शनिवार, अप्रैल 05, 2014

  नचिकेता जी की
गीत वसुधा : दस अनसुलझे सवाल


# भारतेन्दु मिश्र

हिन्दी गीत नवगीत के लिहाज से नचिकेता जी एक बडे हस्ताक्षर के रूप मे जाने जाते हैं।यह भी सच है कि रमेश रंजक और शांतिसुमन के बाद सत्यनारायण के समकक्ष खडे नचिकेता का कविमन पिछले दस वर्षों  से गीत वसुधा पर काम भी कर रहा था।लेकिन अब उनकी दस वर्षो की मेहनत को देखकर जो निराशा हुई उसका वर्णन करना मेरे लिए नितांत दुखद अनिवार्यता है।अनिवार्यता इस लिए कि मैं नवगीत/गीत से किसी भी रूप में जुडे मित्रों को गीत वसुधा के इन पक्षो का ज्ञान कराना जरूरी समझता हूं।और दुखद इस लिए कि नचिकेता जी जैसे  वरिष्ठ रचनाकार के दस वर्षो के श्रम की  निरर्थकता से और व्यापारिक लाभ (साहित्येतर )से  पाठकों को अवगत कराना पड रहा है । घोषित और अघोषित रूप से जनवादी माने जाने वाले नवगीतकार जो स्वयं को जनगीतकार के रूप प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं। उनके द्वारा संपादित यह ग्रंथ (कथनी करनी में भेद के कारण )बहुत चकित करने वाला और भ्रम मे डालने वाला है। कुछ बिन्दु इस प्रकार हैं-
1. जब दस वर्ष पहले नचिकेता जी  ने गीत भेजने के लिए आग्रह  किया था तब वे अकेले ही इस योजना के संपादक थे।परंतु प्रकाशित रूप में इसमे अवधेश नारायण मिश्र और यशोधरा राठौर जी का नाम जाने कैसे जुड गया।शायद इस प्रयोग से उन्हे कुछ बल(धनबल/आत्मबल ) अवश्य मिला होगा।वर्ना इसकी कोई उपयोगिता पुस्तक में नजर नही आती।यदि उनकी उपयोगिता होती तो कुछ नजर  भी आनी चाहिए ?
2.मेरे पास नचिकेता जी के पत्र सुरक्षित हैं जिनसे मेरे गीत आमंत्रित किए गए थे।तब आर्थिक सहयोग 500/रुपए था जो मैने भेजने के लिए मना किया था।परंतु बिना सहयोग के ही गीत भेजने का फोन पर भी बार बार आग्रह  किया जाता रहा और मैने अंतत: गीत भेज दिए तब मुझे यह नही मालूम हो पाया था कि यह उनकी कैसी योजना है ? उनकी यह योजना किस स्तर पर नवगीत के अन्य समवेत संकलनों से भिन्न है ?तबतक मेरी उनसे मुलाकात भी नही हुई थी,बस पत्राचार ही हुआ था ।कोई वरिष्ठ रचनाकार जब बार बार आग्रह  करता है तो सामाजिक मर्यादा के अनुरूप उसे निभाना पडता है,फिर नचिकेता जी तो उम्र में और गीत -रचनाधर्मिता में भी  वरिष्ठ हैं ।
3.इस 580 पृष्ठों की पुस्तक का मूल्य नचिकेता जी ने रु.2000/ रखा है। इस मूल्य निर्धारण में बेचारे प्रकाशक की कोई भूमिका नही है। क्योकि वो प्रकाशक नचिकेता जी का नाम लेकर ही किताब बेच रहा है।शायद किसान चेतना और मजदूरों से जुडे जनवादी कवियों कलाकारों के लिए यह सामंतजनोचित मूल्य उनकी दृष्टि मे उचित होगा।क्या इसी पुस्तक का पेपरबैक 200/ में भी सुलभ नहीं हो सकता था ?
4.विशेष बात यह है कि नचिकेता जी ने सभी गीतकारों के गीतों का कापीराइट भी प्रकाशक से मिलकर अपने नाम करा लिया है। अब वे पिछले छह महीने से इस पुस्तक को बिकवाने के लिए संकलित रचनाकारों से आग्रह  कर रहे हैं।पहले प्रकाशक ने किताब खरीदने के लिए मुझे सीधे फोन किया फिर नचिकेता जी ने  मुझे आधे मूल्य पर किताब खरीदने के लिए फोन भी किया था।किंतु मैने मना कर दिया ,क्योकि मूर्खतावश मुझे लगता है कि   रचनाकार होने के नाते यह किताब मुझे ही नहीं सभी रचनाकारों को संपादक द्वारा लेखकीय प्रति के रूप में धन्यवाद सहित क्यों नहीं मिलनी चाहिए ? इस पर केन्द्रित संगोष्ठी करने की बात कहीं सुनाई नही दी।मैने तो उन्हे अपने गीतो का लिखित या मौखिक रूप से स्वत्वाधिकार नही दिया /बेचा था और कोई गीतकार मुझे मिला भी नही जिसने अपने गीतों का स्वत्वाधिकार नचिकेता जी को लिखित रूप में दिया हो।
5.हैरानी की बात यह भी है कि कई 1000/रुपये अग्रिम धनराशि देकर भी  नए गीतकार  इसमें इसलिए शामिल कर लिए गये ।ऐसे कई गीतकारों का संकेत नचिकेता जी ने संपादकीय में आदर भाव से किया भी है।
6.अब जरा इस ग्रंथ के  समर्पण पृष्ठ के बेनामी गीत का मुखडा पढिए-
उनको/ जिनके लिए/गीत पसीने की परिभाषा है/जीवन जीने की अभिलाषा है।
अर्थात जो गीत को पसीने की परिभाषा में लिख रहे हैं और जी रहे हैं यह पुस्तक उनके लिए तो है लेकिन इसका मूल्य केवल -2000/रुपये है।..माने संपादक के लिए गीत जीने मरने का प्रश्न नही है ?
7. और देखिए चकित मत हो जाइए-आपन मुख तुम आपन करनी /बार अनेक भांति बहु बरनी।–जैसा कि तुलसी बाबा कह गए हैं उसी तर्ज पर नचिकेता जी अपने ही गीतों की प्रशस्ति अपनी  ही कलम से गीतवसुधा की भूमिका मे देते हुए चलते हैं-देखें पृष्ठ 49 और 50 (संपादकीय:समकालीन गीत का आत्मसंघर्ष )तो क्या यह संपादक का न्याय हो सकता है? जरा गौर करने की बात है। रामचन्द्र शुक्ल,रामविलास शर्मा,आदि ने अपनी आलोचना पुस्तकों में अपने ही आलेखों /कविताओं की प्रशस्ति क्यों नहीं की ? हां नचिकेता जी के आदर्श यदि राधेश्याम बन्धु हैं जिन्होने नवगीत के नए प्रतिमान में हर आलेख में अपनी कविताओं के उद्धरण स्वयं ही भर लिए हैं,तो यह उचित कहा जा सकता है।
8.सोचने और विचार करने की बात यह भी हो सकती है कि गीत वसुधा मे संकलित रचनाएं भारतीय मानस और समाज की हैं या कि किसी अन्य देश की  ? यदि भारतीय कविता हमारे समाज से निकली है तो उसकी समीक्षा के औजार भी तो भारतीय काव्यशास्त्र से निकलने चाहिए। जबकि नचिकेता जी अपने संपादकीय की शुरुआत जार्ज लुकाच के उद्धरण से करते हैं। बहरहाल उद्धरणीय विचारों का एक कालक्रम  होता है जिसका यहां निर्वाह नही दिखाई दिया।
9.इतने बडे बहुआयामी संपादकीय को देखकर कहीं कहीं तो यह भी लगता है कि नचिकेता जी पर राधेश्याम बन्धु की मूर्खता पूर्ण कृति (नवगीत के नए प्रतिमान ) का गहरा प्रभाव पडा है।जबकि राजेन्द्र गौतम की पुस्तक विख्यात पुस्तक हिन्दी नवगीत उद्भव और विकास  का जानबूझकर  नामोल्लेख तक नही  किया गया है। राजेन्द्र गौतम के गीतों के साथ प्रस्तुत परिचय तक में नहीं।
10. अब अंतत: यदि इसमें अवधेश नारायण मिश्र और यशोधरा राठौर के श्रम को भी जोड लें या जोडकर देखें तो नचिकेता जी के दस वर्षों की कमाई केवल इस पुस्तक का नाजायज कापीराइट ही बचता है।
इसके बावजूद उन्हे बधाई जिन्हे पहलीबार नचिकेता जी जैसे किसी वरिष्ठ कवि द्वारा संकलित गीत संकलन मे येन केन प्रकारेण रचनाकार के रूप में स्थान मिला। प्रकाशक को बधाई कि उसे इतनी बढिया कमाई वाली पुस्तक मिली।
गीत वसुधा/संपादक:नचिकेता+अवधेश नारायण मिश्र+यशोधरा राठौर /पृ.580/मूल्य-2000/=/प्र्काशक:युगांतर प्रकाशन ,दिल्ली/वर्ष:2013

   

15 टिप्‍पणियां:

  1. भारतेन्दु मिश्र जी की 'गीत वसुधा' पर टिप्पणी पढ़कर लगा कि साहित्य से जुड़े लोग जब व्यावसायिकता पर उतर आते हैं तो उद्देश्य कमाई करना होता है न कि साहित्य सेवा । अपने परिचय, सम्बन्धों तथा वरिष्ठता से मिले सम्मान का नगदीकरण करना किसी स्थापित रचनाकार को शोभा नहीं देता। एक ओर प्रकाशकों का प्रलाप कि कविता /पद्य की पुस्तकें बिकती नहीं हैं अतः कवियों/गीतकारों से प्रकाशन हेतु असमर्थता दिखाते हुए छापने का अहसान दिखाया जाता है वहीँ पुस्तकों के मूल्य इतने अधिक रखे जाते हैं कि पुस्तकें आम पाठक ,जो आम तौर पर लेखक/कवि ही अधिक होते हैं, की पहुँच से बाहर होती जा रही हैं। बाज़ारी-व्यवस्था में नया रचनाकार स्वयं को साहित्य की हाट में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए इस प्रकार के संकलनों में अपना योगदान देता है ताकि उसका नाम भी कहीं चर्चा में आ जाये। वरिष्ठ रचनाकार द्वारा किया गया इस प्रकार का कृत्य बौद्धिक सम्पदा के शोषण की श्रेणी में ही आता है। भारतेन्दु जी द्वारा उठाये गए बिंदुओं पर सोचने की आवश्यकता है और इस प्रकार के हर प्रयास की भर्तस्ना करने के लिए लेखकों /कवियों को आगे आना चाहिए। एक बात इन वरिष्ठ और स्थापित रचनाकारों भी ध्यान में रखनी चाहिए कि उनके कृत्य का न केवल उनको बल्कि उस विचारधारा और संगठन जिससे वे जुड़े हैं पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है अतः उन संगठनों को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए। -जगदीश पंकज

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  2. आदरणीय,इस महत्वपूर्ण टिप्पणी के लिए आपका आभार।

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  3. गीत वसुधा के बारे में सुना भर था।पुस्तक पर आपकी समीक्षा पढ़कर कुछ खाका बन तो रहा है पर.... पुस्तक का मूल्य वाकई बहुत ज्यादा है।

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    1. मेरी टिप्पणी को लेकर -योगेन्द्र वर्मा जी के दो सवाल-Yogendra Vyom Apse bhi 2 ansuljhe sawaal-
      1. Apne yeh spasht nahi kiya ki pustak apne kharidi ya fir apko sasamman prapt huyee? vaise, ham adhikansh geet ke log geet ki pustak kharid kar padhne ke aadee nahi hain.
      2. "KUCHH ANSULJHE SAWAAL" ke sath-sath apne pustak ki sameeksha kyon nahi ki?

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  5. भाई आपके दोनो सवालो का जवाब हाजिर है उम्मीद करता हूं आपकी शंका का समाधान हुआ होगा---1.योगेन्द्र जी, खरीदी वो किताब जाती है जिसे आप अपने लिए उपयोगी समझते हैं।मुझे नही लगता कि गीतवसुधा खरीद्नी चाहिए।..हमे ससम्मान एक प्रति भेंट करना संपादक का दायित्व है। उन्होने तो हमारी कविताओं का कापीराइट अपने नाम कर लिया जो अवैध है।2.समीक्षा करना या न करना किसी भी समीक्षक/लेखक की रुचि और पसन्द का मामला है,कोई जबरदस्ती है क्या ?..जहां तक गीतवसुधा की बात है तो जब नचिकेता जी स्वय्ं ही आत्म्प्रशंषा कर रहे हैं तो मेरे लिए आप जैसे देश भर के सार्थक गीतकारों का नाम परिगणन ही शेष रह जाता है।..एक और बात नचिकेता जी से पूछिए क्या उन्होने समीक्षार्थ मुझे प्रति भेजी है या प्रकाशक ने दी है।

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  7. प्रिय भाई भारतेन्दु जी,
    आज संयोगवश मेरी नजर `गीत वसुधा' पर की गयी आपकी टिप्पणी पर पड़ी । इस सन्दर्भ में मैं जोड़ना चाहूँगा कि मेरे पास भी कभी नचिकेता ने गीत भेजने और रु 500/- की सहयोग राशि देने का आग्रह पत्र भेजा था । मैंने उसका कोई जवाब तक देना उचित नहीं समझा ,क्योंकि यह मुझे घोर अपमानजनक लगा ।
    बाद में किसी ने बताया कि उसने मेरे गीत भी उस संग्रह में संकलित कर लिये हैं । मैं सोच ही रहा था कि इस कुकृत्य का क्या जवाब दूँ कि तबतक उसका एसएमएस रु 1000 /- अमुक बैंक खाते में जमा करने के लिए आया । इसके बाद कायदे से तो मुझे नचिकेता को बिना अनुमति के गीत छापने पर नोटिस भिजवाना चाहिए था, मगर मैंने सोचा कि अगर इसी माध्यम से कोई गीत को बेचकर कमा -खा ले रहा है, तो उसका निवाला क्यों छीनूँ । और मैं चुप हो गया । वस्तुस्थिति यह है कि मैंने उस संग्रह को अभी तक देखा भी नहीं है ।
    आपने बात छेड़ी तो मुझे अपनी पीड़ा व्यक्त करनी पडी ।
    रही बात राधे श्याम बंधु की पुस्तक की; तो उसे देख मैं भी चकित हूँ ।उन्होंने रु 400/- लेकर दो प्रतियाँ भेज दी थीं । मेरे लिए यह किताब सूअर की विष्ठा से अधिक उपयोगी नहीं है । न मैं इसे अपने पास रखना चाहता हूँ, न किसी को देना,क्योंकि उससे गलत सूचनाओं का सिलसिला बढ़ेगा ।

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  8. आपका आभार भाई जी ,नवगीत की दिशा में कचरा फैलाने वाले बन्धु जैसे तमाम नादान दोस्त हैं..लेकिन नचिकेता जैसे कवि से ऐसी उम्मीद नही थी।

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  9. मैं तो हतप्रभ हूँ. नचिकेता जी से ऐसी अपेक्षा तो संभवतः किसी को नहीं रही होगी.
    आपने जो प्रश्न उठाये हैं, वे अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं. ऐसी स्थितियाँ साहित्य और नवगीत दोनों के लिए नुकसान दायक हैं.

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  10. जी भाई,और मित्रो को भी इस विषय पर विचार करना चाहिए।

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  11. बधाई भारतेन्दु भाई 'गीत वसुधा' पर एक बहुमुखी और बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणी के लिए। भाई बुद्धिनाथ मिश्र ने अपनी पीड़ा व्यक्त कर दी है। अन्य कई लोग भी उसे महसूस कर रहे हैं। नचिकेता को मैं एक समर्थ रचनाकार और स्पष्टवादी व्यक्ति के रूप में ही जानता रहा हूँ। वही बना रहता तो ठीक रहता।

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  12. आपका आभार,मुझे भी उनसे ऐसी उम्मीद न थी।कई महीने हुए उनके प्रकाशक के फोन से मुझे कष्ट हुआ फिर उन्होने भी उसी स्वर में बात की किताब खरीदने को लेकर ।तो मैने मना कर दिया।..फिर मैने किसी और से लेकर पढने के बाद यह टिप्पणी लिखी ।यदि यही सब किया जाना है तो फिर हम किस गीत के लिए संघर्ष की बात करते हैं ?..

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  13. आपकी इस बेबाक टिप्पणी और साहसिक आलोचना से सहमत हूँ |हृदय से आभार |इसीलिए इस बार मैंने राधेश्याम बन्धु को स्पस्ट मना कर दिया |ये लोग गीतों का बिग बाज़ार खोलते जा रहे हैं |

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