समीक्षा
निराला का स्तवन
महाप्राण ,यतीन्द्रनाथ राही का खण्डकाव्य है। समकालीन कविता के दौर में प्रबन्ध काव्य की परम्परा लुप्त सी हो गयी है। नई कविता के सहज सरल मार्ग का प्रभाव कहें या दबाव कहें -सच तो यह है कि बिना लय छन्द को जाने ही तमाम महाकवि बन गये हैं।हमारे बीच में ऐसे बडे कवि पाये जाने लगे हैं। ऐसे लोग किसी खास विचारधारा के नाम पर राजनीति करते हुए अपना खेमा बनाये हुए आगे बढ रहे हैं। अकादमियों मे उनकी खास पहुँच बनी हुई है। अखबारों मे पत्रिकाओं मे भी जो सम्पादक बैठे हैं उनको या तो भारतीय काव्य मूल्यों की समझ नही है या फिर वे भी किसी राजनीति से बँधे हुए हैं। स्थिति यहाँ तक दयनीय बनी हुई है कि खण्डकाव्य और प्रबन्ध काव्य के बारे में पढाने वाले नये अध्यापक नगण्य हो गये हैं ऐसे समय में यतीन्द्रनाथ राही का खण्डकाव्य कविता में भारतीय मूल्यों की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करने वाला प्रयास कहा जाना चाहिए।
सच यह भी है कि निराला जैसे महाकवि को विषय बनाकर खण्डकाव्य लिखना आसान काम नही है। कवि राही का छन्द सधा है। भाषा सहज है। निराला को कवि ने मैनपुरी के किसी कवि सम्मेलन में देखा और मुग्ध होकर उनपर मुग्ध भाव से यह लम्बी कविता लिखी। खण्डकाव्यत्व की कसौटी पर महाप्राण को परखने की आवश्यकता है। खण्डकाव्य में नायक के जीवन की किसी घटना विशेष को लक्ष्य बनाकर लिखे जाते रहे हैं। महाप्राण में वैसा कुछ देखने को नही मिलता। अर्थात इस खण्डकाव्य में निराला की जीवनी का अंश बहुत कम मुखर हो पाया है,निराला का गुडकीर्तन तो कवि ने बहुत खूब किया है। निराला का जीवन किंवदंतियों से भरा हुआ था। कवि यदि निराला के जीवन को लक्षित करते हुए घटनाओं को कुछ और विस्तार दे पाता तो इस खण्डकाव्य का महत्व और रेखांकित किया जा सकता। बहरहाल कवि श्री राही की भाषा का माधुर्य और निराला के प्रति उसका भक्तिभाव निश्चित रूप से समादरणीय है। सरोज ,मनोहरा आदि की छवियाँ कम उभरती हैं किंतु निराला की छवि कवि के मन में बार उभरती रही है यही कारण है कि वह निराला के शब्द चित्र बडे मार्मिक ढंग से निर्मित किये हैं-
कमनीय कल्पना में चुभती/धरती की फटी बिवाँई थी
जितने ऊँचे थे स्वप्न शिखर /उतनी यथार्थ गहरायी थी।
तथा-
लोकोत्तर काव्य चेतना थी/व्यापक करुणा संघर्ष अकथ
उस व्यक्तिबोध में झंकृत था/युग पीडा का विस्तार वृहद।
श्रृगार राग की अरुणाभा/नैराश्य तिमिर की अमा निशा
शोकांतिक झूले पलकों पर/निर्लिप्त फकीरी जिजीविषा।
हे कल्प पुरुष हे क्रांति रथी/प्रतिपद परिवर्तन की आहट
दल अनय दैन्य वैषम्य गुल्म/तुम सघन छाँव दृढ अक्षयवट।
आज के सन्दर्भ मे ऐसी भाषा की बुनावट कर पाने वाले कवि कम ही रह गये हैं। महाप्राण का मूल स्वर ओज का है। पठनीयता का प्रवाह मन आकर्षित करता है। कथावस्तु या कि निराला की जीवनी के मार्मिक प्रसंगों का किंचित और समावेश हो पाता तो महाप्राण की महाप्राणता और खण्डकाव्यत्व दोनो ही सध जाते। अंतत: निराला की चर्चा ही इतनी महान है कि उनका स्मरण किसी भी रूप में किया जाय मन को आनन्द प्रदान करता है। मेरी दृष्टि में यही इस कृति का महत्व है।
शीर्षक:महाप्राण
कवि:यतीन्द्रनाथ राही
प्रकाशक:ऋचा प्रकाशन,106,शुभम 7 न.बीडीए मार्केट शिवाजी नगर भोपाल-16
मूल्य:100/, वर्ष:2009
thank you very much.
प्रत्युत्तर देंहटाएंbhartendu ji. rachanayen bohot sundar hain. lok jeewan ki jhaankiyan jeewant hoti hain. madari ki ladki aur gujariya padhne par niraala ji ki yaad aati hai.
प्रत्युत्तर देंहटाएंउद्धरण से ही स्पष्ट होरहा है कि काव्य-भाषा एवं शिल्प पुष्ट है, विषय तो विशिष्ट है ही । लेखक बधाई के पात्र हैं ।
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