सोमवार, मई 14, 2018




समीक्षा -
"पठार पर रंगोली"
# भारतेंदु मिश्र 

नवगीत की सर्जना में कवयित्रियों के नाम बहुत कम हैं, फिर भी शान्ति सुमन,राजकुमारी रश्मि,इंदिरा मोहन,शरद सिंह ,पूर्णिमा वर्मन,रजनी मोरवाल,यशोधरा राठौर जैसी नवगीत कवयित्रियाँ हमारा ध्यान बरबस अपनी ओर आकर्षित करती हैं|इसी नवगीत की परंपरा में कुछ दिनों से मालिनी गौतम के नाम की भी चर्चा हो रही है|‘चिल्लर सरीखे दिन’ मालिनी गौतम के नवगीतों की पहली पुस्तक है|इसमें 55 गीत नवगीत संकलित हैं,जिनमें अधिकाँश गीत भाषा और छंद की दृष्टि से निर्दोष हैं|जीवन में हम सबको छोटी छोटी खुशियों की ही तलाश रहती है|कवयित्री मालिनी गौतम को घर में ही कविता का सार्थक संस्कार अपने पिता से मिला जो आज उनकी काव्य भाषा और रूपकों में देखा जा सकता है|यू तो मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरती पर नवगीत जितना फला फूला और उसकी समझ विक्सित हुई उतना किसी अन्य प्रदेश में संभव नहीं हो पाया|संयोगवश मालिनी जी को इसी मध्यप्रदेश की मोहक सांस्कृतिक छवियों वाली काव्य भूमि विरासत में मिली|अपनी जिज्ञासा और पढाई लिखाई के परिश्रम से कवयित्री ने अपनी काव्य अनुभूतियों को मांजा और बेहतरीन ढंग से चमकाया है|ये नवगीत मालिनी गौतम की सजग काव्य चेतना का प्रकटीकरण हैं|वे कविता की अनेक विधाओं में लिखती हैं|
आज इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में जब मनुष्य संवेदना की बात लगभग बेमानी हो गयी है तब मालिनी गौतम अपनी सशक्त नवगीत सर्जना से नवगीत प्रेमियों को न केवल आश्वस्त करती हैं बल्कि किसी हद तक चकित भी करती हैं| संयोगवश संकलन के अंतिम गीत पर मेरी नजर पहले पडी,फिर सभी गीत पढ़ने का मन बनाता गया|अन्तिम गीत  का अंश देखिये-
झूठ दौड़ता पहन जूतियाँ /अफवाहों की
बातें करती कानाफूसी/घर घर जाकर
छल की भाषा शोर मचाती /मौक़ा पाकर
भटक रहीं हैं आवाजें /सच की आहों की|(पृ-96)
ये जो अफवाहों की जूतियाँ कवयित्री ने झूठ को पहना दी हैं असल में यही नवगीत की अंतर्चेतना है| एक शब्द या एक रूपक के निर्वाह भर से ही कविता में जो अर्थ की छवि उद्भासित होती है वही रचनाकार की शक्ति का पता बता देती है|ऐसे अनेक नवगीत इस संकलन में दिखाई देते हैं जिनमें नई सदी की कविता का मुहावरा धड़कता है|ये नवगीत छंद और लय की दृष्टि से भी प्रवाह संपन्न हैं| संकलन के शीर्षक नवगीत का अंश देखिये-
हाँथ में हैं शेष /कुछ चिल्लर सरीखे दिन
हडबडाती जिन्दगी/इक रेल सी गुज़री
चाहतों के स्टेशनों पर/चार पल ठहरी
उम्र के खाली कपों में /घूँट से पल-छिन |(पृ-11)
असल में जिन्दगी का फलसफा कवयित्री को बखूबी मालूम है और वह हडबडाते समय को धैर्य पूर्वक सहज मन से जी लेने के लिए तत्पर भी है| यह तत्परता ही उसे नास्टेल्जिक होने से बचाती है| प्राय: जो अतीत का रोना लेकर गीत लिखे जाते हैं उनसे कवयित्री का स्वर कदाचित भिन्न है| कवयित्री कविता में यथास्थिति तक सीमित होकर नहीं रह जाती बल्कि वह अपने सामर्थ्य और समझ से समाधान और उपाय भी बताती है-
‘वक्त कबसे कैद है /कब तलक सोओगे तुम/अब उठो घंटा बजाओ|’(पृ-16)
इसी क्रूर समय में हमारे जीवन की दुर्दशा हमारे ही कुछ ठग साथी कर रहे हैं |हमारे जीवन की सहज गति को रोकने के लिए वे कीलें बिखरा कर हमारे पहियों में पंक्चर करने से भी बाज नहीं आते|फिर भी संवेदना का घाव लिए हुए मनुष्य अनंत की यात्रा पर बढ़ता जा रहा है|कवयित्री मालिनी गौतम के पास जीवन और जगत के यथार्थ को अभिव्यक्त करने की सटीक भाषा संवेदना भी है|नवगीत का एक अंश देखें-
खुरच खुरच कर खोद रहा है/वक्त हमारे घाव/
यहाँ वहाँ बिखरी कीलों ने /पंक्चर किये तमाम
कैसे घूमे पहिया कोई /लगे जाम पर जाम
सिग्नल सारे टूटे जब जब /उनपर बढ़ा दबाव|(पृ-34 )
कवयित्री के मन में खेतिहर किसान की समस्याओं के स्वर भी घुमड़ते हैं,इसलिए वह धरती और बादल के बिम्ब लेकर संबंधो की खेती करने का सहज प्रयास करती है-
ऊसर धरती पर /चाहत के बीज उगा दूं
एक उदासी/ खाट डालकर कब से सोयी
खाली कोनों में /खुशियों की चिड़िया रोयी
खालीपन को झाड़ पोंछकर/आज सजा दूं|(पृ-82)
सहज कविता तो जीवन और जगत के प्रेम से ही निकलती है|मालिनी जी के इन नवगीतों का सौन्दर्य  इनकी लोक धर्मी चेतना से पथरीले यथार्थ की जमीन पर अल्पना सजाने जैसा है| ये पठार पर रची गयी रंगोली जैसे आकर्षक हैं| जिनके मन की अटारी खाली हो वह उसे भरने की कोशिश अवश्य करता है|प्रेम की झीनी चदरिया बुनने की कोशिशें करने वाले सजग रचनाकार ही मनुष्यता को भटकाव से बचा सकते हैं|किसी बड़े आलाप- विलाप, पक्ष -विपक्ष के बिना, सहज ढंग से रचे गए मालिनी गौतम के ये नवगीत नई सदी की नवगीत सर्जना का नया प्रस्थान बिंदु प्रतीत होते हैं|अंतत: कवयित्री के इस पहले नवगीत संग्रह का मैं हृदय  से स्वागत करता हूँ| बोधि प्रकाशन को भी इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई|
शीर्षक:चिल्लर सरीखे दिन/कवयित्री: मालिनी गौतम/प्रकाशन: बोधि प्रकाशन,जयपुर/मूल्य:100/वर्ष:2017
संपर्क:
भारतेंदु मिश्र
सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-11 00 95

रविवार, नवंबर 19, 2017





पथराई आकांक्षाओं के नवगीत स्वर
# डॉ.भारतेंदु मिश्र

गत माह नवगीत और गजल पर केन्द्रित हिन्दी साहित्य सम्मलेन की उमरिया शाखा के आयोजन में भाग लेने का अवसर मिला|यहीं पहली बार अनेक सुधीजनों तथा  कवियों के बीच अग्रज महेश कटारे सुगम जी से भी मुलाक़ात हुई|हालांकि उन्हें फेसबुक के माध्यम से पहले से  जानता था,और उनकी बुन्देली गजलों का पाठक और प्रशंशक भी हूँ| यहाँ मिलकर उन्हें पहचानने और उनकी रचनाशीलता को चीन्हने में सहायता मिली|वहीं मुझे पता लगा कि महेश जी नवगीत भी लिखते हैं|मंच से जब उन्होंने अपने नवगीत प्रस्तुत किये तब उनके रचनाकार के प्रति और भी आश्वस्ति हुई|विदा होते समय उन्होंने मुझे 'तुम कुछ ऐसा कहो ' शीर्षक अपना नवगीत संग्रह भी भेंट किया| इस नवगीत संग्रह में  छप्पन नवगीत संकलित हैं|इनमे से अधिकाँश में अपनी युगधर्मिता और सामयिकता से से टकराहट के स्वर गूंजते हैं|असल नवगीत की पूंजी वही है जो समय के दर्द के साथ करुण स्वर  में पर्यवसित हो जाए-
तुम रंगमहल के हो प्रकाश
मैं टिमटिम लौ फुटपाथों की|
मेरी मरियल सी आशाएं
तेरी पहाड़ सी इच्छाएं
तेरा जल कुल तो सीमित है
हर जगह हमारी शाखाएं
फिर भी मैं नाचा करता हूँ
कठपुतली बनकर हाथों की||
ऐसी अभिव्यक्ति से कौन न आकर्षित हो जाए|राग और विडम्बना का मार्मिक स्वर हमें खीच लेता है|असल में महेश जी ललितपुर से सागर पहुचे हैं|उन्हें बुन्देली समाज की अभावग्रस्त जीवन शैली का अभ्यास है|इस लिए इन पंक्तियों में भी पहाड़ और जल दोनों का नैसर्गिक अभाव और प्रभाव उन्हें नवगीत रचने के लिए प्रेरित करता है|अपनी विसंगति की और भी कवी ध्यान दिलाता है कि वह बस कठपुतली बनकर रह जाने के लिए विवश है| कवि की नवगीत चेतना को और अधिक निकट देखने के लिए अनेक नवगीत उद्धृत किये जा सकते हैं लेकिन उनके कमरे का बिम्ब अत्यंत मार्मिक है|इस तरह के कमरे को ही खोली भी कहा जाता है-
ये हमारा घर
बहुत सीलन भरा
उबकाइयां लेता  हुआ बस एक कमरा|
इस एक घर के कमरे में ही कवि की पूरी गिरिस्ती समाई हुई है|इसी कमरे में एक कोने में सिंगडी है,नन्हे के जूते,चारपाई और फटा गद्दा है,एक और भगवानो की भी अलमारी है| एक मार्मिक व्यंग्य देखिये-
तोड़ने के वास्ते
फेके गए पत्थर
डालियों पर लटक कर
रहा गए हैं
आम के फल तो
कभी के झड गए हैं|
ये पथराई आकांक्षाओं के स्वर ही तो मूलत: नवगीत का स्वर है|महेश जी के पास नवगीत की सधी हुई भाषा और लय की नवता  दोनों प्रकार की रचनात्मक पूंजी विद्यमान है|इस बिम्ब को देखकर लगता है कि कवि के साथ कहीं हम सब किसी फलदार पेड़ की डाल पर  फेके गए पत्थर की तरह लटके हुए हैं|कहने को और भी बहुत कहा जा सकता है लेकिन संग्रह का अंतिम नवगीत  'अम्मा 'अपने आप में एक कोलाज कीतरह महेश जी ने गढा है, अंतिम बंद देखिये  -
खुशियों के पैबंद मुसीबत की कीलें
भाव रहित चहरे को नहीं बदल पाते
दर्दों के अहसास
अभावों के तूफाँ
भावों के आगन में नहीं टहल पाते
अनुभव की चादर
मन की हरियाली से
खुश रहने की भाषा उनको भाती है
रिश्तों वाली पौध
प्रेम के पानी से
सिंचित कैसे करें नीति ये आती है
झुकी कमर ले तनी खडी हैं
इक अनबूझा पहेली अम्मा|
घर में नहीं अकेली अम्मा||
झुकी कमर के साथ कोई तन कर कैसे खडा हो सकता है ये हुनर या तो कवि जानता है या उसकी अम्मा को पता है|अंतत: यद्यपि यह उनका पहला नवगीत संग्रह है लेकिन किसी भी नवगीत के बड़े हस्ताक्षर की तुलना में उनके नवगीत कतई कमतर नहीं हैं|अग्रज भाई महेश कटारे सुगम जी की रचनाशीलता नवगीत के क्षेत्र में और अधिक विकसित ,चर्चित हो इसी आशा के साथ  उन्हें बधाई|
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शीर्षक: तुम कुछ ऐसा कहो,/कवि : महेश कटारे सुगम,/प्रकाशन वर्ष;2012  /प्रकाशक:निरुपमा प्रकाशन,शास्त्री नगर मेरठ/मूल्य:रु 150 /
कवि संपर्क:0 97 13 0 2  43 80



शुक्रवार, नवंबर 10, 2017

कुमुदेश जी की स्मृति को प्रणाम
#:भारतेंदु मिश्र

प्रसिद्ध छंदकार अग्रज अशोक कुमार पाण्डेय अशोक जी लखनऊ के शताधिक छंदोबद्ध कवियों के काव्य गुरु हैं | हिन्दी खड़ीबोली में घनाक्षरी का जैसा सुन्दर प्रयोग वे करते हैं वैसा कम ही आधुनिक कवियों की कविताई में देखने को मिलता है|पिछली लखनऊ यात्रा में उन्होंने अपने पिताश्री स्व.गोमती प्रसाद पाण्डेय कुमुदेश जी की रचनावली भेंट की ये पुस्तक अनेक कारणों से मेरे लिए संग्रहणीय है|कुमुदेश जी के सभी चारों पुत्र क्रमश:अशोक कुमार पाण्डेय,विजय कुमार पाण्डेय,महेश कुमार पाण्डेय और शरद कुमार पाण्डेय सभी छंदोबद्ध कविता के कौशल से संपन्न सुकवि तो हैं ही,मेरी युवावस्था के मित्र और सहचर भी रहे हैं|युवारचनाकार मंच की सभी गतिविधियों में इन सभी की भागीदारी होती थी|मुझे इस कवि परिवार से भाई आवारा नवीन जी ने ही जोड़ा था|बहरहाल ये रचनावली हिन्दी छंद विधा के रचनाकारों के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज है|इसमें कविवर कुमुदेश जी की सभी पांच कृतियों-कुमुदावाली,तुलसी रत्नावली,मालती,वनमाला और जाग्रति को समाविष्ट किया गया है|उनका जन्म 15 नवंबर 19 23 को हुआ और मात्र 55 वर्ष की अवस्था में ही 7 सितम्बर 19 78 को उनका देहांत हो गया|वे निशंक जी के अत्यंत प्रिय कवि थे|सुकवि,साप्ताहिक हिन्दुस्तान,धर्मयुग,स्वतन्त्र भारत आदि में लगातार उनके कवित्त प्रकाशित होते थे| जब एक और छंदहीनता और मुक्तछंद कविता की वकालत की जा रही थी तब कुमुदेश जैसे कवियों ने ही छंदोबद्ध कविता की आंच को सुरक्षित रखा|निशंक जी उनके बारे में लिखते हैं-'कुमुदेश जी के सवैये बड़े मार्मिक और चुटीले हैं |वे ब्रजभाषा एवं खड़ीबोली दोनों में ही कवित्त घनाक्षरी और सवैया छंद लिखने में सिद्ध हस्त थे|'सनेही,हितैषी जी की परंपरा में लोग आज भी उन्हें याद करते हैं| मित्रो के लिए उनकी अंतिम कविता इस प्रकार है-
चोट जब भी लगी खा के गम रह गये
झेलते नित सितम पर सितम रह गये
लोग जाने कहाँ से कहाँ बढ़ गए
और हम देखते अधिनियम रह गये |
इन्ही शब्दों के साथ उनकी स्मृति को प्रणाम|

बुधवार, अक्तूबर 25, 2017

इतिहास में दर्ज हुआ आदिवासी क्षेत्र में साहित्यकारों का जमावड़ा
“नवगीत और गज़ल पर केन्दित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं
रचनापाठ के निमित्त उमरिया में जुटे थे देश भर के मूर्धन्य साहित्यकार
(14-15 अक्टूबर -2017)
 विस्तृत रपट-


उमरिया || पूर्वी मध्यप्रदेश के छोटे से आदिवासी बाहुल्य उमरिया जिले में नवगीत एवं गज़ल पर केन्द्रित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं रचनापाठ के निमित्त देश भर के साहित्य मनीषियों का जमावड़ा एक ऐतिहासिक परिघटना बन गया। पत्रकारों के सवालों के जवाब में वरिष्ठ कवि और म.प्र. शासन में अतिरिक्त सचिव राजीव शर्मा के बयान ने जैसे इस पर मुहर लगा दी। राजीव शर्मा ने कहा -‘‘ नवगीत एवं गज़ल पर आगे जब भी विमर्श होगा उमरिया में संपन्न हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी का संदर्भ अवश्य दिया जायेगा। बौद्धिकता और रचनात्मकता से परिपूर्ण यह गरिमामयी आयोजन इतिहास में दर्ज हो चुका है” |  
                 नवगीत और गज़ल पर राष्ट्रीय संगोष्ठी और रचनापाठ का यह दो दिवसीय आयोजन दिनांक – 14-15 अक्टूबर 2017 को म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन की उमरिया जिला इकाई द्वारा किया गया था। जिसका उद्घाटन वरिष्ठ कवि डॉ. दिनेश कुशवाह, हिन्दी विभागाध्यक्ष अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा ने किया। अध्यक्षता, वरिष्ठ और बहुचर्चित गज़लकार महेश कटारे सुगमने किया। ख्यातिलब्ध समालोचक भारतेन्दु मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार पारस मिश्र, राजीव शर्मा, डॉ. चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र  डॉ.आर.पी.तिवारी और डॉ. परमानंद तिवारी और बतौर विशिष्ठ अतिथि उपस्थित रहे। स्वागत भाषण सम्मेलन की उमरिया इकाई के संरक्षक डॉ. रामनिहोर तिवारी ने और उद्घाटन सत्र का संचालन सम्मेलन की उमरिया इकाई के अध्यक्ष संतोष कुमार द्विवेदी ने किया। मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए डॉ. दिनेश कुशवाह ने बड़ी बेबाकी से गीत की विशेषताओं के साथ उन मर्यादाओं और ठहराओं पर तीखा कटाक्ष किया, जिसके कारण साहित्य में नवगीत आंदोलन का आरंभ हुआ।
विमर्श में साहित्य के वैश्विक परिदृश्य को समेटते हुए आपने याद दिलाया कि इतिहास, विचार और कविता के मृत्यु की घोषणा को क्या हम भूल सकते हैं? इस तरह की घोषणाएं करने वाले और उसकी शवयात्रा में शामिल होने वाले कौन लोग हैं? हमें उन्हें पहचानना होगा। आपने चेताया कि इतिहास, परंपरा बोध और कविता न मरी है न मर सकती है। कविता समाज के सामूहिक संवेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति है। अपने विस्तृत और विद्वत्तापूर्ण व्याख्यान में आपने समकालीन नवगीत और गज़ल के लिए नये बिम्ब, नये प्रतीक, नई भाषा और नये शिल्प विधान के साथ ही साथ आम आदमी के शोषण और संत्रास के खिलाफ स्वर को अनिवार्य शर्त बताया। डॉ. परमानंद तिवारी ने नवगीत को नई पीढ़ी का काव्य बताया तो डॉ. आर.पी.तिवारी ने कहा कि निराला ने ‘‘नव गति नव लय ताल छंद नव’’ गाकर जिस काव्य परंपरा का पूर्व में उद्घोष किया था, उसे ही आज के नवगीतकारों ने एक नया मकाम दिया है। डॉ. चन्द्रिका प्रसाद चन्द्रने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को गलत समय पर उठाया गया सही कदम बताया। ‘‘राजा ने कहा रात है, मंत्री ने कहा रात है, संत्री ने कहा रात है, यह दोपहर की बात है’’ उद्धृत करते हुए आपने कहा कि जब सच का दम घोटा जा रहा हो तब पुरातन के व्यामोह से निकलकर नये कलेवर और नए तेवर के गीत गाने होंगे।
                    उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष समकालीन भाषाई गज़ल और हिन्दी नवगीतों के बहुचर्चित रचनाकार महेश कटारे सुगमने असहाय और अभावग्रस्त सामान्य जन की
पीड़ा, शोषण और अन्याय को मुखरित करना ही साहित्य सृजन का वास्तविक हेतु माना।
           संगोष्ठी के पहले विमर्श सत्र ‘‘नवगीत की परंपरा: दशा और दिशा’’ पर मुख्य वक्ता यशस्वी गीतकार और समालोचक डॉ. भारतेन्दु मिश्र ने कहा कि ‘‘हर गीतनवगीत नहीं होता लेकिन हर नवगीत में गीत के तत्व होना आवश्यक है। नवगीत युगीन यथार्थ को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। उसे हिन्दी कविता का
मध्यम मार्ग कहा जा सकता है। नई सदी में चर्चित हुए नवगीतकारों में डॉ. मालिनी गौतम, जय चक्रवर्ती, ओम प्रकाश तिवारी, चित्रांश बाघमारे, यशोधरा राठौर, पूर्णिमा बर्मन, रजनी मोरवाल, विनय मिश्र, वेद प्रकाश शर्मा आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। नवगीतकारों ने लोकभाषा और लोकजीवन के सरोकारों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वह छायावादी गीत से पर्याप्त भिन्न है। नवगीत की अपनी अलग पहचान है। कुल मिलाकर नवगीतकार ही हिन्दी कविता की समावेशी अवधारणा का पर्याय है। आपने माना कि नवगीत की परंपरा निराला से शुरू होती है और वही इसके जनक हैं।
              इस सत्र के हस्तक्षेप में नई पीढ़ी के बहुपाठित गीतकार राजीव शर्मा ने कहा कि नवगीत लोकजीवन को कविता का विषय बनाने और उसे कविता से जोडऩे की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं। नई कविता की सपाटबयानी और दुरूहता से ऊबे पाठकों को रस और संवेदना की अनुभूति नवगीतों से मिली। लेकिन नवगीत भी अब उसी के शिकार हो रहे हैं जो चिन्ता का विषय है। डॉ. अमोल बटरोही ने कहा कि मौजूदा समय के कथ्य, शिल्प और प्रतीकों के कारण नवगीत एक अलग तेवर अख्तियार करते हैं। अन्यथा लयात्मकता और गेयात्मकता गीतों मे भी है और नवगीतों में भी है।  इस सत्र की पूरी चर्चा को समेटते हुए वरिष्ठ गीतकार कुमार शैलेन्द्र ने ध्वनि, रस और छन्दों के संबंध में बताते हुए भारतीय चिन्तन परंपरा एवं सृजन धारा का विस्तृत निरूपण किया। आपने कहा कि आलोचक भले ही नवगीत को खारिज करें अथवा हाशिये की कविता कहें वे हमेशा रहेंगे पढ़े, सुने, गाये और गुनगुनाये जायेंगे। इस सत्र का संचालन सम्मेलन की उमरिया इकाई के सचिव अनिल कुमार मिश्र ने और आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि शंभू सोनी पागलने किया।
                      पहले दिन के दूसरे सत्र ‘‘नवगीत में लोकतत्व’’ की अध्यक्षता नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर वेदप्रकाश शर्मा ने की तथा वरिष्ठ गीतकार शिवकुमार अर्चनने मुख्य वक्तव्य दिया। श्री अर्चन ने कहा कि नवगीत छायावादोत्तर कविता की प्रमुख धारा के रूप में उभरा। 1941 से 1950 के दशक में कविता के दो रूप दिखाई देते हैं। पहला पारंपरिक छन्दोबद्ध कविता दूसरा परंपरा भंजक, प्रयोग और प्रगतिवादी कविता। 1950 से 60 वाले दशक में कविता की सभी धाराएं एक मंच पर थीं। इसी को नयी कविता कहा गया। इसमें गीत काव्य भी था। अज्ञेय ने जिसे नई कविता का गीत कहा। बाद में इसी धारा के विकसित रूप को नवगीत कहा गया। आपने लोक की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि नवगीत ने न सिर्फ लोकचेतना और मानवीय सरोकारों की पक्षधरता सिद्ध की है अपितु लोक संवेदना और लोक रंजन से लेकर लोक मंगल तक की यात्रा तय की हैं। नवगीतों में आम आदमी के दुख, दर्द, घुटन, गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी आदि की त्रासदी को गीतों का विषय बनाया गया और जनसंवाद धर्मिता अपनाई गई।
                   आपने ध्यान दिलाया कि यह स्थिति 80 के दशक के बाद बरकरार नहीं रह पाई । गीत लोकचेतना और लोकजागरण का वाहक नहीं रहा। वह जनसाधारण से कटने लगा। इसके पीछे कविता का वाचिक परंपरा से कटना भी था। इसके अलावा बाजारवाद, भूमण्डलीकरण, के बाह्य दबावों जीवनानुभव की कमी जनजीवन व जमीन से अलगाव जैसी कई अहम वजहें हैं।
             इस सत्र में प्रमुख नवगीतकार डॉ. मालिनी गौतम ने सार्थक हस्तक्षेप किया। डॉ. मालिनी गौतम ने कहा कि लोक में व्याप्त चेतना के आधार पर लोकधर्मी गीत की शिनाख्त करनी होगी। लोक में नगरीय जीवन और बौद्धिक मनुष्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती। रोजी रोटी की तलाश में लोग नगरों की ओर पलायन करते हैं लेकिन उनके लौकिक संवेग उनके अंतस्थल में सुरक्षित रहते हैं। नवगीत ने उन्हें खुरचा, देखा, उनसे संवेदना के स्तर पर जुड़ा और उन्हें अपना विषय बनाया। आपने आरोप लगाया कि साहित्य की बागड़बन्दी के कारण लोक उपेक्षित हुआ है। अभिजात्य उसके केन्द्र में आ बैठा है। हमें इस जड़ता को तोडऩा होगा। आपने कहा कि नवगीत में लोक चेतना लोकगीतों और लोकधर्मी उत्सवों से आती है, लोक मन और लोक व्यवहार से आती है, गली-गली घूमते साधुओं-फकीरों की सधुक्कड़ी और सूफियाना गायन से आती है, हमारी समावेशी सांस्कृतिक विरासत जिसमें अक्षत-रोली, चंदन-कुंकुंम, मंगल घट, गोरोचन, मस्जिद की अजान और मंदिर की घंटा ध्वनि जैसी तमाम चीजें समाहित हैं, उनसे आती है। आपने जोर देकर कहा कि प्रकृति और लोक संस्कृति के आसव से पगे नवगीत लोकतत्व के सच्चे वाहक हैं।
           डॉ. राम गरीब विकल ने उद्धरणों के साथ नवगीतों में लोकतत्व की प्राण प्रतिष्ठा के कई सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने नवगीतों में लय और छंदबद्धता की वकालत की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर वरिष्ठ कवि वेद प्रकाश शर्मा ने उद्घाटन सत्र से लेकर अब तक की चर्चा को समेटते हुए कई तल्ख टिप्पणियाँ कीं तथा नवगीत के समष्टिपरक दृष्टिकोण और भूमिका को स्पष्ट किया। आपने नवगीतकार देवेन्द्र शर्मा इन्द्रके नाम का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि नई कविता वाले इस दौर के समर्थ व सशक्त नवगीतकारों को आखिरकार क्यों नहीं पढ़ते? यही नहीं नवगीतो में बिम्ब और प्रतीकों की दुरूहता के आरोप को लक्षित करते हुए पूछा कि क्या नवगीत के बिम्ब और प्रतीक मुक्तिबोध की रचनाओं से भी दुरूह हैं।
                    आपने कहा कि कविता की आत्मा सौन्दर्य है तथा इस सौन्दर्य की रक्षा छायावाद के कवियों ने जिस सुरुचिपूर्ण-सुसंस्कृत रूप से की है नवगीत ने युग यथार्थ के सम्यक बोध के साथ उसे कायम रखा है। नवगीत ने अपने समय के सामाजिक यथार्थ को समग्रता के साथ भिन्न-भिन्न रूपों में देखा है और इस प्रकार वह उसी ठोस  धरातल पर खड़ा है जिसका गुणगान करते हुए नई कविता नहीं थकती। इस सत्र का संचालन युवा गीतकार राजकुमार महोबिया ने तथा आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि रामलखन सिंह चौहान भुक्खड़ने किया।
                                                            
दूसरा दिन गजल के नाम
          दूसरे दिन का विमर्श गजल को समर्पित था। जिसमें “समकालीन गज़ल की दशा और दिशा” तथा “समकालीन गज़ल के बदलते उन्वान” पर जहीन और अजीज शायरों ने अपने विचार व्यक्त किए। पहले सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ गज़लकार कुंवर कुसुमेश ने की तथा मुख्य वक्तव्य वरिष्ठ पत्रकार एवं समालोचक नन्दलाल सिंह ने दिया। नन्दलाल सिंह ने समकालीन गज़ल की परंपरा को रेखांकित करते हुए उसके बदलते तेवरों को उद्धरणों के साथ स्पष्ट किया। आपने कहा कि समकालीन गज़ल ने सामाजिक कुरीतियों से लेकर धार्मिक, राजनीतिक व्यवस्था, शोषण और विषमता पर जिस साहस और सलीके से तंज कसे हैं वैसी बेबाकी अन्यत्र दुर्लभ है। इस सत्र में डॉ. नीलमणि दुबे ने हस्तक्षेप किया और कबीर से लेकर मौजूदा दौर की गज़ल के हवाले से स्पष्ट किया कि गज़ल का भविष्य उज्ज्वल है और अब तो वह भाषा का बैरियर तोडक़र लोकव्यापीकरण की ओर बढ़ रही है। युवा गज़लकार नजर द्विवेदी ने गज़ल में हिन्दी और उर्दू की जंग को बेमानी बताया | कथाकार, समालोचक संदीप नाइक ने कहा कि अपनी बात स्पष्ट करने के लिए शेर उधृत करना गजल की लोकप्रियता और जन स्वीकृति दर्शाता है |
           अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ गज़लकार कुंवर कुसुमेश ने कहा कि गज़ल की बहर हर गज़लगो को सीखनी ही चाहिए। मैंने 60 की उम्र में ट्यूशन लगाकर गज़ल का सलीका और शिल्प सीखा। उन्होंने बताया कि गज़ल की 32 बहरें होती है जिनमें से 17 प्रचलित हैं। सम्भव है अभी और बहरों पर गज़लें लिखीं जाएं और उन्हें भी मकबूलियत हासिल हो। इस सत्र का संचालन युवा गज़लकार कुलदीप कुमार ने और आभार सम्मेलन की साहित्य मंत्री मंजु ‘मणि’ ने व्यक्त किया।
                     ‘‘समकालीन गज़ल के बदलते उन्वान’’ विषय पर मुख्य वक्तव्य जहीन शायर अशोक मिजाज ने रखा और अध्यक्षता वरिष्ठ गज़लकार शाहिद मिर्जा ने की। अपने वक्तव्य में गज़लकार अशोक मिजाज ने कहा कि यदि हम गज़ल में बदलते हुए आयामों की खोज करते हैं तो पता चलता है कि यह एक झरना है जिसमें लगातार नवीनता बह रही है। उर्दू गज़ल जो कभी रवायती गज़ल के रूप में थी उसने जदीद गज़ल का रूप ले लिया है। पहले से चले आ रहे अरबी फारसी के शब्दों के स्थान पर आसान उर्दू के शब्दों में आज के प्रतीकों और बिम्बों का प्रयोग किया जाने लगा है।  आज के दौर की उर्दू जदीद गज़ल और हिन्दी गज़ल कहीं-कहीं एक होती दिखाई दे रही । इस दौर के जदीद गज़लकारों के कुछ शेर इस बात की पुष्टि के लिए काफी हैं। तहज़ीब हाफी के शेर देखिए ‘‘तारीकियों को आग लगे और दिया जले, ये रात बैन करती रहे और दिया जले। तुम चाहते हो तुमसे बिछड़ के भी खुश रहूँ, यानी हवा भी चलती रहे और दिया जले”।  इसी तरह मुईन शादाब का एक शेर देखिए तुमसे बिछड़ के सबसे नाते तोड़ लिये थे, हमने बादल देख के मटके फोड़ लिए थे”। इन शेरों में शायरी की वह मुलायमियत और वह विषय भी है जिसके लिए गज़ल जानी जाती रही है लेकिन भाषा हिन्दी गज़ल की है।
                     इस सत्र में हस्तक्षेप करते हुए वरिष्ठ गज़लकार महेश कटारे सुगमने कहा कि गज़ल का दायरा अब हिन्दी उर्दू तक सीमित नहीं बल्कि भाषायी क्षेत्रों में भी उसका विस्तार हुआ है। आपने मौजूदा समय की विसंगतियों और विद्रूपताओं को गज़ल का विषय बनाने और नये प्रतीक गढऩे की हिमायत की। नसीर नाजुक ने पाकिस्तान के शायरों के कुछ शेर उद्धृत कर यह स्पष्ट किया कि हिन्दी और उर्दू गज़ल के बीच कोई सीमारेखा नहीं खींची जा सकती।
               अध्यक्षीय उद्बोधन में शाहिद मिर्जा ने कहा कि अरूजी होना और शायर होना अलग-अलग बातें हैं। ड्रायविंग के लिए गाड़ी की जानकारी और ट्रेफिक नियमों का ज्ञान जरूर होना चाहिए लेकिन मैकेनिक बनना कोई जरूरी नहीं।  जैसे  योग करने के लिए योगाचार्य होने की जरूरत नहीं। हम जिस भाषा का प्रयोग बोलचाल में करते हैं वो हिन्दी या उर्दू नहीं हिन्दुस्तानी जबान है। मात्र लिपि का ही अन्तर है।  
शायरी में आम बोलचाल की सरल भाषा में गहरी बात कही जाए तो आवाम तक जल्दी पहुंच जाती है। इस सत्र का संचालन युवा गज़लकार महेश अजनबीने किया और आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि जगदीश पयासी ने किया।
नवगीत और गज़लों ने बांधा समां
                उमरिया में संपन्न हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में रात को रचना पाठ का सुरुचिपूर्ण आयोजन किया गया। 14 अक्टूबर की रात को नवगीत का एवं 15 अक्टूबर की रात को गज़ल का पाठ हुआ। देर रात तक चले रचनापाठ का नगर के सुधी                                                     श्रोताओं ने जमकर लुत्फ लिया। नवगीत के रचनापाठ की अध्यक्षता डॉ. दिनेश कुशवाह ने और संचालन वरिष्ठ गीतकार शिवकुमार अर्चनने किया। इसमें भारतेन्दु मिश्र, कुमार शैलेन्द्र, वेदप्रकाश शर्मा, डॉ. मालिनी गौतम, राजीव शर्मा, डॉ. राम गरीब विकलऔर कल्पना मनोरमा ने नवगीत पाठ किया।
               इसी तरह अगली रात गज़ल का पाठ हुआ। जिसकी अध्यक्षता शाहिद मिर्जा ने और संचालन अशोक मिजाज ने किया। गज़ल का आगाज युवा गज़लकार कुलदीप कुमार ने किया फिर क्रमश: राजिन्दर सिंह राज’, गीता शुक्ला, डॉ. नीलमणि दुबे, कासिम इलाहाबादी, महेश कटारे सुगमऔर शाहिद मिर्जा ने अपनी जहीन शायरी से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया ।
संगोष्ठी में पांच साहित्यिक कृतियां विमोचित
          संगोष्ठी में पांच साहित्यिक कृतियों का विमोचन किया गया। पूर्णेन्दु शोध संस्थान के संचालक वरिष्ठ कवि पूर्णेन्दु कुमार सिंह के दो काव्य संग्रह ‘‘केसर के सिवान’’ और ‘‘प्रात की रंगोली’’ महेश अजनबीऔर मंजु मणि के प्रथम काव्य संग्रह ‘‘बेसुरी सी बांसुरी’’ वरिष्ठ साहित्यकार विनोद शंकर भावुककी कृति ‘‘सीता जी की
जन्म कथाए’’ डॉ. शिवसेन जैन संघर्षके ‘‘सीमा शतक’’ और वाट्सएप ग्रुप में साझा की गयी चयनित रचनाओं के संग्रह ‘‘उड़ान’’ का विमोचन डॉ. दिनेश कुशवाह, महेश कटारे सुगम, कुमार शैलेन्द्र, भारतेन्दु मिश्र, वेद प्रकाश शर्मा, डॉ. मालिनी गौतम, कुंवर कुसुमेश और शाहिद मिर्जा और द्वारा किया गया।

साहित्यकार बांधव शिखर सम्मानसे अलंकृत
              इस आयोजन में साहित्य,कला और सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट अवदान के लिए रीवा और शहडोल सम्भाग के वरिष्ठ रचनाकारों, रंगकर्मियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को बांधव शिखर सम्मानसे अलंकृत किया गया। साहित्य के लिए मूर्धन्य संस्कृति मनीषी नर्मदा प्रसाद गुप्त आचार्य’, दयाराम गुप्त पथिक’, डॉ. चन्द्रिका प्रसाद चन्द्र’, पूर्णेन्द्र कुमार सिंह, बाबूलाल दाहिया, डॉ. सत्येन्द्र शर्मा, डॉ. नीलमणि दुबे, डॉ. शिव शंकर मिश्र सरसको, शिक्षा क्षेत्र में जीतेन्द्र शुक्ला और विधिक साक्षरता के लिए यश कुमार सोनी को बांधव शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया। इसी तरह रंगकर्म और लोक कलाओं के संरक्षण व संवर्धन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए नीरज कुंदेर, रोशनी प्रसाद मिश्र, नरेन्द्र बहादुर सिंह और करुणा सिंह को बांधव शिखर सम्मानसे अलंकृत किया गया। 

राष्ट्रीय संगोष्ठी को इन्होंने बनाया सफल
            राष्ट्रीय संगोष्ठी को सफल बनाने में म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मलेन की उमरिया जिला इकाई के संरक्षक डॉ. राम निहोर तिवारी, श्रीशचन्द्र भट्ट,  एम.ए. सिद्दीकी, आत्मा राम शर्मा चातक’ , अध्यक्ष संतोष कुमार द्विवेदी सचिव अनिल कुमार मिश्र, कवि शम्भू प्रसाद सोनी पागल’, राम लखन सिंह चौहान भुक्खड़’, जगदीश पयासी , शेख धीरज , शंकर वर्मन कलारिहा’, राजकुमार महोबिया, शेख जुम्मन, जावेद मियांदाद, महेश अजनबी’, मंजु मणि’, प्रीती थानथराटे, अजमत उल्ला खान, भूपेन्द्र त्रिपाठी, वीरेन्द्र गौतम, दीपम दर्दवंशी, कीर्ति सोनी, सम्पत नामदेव, विनय विश्वकर्मा और रजनी बैगा आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।                                                
                                                          संतोष कुमार द्विवेदी
                                                          अध्यक्ष
                                                          म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन
                                                          जिला इकाई-उमरिया
                                                          वार्ड नं-14, विकटगंज, जिला - उमरिया (म.प्र.)
                                                          पिन 484661
                                                          मो. 9425181902


ई मेल – santoshjiumr@gmail.com

शनिवार, अक्तूबर 21, 2017

लोकचेतना के नवगीतकार :अवधबिहारी श्रीवास्तव

#  डॉ. भारतेंदु मिश्र

वर्ष 2010 में  भाई देवेन्द्र सफल के गीत संग्रह लेख लिखे माटी ने के लोकार्पण के बहाने कानपुर जाने का सुयोग बना। वहाँ की दो दिवसीय गीत गोष्ठी देवेन्द्र सफल ने ही आयोजित की थी। इस कार्यक्रम में प्रो.रमेशकुंतल मेघ चंडीगढ से पधारे थे,वरिष्ठ गीतकार नचिकेता पटना से पधारे थे। प्रो.रामस्वरूप सिन्दूर इस समारोह के अध्यक्ष थे।मुझे भी समकालीन गीत की दिशा और नवगीत के प्रयोग पर बोलना था|मैंने अपनी बात रखी और इसी विषय पर लोगों से संवाद भी हुआ| मेघ जी ने नवगीत की सौन्दर्य चेतना और लोक रंग पर बहुत महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये  |बहरहाल यह दो दिवसीय गोष्ठी समकालीन हिन्दी कविता मे गीत नवगीत के रचना विधान और गीत के विविध आयामों को समझने की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण रही। बहुत बडा कोई सरकारी मंच नही था। इसे व्यक्तिगत तौर पर गीतकार देवेन्द्र सफल ने अपने प्रयास से आयोजित किया था। यही इस कार्यक्रम की सीमा भी थी कि वह किसी एक कवि द्वारा आयोजित किया गया था,और यही इस कार्यक्रम की शक्ति भी । बहरहाल इसी बहाने यहाँ अवधबिहारी श्रीवास्तव, वीरेन्द्र आस्तिक,शैलेन्द्र शर्मा,विनोद श्रीवास्तव जैसे कानपुर के कवियों से इस अवसर पर मिलने का मौका मिला जो मेरे लिए बहुत सुखद रहा। कानपुर से लौटकर श्रेष्ठ नवगीतकार कवि अवधबिहारी श्रीवास्तव की जो छवि मन पर अंकित हुई वह अविस्मरणीय है। उनकी पुस्तक हल्दी के छापेको दुबारा पढते हुए सचमुच बहुत संतोष मिला।आमतौर पर कुछ ही ऐसी पुस्तकें होती हैं जिन्हे आप दुबारा या बार बार पढना चाहते हैं हल्दी के छापेवैसी ही पुस्तक है। समकालीन कविता के रचनात्मक अभियान को सबल बनाते पुस्तक के कुछ गीत कवि के व्यक्तित्व और कृतित्व की सुगन्ध बिखेरते हैं।हालाँकि हल्दी के छापेका प्रकाशन 1993 मे हुआ था किंतु अभी इन गीतों की चमक तमाम कवियों को चकित करती है।ये गीत कवि के आसपडोस की लोकधर्मी जीवन शैली से सीधे तौर पर जुडे हैं। अवधबिहारी जी ने बहुत अधिक गीत नही लिखे लेकिन जो गीत उनकी सधी हुई लेखनी से जनमें है वो बडे महत्वपूर्ण हैं। उनकी इस पुस्तक में गीत नवगीत प्रगीत और आख्यान धर्मी लम्बी कविताएँ भी संकलित हैं। ठाकुर प्रसाद सिंह ,अमरनाथ श्रीवास्तव,शतदल आदि ने अवधबिहारी के इन गीतों पर टिप्पणी की है।ठाकुर प्रसाद जी कहते हैं-हल्दी के छापेमें ऐसे गीतों की संख्या बहुत बडी है जो अवधबिहारी के अत्यंत अंतरंग क्षणो के साक्षी हैं।यह अंतरंगता ही कवि के निजीपन का साक्ष्य बनती है और कविता में सौन्दर्य की चमक पैदा करती है। अवधबिहारी जी के कुछ गीत अंश देखिये-
भाभी की चपल ठिठोली है/माँ के आँचल की छाया है/ दादी की परी कथाओं का/वह जादू है वह टोना है हम हँसते थे घर हँसता था/फिर यादों में खो जाता था/ मैने देखा है कभी कभी/घर भूखा ही सो जाता था/ मुझको तीजों त्योहारों पर,दरवाजे पास बुलाते थे/ खिडकियाँ झाँकती रहती थीं,कमरे रिश्ते बतलाते थे/ आँगन में चलती हुई धूप,कल्पना लोक में चाँदी है/ दीवारों पर सूखती हुई,मक्के की बाली सोना है/ वैसे तो माटी माटी है,मेरे बाबा वाला वह घर, लेकिन यादों का राजमहल/उस घर का कोना कोना है।माता पिता और अपने सगे सम्बन्धियों पर अनेक कविताएँ हिन्दी के कवियों ने लिखी हैं लेकिन अपने घर आँगन पर अवधी लोक का ऐसा मार्मिक चित्र नवगीतों में  मुझे इससे पहले कहीं पढने को नही मिला। अवधबिहारी के पास ऐसे कई गीत हैं जो गृहरति की व्यंजना को व्यापक स्तर पर सघन और सुसंवेद्य बनाते हैं। कवि के पास अपना घर आँगन है और अपनी कृषि संस्कृति वाली प्राथमिकताएँ हैं-
लगता है बरसेगा पानी/धूप भागकर गयी क्षितिज तक/वर्षा की करने अगवानी।इसके अतिरिक्त- चौक पूरते हाथ कलश जल,मन में उत्सव भरें/नयन में कितने चित्र तिरें/ गोबर लिपी देहरी खिडकी मुझसे बातें करें/नयन में कितने चित्र तिरें।अवधी लोक जीवन के ऐसे विरल चित्र अवधबिहारी के यहाँ कई रूपों मे उभरते हैं।व्यंग्य और विसंगति का एक चित्र देखिए- मै बरगद के पास गया था छाया लेने/पर बरगद ने मुझसे मेरी छाया ले ली। तथाकथित महान लोगों पर कवि का यह व्यंग्य कितना सार्थक है कहने की आवश्यकता नही। हिन्दी गीत /नवगीत के सन्दर्भ में अवध बिहारी श्रीवास्तव का नाम अत्यंत सार्थक है।हल्दी के छापेके लगभग दो दशक बाद मंडी चले कबीरनाम से अवधबिहारी जी का दूसरा गीत संग्रह वर्ष 2012 प्रकाशित हुआ ।इस संग्रह मे कुल 77 गीत हैं।इन गीतों का स्वर अवध के किसानों के बदलते परिवेश से हमें जोडता है।कवि अपने समाज की विडम्बनाओ को और आम गँवई मन को बडे मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है।गँवई मन का अर्थ है-किसान चेतना,गाँवों का बिखराव,आर्थिक सामाजिक असंतुलन,छीजती ग्राम्य संस्कृति और इस दौर की बाजारवादी प्रगति के बीच में फँसा गँवई मन वाला आम आदमी। यद्यपि रीतिकालीन कविता मे सेनापति का बारहमासा बहुत चर्चित रहा है किंतु अवधबिहारी जी ने नवगीतों के माध्यम से जो समसामयिक बारहमासा प्रस्तुत किया है वह भी बहुत स्वागत योग्य है।जिस प्रकार कैलाश गौतम और महेश अनघ जैसे नवगीतकारों ने नवगीत के ग्राम्य और आंचलिक पक्ष को हमारे सामने उजागर किया है कदाचित उसी क्रम में अवधबिहारी जी समकालीन किसान चेतना की गीत परम्परा को आगे ले जाते हुए दिखाई देते हैं,मगर वो जनवादी राजनीति के जन गीतकार नही हैं।
प्रगतिशील चेतना के गीत को ही नवगीत कहा जाता है।मंडी चले कबीरके अधिकांश गीत हमारी गँवई चेतना की मर्मव्यथा को बहुत सहज ढंग से झकझोरते हैं।अवध के गाँवों की बोली और लोक जीवन की विविध छवियाँ तथा उन छवियों में से झाँकता सजग कवि मन सबको आकर्षित करता है।भाषा शिल्प और छन्द तो कमाल का है ही।अनेक गीतों मे तुलसीबाबा वाला चौपाई छन्द कवि की कविताई मे चार चाँद लगा देता है- मुझे सुखी रखता है मेरा/अपना गँवई मन।/सीखा नही व्याकरण कोई/पहना नही आभरण कोई/कविता मे सच कहना सीखा/तुलसी बाबा से/गाँधी बाबा से सीखा है/सादा रहन सहन।कवि ने चैत-बैसाख-असाढ-सावन से लेकर फागुन तक जो ऋतु परिवर्तन के ब्याज से गँवई मन की संवेदना के अनेक गीत रचे हैं,उनका अलग ही महत्व है।ये गीत- नवगीत के खाते में अवध के गाँव को देखने समझने की एक नई दृष्टि से हमें जोडते हैं।जैसे-
उतरा बहुत कुँओं का पानी/जेठ तप रहा गाँव में।पूस माह का एक चित्र देखें- गन्ने के रस पर दिन बीता/रात बिताएँगे नारायण/काकी कथरी ओढे चुप है/काका बाँच रहे रामायण/हाँथ पसारें कैसे ?जकडी मर्यादाएँ पाँव में/काँधे पर अभाव की लाठी/पूस घूमता गाँव में।क्वार का एक चित्र इस प्रकार है-
पकने लगी धान की बाली /थिरने लगा ताल का पानी/दिखने लगीं मछलियाँ जल में/फसलें अब हो गयीं सयानी/कच्चे दूधो वाले दाने/भुने नीम की छाँव में/नए अन्न की गमक उड रही/क्वाँर आ गया गाँव में।हालाँकि गाँव मे लगातार बदलाव हो रहे हैं बिखराव के बावजूद अभी तक प्राकृतिक रूप में बहुत कुछ बचा हुआ है।वहाँ लोग अक्सर बैठते बतियाते हैं।कवि ने बारहों महीने मे आने वाले बदलाओ की सुन्दर प्रस्तुति यहाँ की है।इसके अतिरिक्त सत्यनाराण की कथा,नदी का घाट,बाबा की उदासी-बहू-कोठरी-लडकी के कई बिम्ब इस संग्रह में हैं।मंडी चले कबीरशीर्षक गीत का अंश देखिए- कपडा बुनकर थैला लेकर/मंडी चले कबीर/कोई नहीं तिजोरी खोले /होती जाती शाम/उन्हे पता है कब बेचेंगे/औने-पौने दाम/रोटी और नमक थैलों को/ बाजारों को खीर।कामगर को वाजिब दाम कभी नही मिला हमारे देश में।व्यापारी कामगर के हिस्से की सारी मलाई सदैव उडाते रहे आज भी यही कुछ चल रहा है।ये गीत अवधबिहारी जी की ही तरह बहुत सहज सरल हैं।यह अनगढ सहजता उनकी कविताई की सीमा भी है।लाक्षणिकता और जटिल बिम्बो की ओर कवि नही जाता।प्रतीको वाली भाषा यहाँ कवि नही अपनाता।अर्थात कवि अपनी और अपने पाठको की तमाम काव्य क्षमताओ को भी जानता है।देश काल बोध के गीत तो यहाँ हैं ही।उडीसा की सुमित्रा बेहरा का पता भी अवधबिहारी जी को मालूम है जिसने भुखमरी के चलते अपनी लडकी को बेच दिया था।उस मार्मिक संवेदना की मार्मिक अभिव्यक्ति देखिए- मैं उडीसा की सुमित्रा बेहरा हूँ/माँ नहीं/रोटियों के लिए मैने/ बेच दी हैं लडकियाँ।
इसके बाद अब 2017 में उनका नया नवगीत संग्रह बस्ती के भीतरप्रकाशित हुआ है| कवि की ख़ास बात यह है कि वे किसी त्वरा में नहीं हैं बल्कि पूरी तैयारी से अपने मौलिक रचाव के साथ गीतों के शिल्प भाषा और कथ्य पर काम करते हैं|इस संग्रह में उनके लगभग 60 गीत और कुछ दोहे संकलित हैं|इन सब गीतों को पढ़ने के बाद यह मुकम्मल तौर से कह सकता हूँ कि अवधबिहारी के गीतों का स्वर आंचलिक है जिनमें पारंपरिक गीत और नवगीत दोनों की सुन्दर छवि भास्वर होती है| गृहरति की व्यापकता और अवधी समाज के जीवन का जितना अच्छा चित्रण अवधबिहारी के गीतों में मिलता है वैसा चित्रण हमारे अन्य किसी समकालीन नवगीतकार के पास मुझे देखने को  नहीं मिला |अवध की बेटियों के लिए कवि कहता है-
मैं तो जन्मी थी पंख लिए /पर उड़ने का अवसर न मिला
खिड़कियाँ खोलना नहीं, बंद करना सिखलाया गया मुझे
जो रस्ता भीतर खुलता था वह पथ दिखलाया गया मुझे
जा उड़कर आसमान छू ले यह कहने वाला घर न मिला|
दकियानूसी मर्दवादी समाज में रहते हुए ,जाहिर है कि दरवाजे के पीछे धकेली गयी कनपुरिया लड़की की मनोव्यथा अवधबिहारी जैसा कवि ही इतनी मार्मिकता से व्यक्त कर सकता है|मंडी,कबीर,गाँव के मेले ठेले,माँ,घर, किसान  ग्रामीण स्त्रियाँ आदि कवि के प्रिय विषय हैं|उपेक्षित, शोषित, दलित और ग्रामीण स्त्री के प्रति कवि की चेतना हमारे सामने लगातार नवगीत का एक नया पाठ प्रस्तुत करती है|सयानी हुई लड़की के ब्याह को लेकर उसके परिजनों की चिंता कितनी विकट है और वह लड़की केवल अपना सर झुकाए बैठी है|अवधी में इसे मूड गड़ाकर बैठना कहते है- मूडी गाड़े बैठी लड़की /झगड रहे हैं बाबू भाई|’ ऐसे चित्र नवगीत के खाते में नयापन भरने के लिए पर्याप्त हैं लेकिन यह नयापन अवधीभाषा और अवधी लोक के ब्याज से ही प्रकट होता है|इसी क्रम  में समकालीन अवधी किसान का चित्र देखिये-
माथे हाँथ धरे बैठा है /थका थका चंदर
सूखा आया बीज खा गया/बाढ़ खा गयी घर|
यहाँ न तो प्रतीकों का घटाटोप है ,न अलंकारों की योजना है,न लाक्षणिकता का गुरुतर भार इसीलिए इस गीत की व्यंजना मार्मिक बन गयी है| यह सहजता ही कवि की पूंजी है|’नइकी दुलहिनजैसे लोकचित्र नवगीत में विरल हैं| इन गीतों को पढ़कर अक्सर कैलाश गौतम की याद आ जाती है|सहजता में उक्ति वैचित्र्य और अर्थगाम्भीर्य  प्रकट कर पाना आसान काम नहीं होता| कबीर तुलसी और बाद में निराला और त्रिलोचन शास्त्री की कविताई इस बात का प्रमाण है कि श्रेष्ठ कविताएं सहजता के साथ ही प्रकट होती हैं|अवधी लोक जीवन और सहजता के सौन्दर्य से संपृक्त होने के कारण ही अवधबिहारी जी मेरे प्रिय नवगीतकार हैं|ये चलनी में जल ढो लेने का हुनर अवधबिहारी जी ने अपनी माँ से ही सीखा है जिसको ये हुनर आता है वही नवगीत को नई दिशा दे सकता है-बाबू के गुस्से पर करती /धीरज का कोमल आलेपन/बहनोने के संग हंसती थी माँ /खिल उठता था सारा आँगन /घर के सभी अभावों में माँ /ढो लेटी थी चलानी में जल|’ गीत की इस तीसरी पुस्तक में कुछ दोहे भी हैं ओशो पर एक मुक्तछंद कविता भी है जो अपनी भंगिमा से आकर्षित करते है|किन्तु इस में कुछ दुमदार दोहे भी कवि ने संकलित किये हैं जो यहाँ न संकलित किये जाते तो अच्छा होता|एक दोहा देखें-
एक पिरामिड सा खडा /अपना सारा देश
लक्ष्मी जी ऊपर चढीं /नीचे पड़े गणेश|
अंतत: गीतकार भाई वेदप्रकाश शर्मा वेद अवधबिहारी जी पर केन्द्रित कोई पुस्तक निकाल रहे हैं यह जानकर मुझे प्रसन्नता हुई| इस टिप्पणी के साथ ही अवधबिहारी जी की कविताई का मैं स्वागत करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे दीर्घायु हों स्वस्थ और सानंद रहें|
संपर्क:
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