रविवार, मार्च 08, 2015

समीक्षा
गर्मजोशी से भरे नवगीत

 #भारतेन्दु मिश्र

नवगीत की ताजी बयार तभी आ सकती है जब सहृदय लोग अपनी वर्जना की खिडकियो को खोलना चाहेंगे।पेशे से पत्रकार कवि भाई ओमप्रकाश तिवारी का पहला गीत संग्रह खिडकियां खोलो सचमुच नई ताजगी का संकेत है।नवगीत मे जो एक सामाजिक सरोकार की बात की जाती है -ये अधिकांश नवगीत उसी संवेदना के प्रतिमान कहे जा सकते हैं।ओमप्रकाश तिवारी के इस पहले नवगीत संग्रह से बहुत उम्मीद जगती है कि नवगीत अभी मरा नही है।मुम्बई कवि की कर्मस्थली है जहां सपनो के लिए तन मन सबकुछ खरीदे और बेचे जाने की सतत पर्ंपरा उद्योग बन चुकी है।उस परिवेश मे आम आदमी के सुख दुख को नवगीत के शिल्प में प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण कार्य ओमप्रकाश तिवारी बखूबी निभा रहे हैं।गत वर्ष लखनऊ यात्रा मे नवगीत परिसंवाद-2013 मे उनके नवगीत सुनकर आश्वस्ति हुई थी।अब उनके नवगीत संग्रह पर टिप्पणी करते हुए भी आह्लाद का अनुभव हो रहा है।पहले गीत का अंतिम अंश देखिए-
मुस्कुराओ/तुम दिखाओ गर्मजोशी/अजनबी भी हो अगर अपना पडोसी/बर्फ तो कुछ प्रेम पा कर ही गलेगी/खिडकियां खोलो हवा ताजी मिलेगी।
सचमुच इस संग्रह के गीतो को पढकर नवगीत की ताजी हवा के झोंके का अनुभव किया जा सकता है।दूसरे  गीत का अंश देखें-
बाबू जी की/ एक तर्जनी/कितना बडा सहारा थी/उंगली सिर्फ/ नही थी उंगली/ घर का वही गुजारा थी।
कवि के पास संवेददनाओ को मार्मिक भाषा में नवगीत का सुव्यवस्थित शिल्प देने की कला भी है।हर युवक को कैसी बहू की अपेक्षा होती है देखिए जरा-
बहू चाहिए अफलातून/करे नौकरी वह सरकारी/साथ साथ सब दुनियादारी/बच्चो के संग पति को पाले/घर की भी ले जिम्मेदारी/रोटी भी सेंके दो जून।
ये व्यंग्य तभी निकल पाता है जब कवि के पास अनुभवो के व्यक्त करने वाली संवाद भाषा हो।सटीक भाषा से ही अपेक्षित संवेदना का प्रकटीकरण हो पाता है।राजा के मिथ से कवि ने कई गीत लिखे हैं।राजा प्रतीक है सत्ता का और सामंतवादी सोच का कवि कहता है-
राजा जी को/कौन बताए/राजा नंगा है/पीढी दर पीढी उसने है /पाया यह दर्जा/ताका करती है उसका मुह/पढी लिखी परजा/वह मुस्का दे /मुल्क समझलो बिल्कुल चंगा है।
इसी प्रकार का एक और बिम्ब देखिए-
कलावती के /गांव पधारे राजाजी/धूल उडाती आयीं दो दर्जन कारें/आगे पीछे बन्दूकों की दीवारें/चमक रहा था चेहरा जैसे संगमरमर/गूंज रही थीं गगन फाडती जयकारें/धन्य हो गया दुखिया का दरवाजा जी।
यहा कथ्य के बारे मे जितनी बात की जाय वह कम होगी लेकिन शिल्प की दृष्टि से देखें तो –“चेहरा जैसे संगमरमर” मे छान्दसिक दृष्टि से एक मात्रा कम हो रही है।इसके बावजूद कवि कौशल और अर्थ की लय मे कोई व्यवधान नही आया है।अपने समय की राजनीति नवगीतो मे कैसे धडकती है एक और नमूना देखिए-
क्षमा करो सरदार /कहां से लोहा लाएं हम/हात कबाडी के बेचे सब/खेती के औजार/अधिया पर दे खेत/शहर मे करते लोग बेगार/पाले हैं तो पाले रहिए /आप प्रगति का भ्रम।
इस प्रकार विसंगतियो को स्वर देते ये नवगीत अपने लिए स्वयं जगह बनाते दिखाई देते हैं।अपनी ही पत्रकार बिरादरी पर प्रहार करते हुए कवि कहता है-   बिक चुकी है रोशनाई क्या लिखोगे/मत गुमां पालो कि हैं अखबार में/सोच लो हम भी खडे बाजार में/बिक रहे है सब मियां/तुम कब बिकोगे।
और अंत मे मुझे लगता है कि भाई ओमप्रकाश तिवारी ने मध्यवर्ग की जिस चेतना के चश्मे इन गीतो का पाठ तैयार किया है वह बहुत स्वागत योग्य है।एक गीत की पंक्तियो मे कवि कहता है-“मध्य मे हू/ कहां जाऊं।“ तो ये जो जीना यहां मरना यहां वाली विवशता है उसका प्रकटीकरण नवगीत के माध्यम से कर पाना आसान नही है।कवि को इन सुन्दर गीतों मे पिरोई सामाजिक सरोकारो की सकारात्मक धारदार ऊर्जा के लिए हार्दिक शुभकामनाएं-कि वो ऐसे ही अपने समय को नवगीत मे ढालने का काम करता रहे।
खिडकियां खोलो:नवगीत संग्रह/कवि:ओमप्रकाश तिवारी/प्रकाशन:बोधि,प्रकाशन जयपुर/मूल्य:90/वर्ष;2014



2 टिप्‍पणियां:

  1. समाज के सबसे बड़े वर्ग की सोच, मान्यताओं और सर्वोपरि सुख-दुख को शाब्दिक करने के क्रम में ओमजी सफल रहे हैं. उनके नवगीत संग्रह ’खिड़कियाँ खोलो..’ से गुजरना वस्तुतः एक तोषकारी अनुभव है. नवगीतों की प्रासंगिकता तथा इसके सामर्थ्य पर प्रश्न करने वालों के लिए ओमजी का नवगीत-संग्रह एक सटीक उत्तर है. इस भाव को भारतेन्दुजी ने अपनी पड़ताल के माध्यम से और व्यापक किया है.
    भारतेन्दुजी द्वारा प्रस्तुत सार्थक उद्धरणों से समीक्षा रोचक तो बन ही पड़ी है, अर्थवान भी हो गयी है. ओमजी की संप्रेषणीयता आश्वस्त करती है. इसी लय में कहूँ तो एक सशक्त नवगीतकार द्वारा सार्थक नवगीत-रचनाओं पर चर्चा एक शुभ संकेत है. रचनाओं और रचनाकार के लिए तो है ही, नवगीत विधा के लिए भी.
    शुभ-शुभ

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