बुधवार, सितंबर 06, 2017


  समीक्षा 
                        उपेन्द्र और इन्द्रप्रस्थ
                         # भारतेंदु मिश्र
उपेन्द्र जी हमारे समय के वरिष्ठ हिन्दी कवि हैं| इन्द्रप्रस्थ से पहले उनके अनेक कविता सग्रह प्रकाशित हो चुके हैं|उनकी गजलें और कवितायेँ लगातार पढी,सुनी और सराही भी जाती रही हैं|परन्तु उपेन्द्र जी का पिछले दिनों जो ‘इन्द्रप्रस्थ ‘ शीर्षक से बारह कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ है वह इनदिनों चर्चा में है|कुछ लोगों ने इसे महाकाव्य और कुछ्लोगों ने इसे प्रबंध काव्य कहा है मैं उनसे सहमत नहीं हूँ| यह इन्द्रप्रस्थ विषय से जुडी बारह कविताओं का समूह भर है| ये बारहों कवितायेँ प्रबंध काव्य के पारंपरिक शिल्प में नहीं रची गयी हैं|दूसरी बात कि प्रबंध काव्य या महाकाव्य की अपनी निश्चित कथावस्तु होती है | कवि ने जो प्रबंधन किया है उसमें महाभारत के विराट कथासंसार में वर्णित इन्द्रप्रस्थ नगर वहां के सभी राजा और राज्य परंपरा आदि का भी विशेष चित्रण नहीं है| कोई एक नायक/नायिका/ पात्र विशेष भी नहीं है|इसलिए इसे काव्यशास्त्रीय शैली में महाकाव्य या खंडकाव्य कहना उचित नहीं लगता |इसके बावजूद कवि द्वारा बारह कविताओं के माध्यम से प्रतीकात्मक रूप में इन्द्रप्रस्थ की सामाजिक पतन गाथा की करुण कथा का संयोजन किया गया है वह न केवल चकित करता है अपितु बेहद पठनीय भी है|मेरी नजर में इन्द्रप्रस्थ एक फैंटेसी है जिसमें हमारे वर्त्तमान जीवन और नारी अस्मिता का यथार्थ भी झलकता है|जिसे हम आज का स्त्रीविमर्श और दाम्पत्य जीवन के मनोभावों और विचलनों से भी जोड़कर देख सकते हैं|
उपेन्द्र और इन्द्रप्रस्थ दोनों का गहरा संबंध रहा है| उपेन्द्र का एक अर्थ है विष्णु और दूसरा अर्थ है देवराज  इंद्र का छोटा भाई| पौराणिक सन्दर्भ के अनुसार इन्द्रप्रस्थ नगर का निर्माण और इसकी स्थापना कराने वाले श्रीकृष्ण ही थे| जब ध्रतराष्ट्र  ने आधा राज्य देने के नाम पर पांडवों को हस्तिनापुर से बाहर किया था तब कहा था-‘खांडवप्रस्थ के वन को साफ़ करके उसे समतल बनाकर नया शहर बनाओ और आधाराज्य भोगो|’ पांडवों ने उस चुनौती को स्वीकार किया तब श्रीकृष्ण जी ने मयदानव की सहायता से यमुना के तट पर इन्द्रप्रस्थ की रचना करवाई थी| पहले यह दैत्यों और सर्पों की भूमि थी|लेकिन कृष्ण के सामने किसी की एक न चली,कृष्ण कालिया नाग का दमन कर चुके थे इसलिए उनके सामने किसी प्रकार की बाधा यमुना तट के सर्पों ने नहीं उत्पन्न की| तभी उन्होंने मयदानव को अपने वश में किया फिर उसकी सहायता से इस भव्य नगर की स्थापना करवाई | वह पौराणिक इतिहास है| यहाँ उपेन्द्र का कवि अपनी पुस्तक इन्द्रप्रस्थ में भी हमारे समय में कविता के जंगल में उगे हुए पठार और कठिन यथार्थ से टकराता है,वह इन्द्रप्रस्थ के बहाने आजके युग की संवेदना खासकर स्त्री पुरुष संबंधों को अतीत से वर्त्तमान तक जोड़कर ले आता है और इन कविताओं के माध्यम से नए समय के यथार्थ को पाठक के सामने रखता है| या कहें कि कवि इन्द्रप्रस्थ रूपी बारादरी के सभी दरवाजे नए पाठक के लिए खोलने का काम करता है|
चूंकि महाभारत मूल्यों के पतन की गाथा है इसलिए इन्द्रप्रस्थ में भी मातृत्व से लेकर स्त्री पुरुष संबंध और उनमें व्याप्त ह्रासोन्मुखी विसंगतियों का समीचीन ढंग से निरूपण कवि  ने किया है| पुरुरवा,ययाति,और नहुष जैसे राजा सभी काम वासना के ही प्रतीक बनाकर प्रकट होते हैं|इन्द्रप्रस्थ पितृसत्ता के घृणित यथार्थ की गाथा है| उपेन्द्र जी ने इन मार्मिक प्रसंगों को गहरी संवेदना से व्याख्यायित किया है| पहली कविता ‘शायद यही इन्द्रप्रस्थ है’ में -कवि अतीत में खोये हुए इन्द्रप्रस्थ को खोजने की कोशिश करता है|जैसे मानो कोई स्वप्न कथा या फैंटेसी हो|पुरुरवा विरह में व्याकुल है उर्वशी इंद्र के श्राप से मुक्त होकर उसे खोजती हुई मिलती है|यहाँ स्वप्न कथा में उर्वशी के आने जाने के बीच का घटनाक्रम टूटा हुआ है|जैसे स्वप्न टूटकर पुन: आगे पीछे जुड़ जाता है उसी तरह कविता भी जुड़कर आगे बढ़ जाती है-‘विस्मृत कथाओं और इतिहास के धुंधलके में कुछ छुपा ,कुछ दीखता /शायद यही है इन्द्रप्रस्थ|’(पृष्ठ-11 )
दूसरी कविता ‘याज्ञसेनी’ में द्रुपद द्वारा यज्ञ करते समय वेदी से याज्ञसेनी अर्थात द्रोपदी के आविर्भाव की कथा है|वह अयोनिजा है|वह अपने समय की अनिद्य सुन्दरी भी है|वह युवा ही जन्मी है, वह पिता द्रुपद के प्रतिशोध की ज्वाला स्वरूप है |यही कारण है कि उसका पूरा जीवन प्रतिशोध की ज्वाला ही बनकर रह गया|वह कृष्ण के अलावा किसी से अपने मन की बात कर भी कहाँ पायी|तीसरी कविता ‘स्वयंवर’ में कवि की कल्पना और काल का घोड़ा दोनों दौड़तें हैं|वह द्रोपदी एक है लेकिन उसके रूप अनेक हैं नाम अनेक है-‘किसी के लिए कृष्णा/किसी के लिए याज्ञसेनी/किसी के लिए पांचाली/तो किसी के लिए द्रोपदी|’(पृष्ठ-21 ) ये अनेक नाम द्रोपदी के रूप गुण और आचरण के परिचायक भी हैं|वही एक है जिसके कारण इन्द्रप्रस्थ की रचना होती है और उसी के कारण इन्द्रप्रस्थ स्वाहा भी हो जाता है|
चौथी कविता का शीर्षक है-‘आवश्यक है इन्द्रप्रस्थ’ यह कविता इन्द्रप्रस्थ के आंशिक ऐतिहासिक विवरण से संपन्न है| कवि कहता है-‘कैसा विचित्र संयोग/पुरुरवा,नहुष,ययाति/जैसे महाप्रतापी परन्तु कामांध/नृपों की कहानी /बारबार दुहराता रहा इन्द्रप्रस्थ|’(पृष्ठ-26) अगली पांचवीं कविता ‘चुम्बन ही चुम्बन ’द्रोपदी के स्वप्न की कथा है जिसमें उसके प्रेम और पांच पतियों में देह बांटने की अभूतपूर्व कथा का वर्णन है| उपेन्द्र जी पूछते हैं-‘कैसे हुआ होगा संभव /उन पाँचों के बीच/अपने को साझा करना सामान रूप से/अपनी भावनाएं अपना अनुराग|’ (पृष्ठ-30 )
द्रोपदी निसंदेह अर्जुन से प्रेम करती है और वह उसकी सुधि में खोयी रहती है|कवि ने अपनी कल्पना से विपरीत रति करने वाली स्त्री के रूप में भी द्रोपदी को दिखाया है|प्रणयातुर विक्षुब्ध स्त्रियाँ शायद इस प्रकार भी अपने प्रेम अथवा प्रणय कोप को प्रकट करती हों|बहरहाल यह फैंटेसी बीच बीच में टूटती और फिर नई तरह से जुड़ती हुई चलती है जैसे इन्द्रप्रस्थ बार बार बिखरता और जुड़ता रहा|
छठी कविता का शीर्षक है-‘जब तक जीवन है’ द्रोपदी के साथ ही युधिष्ठिर अर्जुन जैसे अन्य पात्रो का भी द्वंद्व धर्म -अधर्म, नैतिकता – अनैतिकता,प्रणय –वासना ,जय-पराजय सब कुछ एक साथ चलता है |जब तक जीवन है तब तक काम क्रोध,लोभ मोह सब रहेगा ही| ये भी सच है कि पांच पतियों का न्याय केवल द्रोपदी के ही लिए हुआ|महाभारत की अन्य स्त्रियों के साथ वैसा नहीं हुआ|वही जुए में दांव पर लगाई और हारी गयी |वही महाभारत के अभूतपूर्व युद्ध और इन्द्रप्रस्थ का मूल भी है| सातवीं कविता ‘माँ जानती थी ’में उपेन्द्र जी ने जो पाँचों भाईयों के साथ सहवास की कल्पना की है वह विलक्षण है| यह भी कि कुंती ने जानबूझकर द्रोपदी को सभी भाइयों में बराबर से बाँट लेने का आदेश दिया|जब हम इस मिथ को यथार्थ के स्त्री विमर्श के पाठ के साथ रखकर देखते हैं तो नई विसंगति के रूप में कविता फूटती है|उपेन्द्र जी की यही सफलता है| किसी विह्वल कामी की तरह अर्जुन सोचता है –‘अपनी अवधि तो अपनी ही है/बाकी में वर्जित केवल/पांचाली के शयन कक्ष में जाना/परन्तु कहाँ है वर्जित पांचाली से मिलना/उसके शयन कक्ष से बाहर|(पृष्ठ-48 ) ’
आठवीं कविता ‘मोर नाचतें है ’ इस कविता में द्रोपदी का आत्मविमर्श बहुत मार्मिक ढंग से कवि  ने प्रस्तुत किया है| वह अर्जुन की स्वयंवरा पत्नी है और अब उसे पांच पतियों को बारी बारी संतुष्ट करना है,यह विकट परिस्थिति उसके सामने और उसके बाद के इतिहास में भी किसी स्त्री के सामने नहीं आयी| अब वह अर्जुन से दिन में भी मिलने का रास्ता खोज लेती है| पितृसत्ता की रक्षा के लिए पंचभोग्या बनकर भी वह खुश रहने का मार्ग खोज लेती है यह विडम्बना है|उपेन्द्र जी ने इस मार्मिक स्थल को बहुत निपुणता से चुनकर बुना है-
‘बारी वाले पति रात को असंतुष्ट चले गए/कुछ भी नहीं हुआ/द्रोपदी सोलह श्रृंगार कर /पथ पर आँख टिकाये बैठी रही/बाग़ में सफ़ेद मोर नाचते रहे/शुभ संकेत देते रहे/तभी अर्जुन पधारे/द्रोपदी अर्जुन से लिपट गयी/तय हो गया कि दिन उनके हैं/रात चाहे बारी वाले किसी भी पति की हो|’  (पृष्ठ-54 ) नवी कविता का शीर्षक ‘लहरों में खडी ’ कुंती के जीवन से जुड़ी है|कुंती पहले कुंआरी माँ बनी फिर नपुंसक पति से विवाह के कारण कुंती और माद्री दोनों को पितृसत्ता बचाए रखने के लिए देवताओं का आवाहन करना पडा| तात्पर्य यह कि ये सभी पितृसत्ता और राज्य की रक्षा के लिए अपनी भावनाओं की बलि देती रहीं और अन्य पुरुषों के संसर्ग से पुत्र प्राप्त करने के लिए सहमत हुईं| सूर्य से प्राप्त पुत्र कर्ण को कुंती टोकरी में रखकर नदी में प्रवाहित कर देती है लेकिन उसका मन सदैव बेचैन रहता है|पुन: कौमार्य  मिल जाने का वरदान देकर सूर्यदेव अपने रास्ते चले गए|कुंती न अपने प्रेम को पा सकी न अपने सबसे तेजस्वी पुत्र कर्ण को बचा सकी|अब महारानी बनाने के बाद पति की नपुंसकता का पता लगाने के बाद उसे सत्ता की रक्षा के लिए प्रतापी पुत्रो की आवश्यकता थी इसलिए उसने वह सब किया जो उसका मन नहीं चाहता था-‘अगली समस्या थी संख्या की /कितने पुत्र /ताकि वे कम भी न पड़े/और आपस में लड़ भी न पड़ें|’ पूरे पांडव कुल को सुरक्षित रखने का दायित्व भी कुंती पर ही था| उसने ही द्रोपदी नाम के खूंटे से सब पुत्रों को बांधा ताकि परिवार बिखर न जाए|उपेन्द्र जी ने यह कविता विशेष रूप से स्त्री प्रश्न से टकराते हुए लिखी है| आज के समाज में भी स्त्री के कौमार्य और उसके दूसरे पुरुषों से संपर्क को लेकर तरह तरह का हंगामा मचा रहता है|
दसवीं कविता ‘कुल और गोत्र ’ है|स्वाभाविक है कुल, गोत्र और रक्त की शुद्धता आदि के प्रश्न उस समय भी रहे होंगे कर्ण को जीवन भर सूत पुत्र का दंश झेलना पडा|ये सवाल आज भी हमारे समाज में उसी तरह खड़े हैं|ग्यारहवीं कविता-‘देखे मैंने उन आँखों में’ कर्ण के एकालाप की भाँति  रची गयी है|वह सबके लिए पहेली बना रहा जीवन पर्यंत-‘मै जैसे रहा विद्यमान इन्द्रप्रस्थ में /कुंती के मन में ऊहापोह बन/द्रोपदी के मन में प्रेम-घृणा का द्वंद्व बन/पांडवों के मन में भय बन/और कृष्णा के मन में बना प्रश्नचिन्ह |(पृष्ठ-76 )’| अंतिम बारहवीं कविता का शीर्षक है-‘प्रत्येक स्त्री का इन्द्रप्रस्थ ’ यह कविता अन्य कविताओं के निष्कर्ष स्वरूप लिखी गयी है| प्राचीन काल की स्त्री और आज के समय की स्त्री के जीवन में भी पित्रसत्ता से प्रेरित सामाजिक समस्याएँ तकरीबन एक जैसी हैं|इसीलिए उपेन्द्र जी अंतिम पक्तियों में कहते है-‘चलता रहा मेरा इन्द्रप्रस्थ भी साथ साथ/होता रहा नष्ट बार बार/होता रहा पैदा बार बार /प्रत्येक स्त्री के साथ उसका इन्द्रप्रस्थ|’(पृष्ठ-87)
इन्द्रप्रस्थ की इन सभी कविताओं में एक दूसरे से सन्दर्भ जुड़ते हुए चलते हैं | पठनीयता कहीं बाधित नहीं होती|शाश्वत स्त्री अस्मिता के प्रश्न को कवि ने नए आख्यान के रूप  में हमारे सामने प्रस्तुत किया है| इस पुनराविष्कार के लिए उपेन्द्र जी को  बधाई|
शीर्षक: इन्द्रप्रस्थ/कवि :उपेन्द्र कुमार/प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स,दिल्ली-11 0 0 32  /वर्ष:2017/प्रथम संस्करण/मूल्य:100/ 

संपर्क: सी-45/वाई-4 ,दिलशाद गार्डन,दिल्ली-95




शनिवार, फ़रवरी 11, 2017


जन्मशती (1917-1964 ) पर स्मरण--
मुक्तिबोध का काव्य मर्म



                                   मुक्तिबोध समकालीन हिन्दी कविता के 

युगप्रवर्तक रचनाकार माने जाते है|वे ‘तारसप्तक’ के पहले कवि है|अपने जीवन और 

परिवेश के अँधेरे में भटकते हुए उन्हें अभाव के प्रभाव के साथ व्यापक जीवनानुभव 

की दिशा सहज ही मिल गयी थी| 

गजानन माधव मुक्तिबोध जी का जन्म 13 नवंबर 1917 को श्योपुर (शिवपुरी) जिला मुरैना, ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में हुआ था। आपके पिता माधवराव और माता का नाम पार्वती बाई था। पिता पुलिस की नौकरी में थे |ईमानदारी के कारण पिता जी के तबादले बार बार कई शहरो में होते रहे| मुक्तिबोध को भी परिवार के साथ शहर –गाँव सब कही भटकना पडा| बाद में पदोन्नत  हो कर पिता जी उज्जैन में इन्स्पेक्टर पद से रिटायर हुए। रात में गश्त लगाने वाले पुलिस वालो के साथ उन्हें घूमना अच्छा लगता था| रात के अँधेरे में होने वाले जुर्म और उनकी रोकथाम के लिए पुलिस विभाग द्वारा रात की गश्त के लिए सिपाहियों की तैनाती की जाती है| मुक्तिबोध को अपनी कविता का पोस्टर जीवन की इन बेसबब भटकनो से मिला|मुक्तिबोध की पढाई में बाधा बार बार आती रही| पूजापाठ के प्रति आस्तिक विचारवाले , निर्भीक, न्यायनिष्ठ और रिश्वत-विरोधी होने के कारण जब पिता जी रिटायर हुए तब भी वे खाली हाथ थे।ऐसे ईमानदार सात्विक परिवेश में कवि का बचपन बीता था|उन दिनों मध्यप्रदेश के गाँवों में किस तरह का पिछडापन रहा होगा उसकी कल्पना ही की जा सकती है|मुक्तिबोध ने इस परिवेश में पसरे जीवन और लोगो के जीवन संघर्ष को बहुत निकट से देखा और उनके जीवन की विसंगतियों को देखकर  उनके दुखो  के मर्म को समझने की चेष्टा की है| जब अमानवीयता के बिम्ब असहनीय होने लगते है तो मुक्तिबोध की कविता शोषितों के हक में पोस्टर बन जाती है|किताबो के अलावा मुक्तिबोध जीवन के भी गहराई से पढ़ते हैं|मुक्तिबोध के लिए भटकन और अभाव से लड़ने के लिए कविता पोस्टर का काम करती है|वह भी खून के रंग से लिखा गया पोस्टर –
गलियों के अलमस्त
फ़क़ीरों के लहरदार
गीतों से फहराओ
चिपकाओ पोस्टर
कहता है कारीगर ।
############
मानो या मानो मत
आज तो चन्द्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है !!
वेदना के रक्त से लिखे गये
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर !!

मुक्तिबोध का अपने परिवेश में रहने वाले इंसानों से इतना गहरा प्रेम है कि वही प्रेम की संवेदना मानो धड़कती छाती की गर्मी से निकलने वाली भाप के आसवन से कविता आंसू बन जाती है|कवि की करुणा का विरेचन करने वाला वह आंसू ही उनकी कविता के लिए खूखार अक्षर बन जाता है|ऐसे ही अक्षरों से लिखी गयी उनकी कविता शोषण के विरुद्ध बनाया गया पोस्टर है|इस मर्म संवेदना का  पोस्टर जिसे कवि चौराहों पर आसपास की दीवारों पर चिपका देना चाहता है| मुक्तिबोध कविता को फकीरों के गीत से जोड़ते है|पेंटर की पेंटिंग से जोड़ते है|उनके लिए कविता केवल कुछ ख़ास विचारधारा वाले चिंतको की बयानबाजी भर नहीं है|वो सभी ओर से उठने वाले संघर्षो को एक साथ चौराहे तक लाना चाहते है| दुखो से बिलबिलाती और अपने अज्ञान के कारण मारी जाती हुई निरीह जनता के बीच किसी गाँव गली का चौराहा ही उनका मंच है|असल में मुक्तिबोध अपनी लंबी कविताओं को कविता के रूप में न लिख कर उन्हें रंगमंच के शिल्प में गढ़ते है| उनकी फैंटेसी चाहे ‘अंधेरेमे’ हो या ‘ब्रह्मराक्षस’ सभी का अर्थ मंचित किये जाने से ही खुलता है|हिन्दी कविता में यह नई पहल थी|ये समय ही आख्यान धर्मी लम्बी कविताओं का लगता है-
प्रसाद की ‘प्रलय की छाया’,निराला की-‘राम की शक्तिपूजा’ अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ और इसी आख्यान परंपरा में मुक्तिबोध की कविताएं देखी परखी जा सकती है| परन्तु गंभीरता से विचार करने पर हम देखते है कि मुक्तिबोध की लम्बी कवितायेँ पूर्व के कवियों की आख्यान धर्मी कविताओं की परंपरा से कुछ भिन्न नई लीक बनाती है| ये स्वप्न-आख्यान के रूप में हमारे अवचेतन में उतरती है और हमे पूरी तरह झिझोड कर जागृत कर जाती है|इन कविताओं में जीवन की धड़कती हुई लय विद्यमान है| भले ही प्रकट रूप में कोई छंद हो या नहो| इन कविताओं की संवाद धर्मिता और व्यंजना की धार बारंबार समाज के तथाकथित प्रबुद्धो के मस्तिष्क पर चोट करती हुई दिखाई देती है|  ये अत्यंत उलझे हुए आख्यान वाली कविताएं होने के साथ ही आक्रोश से लबालब प्रतिहिंसा को उकसाने वाली कविताएं भी है| पराधीनता के प्रति विद्रोह तो एक आवरण है|गुलामी के जो कई आयाम है मुक्तिबोध उन सबको समझते है| सबको समझाने के लिए मुक्तिबोध सभी कलाकारों और कला माध्यमो को सन्देश भी देते है-पेंटर ,कवि और संवाद की भाषा तो मानो उन्हें शूद्रक अथवा शेक्सपीयर ही बना देती है| मुक्तिबोध सकारात्मक ज्ञानात्मक संवेदना पर बल देते है|आम आदमी का जीवन जटिल है उसे समझने के लिए सामाजिक कार्यकर्ताओं और लेखको को उनके निकट जाना होता है,समाज और सामाजिको से जुड़े बिना उनके जीवन संघर्ष अथवा जीवन सौन्दर्य को  नहीं पहचाना जा सकता|
    मुक्तिबोध की प्रारंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई। 1938 में बी० ए० पास करने के पश्चात आप उज्जैन के मॉर्डन स्कूल में अध्यापक हो गए । आपने अनेक स्थानों पर अध्यापन कार्य किया और अर्थ-संकट भी भोगा। 1954 में एम० ए० करने पर राजनाँद गांव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए। दस वर्ष बाद ही अर्थात 11 सितंबर 1964 को उनका निधन हुआ | कुल 47 वर्ष का जीवन और हिन्दी साहित्य की दिशा में मील का पत्थर बन कर अल्पायु में ही चल बसे| विद्वानों का मत है कि-1962 में जब उनकी अन्तिम रचना, 'भारत इतिहास और संस्कृति' प्रकाशित हुई तभी तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार उनको लेकर चौकन्नी हो गई थी|कोई भी सत्ता अपने सामने विद्रोही कवि को कैसे सह सकती थी| मुक्तिबोध को सत्ता की उपेक्षा के कारण  आतंरिक चोट पहुँचाई गयी इस कारण उनके हृदय पर इस असहनीय उपेक्षा का गहरा प्रभाव पडा और  अकस्मात्  17 फरवरी  1964 को उन्हें पक्षाघात हुआ  । भोपाल के हमीदिया अस्पताल में उनका उपचार भी  हुआ लेकिन जब दशा और अधिक बिगड़ गई तो मुक्तिबोध को दिल्ली स्थित  ऑल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में भरती करवाया गया। लगभग आठ महीने मृत्यु से जूझने के पश्चात 11 सितम्बर, 1964 को मूर्छा  में ही आपका देहांत हुआ| इस अल्प आयु में ही वे हिन्दी साहित्य को जितना कुछ दे गए वह अत्यंत महत्वपूर्ण है| हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध निरे कवि नहीं थे वे कहानीकार भी थे और समीक्षक भी।प्रसाद की कामायनी पर उनकी किताब इस बात का प्रमाण है कि वे अपने समय के श्रेष्ठ आलोचक भी है| वे नवता  के मूल्यों को अपनी दृष्टि से विवेचित करते हैं| वे  प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु निर्मित करते है|नए युग के लिए नए काव्य सौन्दर्य के मानक भी गढ़ते है।
 सन 1939 में आपने शांता जी से प्रेम विवाह किया था। कहा जाता है कि पत्नी के साथ उनकी वैचारिक अनुकूलता नहीं हो पाई। पत्नी को मुक्तिबोध के कवि-व्यक्तित्व की अपेक्षा सम्पन्नता और सुविधापूर्ण जीवन में अधिक रुचि थी।   वैश्विक स्तर पर देखे तो यह समय क्रान्ति – शोषण और दमन का रहा है| 1942 के आस-पास वे वामपंथी विचारधारा की ओर झुके तथा शुजालपुर में रहते हुए उनकी वामपंथी चेतना और मजबूत हुई।इस अल्पायु में उनकी दुर्दमनीय रचनाधर्मिता अचंभित करती है| उनकी रचनाओं में-- कविता संग्रह : चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी भूरी खाक धूल तथा तारसप्तक में रचनाएं प्रकाशित|कहानी संग्रह : काठ का सपना, विपात्र, सतह से उठता आदमी।उपन्यास: विपात्र,आलोचना : कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्मसंघर्ष, नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ तथा  आत्माख्यान: एक साहित्यिक की डायरी के रूप में उपलब्ध है| हालांकि अब सात खंडो में मुक्तिबोध रचनावली का भी प्रकाशन हो चुका है | सर्वप्रथम ‘तारसप्तक’ में उनकी उपस्थिति सबको आकर्षित करती है| मुक्तिबोध कवि की पीड़ा को कुरेदते हुए जीवन का यथार्थ लिखते है| तारसप्तक में ‘मृत्यु और कवि’ तथा ‘नाश देवता ’ जैसी कवितायेँ जीवन की व्यापक करुणा का स्वर लेकर उपस्थित होती है| करुणा स्थायी भाव है,वह दुःख के भाव का नैसर्गिक आयाम भी है| मुक्तिबोध की ये दोनों कविताएं अपने शीर्षकों से ही नहीं वरन अपनी भाषा , लय और व्यंजना से हमें बांधती है| ‘मृत्यु और कवि’ का स्वर देखने योग्य है|इस कविता के आरंभिक दो अनुच्छेद इस प्रकार है -      
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर
व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर
है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती,
जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर
बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला,
वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन
घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला
"
ये सब क्षणिक ,क्षणिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर" ।

ऐसा मत कह मेरे कवि, इस क्षण संवेदन से हो आतुर
जीवन चिंतन में निर्णय पर अकस्मात मत आ, ओ निर्मल !
इस वीभत्स प्रसंग में रहो तुम अत्यंत स्वतंत्र निराकुल
भ्रष्ट ना होने दो युग-युग की सतत साधना महाआराधना
इस क्षण-भर के दुख-भार से, रहो अविचिलित, रहो अचंचल
अंतरदीपक के प्रकाश में विनत-प्रणत आत्मस्थ  रहो तुम
जीवन के इस गहन अटल के लिये मृत्यु का अर्थ कहो तुम ।
हमारी परंपरा में आदि कवि वाल्मीकि ने शोक को ही श्लोक के रूप में विक्सित किया था|काव्यशास्त्रियो द्वारा कहा जाता है-‘शोक:श्लोकत्वमागत:’ अर्थात शोक से श्लोक निकल आया|बहेलिये ने क्रौंच पक्षी का जब वध किया और क्रौंची विलाप करने लगी तो उसकी करुण पीड़ा और शोक को कवि ने श्लोक के रूप में व्यक्त किया| जैसा कि संस्कृत में एक अन्य सूक्ति है- ‘जीवन्नरो भद्र शतानि पश्यति’ अर्थात मनुष्य का स्वभाव है कि जीवन के लिए जीवित रहते मनुष्य अपने कल्याण के लिए  सैकड़ो मार्ग खोजता है| किन्तु मृत्यु के बाद विवश पड़े हुए मनुष्य में कवि को मानो अपनी मृत्यु नजर आने लगती है|मुक्तिबोध कवि से मृत्यु का अर्थ कहने के लिए प्रेरित करते है| ठीक उसी प्रकार जैसे गौतम बुद्ध कहते है-संसार के चार आर्य सत्य हैं-1.दुःख है|2.दुखका कारण है|3.दुख के कारण का निवारण है|4.दुख के निवारण का मार्ग है| मुक्तिबोध इसी कविता के माद्ध्यम से अपने नाम को सार्थक करते हुए अपने समय की कवि बिरादरी को सचेत करते है| ज़रा, व्याधि मृत्यु के बोध से मुक्ति के बाद ही कोई कवि सही अर्थ में कवि हो सकता है| ये चेतना हमारी परंपरा से जीवन में व्यापी हुई है|ऐसी कविता लिखते समय जाहिर है कि मुक्तिबोध के सामने पराधीन भारत में  मध्यप्रदेश के पिछड़े हुए शहरों और गाँवों में भुखमरी,गरीबी, बीमारी और अकाल मृत्यु के कारुणिक दृश्य सामने उपस्थित रहे होंगे| किसी कवि को अपना काव्य प्रयोजन याद रहे तो यह बहुत बड़ी बात है| ‘तारसप्तक’ में ही संकलित एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘नाश देवता’ इसका स्वर तो और भी विचलित करने वाला है-

घोर धनुर्धर, बाण तुम्हारा सब प्राणों को पार करेगा,
तेरी प्रत्यंचा का कंपन सूनेपन का भार हरेगा
हिमवत, जड़, निःस्पंद हृदय के अंधकार में जीवन-भय है
तेरे तीक्ष्ण शरों की नोकों पर जीवन-संचार करेगा ।

तेरे क्रुद्ध वचन बाणों की गति से अंतर में उतरेंगे,
तेरे क्षुब्ध हृदय के शोले उर की पीड़ा में ठहरेंगे
कोपित  तेरा अधर-संस्फुरण उर में होगा जीवन-वेदन
रुष्ट दृगों की चमक बनेगी आत्म-ज्योति की किरण सचेतन ।

सभी उरों के अंधकार में एक तड़ित वेदना उठेगी,
तभी सृजन की बीज-वृद्धि हित जड़ावरण की मही फटेगी
शत-शत बाणों से घायल हो बढ़ा चलेगा जीवन-अंकुर
दंशन की चेतन किरणों के द्वारा काली अमा हटेगी ।

हे रहस्यमय, ध्वंस-महाप्रभु, जो जीवन के तेज सनातन,
तेरे अग्निकणों से जीवन, तीक्ष्ण बाण से नूतन सर्जन
हम घुटने पर, नाश-देवता ! बैठ तुझे करते हैं वंदन
मेरे सर पर एक पैर रख नाप तीन जग तू असीम बन ।
ये दोनों कविताएं वर्ष 1942 से पहले रची गयी होंगी|स्वतंत्रता संग्राम की गमक पूरे समाज में विद्यमान थी| मुक्तिबोध नाश के देवता की अभ्यर्थना करते है| महाकाल की अभ्यर्थना में प्रसाद जी ने भी कामायनी में शिव को समानांतर
रूप से नाश और सृजन का देवता माना है| मुक्तिबोध इस कविता में क्रोध और आक्रोश के लिए महाकाल को मानो सज्जित होने का आह्वान करते हैं| धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर शर संधान हेतु सज्जित होने की प्रार्थना करने वाला कवि ही कदाचित मुक्तिबोध हो सकता है| कवि का मानना है कि दंशन से चेतना की किरणे फूटेंगी और अज्ञान का अन्धकार नष्ट होगा| इसीलिए मुक्तिबोध महाकाल से कहते है कि हे ध्वंस के महाप्रभु अपने तीक्ष्ण बाणों के अग्निकणों से पुरातन को हटाओ और नूतनता का सृजन करो|अंगरेजी राज की काली अमावस्या को तुम ही दूर कर सकते हो| मुक्तिबोध की शिवसाधना को भी हमें समझना होगा कि वे अपने किसी हित के लिए प्रार्थना करने वाले निरे विह्वल भक्त नहीं है| बल्कि वे हमारे समय के क्रान्तदर्शी कवि है| उनका आक्रोश और आगे बढ़ता जाता है|’प्रश्नचिन्ह बौखला उठे’ शीर्षक कविता का अंतिम अंश देखिये-

भूखे चूल्हे के भोले अंगारों में रम,
जनपथ पर मरे शहीदों के
अन्तिम शब्दों में बिलम-बिलम,
लेखक की दुर्दम कलम चली ।
मुक्तिबोध की कविताओ में जहा छंद टूटते दिखाई देते है वहा उनके जीवन के व्यापक संघर्ष को बल मिलता है|जब कविता की लय खंडित होती है,जीवन की लय भी टूटती है| टूटती हुई जीवन की लय को नया शिल्प देने का कार्य हिन्दी में मुक्तिबोध ही करते है| उनका चिंतन  इसीलिए बरगद की जड़ की तरह पाताल की गहराई से लेकर आकाश तक फैली हुई फुनगियो में दिखाई देता  है|विरूप यथार्थ का सौन्दर्यशास्त्र गढ़ने में मुक्तिबोध को महारत हासिल है|जैसे  नागार्जुन के यहाँ चूल्हा चक्की की उदासी वाला अकाल का चित्र  झलकता है| मुक्तिबोध भी इस प्रकार के त्रासद प्रसंग के सौंदर्यशास्त्र से जुड़ चुके थे| मुक्तिबोध के पास दुर्दम कलम है| ऐसी कलम जब चलती है तभी शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि दी जाती है| ‘विचार’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध कहते है-

विचार आते हैं
लिखते समय नहीं
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करते समय
चांद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में
अर्थात विचारों का संबंध मनुष्य की जीवन शैली से है|सकारात्मक ज्ञानात्मक संवेदना ही लेखन की मूल संवेदना है|इस मूल्य को जिन लोगो ने समझा वे ही लोग मुक्तिबोध की कविता को समझ सके हैं|मुक्तिबोध के यहाँ चाँद के अनेक रूपाकार है विविध सौन्दर्य बिम्बों के साथ विविध प्रतीकों के रूप में वह प्रकट होता है|एक बात और समझने की है कि मुक्तिबोध निरे मार्क्सवादी विचारधारा के कवि नहीं है|वे आक्रोश के कवि है|वे संघर्ष के कवि हैं|पाखण्ड के विरोध में खड़े होने और उससे आगे बढ़कर लड़ने की प्रेरणा देने वाले कवि है,किन्तु उन्हें एक ख़ास विचारधारा में सीमित करके देखना उचित नहीं है|चाँद का मुंह टेढा है की भूमिका में श्रीकांत वर्मा ने लिखा था-
“हमारे सामाजिक जीवन में कविता को क्या स्थान हासिल है, इसका इससे अच्छा परिचय और क्या मिल सकता है ! वास्तव में कविता मरणासन्न है या समाज, इसका फ़ैसला भी कवि और समाज दोनों ही अपने-अपने ढंग से करेंगे। मुक्तिबोध तो शायद यह नहीं मानते मगर मैं यह ज़रूर मानता हूँ कि अपनी मृत्यु के लिए कवि भले ही ज़िम्मेदार हो, समाज की मृत्यु के लिए क़तई नहीं।किसी और कवि की कविताएँ उसका इतिहास न हों, मुक्तिबोध की कविताएँ अवश्य उनका इतिहास हैं। जो इन कविताओं को समझेंगे उन्हें मुक्तिबोध को किसी और रूप में समझने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी”
मुक्तिबोध को समझने के लिए उनकी कविताओं में घुसकर देखना होगा|खासकर लम्बी कविताओं में उनके जीवनानुभव का प्रतीकात्मक विस्तार है| जिंदगी के एक-एक स्नायु के तनाव को मुक्तिबोध खासकर अपनी लम्बी कविताओं –अँधेरे में,ब्रह्मराक्षस ,चांद का मुंह टेढा है,आदि में गहरी निष्ठा से व्यक्त करते है|वे उन कविताओं के लिए विख्यात भी हुए|उनकी इन कविताओं में उनके समय के यथार्थ की जटिलता को समझा जा सकता है| आज भी न वह शोषण ख़त्म हुआ है और न वह जन सामान्य के जीवन की जटिलता ही समाप्त हुई है|मुक्तिबोध इसी लिए समाज में रह कर भी स्वयं को समाज से भिन्न स्थान पर अनुभव करते हैं---
‘मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ 
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है 
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।‘
जब मुक्तिबोध ऐसा कहते है तो उनकी महाप्राणता का अंदाजा लगाया जा सकता है| जैसे गीता में कहा गया है-‘या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ’ कुछ उसी व्यंजना में मुक्तिबोध को समझना चाहिए|वो सबके साथ सामान हो कर भी सबसे अलग हैं|





शुक्रवार, जनवरी 27, 2017


जन्मशती पर विशेष—
(1917 से 2007 )
                           त्रिलोचन की छांदस चेतना
# भारतेंदु मिश्र
 


गाओमन के तारों परजी भर कर गाओ
जहाँ मरण का सन्नाटा है जीवन लाओ।
त्रिलोचन मन की स्वतंत्रता के कवि है|  मानसिक स्वातंत्र्य कवि होने का सहज लक्ष्ण है|त्रिलोचन किसी एक विचार या राजनीतिक संघ से कभी जुड़े नहीं रहे|आलोचकों ने नाहक उन्हें अपनी व्याख्याओं के लिए विचारधाराओं के हिसाब से व्याख्यायित किया है|मृत्यु के सन्नाटे को जीवन में बदलने के लिए जिस भी गीत की आवश्यकता पड़े उसे गाने की वो प्रेरणा देते चलते है|उन्होंने गीत, सानेट, गजल और आवश्यकता के अनुरूप मुक्तछन्दी कविताएं भी लिखीं | कभी किसी काव्यविधा को कम करके नहीं आंका| कविता के प्रति उनके व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है| किन्तु उनके समीक्षकों ने उनकी छंदबद्धता का वैसा आदर नहीं किया|उनके भाषा और छंद के ज्ञान के बारे में किसी को संदेह नहीं था|किस शब्द को किस तरह से प्रयुक्त किया जाना है लोग उनसे सीखते थे| वे वैदिक संस्कृत से लेकर प्राकृत ,पाली,अंगरेजी,उर्दू,बांग्ला हिन्दी और अवधी जैसी भाषाओं के बेहतरीन जानकार थे|सागर में रह कर उन्होंने वर्षो तक मुक्तिबोध की भाषा चेतना पर काम किया|बाद में अनेक वर्षो तक अलीगढ़ वि.वि. में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर उर्दू फारसी आदि भाषाओं पर काम किया|

उनके साथ बतकही करना किसी उत्सव से कतई कम नहीं था|मेरा सौभाग्य है कि मुझे 1989 से 1997 तक उनका सामीप्य मिला|दिल्ली में उनके साथ बिताये पल मेरे लिए अनमोल है |एक बार उनके साथ सात दिन की कुल्लू यात्रा करने का भी सौभाग्य मिला|उनसे बहुत कुछ सीखा और जाना| पहली मुलाक़ात में उन्होंने पूछा-‘पढाई लिखाई क्या की है ?’
‘जी,संस्कृत में एम्.ए. किया है|’मैंने उत्तर दिया तो बोले – ‘ये शुभ लक्षण है..क्योकि हिन्दी वालो को हिन्दी नहीं आती|’ इसके बाद वो बताते रहे कि मुझे और क्या क्या पढ़ना चाहिए| उनके साथ के अनेक संस्मरण है|संस्मरण फिर कभी अन्य अवसर के लिए उपयोगी होंगे |
उनके भाषा ज्ञान और गांभीर्य को उनकी कविता की सहजता में देखा जा सकता है|वे कविता में पूरे वाक्य संतुलित भाषा और छान्दसिक सौष्ठव के पक्षधर थे| जटिल से जटिल विषयो को सहज रूप में समझा देने की उनकी कला चमत्कृत करती थी| सच्चाई ये भी है कि उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा अकेले ही काटा|एक गीत में वे कहते है-

आज मैं अकेला हूँ/अकेले रहा नहीं जाता।
जीवन मिला है यह/रतन मिला है यह
धूल में कि फूल में /मिला है तो मिला है यह
मोल-तोल इसका/अकेले कहा नहीं जाता|

सुख आये दुख आये/दिन आये रात आये
फूल में कि धूल में आये/जैसे जब आये
सुख दुख एक भी/अकेले सहा नहीं जाता|

चरण हैं चलता हूँ/चलता हूँ चलता हूँ
फूल में कि धूल में/चलता मन चलता हूँ
ओखी धार दिन की/अकेले बहा नहीं जाता।
इतने मार्मिक ढंग से अकेलेपन की व्यथा को इस गीत के माद्ध्यम से त्रिलोचन जी रखते है कि वह प्रत्येक मनुष्य के लिए नया पाठ देने लगता है|ये उन दिनों का गीत है जब अधिकाँश नौकरी करने वाले कमाने के लिए अपने घर परिवार से दूर शहरों में रहते थे|त्रिलोचन प्रेम और जनवादी सौन्दर्य के बड़े कवि है|आत्मव्यंग्य करने से वो कभी नहीं चूकते|हालांकि उनकी कविता का स्वर संघर्ष और दृढ़ता के मूल मन्त्र से हमें जोड़ता है|उनका एक गीत है ‘परिचय की गाँठ’ ये गीत वास्तव में प्रेम या प्रणय को परिभाषित करता है|अर्थात जब किसी परिचित से हमारा संपर्क हो जाता है और जब वह बंधन अविच्छिन्न प्रतीत होने लगे तो उसी अवस्था का नाम प्रेम है| देखिये परिचय की गाँठ का स्वर-
यूं ही कुछ मुस्काकर तुमने/परिचय की वो गांठ लगा दी!
था पथ पर मैं भूला भूला /फूल उपेक्षित कोई फूला 
जाने कौन लहर ती उस दिन /तुमने अपनी याद जगा दी।
कभी कभी यूं हो जाता है /गीत कहीं कोई गाता है 
गूंज किसी उर में उठती है /तुमने वही धार उमगा दी।
जड़ता है जीवन की पीड़ा /निस्-तरंग पाषाणी क्रीड़ा
तुमने अन्जाने वह पीड़ा /छवि के शर से दूर भगा दी।
तमाम नवगीतवादियों के लिए ये गीत आज भी अत्यन्त प्रेरक है|ध्यान देने की बात ये है कि पूरे गीत में कही भी प्रेम या प्रणय शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है| यही त्रिलोचन की शक्ति है| छंद तो है ही पूरा वाक्य भी साफ़ तौर से देखा चीन्हा जा सकता है|ये जो छवि का शर इस गीत में आता है वही कविता की मूल संवेदना है|सौन्दर्य का तीर की तरह लगना ही प्रणयानुभूति है|छन्दोबद्ध कविता का कुछ आलोचकों ने जिस समय सबसे अधिक विरोध किया उसी समय में हमारे चर्चित प्रगतिशील कवि गीतों और छंदों में कविता कर रहे थे| शरद ऋतु के प्रसंग को गीत में त्रिलोचन जी बेहद सुंदर रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते है-
शरद का यह नीला आकाश 
हुआ सब का अपना आकाश 
ढ़ली दुपहरहो गया अनूप 
धूप का सोने का सा रूप 
पेड़ की डालों पर कुछ देर 
हवा करती है दोल विलास 
भरी है पारिजात की डाल 
नई कलियों से मालामाल 
कर रही बेला को संकेत 
जगत में जीवन हास हुलास 
चोंच से चोंच ग्रीव से ग्रीव 
मिला करहो कर सुखी अतीव 
छोड़कर छाया युगल कपोत 
उड़ चले लिये हुए विश्वास|
  शरद के नीले आकाश में सुनहरी धूप और पारिजात के वृक्ष पर झूलती और उसे झुलाती हवा का सुन्दर बिम्ब देखने योग्य है| इसी बीच कपोतो की रति क्रीडा का अद्भुत चित्र अपनी नैसर्गिकता के साथ अत्यंत हृदयहारी बन गया है| त्रिलोचन जी के काव्य सौन्दर्य को समझाने के लिए इस प्रकार के गीतों को व्याख्यायित किया जाना मुझे आवश्यक प्रतीत होता है| दूसरी ओर देखें ‘फेरू ’ जैसे विपन्न जाति के कहार पात्र को लेकर उन्होंने कितना सुंदर नवगीत अपने समय में उन्होंने लिखा था| फेरू मनमौजी है ठाकुर का खानदानी सेवक है| वाह बहिर्मुखी है,बहिर्मुखी से अभिप्राय सामंत के साथ बाहर राग रंग की दुनिया के नज़ारे देखने में वो भी खुश है|उसी सामंतवादी दासता के भ्रमजाल में वह ठकुराइन के झूठ के साथ मगन भी है|ऐसे भोलेभाले  पात्र आज भी हमारे गाँवों में मिल जाते हैं --
फ़ेरु अमरेथू रहता है
वह कहार है/काकवर्ण है
सृष्टि वृक्ष का /एक पर्ण है
मन का मौजी
और निरंकुश/राग रंग में ही रहता है|
उसकी सारी आकान्क्षाएं - अभिलाषाएं
बहिर्मुखी हैं/इसलिए तो
कुछ दिन बीते/अपनी ही ठकुराइन को ले
वह कलकत्ते चला गया था
जब से लौटा है/उदास ही अब रहता है। 
ठकुराइन तो बरस बिताकर/वापस आई
कहा उन्होंने मैंने काशीवास किया है
काशी बड़ी भली नगरी है
वहां पवित्र लोग रहते हैं
फेरू भी सुनता रहता है।
  नागार्जुन ,शमशेर ,केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे कवि हिन्दी की  प्रगतिशील चेतना के कवि हैं | ये सब गीत और छंद में कविताए लिख रहे थे|यही कारण था कि ये अन्य कवियों की तुलना में अधिक चर्चित और प्रासंगिक रहे| बात यह भी ध्यान देने की है  कि इनके काव्य में इनका अपना जीवन संघर्ष इनकी अपनी लोकचेतना के साथ भास्वर होता हैलोकचेतना का अर्थ ही है संपूर्ण लोक जीवन जिसमे लोकभाषा चेतना ,किसान चेतना,आंचलिक सौन्दर्य,जनपदीय स्वर,लोक भाषा के छंद और उनकी जीवन लय त्रिलोचन के सामने नागार्जुन थे तुलसीदास उनके भाषा गुरू थे हीसंस्कृत माध्यम से बचपन में पढाई शुरू हुई|कबड्डी और पहलवानी उनके खेल थे| उनका जन्म 20 अगस्त 1917 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के कठघरा चिरानी पट्टी गाँव में क्षत्रिय परिवार में हुआ। बाद में काशी विद्यापीठ में रहकर पढाई की| स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम चरण भी देखा और देश का विभाजन भी|उनका इतिहास बोध कमाल का था| कालिदास,तुलसी,शेक्सपीयर ,गुरुदेव रवीन्द्र आदि  से लेकर लेनिन, मार्क्स,स्वामी विवेकानंद,के बारे में उनसे कोई भी घंटो बात कर सकता था| बातचीत के सिलसिले में खाना पीना भी भूल जाया करते थे| जीवन संघर्ष और संघर्ष से प्रगति का मार्ग देखना उनका स्वभाव बन गया था|अपने गाँव के पात्रो को,अपने जनपद को और  अपने समाज को त्रिलोचन जी प्रगति करते हुए देखना चाहते हैं | यह उनका जन्मशती वर्ष है| अब यदि जीवित होते तो शतायु हो चुके होते| बहरहाल उनकी कविताएं आज भी जीवित है और आगे भी जीवित रहेंगी|मानवता  तो सबके मूल में है ही|इसीलिए मुझे लगता है कि  त्रिलोचन जी हिंदी की प्रगतिशील काव्यधारा के साथ ही अपनी जनपदीयता और अवधी लोक के प्रमुख और अपरिहार्य कवि भी हैं।उत्तर प्रदेश के छोटे जनपद आज भी अपने स्वाभिक विकास की प्रतीक्षा कर रहे है|अपने जनपद के अभावो को याद करते हुए वे एक सानेट में कहते है-
उस जनपद का कवि हूँ जो भूखा दूखा है, 
नंगा हैअनजान हैकला--नहीं जानता 
कैसी होती है क्या हैवह नहीं मानता 
कविता कुछ भी दे सकती है। कब सूखा है |
   उनके बारे में डॉ. रामविलास शर्मा जी की टिप्पणी बहुत महत्त्वपूर्ण है - "एक खास अर्थ में आधुनिक है और सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि आधुनिकता के सारे प्रचलित साँचों को (अर्थात नयी कविता के साँचों को) अस्वीकार करते हुए भी आधुनिक हैं। दरअसल वे आज की हिंदी कविता में उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं जो आधुनिकता के सारे शोरशराबे के बीच हिंदी भाषा और हिंदी जाति की संघर्षशील चेतना की जड़ों को सींचती हुई चुपचाप बहती रही है। त्रिलोचन जी की कविताएँ समकालीन बोध की रूढ़िग्रस्त परिधि को तोड़ने वाली कविताएँ हैं।" यह कहने के पीछे रामविलास जी का मंतव्य समझने के लिए हम जब उनकी कविताओं की पड़ताल करते है तो देखते है कि वे नई कविता के रूपवादी स्वरूप से बचकर निकल जाते है|उनकी कविताओं का स्वर ग्राम चेतना से सदैव संपृक्त दिखाई देता है|अब ज़रा उनकी रचनाओं  के नामकरण बारे में जाने -
धरतीदिगंतगुलाब और बुलबुलताप के ताये हुए दिनअरधानउस जनपद का कवि हूँफूल नाम है एकअनकहनी भी कहनी हैतुम्हें सौंपता हूँसबका अपना आकाशअमोला आदि उनके काव्य संग्रह है । इनमे से ‘अमोला’ में उनके अवधी भाषा में लिखे 400 बरवै संग्रहीत है| इस शीर्षकों की ध्वनि भी उनकी लोक चेतना का उद्घोष करती है| त्रिलोचन बड़े इसीलिए है कि वे अपनी जातीय भाषा अवधी और जनपदीयता को कभी नहीं छोड़ते| इसीलिए वे कवि से अधिक भाषाशास्त्री के रूप में दिखाई देते है| ध्यान देने की बात ये भी है कि जो कुछ उन्होंने अवधी में लिखा उस संग्रह का नाम ‘अमोला’ अर्थात जो अमूल्य है |उनसे जब कभी अवधी भाषा के बारेमें बात होती थी तो वो कहा करते थे-‘अवधी में लिखिए पढ़िए,गद्य का प्रयोग अवधी में नहीं हुआ है|अवधी गद्य में अनंत शक्ति है|’ उन्ही दिनों मैंने एक अखबार के लिए उनसे बातचीत की थी तो एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा था-‘मै अवध के गाँवों को विश्वविद्यालय मानता हूँ|’ जाहिर है कि त्रिलोचन जी लगातार अपने जनपदीय पात्रो के दुःख और जीवन को लेकर लगातार रचनाशील रहे| यह प्रेरणा उन्हें तुलसी की भाषा से मिली है|  एक कविता में वे तुलसीदास को अपना भाषा गुरू स्वीकारते है-
“तुलसी बाबाभाषा मैंने तुमसे सीखी
मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो ।
कह सकते थे तुम सब कड़वीमीठी तीखी ।
प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो ।
और वृक्ष गिर गए मगर तुम थमे हुए हो ।“
ये सच है कि तुलसीदास जैसा दूसरा कवि हिन्दी में नहीं हुआ जिसने अपने समय में नई काव्य भाषा गढ़ी| अपने समाज की भाषा को नया रूपाकार देने में तुलसी बेजोड़ हैं | त्रिलोचन के सामने तुलसी हमेशा खड़े हुए दिखाई देते है| लेकिन कुछ मार्क्सवादियो को तुलसी केवल धार्मिक और सामंतवाद के पोषक कवि के रूप में दिखाई देते है| इन आलोचकों के वैचारिक मोतियाबिंद का कोई इलाज नहीं है| त्रिलोचन को तुलसी से जो गृहण करना है उतना ही लेते है|  ध्यान देने की बात है कि त्रिलोचन तुलसी से दासवाली भक्ति की प्रेरणा कतई नहीं लेते| त्रिलोचन जी इसी अर्थ में सबसे अलग है| वे परपरा से भाषा और जातीय चेतना लेते है लेकिन वैचारिक भूमि में वे तमाम आधुनिक कवियों से बहुत आगे खड़े दिखाई देते हैं|उनकी कविताओं में नगई महारा,फेरू,चम्पा जैसे लोक जीवन के पात्र सहज ही प्रकट होते है| शुरुआत तो गीत और हिन्दी में गजल के प्रयोग से ही करते है इसके बाद सानेट छंद में उनकी कविताई निखरती है| उनकी मुक्तछंदी कविताओं में भी अंतर्लय की अन्विति सदैव विद्यमान रहती है|एक गजल देखिये-
बिस्तरा है न चारपाई है,/जिन्दगी खूब हमने पायी है। 
‘कल अंधेरे में जिसने सर काटा,/नाम मत लो हमारा भाई है।
ठोकरें दर-ब-दर की थी हम थे,/कम नहीं हमने मुँह की खाई है। 
कब तलक तीर वे नहीं छूते,/अब इसी बात पर लड़ाई है। 
आदमी जी रहा है मरने को/सबसे ऊपर यही सचाई है। 
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम /धुन कहाँ वह सँभल के आई है।
ये आत्मव्यंग्य  की साफ़गोई आज की हिन्दी गजल में भी देखने को नहीं मिलती| उन्हें अपने जातीय छंदों से भी प्रेम है| उनके आलोचकों ने उन्हें व्याख्यायित तो किया किन्तु कभी उनके इस पक्ष पर जानबूझकर विचार नहीं किया| किसान आसमान में घुमड़ते हुए बादलो को देखकर किस प्रकार आह्लादित होता है यह हम सभी जानते है |लेकिन इस गीत में त्रिलोचन जी किसान को पुरवाई के माद्ध्यम से सन्देश भेजते है| इस प्रकार के मनोरम मानवीय भावो से त्रिलोचन की कविताई हमें आह्लादित भी करती है और उनकी ग्राम्य सौन्दर्य को चीन्हने वाली दृष्टि का भी हमें पता बताती है| इसी लिए त्रिलोचन जनकवि है--
उठ किसान ओउठ किसान ओ,/बादल घिर आए हैं
तेरे हरे-भरे सावन के/साथी ये आए हैं|
आसमान भर गया देख तो/इधर देख तोउधर देख तो
नाच रहे हैं उमड़-घुमड़ कर/काले बाल तनिक देख तो
तेरे प्राणों में भरने को/नए राग लाए हैं|
यह संदेशा लेकर आई/सरस मधुरशीतल पूरवाई
तेरे लिएअकेले तेरे/लिएकहाँ से चलकर आई
फिर वे परदेसी पाहुनसुन,/तेरे घर आए हैं|
चैती,कातिक पयान जैसी उनकी अनेक कविताएं उनके किसान और किसानी को व्याख्यायित करने वालीहै| किसान को जगाने वाले उसमे उल्लास भरने वाले कवियों की परंपरा में त्रिलोचन जी का नाम आदरपूर्वक लिया जाना चाहिए| भारत किसानो का देश है और रहेगा भी उन्होंने ज्यादातर किसान और  कृषि मजदूरों से जुडी कविताओं के में उनके जटिल जीवन को रेखांकित किया है| त्रिलोचन जी ने अभाव को बहुत निकट से देखा ही नहीं किन्तु जिया भी था| एक मेहनती कामकाजी और स्वाभिमानी व्यक्ति की छवि त्रिलोचन जी की सदैव बनी रही|अभावो को सहा लेकिन समझौते नहीं किये| काविताई से सम्मान वगैरह तो बहुत बाद में मिलने शुरू हुए थे |कवि का जीवन जब उसकी कविताओं में से झांकता है तभी उसे सच्चा सम्मान मिलता है| खुली किताब की तरह खिलंदड़े स्वभाव के त्रिलोचन स्वयं अपने बारे में एक सानेट में कहते है- 
वही त्रिलोचन हैवह-जिस के तन पर गंदे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे-फटे लटे हैं
यह भी फ़ैशन हैफ़ैशन से कटे कटे हैं।
कौन कह सकेगा इसका यह जीवन चंदे
पर अवलम्बित् है। चलना तो देखो इसका-
उठा हुआ सिरचौड़ी छातीलम्बी बाहें,
सधे कदमतेजीवे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैंकिस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है। कौन बताए,
क्या हलचल है इस के रुंधे रुंधाए जी में
कभी नहीं देखा है इसको चलते धीमे।
धुन का पक्का हैजो चेते वही चिताए।
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है,
तप तप कर ही भट्ठी में सोना निखरा है।
पुराने लोग जानते है कि त्रिलोचन जी पैदल बहुत चलते थे| पैसे का अभाव उनकी इस आदत के पीछे एक बड़ा कारण बनी| इसीलिए वे अधिकाँश जीवन स्वस्थ भी रहे और 90 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए|तुलसीदास को त्रिलोचन जी अपना आदर्श कवि मानकर चलते रहे|इसका मुख्य कारण तो तुलसी की  भाषा है|इसीलिए अनेक तरह से तुलसीदास को स्मरण करते है| अपने जीवन की तुलना तुलसीदास के सरोकारों से करते हुए एक वे एक अवधी कविता में कहते है कि कविता तो बहुत लोगो ने की है लेकिन तुलसीदास जैसी कविता कैसे की जा सकती है,क्योकि तुलसी तो स्वयं को उबारते है और अन्य पाठक आदि को भी दुखो से उबारते है| प्रकारांतर से त्रिलोचन जी यह भी कहना चाहते है कि तुलसी ने जो कुछ कहा है वही सब कुछ आगे के कवियों के पास भी दिखाई दे रहा है|तुलसी जन जीवन करूणा और दुःख की व्याख्या करने वाले बड़े कवि  है|यही कारण है कि तुलसीदास की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है| तुलसी के अवदान को रेखांकित करते हुए त्रिलोचन जी लिखते है-
कहेन किहेन जेस तुलसी तेस केसे अब होये।
कविता केतना जने किहेन हैं आगेउ करिहैं;
अपनी अपनी बिधि से ई भवसागर तरिहैं,
हमहूँ तौ अब तक एनहीं ओनहीं कै ढोये;
नाइ सोक सरका तब फरके होइ के रोये।
जे अपनइ बूड़त आ ओसे भला उबरिहैं
कैसे बूड़इवाले सँगसँग जरिहैं मरिहैं
जेओनहीं जौं हाथ लगावइँ तउ सब होये।
तुलसी अपुनाँ उबरेन औ आन कँ उबारेन।
जनेजने कइ नारी अपने हाथेन टोयेन;
सबकइ एक दवाई राम नाम मँ राखेन;
काम क्रोध पन कइ तमाम खटराग नेवारेन;
जवन जहाँ कालिमा रही ओकाँ खुब धोयेन।
कुलि आगे उतिरान जहाँ तेतना ओइ भाखेन|
  अंतत: लोक जीवन से जुडी उनकी सहजता ही मुझे बेहद आकषित करती रही|मैंने उन्हें दिल्ली स्थित यमुनाविहार से सादतपुर आते जाते कई बार देखा लेकिन वो कभी रिक्शा या ऑटो रिक्शा नहीं लेते थे| सादतपुर में उन दिनों बाबा नागार्जुन रहते थे| आज भी सादतपुर साहित्यकारों और लेखको के नाम से जाना जाता है|उनदिनों कथाकार रमाकांत,डा.माहेश्वर,विष्णुचंद शर्मा,हरिपाल त्यागी,रामकुमार कृषक,महेश दर्पण,सुरेश सलिल,वीरेन्द्र जैन,रहते थे बाद में हीरालाल  नागर,राधेश्याम तिवारी भी इधर ही रहने लगे| उन दिनों मैं भी उसी तरफ रहता था| संयोग से मेरा घर बीच में पड़ता था| तो त्रिलोचन जी ने एकाधिक बार मेरे घर पर भी पैदल ही पधारने की कृपा की| वे मेरे कितने आत्मीय बन गए थे यह कहना कठिन है| उनका जाना मुझे कुछ वैसे ही लगा जैसा कि उन्होंने अपने एक गीत में दिन के अवसान हो लेकर लिखा था- ‘हंस के सामान दिन /उड़कर चला गया’| बहरहाल मेरे लिए त्रिलोचन जी हिन्दी की छांदस  कविता के महत्वपूर्ण नाम है| उनकी ‘अमोला’ भी जिस तरह से समीक्षित होनी चाहिए वह नहीं हुई| मेरा मानना है कि त्रिलोचन जी की कविताई को सही रूप में जानने के लिए उनकी कविताओं में सहज रूप में प्रवाहित छंद चेतना और भाषा को समझना अनिवार्य है|वे बार बार अपनी भाषा चेतना का सन्दर्भ देते हुए चलते है-
भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है,
ध्वनि में क्रिया भरी है और क्रिया में बल है|
तात्पर्य यह कि उनकी भाषा और उनके छंद ही उनके जीवन की हलचल के पर्याय थे| वो और उनकी भाषा आज भी हिन्दी के नए कवियो के सामने ताल ठोकर चुनौती देती हुई दिखाई देती है|उनकी स्मृति को प्रणाम|


(मध्य में त्रिलोचन शास्त्री जी )

कुल्लू में एक समारोह का चित्र (बटुक जी ,पाल भसीन,भारतेंदु मिश्र,देवेन्द्र शर्मा इंद्र,बाबूराम शुक्ल ,त्रिलोचन शास्त्री,और स्वामी श्याम )