गुरुवार, मार्च 25, 2010

समीक्षा 1.

परवरिस बिना बढते जन के गीत
*भारतेन्दु मिश्र


भगवत दुबे छन्द विधाके महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।वे जबलपुर की कादम्बरी संस्था के नाते भी चर्चित हैं।‘हम जंगल के अमलतास’ उनका नवीनतम गीत संग्रह है।संग्रह में कुछ नवगीत भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। भगवत दुबे के ये गीत अपनी लोकधर्मी चेतना से जुडे होने के नाते पाठकों को आश्वस्त करते हैं। कवि के इन गीतों में समय की विसंगतियाँ विभिन्न रूपों में उभर कर सामने आती हैं।वरिष्ठ नवगीतकार कुमार रवीन्द्र की टिप्पणी भगवत दुबे के नवगीतों को समझने मे सहायक है। कवि आत्मनिवेदन में अपने तमाम सहयात्रियों को नामोल्लेख पूर्वक याद करता है, वह कहीं न कहीं संवेदना का अतिरेक ही कहा जायेगा।भगवत दुबे जैसे कवि को अपने ऊपर हो रहे शोध आदि का उल्लेख अपने आत्म निवेदन मे करने से बचना चाहिए क्योकि आत्म निवेदन और आत्मश्लाघा मे बहुत फर्क होता है। इसी पुस्तक में देवेन्द्र शर्मा इन्द्र,विद्यानन्दन राजीव ,राम अधीर और कुमार रवीन्द्र सहित सबकी प्रशस्तिपरक टिप्पणियों के बाद गीतों के बारे मे कुछ अधिक कहना खतरा मोल लेने जैसा है।दूसरी बात यह भी कि संकलन के कुछ गीत अपने समय समाज की बेहतरीन सूक्तियाँ हैं। भगवत दुबे ओज के कवि हैं-
प्राण गँवाये हैं हमने/ पर लाज रखी है प्रण की/हमने की दुर्दशा/दम्भ के कंस और रावण की।
कवि अपने जातीय परिवेष की व्यवस्था पर चिंतित है,उसे सामाजिक समीकरण बिगडता दिखायी देता है।वह जिस लोक जीवन मे जी रहा है वहाँ मनुवादी जातियाँ ताण्डव कर रही हैं। संवेदनशील कवि कहता है-
बँधी जातियों की नावें/मजहब के घाटों में/लहरों को बँटवाया/महतर,बाँभन,जाटों में।
दूसरी ओर कवि के सामने भुखमरी के दृश्य हैं जो उसे विवश करते हैं।रोजी रोटी के चक्कर में खोया आम आदमी भी उसे नजर आता है।कवि कहता है-
सुख राई सा बौना /पर्वत जैसे कष्ट मिले/भूख मिटाने के साधन/सारे पथभ्रष्ट मिले/छल छद्मों के हाथ/पराजित,दृढ संकल्प हुए/रोजी रोटी बुनते-बुनते/हम खुद गल्प हुए।
ऐसे ही अनेक समसामयिक गीत भगवत दुबे की कविताई का पता बताते हैं।प्राचीन महाकोसल की लोक परम्पराएँ भी कवि के इन गीतों मे कहीं-कहीं झलकती हैं। आज भी यहाँ का नेता अपने हित में धर्म का इस्तेमाल करने में लगा है।भगवत दुबे कहते हैं-
भ्रम से लिपटी हुई/धर्म की पोथी थमा गये/तृष्णा स्वार्थ मनुष्यों की/ नस नस में समा गये।
यह परिदृश्य सदियों पुराना होते हुए भी नया है। कवि की विशेषता यह है कि उसका छन्द सधा हुआ है,लोक बिम्बों की गन्ध कवि की भाषा मे पठनीयता पैदा करती है। समकालीन जीवन की तमाम कठिनाइयों की ओर ये गीत संकेत करते दिखायी देते हैं।एक बिम्ब देखें- हम जंगल के अमलतास/परवरिस बिना बढ्ते/पर गमलों की नागफनी की आँखों में गडते।
नागर और देसी होने यह फर्क सचमुच आज भी हमारे समाज में व्याप्त है। अधिकांश हमारे साथी जनजीवन मे परवरिस के बिना ही जीते हैं।कुल मिलाकर हर कवि का अपना समय होता है और उसके समय के अनुसार उसकी कविताएँ प्रतिध्वनित होती हैं।कवि के ये गीत भी अपने समय के साक्षी हैं।


पुस्तक शीर्षक: हम जंगल के अमलतास
कवि:आचार्य भगवत दुबे
प्रकाशक: कादम्बरी,जबलपुर
मूल्य:रु.150/
वर्ष :2008


समीक्षा 2

दर्द जोगिया के साक्षी गीत
*भारतेन्दु मिश्र

मधुकर अष्ठाना लखनऊ के छन्दोबद्ध कवियों मे सुपरिचित नाम है। मधुकर जी के अब तक अनेक काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।वे गीत गज़ल और नवगीत जैसी छन्दोबद्ध विधाओं के कवि हैं,कवि के सामने एक कविता की सांस्कृतिक परम्परा है। वह अपनी परम्परा मे तनिक भी विचलन देखता है तो उसे विक्षोभ हो आता है और वह अपनी अभिव्यक्ति गीत या नवगीत के रूप मे प्रस्तुत करता है।कवि के सद्य:प्रकाशित गीतसंग्रह ‘दर्द जोगिया ठहर गया’ मे कवि के एक सौ से अधिक गीत हैं जो उनके गीतों की बहुआयामी अभिव्यक्तियों का दस्तावेज़ है। महानगरों मे उगे हुए कंकरीट के जंगलों मे अब देसी पंछी नजर नही आते।अब दिनोदिन विकसित हो रहे नगरों मे कौए ही सर्वाधिक नज़र आते हैं। कवि कहता है-
गली-गली में/डगर-डगर में काले कौए भरे नगर में।
असल में ये कौए शहरी प्रदूषण और धूर्तता का पर्याय भी बन गये हैं। मधुकर जी प्रगतिशील गीतकार हैं क्योकि उनके गीतों में लगातार भाषा-भाव छन्द तथा विचार के आधार पर भी प्रगति की चेतना दिखलायी देती है। महाकुम्भ पर कवि के दो गीत हैं जो दो विभ्न्न दृष्टियों से लिखे गये हैं,और बेहतरीन ढंग से लिखे गये हैं। एक नजर में जहाँ हरिद्वार नज़र आता है वहीं दूसरी नज़र में नरकद्वार दिखायी देता है।एक गीत मे कवि कहता है-
तम्बू खेमे और कनाते/ आने लगे नज़र/उतरा रातो-रात यहाँ पर कोई देव नगर।
दूसरे गीत मे कवि कहता है-
जाग गया उन्मुक्त प्रदूषण/कण-कण भरा जहर/ उतरा रातो रात यहाँ पर एक पिशाच नगर।
यहाँ पहला वाला दृश्य चिंतनीय है और दूसरा दृश्य तो भयावह है क्योंकि सच्ची आस्था तो मनुष्य के मन में और उसके व्यक्तिगत जीवन में होती है –उसका कोई भी रूप हो सकता है।उसके लिए किसी गुरु या महंत की आवश्यकता नही होती।कवि की नजर में अपने शहर के बच्चे भी हैं और उनकी विवशता भी है बच्चों के विकास की उम्र में अपने सपनों कीमत पर हम सभी उनसे किताबों का बोझ ढुलवा रहे हैं उसका बचपन कहीं खो चुका है कवि कहता है- धूप में बस्ता उठाये हाँफता बच्चा/तोतली भोली निगाहें लापता बच्चा। भ्रष्ट राजनीति का एक चित्र देखें- जय-जयकार भेडियों की /झंडा बरदारी है/ इसका आज और कल उसका/जग दरबारी है/कुछ पानी ही ऐसा/कोई दाल नही गलती/बहला देने से तो कोई बात नही बनती। ऐसे माहौल मे छुटभैये नेताओं की दशा मोहासन्न नारद जैसी हो जाती है।आम आदमी के मन में लगातार एक विभ्रम या विपर्यय का बोध चल रहा है।कवि कहता है- चार छोडकर/बीस भुजाओं पर/नारद का मन मचला है/रावण वही नाम बदला है/लिखा पढा अगला पिछला है। जैसे जैसे हमने प्रगति की है हमारे समाज मे नायकत्व का अभाव होता गया। पुराने नायकों पर विश्वास नही रहा नये नायक उभरकर आ नही पाये।कवि इसी चिंता को व्यक्त करता है- पढ-पढ कथा तुम्हारी राजा राम जी/हम हो गये भिखारी राजा राम जी। ऐसे पीडांतक समय में हम जी रहे हैं यह कम सौभाग्य नही है।अंतत:भोजपुरी मुहावरे की शक्ति कवि के गीतों मे चमक पैदा करती है, संवेदना के धरातल पर कवि का दर्द जोगी बन कर उसकी सघन चेतना मे मानो ठहर सा गया-
अपना लोहू आज आदमी बेबस चाट रहा/दर्द जोगिया ठहर गया चौमासा काट रहा।

पुस्तक शीर्षक: दर्द जोगिया ठहर गया
कवि: मधुकर अष्ठाना
प्रकाशक: उत्तरायण प्रकाशन
मूल्य:रु.250/
वर्ष :2009

2 टिप्‍पणियां:

  1. दोनों ही उम्दा समीक्षा...पुस्तक पढ़ने का मौका लगा, तो जरुर पढ़ेगे.

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  2. हां , मधुकर जी,अपने नवगीतों में नये-नये शब्द-चित्र, व्यन्जना , लक्षणा प्रस्तुत करने में कुशल हैं। उन्हें हम अपनी गुरुवासरीय साप्ताहिक सप्ताहिक गोष्ठी में सुनते रहते हैं।

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