रविवार, दिसंबर 23, 2012


समीक्षा
                     श्रेष्ठ नवगीत की उम्मीद
                         डाँ.भारतेन्दु मिश्र
मनोज जैन मधुर हमारे समय के चर्चित युवा हस्ताक्षर हैं। उनके गीतों की भाषा नवगीत के प्रचलित मुहावरे के अत्यंत सन्निकट है। उनका छन्द सध गया है।गीतो की आंतरिक और बाह्य लय भावानुसारी है।इन गीतो की पठनीयता पाठक को अपनी आंतरिक और बाह्य दोनो संरचनाओ के माध्यम से अपनी ओर खींच लेती है।एक बूँद हम शीर्षकप्रस्तुत संग्रह मे कवि के कुल 52 गीत संकलित हैं।मनोज जैन का गीत के प्रति गहरा लगाव है।वस्तुत: गीत लिखना शहद के निर्माण की तरह होता है और कवि लगभग मधुमक्षिकावत होता है-लेकिन यहाँ कवि स्वयं को शहद के रूप मे अभिव्यक्त करता है। जिसका अर्थ यह हुआ कि वह स्वयं अपने गीत मे एकाकार हो गया है। इस प्रकार  कवि की गम्भीरता उसके अपने पहले ही गीत से प्रकट होती है जिसमे वह कहता है-
हित साधन सिद्ध मक्खियाँ/आसपास घूमने लगीं
परजीवी चतुर चीटिंयाँ/मुख अपना चूमने लगीं
दर्द नहीं हो पाया कम/एक बूँद शहद हुए हम।
मनोज जैन के गीतो का स्वर आस्था और प्रबोध का है। सार्थक जीवन मूल्यो के प्रति आस्था कवि का मूल स्वर प्रतीत होता है। संग्रह के अनेक गीतो मे कवि इसी आस्था के अनेक प्रकार दर्शन होते हैं।एक संस्कारी युवामन के गीत हैं ये।देखें-
जब तक साँसे हैं इस तन मे /दीपक जैसा जल।
और –
बस थोडी सी कोशिश भर में/छिपा हुआ है हल
अगर सहेजी आज बूँद तो/बचा रहेगा कल।
यह आस्था कवि के मन मे सतत गीत विधा के प्रति भी साफ दिखाई देती है-
भावना के सिन्धु को हम/ रोज मथते हैं
शब्द लय मे बाँधकर हम /छन्द रचते हैं
गीत दुख के पार जाकर/ठाँव देते हैं।
इसके अतिरिक्त कवि के मन मे लगातार बदले हुए माहौल मे नई तरह से अपने घर और गाँव को चीन्हने की कला विवशता के रूप मे हिलोर भरती रहती है।आधुनिकता बोध के इस वातावरण मे घर और मकान का अंतर बढता जा रहा है मनोज जैन को  भी कुछ ऎसा ही अनुभव होता है गीत की पंक्तियाँ देखें-
मोती चुगने वाली दादी/तिनके चुनती है
हुक्म चलाने वाली कैसे/ ताने सुनती हैं
लगा टकटकी देखा करती/ आसमान में
कुछ दिन पहले ही बदला है/घर मकान में।
यहाँ से या कहे कि इस प्रकार की भावभूमि से जहाँ नवता की संवेदना लय बनकर फूटती है वही से नवगीत के मुहावरे निकट कवि पहुँचता है। यह प्रगति का दौर है जिसमे नई बहुए मकान मालिक बन बैठी हैं जहाँ कहीं दादी ने कभी अपना एक घर बसाया था।इस नवगीत के मुहावरे मे जैसे जैसे कवि सिद्ध होता जाता है उसकी लेखनी मे निखार आता जाता है-
एक मित्र का लगा मुखौटा/हमे लुभाता है
सबकी दुखती रग पर आकर/ हाँथ लगाता है
रिश्ते अभी बनाकर/अभी भुनाने वाला है
रथ विकास का/गाँव हमारे आने वाला है।
समकालीन राजनीति की पहचान बताने वाले ऐसे गीत ही नवगीत के मुहावरे के निकट पहुँचते हैं। संग्रह के अनेक गीतो मे पुरातन की सुखद स्मृति का भाव बार्ंबार कवि ने दुहराया है।पुरातन की स्मृति कोई बुरी बात नही है लेकिन वह स्मृति गौरवपूर्ण हो या अवसाद पूर्ण जब हमारी संवेदना मे कुछ नया जुडता है तभी कविता मे नयापन प्रकट होता है। एकाकीपन अपनो के बीच का अजनबीपन आदि गृहरति के रूप मे भी कई दशको से नवगीतो मे प्रकट होता चला आ रहा है। आम आदमी की बेबसी का एक चित्र देखें-
हम हुए हैं/डाल से चूके हुए/लंगूर
है नियति/जलना धधकना/मन हुआ तन्दूर
मारती है पीठपर/ सुधियाँ निरंतर घन
गाँव जाने से /मुकरता है/हमारा मन।
इसी के आगे कवि गृहरति के इसी भाव को और साफ तौर पर स्पष्ट करता है-
गहन उदासी अम्मा ओढे /शायद ही अब चुप्पी तोडे
चिडिया सी उड जाना चाहे/तन पिंजरे के तार तोडकर
चले गये बाबू जी /घर मे दुनियाभर का दर्द छोडकर।
उत्तर-आधुनिकता के इस समय मे कवि को यांत्रिकता की अनुभूति परेशान करती है। लगातार हम सभी को कुछ नया नए ढंग से करना पड रहा है। वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की ये परिस्थितियाँ ही कुछ हम सबसे ऐसा करवा रही हैं।देखिए मनोज जैन क्या कहते हैं-
पकड सुई तुम चलो /पिरोना इसमे हमको हाथी
तारे दिन मे गिनो /करो ई-मेल हमे तुम साथी
स्थितियाँ हैं विकट/इन्ही से हमे उबरना है। 
यहाँ स्थितियाँ शब्द के कारण छन्द मे एक मात्रा की कमी हो गयी है।किंतु मनोज जैन के इस पहले संग्रह को देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले संग्रह मे इस प्रकार की कमी नही रहेगी। समकालीन कविता मे विसंगतियो के स्वर बहुत आकर्षित करते हैं।मनोज के इस संग्रह मे भी विसंगतियो के अनेक बिम्ब हैं।कवि आम आदमी की समस्याओ का पता भी इन विसंगतियो द्वारा बताता चलता है।किसी भी नए कवि की जनपक्षधरता ही उसकी प्रगतिशीलता को प्रमाणित करती है-
मन झरिया का हुआ /कडाही से बतियाने का
चढते भावो ने बदला है/स्वाद जमाने का
छौक लगाना मजबूरी है /अब तो रोज डढेल में
जीना दूभर हुआ हमारा महँगाई के खेल में।
तो ऐसे अनेक गीत है जो मनोज जैन की प्रगति की उम्मीद जगाते हैं लेकिन अभी उन्हे अर्थ की लय को और माँजने की जरूरत है क्योकि कही कही दूरांवय
दोष भी शिल्प के रंग को धूमिल करता है जैसे- दूसरे गीत की दूसरी पक्ति में देखें-
मंजिल तेरे खुद चरणो को/ आकर खुद चूमेगी-के स्थान पर-मंजिल खुद तेरे चरणो को आकर चूमेगी-होता तो अर्थ की चारुता बढ जाती। बहरहाल मनोज जी इस समय के नए गीतकारो मे अग्रणी तो है ही यह निर्विवाद है। उनसे श्रेष्ठ नवगीत की उम्मीद है।उन्हे बधाई।
कृति-एक बूँद हम
कवि-मनोज जैन मधुर
प्रकाशक-पहले पहलप्रकाशन,भोपाल
मूल्य-रु-240/,प्रकाशनवर्ष-2011

1 टिप्पणी:

  1. बहुत अच्छी समालोचना है, भारतेंदु जी. आपको बधाई और मनोज जी को बधाई के साथ शुभकामनाएँ.

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