीत रूपी मोतियों को एक सुन्दर हार के रूप में जोड़ कर प्रस्तुत किया है। इस हार की खासियत यह है कि ये कहीं से भी ढीला नहीं है। गीत प्रेमियों के लिए ये अनुपम उपहार है।
            आज जब मंचो के ग्लैमर में लोग प्रायोजित लेखन करने में लगे हैं तब भारतेंदु जी जैसे रचनाकार ही हैं जो हमें यथार्थ का बोध करा रहे हैं। उनके गीतों में कहीं भी बनावटीपन नहीं है। उनके गीत सच का साक्षात्कार कराते हैं। शोषण पर तंज़ देखिये-
      "एकनिष्ठ बगुले का
        सहज लक्ष्य बोध
        एक टांग खड़े खड़े
        मछली का शोध।।"
वर्तमान समय में व्याप्त भय, असुरक्षा , असंतोष, पर कवि ने पूरी ताकत से कलम चलाई है। समाज में व्याप्त विसंगतियों को सामने लेन का काम कलम करती है। कलम अगर अपने दायित्व से मुख मोड़ ले तो लेखन उदेश्य हीन हो जाता है। भारतेंदु जी जैसे गीतकार अपनी जिम्मेदारियां खुद तय करते हैं और उन्हें  प्रण पूर्वक पूरा करने का साहस भी दिखाते हैं ।
         "वय के गलियारे में पैर डगमगाते हैं
          रास्ते अपरिचित हैं किन्तु बढे जाते है।।" कवि अपरिचित और कठिनाई भरे रास्तों पर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है यही कवि का धर्म होता है कि वह हमें नैराश्य से बहार निकाले। हमारी ऊर्जा का हमें अहसास कराये। कवि ने व्यंगात्मक लहज़े में अपनी बात कही है ।सपाट बयानी तो उनके गीतों से कोसों दूर है। यही व्यंजना पाठकों को जोड़े रखती है। उनके गीत भीतर तक मार करने वाले हैं। वे हमें सोचने पर विवश करते हैं। यही कवि की सफलता है। वे कहते हैं-
   "अगस्तयों ने पि लिया है सिंधु का सब जल
     और हर मछली तड़पती प्यास से घायल
     ढल गई कविता किसी बूढ़ी तबायफ सी।।"
उनके द्वारा प्रयोग किये गए प्रतीक सटीक मार करते हैं।
              विश्व् अब बाजार हो गया है। हर चीज़ बिकने को तैयार है। कवि की चिंताए इस बात को लेकर है कि कहीं इस दौड़ भाग में हम अपनी संस्कृति एवं अस्तित्व को न खो बैठें। और उसका ऐसा सोचना निरार्थक भी नहीं है।बड़े देश हमेशा छोटे देशों के प्रति दुराग्रह रखते हैं। उन्हें हम केवल बाजार दिखाई देते हैं। इसका दुष्प्रभाव हमारे देश पर भी पड़ा है।-"नेताओं की एक राय है
                     यह दुनिया बाजार बने।
                    हंसिया सुई हथौड़ा छोडो
                   मानव बम हथियार बने।
      कवि अपने गांवों के भोलेपन को बचाना चाहता है। यद्यपि वह विकास का पक्षधर है परंतु अंधे विकास का विरोधी भी। शहरी संस्कृति लोगो को दूर करती जा रही है। हमारे देश का आधार लोगों का आपसी प्रेम और सौहार्द्र रहा है जो अब टूट रहा है।"यह शहर है
     चीख सुनकर कौन रुकता है
      बहुत पक्के स्वार्थ निर्भर
    लोग अपने घाव खुद ही चाटते।।"
  राजनीती पर बहुत बातें होती हैं कवि ने भी राजनीति पर प्रहार किये हैं। राजनीति में वंशवाद को कवि ने निशाना बनाया है। वंशवाद वर्तमान राजनीति का सबसे कलुषित पक्ष है। इसके अलावा भी कवि ने मर्यादित होकर रणनीति पर करारे प्रहार किये हैं
   "गूंगे बहरे दरवारी हैं अन्धो का दरवार लगा है
   भीष्म द्रोंण छटपटा रहे हैं दुर्योधन का कर्ण सगा है।
ऐसे में समता की भिक्षा मांग रहे कुछ लोग यहाँ"।
       निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है क़ि,"अनुभव की सीढ़ी"पुस्तक में भारतेंदु जी के श्रेष्ठ नवगीतों को संकलित कर डॉ रश्मि जी ने एक महत्वपूर्ण कार्य किया है। इतने श्रेष्ठ नवगीतों को एक पुस्तक का स्वरुप देकर उन्होंने पाठकों को उपकृत किया है। भारतेंदु जी के बारे में मुझ जैसे छोटे कलमकार के द्वारा इतना ही लिखा जा सकता है कि हमारी पीढ़ी गर्व करेगी कि वे हमारे समय में थे। यह हमारे लिए गौरव की बात है। श्रेष्ठ नवगीतों के संकलन के लिए डॉ रश्मिशील शुक्ल जी को बहुत बधाइयाँ।
राकेश कुमार श्रीवास्तव
युवा गीतकार
सेंवढ़ा जिला दतिया मध्यप्रदेश
मोबाइल 09977527170
पिन 475682

सोमवार, मार्च 21, 2016


नवगीत की आत्मा और पूर्णिमा जी के ज्वलंत प्रश्न

जन का अर्थ है सामान्य मनुष्य-नवगीत मे सामान्य मनुष्य की पीडा और उसके सरोकारो की बात होती है।उस सर्वहारा की संवेदना/संघर्ष कथा/व्यंजना आदि।जन का विलोम है अभिजन।जन की पक्षधरता ही नवगीत की आत्मा है।हमारे मंचीय गीतकारो का समाज अभिजन की सेवा मे लगातार लगा रहा उन्हे ही खुश करता रहा है।उनका कीर्ति गायन नवगीत का लक्ष्य कभी नही रहा।दुनिया भर मे आज भी हाथ का काम करने वाले लोगो की संख्या अधिक है।उन्हे अनुशासित करने वाले लोगो की संख्या कम है।किसान /मज्दूर/कामकाजी महिलाए/सुरक्षाकर्मी/नर्स/इन छोटे छोटे कार्यो से जीवन निर्वाह करने वाले लोगो से 'जन' निर्मित होता है इनके पक्ष मे खडे होना ही नवगीत का अभिप्रेत रहा है।असल मे वही हमारी परंपरा है।महात्मा गान्धी ने क्यो आधी धोती ओढकर पूरी दुनिया को अपनी जनवादी लाठी से अपने सिद्धांतो का लोहा मनवाया।नेल्सन मंडेला ने कैसे जन के पक्ष मे लडकर जेल से संघर्ष करते हुए सत्ता को पराजित किया फिर नई व्यवस्था लागू की।अपने स्वार्थ के लिए सत्ता के पक्ष मे खडे होकर हम सत्ता के दलाल बन जाते हैं।इसीलिए दरबारी कवियो को इतिहास मे कभी सम्मान की दृष्टि से नही देखा गया।मंचीय गीतकार अक्सर मौका देखकर उत्सवधर्मी रचनाए लेकर ताली पिटवाते रहे।वह नवगीत का रास्ता नही है।जनपक्ष के लिए व्यापारिक घरानो/राजनीतिक दलालो/सत्ता के सहयोगियो/धार्मिक भक्तजनो -मौलवियों -पादरियों से अलग सोचवाले लोगो पर तटस्थ होकर विचार करना आवश्यक है।ऐसे लोग बहुत कम है जो धर्म की सत्ता चलाते है/जो राजनीति की सत्ता संभालते है/व्यापारिक जगत पर राज करते हैं।नवगीत उनके विपक्ष मे संघर्ष करने वाले आम जन के पक्ष मे खडा होता है।
पूर्णिमा वर्मन-इसका अर्थ क्या यह समझना चाहिये कि
1. अगर कोई रचना अभिजात वर्ग के विषय में, उनकी मनोदशा के विषय में, उनकी सोच के विषय में लिखी, अभिजात वर्ग के द्वारा लिखी जाती हैं तो वे नवगीत नहीं हैं।
2. उत्सवधर्मी रचनाएँ नवगीत नहीं है।
3. नवगीत व्यापारिक घरानों, राजनीतिक तंत्र, सत्ताधारियों, व्यापारियों का विरोधी है।
4. नवगीत धर्म, सत्ता और राजनीति का तख्ता पलटने के लिये लिखी गई कविता है।
5. किसी देवता या मनुष्य के प्रति लिखा गया गीत नवगीत नहीं है।
6. अभिजात वर्ग की उपस्थिति से गीत नवगीत की जाति से बाहर हो जाएगा।
7. उत्सवों और पर्वों पर लिखे गए गीत नवगीत से बाहर हैं।
8. और अब मुझे यह भी समझ में आ रहा है कि होली दीवाली पर लिखे गये गीत नवगीत नहीं हो सकते हैं सिर्फ ईद पर लिखे गए गीत नवगीत हो सकते हैं जैसा कि नवगीत महोत्सव में भारतेन्दु जी ने इशारा भी किया था....
LikeReply19 March at 10:32Edited
Bhartendu Mishra जी हां नवगीत दरबारी कविता का मार्ग नही है।वह केवल होली दीपावली और दुर्गा पूजा का गीत नही है।वह विजय माल्या की प्रशंसा का स्वर नही है।वह किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की वन्दना नही है।वह राम और कृष्ण की स्तुति भी नही है।वह बहुजन समाज(बसपा वाला नही) का पक्षधर है।ये व्यापारिक प्रतिष्ठान वाले,सत्ताधारी और धर्म की राजनीति करने वाले बहुत थोडे से हैं ।लेकिन ये पैसा खर्चकरके कुछ भी लिखवा सकते हैं।अभिजन को बहुसंख्यक मानवीय मूल्यो को समझना होगा और साबित करना होगा कि वे व्यापक मनुष्यता के पक्ष मे खडे हैं,सभी धर्मो के साथ हैं,तभी वे नवगीत की आत्मा को समझ सकते हैं ।

रविवार, मार्च 20, 2016


टिप्पणी-- 
वंचितो का नवगीत स्वर

# डा.भारतेन्दु मिश्र


नवगीत मे सीधेतौर पर मनुवादी व्यवस्था पर चोट करने वाले कवि कम ही हुए हैं।ज्यादातर नवगीतकार अपनी उत्सवधर्मिता और अतीत गायन के लिए चर्चित रहे हैं।पिछले कुछ दशको मे जैसे जैसे सामाजिक आर्थिक मनोवैज्ञानिक और तकनीकी विकास हुआ है सभी अनुशासनो मे परिवर्तन हुआ है।नवगीत चेतना मे भी यह परिवर्तन इसी रूप मे लक्षित किया जा सकता है।ऐसी ही चेतना के नवोदित नवगीतकार जगदीश पंकज जी है गत वर्ष 2015 मे जिनके दो नवगीत संग्रह क्रमश:’सुनो मुझे भी’ और ‘निषिद्धो की गली का नागरिक’ प्रकाशित हुए हैं।कवि का स्वर सधा हुआ है।उसकी दृष्टि परिपक्व है।जगदीश पंकज अवकाशप्राप्त बैंक मैनेजर हैं।स्पष्ट है कि उम्र के साठ बसंत देखने की बाद दैनन्दिन जीवन का कूट गरल पीने के बाद जब अभिव्यक्ति की भंगिमाएं प्रखर हो जाती हैं तब गीत फूटता है।इन परिस्थितियो मे नवगीत लेखन मे सक्रिय रूप से भागीदारी करने का एक और बडा कारण यह भी कि कवि जगदीश पंकज अखिल भारतीय नवगीत चेतना के सर्जक श्री देवेन्द्र शर्मा इन्द्र के पडोसी भी हैं।निश्चित है कि जगदीश पंकज जी सोच समझकर गीत नवगीत की सृजन भूमि से जुडे। किसी फैशन या मंचीयता के व्यामोह ने उन्हे नही आकर्षित किया।पिछले एक वर्ष मे ही उनका रचनात्मक दायरा भी बढा है।इसके मूल मे उनके नवगीत ही हैं।तात्पर्य यह कि जगदीश पंकज उपेक्षितो दलितो की दुर्दशा का स्वर बनकर उभरते हुए नजर आ रहे हैं--
कितने हरे कितने भरे/हैं घाव मन के /दह के
केवल नही तन पर लगी/है चोट मन की भीत पर
अनगिन विरोधाभास हैं/कानून की हर जीत पर
पर पोथियो मे भी नही /आखर मिले कुछ नेह के।
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की 125 वीं जयंती वर्ष मे दलित स्वाभिमान को लक्षित इस गीत की भंगिमा सचमुच नवगीत के लिए उल्लेखनीय है--
सह रहा है/पीठ पर वह/हर तरह के वार/पर झुकता नही है
धर्म धन धरती नही/पर हाथ मे धन्धा/हर तरह की नीतियो को
दे रहा कन्धा/वह दलित/वह सर्वहारा/वक्त से लाचार/पर रुकता नही।
ऐसा नही है कि नवगीतकारो मे इस प्रकार की अभिव्यक्ति देने वाले कवि पहले नही हुए।रूपवादी या पारंपरिक कलावादी खासकर मंचीय गीतकारो को छोडकर उपेक्षितो और दलितो के पक्ष मे खडे होना तो प्रत्येक कवि का पहला कर्तव्य रहा है।इन नवगीतो मे कवि के अपने निजी अनुभव भी शामिल हैं।कवि की यह निजता जब करोडो दलितो और उपेक्षितो के स्वर का रूप लेती है तो उसका महत्व और भी बढ जाता है।वर्ग चेतना का यह स्वर देखिए-
राह मे लेकिन खडे हैं /भेडियो के दल
एक काला कल गया /आना अभी है एक जलता कल।
इसी प्रकार आगे देखिए लगता है कवि दलित स्वर को ही नवगीत बद्ध कर रहा है।सचमुच हर एक संविधान संशोधन उसके और उन जैसे दलितो के जीवन मे बार बार बदलाव को चिन्हित करता है  -
हम असीम वर्जना लिए हुए/जी रहे संशोधनो के नाम पर।
एक और अभिव्यक्ति का स्वर देखिए-
भीड मे भी तुम मुझे पहचान लोगे
मै निषिद्धो की गली का नागरिक हूं।
जाति को लेकर होने वाले संघर्षो और अत्याचारो को नियंत्रित करने में व्यापक  सामाजिक बदलाव लाने की आवश्यकता है।यह कार्य केवल सरकार या समाज के केवल एक वर्ग के चाहने भर से नही होगा।बहरहाल कवि के पास वंचितो और दलितो का प्रवक्ता बनने के सभी गुण विद्यमान है ।इन नवगीतो का स्वर हमे एक ईमानदर यथार्थवादी सामाजिक चेतना से जोडता है।कवि को बधाई इन श्रेष्ठ नवगीतो के लिए।
संपर्क
सी.ब्लाक 45/वाई-4 दिलशाद गार्डन,दिल्ली-110095

    

रविवार, फ़रवरी 21, 2016

समीक्षा:

बिहार की गीत चेतना का दस्तावेज
#भारतेन्दु मिश्र
बिहार एक ऐसा प्रदेश है जहां अनेक सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनो के साथ ही साहित्यिक विधाओ और साहित्यिक आन्दोलनो को भी बल मिला।अनेक विश्वविख्यात लेखक और कवियो की भूमि बिहार है।भाई रणजीत पटेल द्वारा संपादित यह पुस्तक समकालीन हिन्दी गीत परंपरा को रेखांकित करने की दिशा मे बेहतरीन प्रयास है।
”गीत विहंग विहार’ हिन्दी गीतो का केवल एक नया संकलन ही नही है।यह हिन्दी गीत के विकास मे बिहार का योगदान प्रदर्शित करने जैसा कार्य भी नही है।इसका लक्ष्य है गीत के पक्ष मे वातावरण बनाना।गीत का पर्यावरण कई कारणो से दूषित हुआ है पर इतना भी दूषित नही हुआ है कि उसे हाशिए पर धकेल दिया जाये।“-(पृ.19- गीत विहंग विहार) सही तर्क है यह रेवतीरमण जी का इस नजरिये से हिन्दी साहित्य की गीत कविता का मूल्यांकन किये जाने की आवश्यकता है।
समकालीन समवेत संकलनो की परंपरा मे ‘गीत विहंग विहार’ एक सार्थक प्रयास है।भाई रणजीत पटेल ने गीत नवगीत की धरती मुजफ्फरपुर की अपनी गरिमा को आगे बढाने का सराहनीय कार्य किया है।भाई पटेल जी से गत लखनऊ नवगीत महोत्सव-2015 मे भेंट हुई तभी उन्होने मुझे इस पुस्तक की प्रति भेट की थी। पटेल जी का यह कार्य कई दृष्टियो से बेहद आश्वस्ति की सूचना देने वाला है।इस ग्रंथ मे संपादक पटेल जी ने पैंतीस गीत नवगीत के नए पुराने कवियो का परिचयात्मक विवरण दिया है और उनके पांच पांच गीतो को भी संकलित किया है।खासकर रेवतीरमण जी की भूमिका के रूप मे गीत परंपरा पर की गयी टिप्पणी बेहद पठनीय और सारगर्भित है।बिहार की धरती से गीत नवगीत के जो स्वर उठे और उनका किस तरह से पर्यवसान हुआ,यह तथ्य भी जानकारी के लिए इस पुस्तक को पढना चाहिए।
पुस्तक मे जिन पैतीस गीतकारो को समेकित किया गया है उनमें क्र्मश:-केदारनाथ मिश्र प्रभात,रामधारी सिंह दिनकर,गोपाल सिंह नेपाली,आरसी प्रसाद सिंह,रामगोपाल शर्मा रुद्र,आचार्य जानकीवल्लभ शस्त्री,हंस कुमार तिवारी,उमाकांत वर्मा,विन्ध्यवासिनी दत्त त्रिपाठी,रामचन्द्र भूषन,रामनरेश पाठक,राजेन्द्र प्रसाद सिंह,श्यामनन्दन किशोर,सत्यनारायन,गोपीवल्लभ सहाय,हरिहर प्रसाद चौधरी नूतन,अमरेन्द्र कुमार पुतीन,दिनेश भ्रमर,महेन्द्र मधुकर,रिपुसूदन श्रीवास्तव,मृत्युंजय मिश्र करुणेश,ज्ञानशंकर शर्मा,मार्कण्डेय प्रवासी,शांति सुमन,द्वारिका राय सुबोध,नन्दकिशोर नन्दन,नचिकेता,हृदयेश्वर,बुद्धिनाथ मिश्र,उदयशंकर सिंह उदय,रवीन्द्र उपाध्याय,संजय पंकज,यशोधरा राठौर,विश्वनाथ,संजय कुमार शांडिल्य के नाम शामिल हैं।
निश्चित रूप से एक साथ इतने गीत कवियो की बहुआयामी रचनाशीलता की बानगी इस पुस्तक द्वारा प्रस्तुत की गयी है जो बिहार की गीतवाहिनी परंपरा का एक श्रेष्ठ दस्तावेज है।सभी कवियो का साहित्यिक परिचय और पांच पांच गीत संपादक द्वारा चुनकर एकत्र किये गये हैं।भाई रणजीत पटेल का यह श्रमसाध्य कार्य सचमुच सराहनीय प्रयास है।अपनी गीत परंपरा को नये पुराने गीतकारो को जिस प्रकार से संपादक ने एकत्र रेखांकित करने का प्रयास किया है वह छीजती कविता को संरक्षित करने वाला कार्य है। इस सन्दर्भ पुस्तक मे चयनित गीतो का कलेवर कितना आकर्षक और सारगर्भित है यह कुछ निम्न पंक्तियो से पढकर समझा जा सकता है--
 +घोर अन्धकार हो/चल रही बयार हो/आज द्वार द्वार पर यह दिया बुझे नही/यह निशीथ का दिया ला रहा विहान है।(नेपाली)
+आयी है कमरे मे धूल भरी शाम/लाल लाल सूरज को आखिरी सलाम।(आरसी प्रसाद सिंह)
+गीतो मे ही फूट रहा हूं मै/गीतो मे ही आगे भी खिलू खुलूं।(रामगोपाल शर्मा रुद्र)
+किसने बांसुरी बजाई/जनम जनम की पहचानी/वह तान कहां से आयी।(आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री)
+चिप्पियां लगी हवा/चस्पां होते खेत/कहां हैं/हम फिसले जा रहे/धूप की ढलान पर।(रामचन्द्र चन्द्रभूषण)
+गांव गांव बुझ गये अलाव/सर्द तेज चल रही हवा/दूर कहीं पर्वत पर बर्फ पद रही/गलियो की रंगीनी जर्द कर रही।(राम नरेश पाठक)
+सुबह की हवा/खुनक से भरी/बिछलने लगी/समय की/रुकी नदी पर तरी।(राजेन्द्र प्रसाद सिंह)
+सभाध्यक्ष हंस रहा /सभासद कोरस गाते हैं/जय जयकारो का अनहद है /जलते जंगल में।(सत्यनारायण)
+गीत दो लिखे मैने/जन्म के मरण के/एक तुम न सुन सकीं/एक मै न गा सका।(गोपी वल्लभ सहाय)
+थाली उतनी की उतनी ही/छोटी हो गयी रोटी/कहती बूढी दादी अपने गांव की।(शांति सुमन)
+यह आजादी/खेल तमाशा है/खाली दीवारो पर चमके/दगाबाज नारे/बदले क्यो तारीख/बदलती हर दिन सरकारें।(नचिकेता)
+लहरो को छौंक गये/पिछले सब गीत वर्ष/एक बून्द रुनके /तो सात पहर गाये/एक बून्द बांसुरी बजाये।(हृदयेश्वर)
+कोसी गाती कमला गाती है/काली गाती है/नदियो के संग धरती की /हरियाली गाती है।(बुद्धिनाथ मिश्र)
+चान्दनी पर लिखो चर्चा मे रहोगे/घाम पर जो लिख रहा-गुमनाम है।(रवीन्द्र उपाध्याय)
+सात रंग से रची अल्पना/सजी कल्पना प्यार पर/हल्दी लगी हथेली अम्मा/छाप गयी है द्वार पर।(संजय पंकज)
+मै खडी हूं/उस गली के मोड पर/जिस गली मे /रंग के चेहरे उडे/चोट से नाखून पांवो के मुडे।(यशोधरा राठौर)
+कहीं नही दस्तक है/नही कहीं चिल्लाना/बौराये अपने मे /चल रहा जमाना।(विश्वनाथ)
अंतत:भाई रणजीत पटेल को हार्दिक बधाई।  इस प्रकार के सन्दर्भ ग्रंथ अन्य प्रदेशो से भी आने चाहिए।

शीर्षक:गीत विहंग विहार
संपादक:रणजीत पटेल
मूल्य: रु-350/
प्रकाशन:2014

प्रकाशक:अभिधा प्रकाशन,गंगा विहार ,दिल्ली-110094

मंगलवार, जनवरी 12, 2016


अनुभव की सीढ़ी (भारतेंदु मिश्र की गीत सर्जना ) - यथार्थ की लोकधर्मी सुवास के गीत
# जगदीश पंकज

अपने समसामयिक  गीत-नवगीतकारों में भारतेन्दु मिश्र ऐसे रचनाकार हैं जो नवगीत-विमर्श पर पूरी तन्मयता से उपस्थिति देते रहे हैं किन्तु वर्ष 2010 के बाद से उन्होंने गीत नहीं लिखे।गीत न लिखने के उनके अपने तर्क होंगे किन्तु एक सजग रचनाकार जो लगभग तीस वर्ष तक गीत-नवगीत लिखता ही नहीं रहा बल्कि नवगीत के प्रत्येक विमर्श में उल्लेखित भी होता रहा है उसकी रचनाधर्मिता के लिए  यह अकेला तथ्य ही आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है।अपने सृजन-काल के तीन दशकों में भारतेन्दु मिश्र ने अवधी और हिन्दी में समान रूप से रचना की है जिनमें से काफी कुछ अप्रकाशित रहा है। डॉ रश्मिशील ने भारतेंदु मिश्र के हिन्दी गीत-नवगीतों को एक साथ संगृहीत करके 'अनुभव की सीढ़ी' नाम से संपादित किया है।  संग्रह में भारतेन्दु मिश्र की गीत सर्जना के सभी प्रकाशित- अप्रकाशित  गीतों को समाहित किया गया है जिससे कि रचनाकार का समग्र रूप से मूल्यांकन करने में सुविधा हो सके । सम्पादिका ने प्रस्तुत संग्रह में सम्पूर्ण सर्जना को तीन अलग -अलग दशकों में बाँटा है ताकि कालक्रमानुसार रचनाकार की विकास-यात्रा और साहित्यिक परिपक्वता का आकलन करने में सुविधा हो सके।प्रथम खंड में  प्रारम्भिक गीतसृजन (वर्ष 1980 से 1990 ),द्वितीय गीतसृजन खंड में समय (1991 से 2000) तथा तृतीय खंड में समय वर्ष (2001 से 2010 ) की रचनाओं को रखा गया है।   कथ्य की दृष्टि से भी सर्जना को पाँच खण्डों में विभाजित करके प्रस्तुत किया गया है जिससे गीतकार की वैचारिकता,युगबोध,भावात्मक और ज्ञानात्मक संवेदनाओं की सार्थक प्रस्तुति तथा कवि की अपनी समकालीनता से जुड़े सरोकारों और पक्षधरता के बिन्दुओं को समग्रता से समझा जा सके। यह वर्गीकरण इस प्रकार है -(क) बांसुरी की देह (राग-विराग और गृहरति के गीत-नवगीत) (ख) बाकी सब ठीक है (नगरबोध विसंगतियाँ और आस्था के गीत-नवगीत) ,(ग) मौत के कुएं में -(स्त्री मजदूर और किसान चेतना श्रम सौंदर्य के गीत-नवगीत)  (घ) जुगलबन्दी (राजनीति-धर्म-दर्शन और बाज़ारवादी समय के गीत-नवगीत) (ङ) शब्दों की दुनिया (कुछ मुक्तक कुछ अनुभव गीत) । संकलन में भारतेन्दु मिश्र के अपने वरिष्ठ एवं समवर्ती रचनाकारों से हुए पत्राचार के उल्लेख स्वरुप पत्रों को भी स्थान दिया गया है तथा प्रकाशित-अप्रकाशित काव्य संग्रहों के लिए वरिष्ठ साहित्यकारों द्वारा लिखी गयी भूमिकाओं और समीक्षाओं को अविकल रूप से प्रस्तुत किया गया है। सम्पादन के दायित्व को सफलता से निभाने के उद्देश्य से सम्पादिका द्वारा रचनाकार का संक्षिप्त साक्षात्कार भी प्रस्तुत किया है जिसमें भारतेन्दु मिश्र ने विभिन्न साहित्यिक और गीत-नवगीत से जुड़े प्रश्नों पर बेबाक विचार व्यक्त किये हैं। किसी भी रचनाकार की सर्जना पर समग्र रूप से विश्लेषण ,मूल्यांकन और समीक्षात्मक निर्णय देने में मैं स्वयं को असमर्थ पाता हूँ। यह समीक्षा या आलोचना के  किसी स्थापित मानदंड या प्रतिमान के निकष पर आधारित कोई आलेख नहीं है बस मात्र एक पाठकीय प्रतिक्रिया है। प्रत्येक रचनाकार के लेखन में उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि ,परिवेश ,अध्ययन ,,अनुभव और अभ्यास के प्रभाव रहते हैं। अतः भारतेन्दु मिश्र की सर्जना में भी  निश्चित रूप से परिलक्षित हैं। एक पाठक के तौर पर मैं पहलेभारतेन्दु मिश्र की सर्जना पर अपनी संक्षिप्त प्रतिक्रिया देना उचित समझता हूँ।
(क)  बांसुरी की देह खंड में  कवि के राग-विराग और गृहरति के गीत-नवगीत  प्रस्तुत किये गए हैं। जैसा कि खंड के शीर्षक से स्पष्ट है इसमें कवि ने पारम्परिक गीतों की भाषा-शैली का प्रयोग करते हुए वैयक्तिक भावनात्मक संवेदनाओं के गीत रचे हैं जिनमे प्रणय की रागात्मक प्रस्तुति कलात्मक रूप से की गयी है। तथा अपनी मान्यताओं को भी यत्र-तत्र व्यक्त किया है। यथा-
''सांकेतिक  भाषा  पर  आता  विश्वास  नहीं
मौखिक अभिव्यक्ति कभी बनती इतिहास नहीं ''

प्रणय गीतों में कस्तूरी वाली हिरनी को  बेचारा हिरन खोजता फिर रहा है ,,
'' कुंज-कुंज को /लता-लता को /सूँघ-सूँघ कर रह जाता /आती-जाती /हर हिरनी को देखे रोज़ थका हारा ''

'झूमते महुए लबार'   गीत में सुन्दर चित्र उकेरा है ,
''धुप ने जब से/बसंती फ्रॉक पहनी है /यह हवा भी /पाँव में नूपुर सजाये है ''
'कक्षा अध्यापक' शीर्षक के गीत में भारतेन्दु जी के लिए कक्षा के बच्चे सिर्फ पढ़ते ही नहीं बल्कि बच्चे अध्यापक के लिए पाठ की भूमिका भी निभा रहे हैं और वह अपने छात्रों को पढ़कर स्वयं सीख रहा है। एक मनोवैज्ञानिक तथ्य को सरलता से व्यक्त किया है।
इस खंड में 'कक्षा अध्यापक','गोद बुआ की','हम सभी खिलौने हैं' , 'उडी चाँदनी धनपति के संग ' ,'हम न होंगे गीत होंगे ' , 'एक भरम टूट गया', ' गाँठ कसी है' ,'कमल की पाँखुरी पर ' और 'नवगीत के अक्षर' अच्छे गीत हैं। 'कमल की पाँखुरी पर ' गीत की पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं ,
''खुशबुओं के खत /किरण फिर /बाँच पाएगी न जाने। ...... रक्तरंजित /सूर्य होगा /हर तरफ होगा कुहासा/दूब की जड़ /इंद्रधनुषी-/आंच पाएगी न जाने। ''

(ख) बाकी सब ठीक है ' खंड में   नगरबोध विसंगतियां और आस्था के गीत-नवगीत  संकलित किये गए हैं। महानगरीय जीवन की विद्रूप शैली और  जूझती मानसिकता के गीतों में कवि का आत्मानुभव व्यक्त है इन रचनाओं में।  'शूल हुए बिस्तर' गीत की पंक्तियाँ -
''अब तो चुभने लगे /गुलाबी शूल हुए बिस्तर /बांह नहीं उठती है /इतने सूज गए नश्तर। ........... अपनों के ही उष्ण रक्त से /सड़क हो रही तर। ''
 'राहजनी करती दोपहरी ' , 'कागज़ के फूल जहां बदलते परिदृश्य को चित्रित करते हैं वहीँ 'देह का इतिहास' और 'शंख ' ,'चन्दन भी हो गया विषैला ' ,'अंधी हुई दिशाएँ 'जैसे गीत  मानवीय चेतना पर हो रहे संघात से द्वन्द्व में घिरी पीढ़ी की उहापोह को भी व्यक्त कर रहे हैं ।
''एक अधूरापन जीवन का /बार-बार खलता है /कभी-कभी जब अपना साया /साथ छोड़ चलता है। ''
'मैं छोटा सा एक सिपाही','कबीर चाहिए' ,'चूक मत अच्छा समय है ','आज सोमवार है','करुण त्रासदी ','पाँव की बिवाइयाँ ','ऊंटों के परिणय में ',' धूल बरसती है','विश्व ग्राम ','फागुन में','बेपेंदी के लोटे','रात गयी बात गयी','बाकी सब ठीक है',और 'वाल्मीकि व्याकुल है' शीर्षक के गीत अपने कथ्य और शिल्प दोनों तरह से आकर्षित करते हैं।'बेपेंदी के लोटे' गीत की पंक्तियाँ  देखिये -
''जिनकी चर्चायेँ होती हैं /बेपेंदी के लोटे हैं वो।  ....... अपने मन का कोई निर्णय /लेने की सामर्थ्य नहीं है /सभासदों में शामिल हैं /पर इनके मत का अर्थ नहीं है/ अफसर की जूती में चस्पाँ /या कि सुनहरे गोटे हैं वो '' .

(ग) 'मौत के कुएँ में' नाम के इस खंड में  स्त्री-मज़दूर -किसान चेतना:श्रम सौंदर्य के गीत-नवगीत समाहित किये गए हैं। इन गीतों में कवि ने अपने समय के समाज में स्त्री और श्रम की विभिन्न श्रेणियों और पेशों से जुड़े लोगों की स्थिति को सफलता से व्यक्त किया है जगह -जगह व्यंजना के द्वारा पीड़ित की पीड़ा को व्यक्त करते हुए शोषक वर्ग पर चोट करते हुए अपनी पक्षधरता को प्रकट किया है। 'घासलेट की शामें' गीत में देखिये
''मैं ही तो लाचार नहीं हूँ /आस-पास भी लाचारी है /कागज़ पर रह गयी योजना /क्योंकि योजना सरकारी है /लूट रहे वे ही सुविधाएं जो जाने पहचाने हैं। ''
'हम मजदूर होते हैं' गीत में कहा है ,''रोटियों सी /गोल है दुनिया /और हम मजदूर होते हैं /देह अपनी /बाँटते हैं हम /और थककर चूर होते हैं। ''

इस खंड की अनेक रचनाएं  अपनी सादगी भरी व्यंजना और स्वाभाविकता से मोहित करती हैं। जमींदार की डोली','रेत पर लिखे हुए निबंध हैं','यह निगोड़ी नई पीढ़ी ','पारो','दिल्ली कोसों दूर अभी','मुट्ठियाँ तनी हैं','दिया बनाता रामधनी',' लड़की','रामधनी की माई','शिक्षक का बेटा ' आदि अच्छी रचनाएं हैं।

(घ) जुगलबंदी  खंड में राजनीति -धर्म-दर्शन और बाज़ारवादी समय के गीत-नवगीत संकलित किये गए हैं। वैश्वीकरण और मुक्त बाज़ार व्यवस्था और उससे उपजे विसंगत यथार्थ की रचनाओं में मिश्र जी ने अपने सजग सोच को व्यक्त किया है। इस खंड में कवि के प्रारंभिक और नए तथा नवगीत एकादश के अधिकतर गीतों को सम्मिलित गया किया है। इनमें सामाजिक विद्रूपताओं पर प्रहार करते हुए कवि संघर्ष की ओर आह्वान भी करता है जिससे कवि के सरोकार और प्रतिबद्धता प्रकट होती है। 'उद्बोधन ' नाम के गीत में कवि वास्तव में उद्बोधन करते हुए कहता है ,''इस तिमिर से फिर तुम्हें लड़ना पड़ेगा /आग पर प्रह्लाद सा चलना पडेगा 'और 'धुनते हैं रुई चेतना ' गीत में ,''सूरज ने धूप बेच दी/चांदनी पड़ी गिरवी है /जुगनू निर्यात हो रहे /मौसम की बेशर्मी है। ''
'सीढ़ियां चढ़ते उतरते ' गीत में शहर की भागमभाग में आम आदमी के जीविका के लिए किये जा रहे संघर्ष का सजग चित्र खींच दिया है। ----
''देखता हूँ इस शहर को/रोज़ जीते मरते /उम्र यूँ ही कट रही है सीढ़ियां चढ़ते-उतरते ''.
इस खंड के ,'आवाहन गीत','आत्मबोध','इस बस्ती में','जाने कितनी बार','अवध में', 'ग्वाले रोज़ फूँक भरते हैं ','कापालिक बोल रहे हैं','यह शहर है ','एक युद्ध शेष अभी' ,'पथराया फूल का शहर','जुगलबंदी' आदि गीत पठनीय हैं।
(ङ) शब्दों की दुनिया  शीर्षक के इस खंड में अनुभव गीत और कुछ मुक्तकों को स्थान दिया गया है। इस वर्ग में विविध रचनाएँ संगृहीत हैं जिनमे 'नागार्जुन को,' तथा 'अनुभव की सीढ़ी' शीर्षक का गीत तथा मुक्तक दिए गए हैं। जिनमे पठनीयता है।

पूरे संग्रह में सम्पादिका ने भारतेन्दु मिश्र के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के विभिन्न पहलुओं को समेटने का प्रयास किया है फिर भी बहुत कुछ रह गया है जिसे इस संग्रह की विषयवस्तु बनाया जा सकता था।  मेरे अपने विचार से यदि भारतेन्दु जी के अवधी गीतों तथा गीतेतर सर्जना को भी इसमें स्थान मिलता तो रचनाकार की सृजन प्रक्रिया को समग्रता में समझने में सुविधा होती। साथ ही यदि साक्षात्कार में  और अधिक बिन्दुओं को समाहित करते हुए बढ़ाया जाता तो अधिक सार्थक हो सकता था। 
भारतेन्दु संस्कृत के विद्वान हैं तथा उनकी मात्र भाषा अवधी  है फिर भी अपने गीतों में उन्होंने सरल हिन्दी  को ही अपनाया है जिसमें सफल सम्प्रेषणीयता और सहज ग्राह्यता की यथार्थपरक गंध के दर्शन होते हैं।जिससे मैं उनके गीतों को यथार्थ की लोकधर्मी सुवास के गीत कहना उचित समझता हूँ। भारतेन्दु मिश्र की सर्जना को देखते हुए मुझे यह प्रश्न बार-बार झकझोरता रहा है कि एक समर्थ रचनाकार जो गीत-नवगीत के सफल प्रयोगों को करता रहा है उसने गीत न लिखने का निर्णय क्यों लिया। मेरे अपने सोच के अनुसार या तो लेखक स्वयं को चुका हुआ अनुभव करता है या अपने तात्कालिक युगबोध को व्यक्त करने में असमर्थ पा रहा है या उसकी अपनी व्यक्तिगत परिस्थितियां उसे ईमानदारी से स्वयं एवं अपने युगबोध को व्यक्त करने से रोक रही हैं। कारण कुछ भी हो एक ऊर्जावान रचनाकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी समकालीनता पर प्रतिक्रिया करते हुए समयगत यथार्थ को समाज के लिए व्यक्त करे। अतः मैं भारतेन्दु मिश्र को यही परामर्श दे सकता हूँ कि वे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करके गीत-नवगीत लेखन में पुनःसक्रिय भूमिका निभाएं।
अंत में ,मेरा अपना विचार है कि यह संग्रह भारतेन्दु मिश्र के माध्यम से अपने समय और नवगीत सर्जना को समझने का अच्छा दस्तावेज है जो गीत-नवगीत के अध्येताओं, शोधार्थियों और पाठकों के लिए उपयोगी संचयन सिद्ध होगा।
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समीक्षित पुस्तक :  अनुभव की सीढ़ी (भारतेन्दुमिश्र की गीत सर्जना )
संपादक : डॉ रश्मिशील
प्रकाशक : नवभारत प्रकाशन ,दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2015 , पृष्ठ 256 ,
मूल्य : रु. 400/- मात्र
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# जगदीश पंकज
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