रविवार, जून 07, 2009

सातवें आसमान के कवि
भारतेन्दु मिश्र

छंदोबद्ध कवियों मे जबरदस्त आत्ममुग्धता का गुण पाया जाता है।कभी कभी यही आत्ममुग्धता कवि के विकास में बाधक बन जाती है। तुकों-छंदों की पादपूर्ति करते करते वह यह भी भूल जाता है कि उसका उद्देश्य कविता लिख़ना है और दूसरे आम आदमी की जिन्दगी की बेहतरी को लेकर काम करना है। यहाँ मै भजन –कीर्तन लिख़ने वाले या मुशायरे लूट लेने वाले,या कविसंम्मेलनों में दाँत दिख़ाने ,आलाप लेने वाले कवियों की बात नही कर रहा हूँ । सार्थक छंदोबद्ध कविता की कोटि में ऐसे कवि और ऐसी बेहूदा रचनाओं का कोई महत्व नही होता।
सार्थकता तो उन्हीं रचनाओं की होती है जिनमें साफ़ तौर पर प्रगतिशीलता के स्वर झलकते हैं।बाकी सब तो बेमानी है।आत्ममुग्ध कवि अपने कमरे में बैठकर अपने आप को महाकवि या उस्ताद मान लेते हैं। ऐसे में यदि एक आध चेला मिल जाये तो फ़िर कहने ही क्या हैं? किसी लचर पत्रिका में किसी तरह थोड़ा सा स्थान मिल जाये या अपने ही पैसे लगाकर किसी तरह किसी दुबली –पतली पत्रिका का विशेषांक निकलवा पाने में सफ़लता मिल जाये तो ऐसे आत्मुग्ध कवि का स्वाभिमान सातवें आसमान पर चढ़ जाता है।
ऐसे सातवें आसमान पर चढ़े हुए कवियों की संख़्या छदोबद्ध कवियों में सर्वाधिक है।
ये आत्ममुग्धता के स्वर छदोबद्ध कवियों की प्रगतिशीलता को तोड़ते हैं। रचनात्मक स्वाभिमान होना एक बात है जैसे निराला स्वाभिमानी कवि थे। लेकिन आत्ममुग्धता एक घातक बीमारी है।ख़ुले आम अपनी आलोचना को स्वीकार करने और अपनी रचनात्मकता में सुधार करने से ही छंदप्रसंग की सार्थकता है।छंदप्रसंग में ऐसे ही कवियों का जिक्र करना चाहता हूँ जो स्वाभिमानी हों आत्ममुग्ध न हों।सातवें आसमान के कवियों को दूर से ही प्रणाम।

1 टिप्पणी:

  1. आलोचना कटु औषधि होती है।
    अगले लेख की प्रतीक्षा है।

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